Saturday, 21 February 2026

एआई युग का उदय : बदलते भारत में अवसरों की आंधी, चुनौतियों का इम्तिहान

एआई युग का उदय : बदलते भारत में अवसरों की आंधी, चुनौतियों का इम्तिहान  

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) अब केवल तकनीकी शब्द नहीं, बल्कि बदलते भारत की नई दिशा बनती जा रही है। डिजिटल विस्तार के बाद अब देश एक ऐसी तकनीकी क्रांति के द्वार पर खड़ा है, जहां मशीनें सोचेंगी, विश्लेषण करेंगी और निर्णय प्रक्रिया में भी भागीदारी करेंगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल के वर्षों में एआई को भारत की विकास यात्रा काटेक्नोलॉजिकल टर्निंग प्वाइंटबताते हुए इसे स्टार्टअप, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशासनिक सुधार से जोड़ा है। दुनिया में तेजी से बढ़ती एआई प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के सामने दोहरी चुनौती है, तकनीक को अपनाना और उससे उत्पन्न जोखिमों को नियंत्रित करना। युवाओं के लिए यह अवसरों का नया आकाश खोल सकती है, लेकिन पारंपरिक रोजगार संरचना पर इसका प्रभाव भी स्पष्ट दिखने लगा है। डेटा सुरक्षा, फेक कंटेंट और स्किल गैप जैसे मुद्दे भविष्य की बड़ी बहस बनने वाले हैं। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है, क्या एआई भारत को वैश्विक तकनीकी नेतृत्व तक पहुंचाएगी या नई असमानताओं का कारण बनेगी

सुरेश गांधी

21वीं सदी का तीसरा दशक तकनीकी बदलावों का सबसे तेज दौर माना जा रहा है। इंटरनेट के बाद यदि किसी तकनीक ने वैश्विक व्यवस्था को सबसे अधिक प्रभावित किया है, तो वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस) है। जहां मशीनें केवल आदेशों का पालन नहीं करतीं, बल्कि निर्णय लेने, विश्लेषण करने और सृजनात्मक कार्य करने की क्षमता भी विकसित कर रही हैं। वैश्विक स्तर पर विकसित हो रही इस तकनीक का प्रभाव अब स्पष्ट रूप से भारत में भी दिखाई देने लगा है। शिक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य, मीडिया, कृषि और प्रशासन, हर क्षेत्र में एआई नई संभावनाओं का द्वार खोल रही है। भारत जैसे युवा देश में यह तकनीक केवल एक डिजिटल उपकरण नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की बड़ी शक्ति बनती दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कई मंचों पर एआई को “21वीं सदी के विकास का इंजनबताते हुए इसके माध्यम से भारत को वैश्विक तकनीकी नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ाने की बात कही है।

आज एआई केवल कंप्यूटर प्रोग्रामिंग तक सीमित नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था, राजनीति, शिक्षा, मीडिया और सामाजिक व्यवहार तक को प्रभावित करने लगी है। वैश्विक स्तर पर ओपेन एआई जैसी संस्थाओं द्वारा विकसित एआई मॉडल ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाला समयडेटा आधारित निर्णयका होगा। इसी परिप्रेक्ष्य में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी और तेजी से विकसित हो रहा डिजिटल ढांचा मौजूद है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अवधारणा 1950 के दशक में वैज्ञानिक शोध का विषय थी। शुरुआती प्रयोगों में मशीनों को सीमित कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया गया, लेकिन पिछले दशक में बिग डेटा, क्लाउड कंप्यूटिंग और मशीन लर्निंग ने एआई को व्यावहारिक रूप दे दिया। भारत में डिजिटल ढांचे के विस्तार ने इस तकनीक को अपनाने की गति तेज की। डिजिटल इंडिया अभियान ने सरकारी सेवाओं से लेकर ग्रामीण इंटरनेट तक तकनीकी आधार मजबूत किया, जिससे एआई के प्रयोग की संभावनाएं बढ़ीं।

 अब इसी आधार पर एआई भारत मेंदूसरी डिजिटल क्रांतिका संकेत दे रही है। एआई आधारित लर्निंग प्लेटफॉर्म छात्रों की क्षमता के अनुसार अध्ययन सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं। इससे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से लेकर स्कूल शिक्षा तक नई पद्धति विकसित हो रही है। एआई आधारित प्लेटफॉर्म छात्रों को व्यक्तिगत सीखने का अनुभव दे रहे हैं। अब पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि डेटा आधारित सीखने की प्रक्रिया बनती जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी स्मार्ट शिक्षा मॉडल विकसित होने की संभावना बढ़ी है। देखा जाएं तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विस्तार ने रोजगार को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक ओर एआई उत्पादन क्षमता बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक नौकरियों पर खतरे की आशंका भी बढ़ रही है। विशेष रूप से डेटा एंट्री, बेसिक कंटेंट निर्माण, ग्राहक सेवा और अकाउंटिंग जैसे क्षेत्रों में ऑटोमेशन तेजी से बढ़ रहा है।

भारत जैसे युवा देश के लिए यह परिवर्तन निर्णायक साबित हो सकता है। अनुमान है कि आने वाले दशक में लाखों नई टेक्नोलॉजी आधारित नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन उतनी ही तेजी से पुराने कौशल अप्रासंगिक भी होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि अबडिग्री आधारित रोजगारका मॉडल बदलकरस्किल आधारित रोजगारकी दिशा में जा रहा है। यदि समय रहते कौशल विकास पर ध्यान नहीं दिया गया तो एआई अवसर से अधिक संकट बन सकती है। सरकार द्वारा डिजिटल प्रशिक्षण और स्टार्टअप को बढ़ावा देने की पहल इस चुनौती से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। तेज पहचान और सस्ती चिकित्सा : मेडिकल इमेजिंग, रोग पूर्वानुमान और दवा अनुसंधान में एआई की भूमिका तेजी से बढ़ रही है। इससे ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है। एआई रोगों की शुरुआती पहचान, मेडिकल इमेजिंग और दवा अनुसंधान में तेजी ला रही है। इससे भारत जैसे बड़े देश में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने की उम्मीद है।

मौसम पूर्वानुमान, फसल रोग पहचान और मिट्टी विश्लेषण में एआई किसानों के लिए उपयोगी साबित हो रही है। इससे उत्पादन बढ़ने के साथ लागत घटाने की संभावना है। समाचार लेखन, वीडियो संपादन और डिजिटल कंटेंट निर्माण में एआई नई संभावनाएं लेकर आई है, लेकिन इसके साथ फेक कंटेंट का खतरा भी बढ़ा है। एआई ने मीडिया उद्योग को सबसे तेजी से प्रभावित किया है। समाचार लेखन, वीडियो संपादन, ग्राफिक्स निर्माण और डिजिटल प्रस्तुतिकृइन सभी क्षेत्रों में एआई का उपयोग बढ़ रहा है। अब कुछ सेकंड में डेटा आधारित रिपोर्ट तैयार हो जाती है। इससे मीडिया की गति बढ़ी है, लेकिन विश्वसनीयता को लेकर नए प्रश्न भी खड़े हुए हैं। डीपफेक वीडियो और एआई जनरेटेड कंटेंट सूचना संकट का कारण बन सकते हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म आधारित पत्रकारिता के दौर में मीडिया संस्थानों के सामने दोहरी चुनौती है, तकनीक अपनाना, सत्यता बनाए रखना. विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य मेंह्यूमन एडिटिंग $ एआई प्रोसेसिंगमॉडल सबसे प्रभावी रहेगा।

भारत में एआई का सबसे बड़ा प्रभाव रोजगार संरचना पर पड़ेगा। अवसर : एआई इंजीनियरिंग और डेटा साइंस, डिजिटल स्टार्टअप : वैश्विक फ्रीलांस मार्केट. पारंपरिक नौकरियों में कमी, तेजी से बदलती स्किल जरूरतें, तकनीकी असमानता. विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय मेंरी-स्किलिंगऔरअप-स्किलिंगही रोजगार सुरक्षा का आधार बनेंगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एआई कोमानव केंद्रित तकनीकबताया है। उनका जोर इस बात पर रहा है कि तकनीक का उपयोग सामाजिक विकास के लिए हो, कि केवल व्यावसायिक लाभ के लिए। उनके अनुसार एआई के माध्यम से सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता बढ़ेगी, स्टार्टअप इकोसिस्टम मजबूत होगा, भारतीय भाषाओं का डिजिटल विस्तार होगा, डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी. भारत में बहुभाषी एआई मॉडल विकसित करने की दिशा में सरकारी प्रयास इसी दृष्टि को दर्शाते हैं।

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं है. ऑटोमेशन के कारण कई पारंपरिक क्षेत्रों में नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग डिजिटल युग का सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। एआई आधारित फर्जी वीडियो और कंटेंट लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चुनौती बन सकते हैं। यदि एआई तकनीक कुछ देशों तक सीमित रही, तो डिजिटल उपनिवेशवाद जैसी स्थिति बन सकती है। एआई का लाभ तभी संभव है जब तकनीक और नीति साथ-साथ चलें। भारत को तीन स्तरों पर काम करना होगा, स्किल आधारित शिक्षा मॉडल, मजबूत डेटा सुरक्षा कानून, स्वदेशी एआई अनुसंधान. एआई भारत के लिए केवल तकनीक नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने वाला उपकरण है। यदि इसे रोजगार, शिक्षा और नवाचार से जोड़ा गया तो यह भारत को वैश्विक तकनीकी नेतृत्व तक पहुंचा सकती है। लेकिन यदि तैयारी अधूरी रही तो यही तकनीक बेरोजगारी, डिजिटल असमानता और सूचना संकट को बढ़ा सकती है।  अब सवाल यह नहीं है कि एआई आएगी या नहीं, सवाल यह है कि भारत इस तकनीकी बदलाव का नेतृत्व करेगा या केवल उसका उपभोक्ता बनकर रह जाएगा

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुकी है। संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और भारत, तीनों देश एआई नेतृत्व की दौड़ में हैं, लेकिन उनकी रणनीतियां अलग-अलग हैं। अमेरिका निजी तकनीकी कंपनियों और शोध संस्थानों के माध्यम से एआई में अग्रणी है। ओपेन एआई, गुगल और माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनियां एआई मॉडल विकसित कर वैश्विक बाजार को प्रभावित कर रही हैं। चीन सरकारी नियंत्रण और बड़े डेटा ढांचे के आधार पर एआई विस्तार कर रहा है। निगरानी तकनीक और औद्योगिक ऑटोमेशन में उसने तेज प्रगति की है। भारत का मॉडल अपेक्षाकृत संतुलित माना जा रहा है, जहां स्टार्टअप, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और बहुभाषी तकनीक पर जोर दिया जा रहा है। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल डेटा और युवा प्रतिभा है। एआई का भविष्य केवल तकनीक से नहीं, बल्कि नीति, शिक्षा और नवाचार से तय होगा। भारत यदि कौशल विकास, डेटा सुरक्षा और स्वदेशी अनुसंधान पर ध्यान देता है तो वह वैश्विक एआई शक्ति बन सकता है। अन्यथा यह खतरा बना रहेगा कि भारत तकनीकी बाजार तो बने, लेकिन तकनीकी नेतृत्व से दूर रह जाए। प्रधानमंत्री ने कई वैश्विक मंचों पर एआई कोमानव केंद्रित तकनीकबताते हुए इसके निम्न लाभों पर जोर दिया है, डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूती, स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार, सरकारी सेवाओं में पारदर्शिता, भाषा तकनीक के माध्यम से भारतीय भाषाओं का विकास. भारत में बहुभाषी एआई मॉडल विकसित करने की दिशा में भी प्रयास तेज हुए हैं, जिससे स्थानीय भाषाओं में तकनीकी पहुंच बढ़ सके।

 

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