कालीन उद्योग की आत्मा का अवसान : कैलाश नारायण बरनवाल का जाना, भदोही से विश्व तक शोक की लहर
उद्योग को
प्रतिबंधों
से
बचाने
वाले
योद्धा,
बुनकरों
की
आवाज
और
‘कैलाश
रग्स
इंडस्ट्रीज’
के
संस्थापक
को
नम
आंखों
से
विदाई
सुरेश गांधी
वाराणसी. भारतीय कालीन उद्योग ने आज अपना
एक ऐसा स्तंभ खो
दिया, जिसकी कमी लंबे समय
तक महसूस की जाएगी। कैलाश
रग्स इंडस्ट्रीज, खमरिया, भदोही के संस्थापक और
कालीन उद्योग के दिग्गज कैलाश
नारायण बरनवाल का 80 वर्ष से अधिक
आयु में निधन हो
गया। उनके
निधन की खबर से
भदोही, वाराणसी से लेकर दिल्ली
और अंतरराष्ट्रीय कालीन बाजारों तक शोक की
लहर दौड़ गई है।
उद्योग जगत, निर्यातकों और
बुनकर समाज के लिए
यह केवल एक व्यक्ति
का जाना नहीं, बल्कि
एक युग का अंत
है। मुख़ाग्नि उनके पुत्र आलोक
बरनवाल ने दी, इस
दौरान घाट पर बड़ी
संख्या में निर्यातक व
समाजसेवी सहित क्षेत्रीय नागरिक
मौजूद रहे और नम
आँखों से उन्हें भावभीनी
विदाई दी..
वर्ष 1972 में स्थापित कैलाश
रग्स इंडस्ट्रीज के माध्यम से
कैलाश नारायण बरनवाल ने भारतीय हस्तनिर्मित
कालीनों को वैश्विक पहचान
दिलाई। हैंड नॉटेड और
हैंड टफ्टेड कालीनों में गुणवत्ता, परंपरा
और आधुनिकता का जो संतुलन
उन्होंने स्थापित किया, वह भदोही को
‘कालीन नगरी’ के रूप में
प्रतिष्ठित करने में मील
का पत्थर साबित हुआ। उनकी कंपनी
को कालीन उद्योग में उत्कृष्ट योगदान
के लिए केंद्रीय और
राज्य सरकारों के कई प्रतिष्ठित
पुरस्कार भी मिले।
कैलाश बरनवाल का जीवन संघर्ष
और साहस की मिसाल
रहा। जिस दौर में
बालश्रम के नाम पर
अमेरिका में भारतीय कालीन
उद्योग पर प्रतिबंध लगाने
की कोशिशें तेज थीं और
हजारों बुनकर परिवारों की रोजी-रोटी
संकट में थी, उस
समय वे उद्योग के
पक्ष में चट्टान बनकर
खड़े हुए। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय
मंचों पर तथ्यों के
साथ भारत की बुनकरी
परंपरा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था
की सच्चाई रखी और उद्योग
को बचाने में निर्णायक भूमिका
निभाई।
अखिल भारतीय कालीन
निर्माता संघ के अध्यक्ष
के रूप में उन्होंने
निर्यातकों की समस्याओं को
सरकार तक पहुंचाया, नीतिगत
सुधारों के लिए संघर्ष
किया और बुनकर कल्याण
को उद्योग की मूल आत्मा
बताया। उनका मानना था
कि कालीन केवल निर्यात की
वस्तु नहीं, बल्कि लाखों हाथों की मेहनत और
संस्कारों की पहचान है।
उनके पुत्र अलोक बरनवाल के
अनुसार, कैलाश नारायण बरनवाल ने जीवनभर उद्योग
को परिवार की तरह जिया
और बुनकरों को उसकी रीढ़
माना। आज उनके निधन
पर शोक व्यक्त करने
वालों का तांता लगा
है—उद्योग संगठन, सामाजिक संस्थाएं और बुनकर सभी
नम आंखों से उन्हें याद
कर रहे हैं।
कैलाश नारायण बरनवाल भले ही अब
हमारे बीच नहीं हैं,
लेकिन भारतीय कालीन उद्योग के इतिहास में
उनका नाम संघर्ष, सम्मान
और संवेदनशील नेतृत्व के प्रतीक के
रूप में सदैव जीवित
रहेगा। शोक संवेदना व्यक्त
करने वालो में कालीन
निर्यात संवर्धन परिषद के पूर्व चेयरमैन
सिद्धनाथ सिंह, पूर्व प्रशासनिक सदस्य उमेश गुप्ता मुन्ना,
योगेंद्र राय काका, संजय
मेहरोत्रा, रवि पाटोदिया, एकमा
के पूर्व अध्यक्ष हाजी शौकत अली
अंसारी, एकमाध्यक्ष रजा खान, अहसन
रऊफ खान, असलम महबूब
अंसारी, ओपी गुप्ता, धरम
प्रकाश गुप्ता, रोहित गुप्ता, प्रहलाददास गुप्ता, संजय गुप्ता. बृजेश
गुप्ता, राजेंद्र मिश्रा, घनश्याम शुक्ला, ओमकारनाथ मिश्रा, पूर्व मंत्री रंगनाथ मिश्रा, बच्चा मिश्रा सीइपीसी चेयरमैन कैप्टन मुकेश गोम्बर, कुलदीप राज बॉटल, कुंवर
शमीम अंसारी, पंकज बरनवाल, रुपेश
बरनवाल, डॉ एके गुप्ता,
श्यानारायण यादव, छविराज पटेल, सुदेशना बसु, भारतेन्दु द्विवेदी,
रवि बरनवाल आदि प्रमुख रूप
से शामिल है.

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