Tuesday, 3 February 2026

शिव : देव नहीं, दृष्टि व भविष्य हैं...

शिव : देव नहीं, दृष्टि भविष्य हैं... 

महाशिवरात्रि केवल एक तिथि नहीं, यह भारतीय चेतना का वह क्षण है जहाँ समय, शब्द और विचार, तीनों शिव में लीन होने की आकांक्षा करते हैं। यह रात्रि पर्व नहीं, बल्कि प्रतीक्षा है, उस परम तत्व की, जिसे शैव दर्शनशिवकहता है, उपनिषदसत्’, और आधुनिक मनचेतना महाशिवरात्रि अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य का संकेत है। एक ऐसा भविष्य जहां मनुष्य फिर से मौन से संवाद करेगा, प्रकृति से संघर्ष नहीं, सह-अस्तित्व सीखेगा। शिव विनाशक नहीं, पुनर्सर्जक हैं। और शायद आज, इस थके हुए समय में, हमें उसी पुनर्सर्जना की सबसे अधिक आवश्यकता है. महाशिवरात्रि हमें यही सिखाती है कि ईश्वर मंदिरों में नहीं, जागृत चेतना में निवास करता है। जब जैविक चेतना और ब्रह्मांडीय चेतना का अंतर मिट जाता है, तब शिव केवल पूज्य नहीं रहते, अनुभव बन जाते हैं। और तब मनुष्य शव नहीं रहता, शिव बन जाता है...  

सुरेश गांधी

भारतीय दर्शन में शिव किसी सीमित परिभाषा में बंधे देव नहीं हैं। वे सृष्टि के आरंभ और अंत, दोनों के साक्षी हैं। ऋग्वेद के रुद्र से लेकर कश्मीरी शैव दर्शन केपरमशिवतक, शिव एक विकासमान अवधारणा हैं। वे भस्मधारी भी हैं और नटराज भी; वैराग्य भी और गृहस्थ भी। यही द्वंद्व शिव को आज के मनुष्य के सबसे निकट लाता है। आधुनिक जीवन भी इसी द्वंद्व से भरा है, उपभोग और त्याग, गति और ठहराव, उपलब्धि और रिक्तता। शिव इन विरोधों को मिटाते नहीं, स्वीकार करते हैं। भारतीय पर्व प्रायःदिवसहोते हैं, दीपावली, होली, दशहरा। लेकिन शिव की आराधना रात्रि में क्यों? क्योंकि रात्रि प्रतीक है, अज्ञान की, शून्य की, अनंत की। योग परंपरा मानती है कि महाशिवरात्रि वह समय है जब उत्तरी गोलार्द्ध में ग्रहों की स्थिति ऐसी होती है कि मानव चेतना स्वाभाविक रूप से ऊपर उठने को प्रवृत्त होती है। यह वैज्ञानिक दावा नहीं, लेकिन अनुभूति आधारित सत्य है कि मौन, अंधकार और एकांत में मन अधिक गहराई से स्वयं को सुनता है। यह वहीं क्षण है जब स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा संभव होती है। यह वही रात्रि है जब साधक जागता है, क्योंकि अज्ञान सोता है। कहते हैं, इस रात ध्यान, मौन और जागरण करने से मनुष्य अपने भीतर छिपे शिवत्व से साक्षात्कार कर सकता है। साधकों को आत्मबोध की अनुभूति होती है।

कुंवारी कन्याओं के लिए यह मनचाहे वर की कामना है, विवाहित स्त्रियों के लिए अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद और साधकों के लिए, बंधन से मुक्ति का द्वार। पर शिव को केवल वरदाता मान लेना शिव को सीमित कर देना है। शिव सृजन, पालन और संहार, तीनों के प्रतीक हैं। वे आरंभ भी हैं और अंत भी। देवों के देव महादेव, जिन्हें शिव, शंकर, भोलेनाथ, नीलकंठ और महेश्वर जैसे असंख्य नामों से पुकारा गया, इस रात्रि सृष्टि, पालन और संहारकृतीनों के केंद्र में प्रतिष्ठित दिखाई देते हैं। संस्कृत, अवधी, ब्रज, हिंदी, हर भाषा में शिव साहित्य के केंद्र में रहे हैं। कालिदास काकुमारसंभव’, तुलसी कारामचरितमानस’ (जहाँ शिव रामभक्ति के आदर्श हैं), आधुनिक हिंदी कविता में अज्ञेय, केदारनाथ सिंह, और धूमिल तक, शिव प्रतीक बनकर उपस्थित हैं। शिव साहित्य मेंकहनाकम, ‘संकेतअधिक है। शायद इसलिए कि शिव को कहा नहीं जा सकता, केवल जिया जा सकता है। धार्मिक और योगिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि की रात्रि में ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर होता है। यही कारण है कि इस रात्रि जागरण, ध्यान और साधना को विशेष महत्व दिया गया है। यह केवल व्रत या कर्मकांड नहीं, बल्कि चेतना की दिशा बदलने का अवसर है।

काशी : जहां शिव शव नहीं, चेतना बन जाते हैं

काशी केवल एक नगर नहीं, एक अवस्था है। यहाँ शिवमृत्यु के देवनहीं, ‘मुक्ति के सूत्रधारहैं। काशी को समझने के लिए मानचित्र नहीं, चेतना चाहिए। यह शहर नहीं, समय है। यह भूगोल नहीं, ब्रह्मांड है। जहां दुनिया शहरों को बसाती है, वहां काशी स्वयं प्रकट होती है। यहां जीवन और मृत्यु एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के दो चरण हैं। यही कारण है कि काशी को देखने नहीं, अनुभव करने की आवश्यकता होती है। और यही अनुभव महाशिवरात्रि की रात्रि में अपने चरम पर होता है, जब शिव, शक्ति, चेतना और ऊर्जा एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं। मान्यता है कि काशी में मृत्यु, अंत नहीं, आरंभ है। महाशिवरात्रि पर काशी की गलियां केवल श्रद्धालुओं से नहीं, कथाओं से भर जाती हैं। हर दीपक, हर शंख ध्वनि, हर हर महादेव का उद्घोष, समय को रोक देता है। मतलब साफ है काशी का शिव केवल धार्मिक नहीं, सांस्कृतिक और दार्शनिक भी है। या यूं कहे यदि भारत की आत्मा कहीं सबसे स्पष्ट रूप में स्पंदित होती है, तो वह काशी है। महाशिवरात्रि की रात काशी केवल नगर नहीं रहती, वह जीवित मंत्र बन जाती है। पतितपावनी मां गंगा के तट पर बसे घाटों पर दीपों की कतारें, शंख-घड़ियाल की गूंज, हर-हर महादेव के जयकारे और मध्यरात्रि में बाबा विश्वनाथ का दिव्य श्रृंगार, यह दृश्य स्वयं में मोक्ष का अनुभव करा देता है। धर्मग्रंथों के अनुसार काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी है। इसलिए प्रलय में भी इसका नाश नहीं होता। यही कारण है कि सप्तपुरियों में काशी को मोक्ष की नगरी कहा गया है।

काशी : मोक्ष का स्थायी पता

काशी को अविमुक्त क्षेत्र कहा गया है, अर्थात जिसे शिव कभी नहीं छोड़ते। मान्यता है किकाशी में प्राण त्याग करने वाले को शिव स्वयं कान में तारक मंत्र देते हैं”, जिससे जीव जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है। मत्स्यपुराण कहता है कि जो जप, ध्यान, ज्ञान से वंचित हैं, उनके लिए काशी ही अंतिम गति है। खास यह है कि दुनिया में शायद काशी ही एकमात्र स्थान है जहां शिव दो रूपों में, एक ही नाम से विराजमान हैं। 1. गंगा तट पर स्थित प्राचीन काशी विश्वनाथ, 2. काशी हिंदू विश्वविद्यालय परिसर स्थित नया विश्वनाथ मंदिर. बीएचयू का मंदिर आधुनिक होते हुए भी चेतना में उतना ही प्राचीन है। महामना मदन मोहन मालवीय को प्राप्त दिव्य आदेश और बिरला परिवार की श्रद्धा ने इसे आकार दिया।

पांच आरतियां : सृष्टि का दैनिक चक्र

काशी विश्वनाथ की पांच आरतियां मानो ब्रह्मांड के पांच चरण हों, मंगला आरती : सृष्टि का जागरण, भोग आरती : पालन, सप्तऋषि आरती : ज्ञान, श्रृंगार आरती : वैभव, शयन आरती : लय

कांवड़ : तपस्या का उत्सव

तीर्थराज प्रयाग से काशी तक 120 किमी की यात्रा केवल पैदल चलना नहीं, बल्कि आत्मसंयम की साधना है। ब्रह्मचर्य, नंगे पांव, बिना साबुन, तेल, यह आधुनिक मनुष्य के लिए असंभव सा लगता है, लेकिन कांवड़िए इसे सहज भाव से करते हैं।

गंगा : मां, मार्ग और मोक्ष

काशी में गंगा उत्तरवाहिनी हो जाती हैं, मानो स्वयं शिव को प्रणाम करने के लिए। घाटों पर जीवन बसता है जन्म, विवाह, साधना और मृत्यु, सब एक साथ।

मुगल आक्रांता और शिव की अविच्छिन्नता

गोरी से औरंगज़ेब तक, काशी को तोड़ा गया, लेकिन शिव को नहीं। ज्ञानवापी आज भी इस सत्य की गवाही देता है किसंरचनाएं गिर सकती हैं, चेतना नहीं।

शिव और जाति-विमर्श : भस्म समानता का प्रतीक

शिव का शरीर भस्म से लिप्त है, यह कोई श्रृंगार नहीं, यह संदेश है। भस्म सबको समान कर देती है। शैव परंपरा में जाति, वर्ण, लिंग, सब गौण हैं। नाथ पंथ, वीरशैव, लिंगायत आंदोलन, सभी ने शिव को सामाजिक समता के प्रतीक के रूप में देखा। आज जब समाज फिर से विभाजनों की ओर बढ़ रहा है, शिव की भस्म हमें स्मरण कराती है, अंततः सब राख हैं।

शिव और विज्ञान : नटराज का ब्रह्मांड

सर्न परिसर में स्थापित नटराज की प्रतिमा केवल सांस्कृतिक प्रतीक नहीं। यह इस बात की स्वीकारोक्ति है कि भारतीय दर्शन ने सृष्टि कोनृत्यके रूप में देखा, ऊर्जा का सतत प्रवाह। आधुनिक भौतिकी भी कहती है, कुछ भी स्थिर नहीं। शिव का तांडव इसी गतिशीलता का रूपक है।

महाशिवरात्रि और आज का युवा

आज का युवा शिव को इंस्टाग्राम, रील्स, टैटू और डार्क एस्थेटिक्स में खोजता है। यह सतही लग सकता है, लेकिन यह भी एक खोज है, पहचान की, अर्थ की। शिवपरफेक्टनहीं हैं। वे त्रुटियों, विष और विषाद को भी धारण करते हैं। शायद इसलिए युवा उनसे जुड़ता है, क्योंकि शिव सफलता का नहीं, स्वीकार का देवता है।

स्त्री और शिव : शक्ति के बिना शून्य

शिव बिना शक्ति के शव हैं, यह कथन केवल धार्मिक नहीं, दार्शनिक है। पार्वती, काली, दुर्गा, शक्ति के रूपों के बिना शिव निष्क्रिय हैं। यह स्त्री को पूज्य बनाने की नहीं, आवश्यक मानने की परंपरा है।

महाशिवरात्रि : उपवास या उपस्थिति?

उपवास का अर्थ केवल भोजन त्याग नहीं।उपयानी निकट, ‘वासयानी ठहरना, अपने निकट ठहरना। महाशिवरात्रि आत्म-समीक्षा की रात्रि है।

शव ही शिव है’ : चेतना का दर्शन

आज मनुष्य की स्थिति उस गुब्बारे जैसी हो गई है जो स्वयं हवा से भरा होकर भी बाहर हवा खोज रहा है। हम धर्म को सैद्धान्तिक, कर्मकांड को औपचारिकता और जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों का उत्सव मान बैठे हैं। इसी भ्रम में सत्य हमारी पकड़ से दूर होता चला गया। सनातन दर्शन का एक अत्यंत गूढ़ सूत्र है, “शव ही शिव है और शिव ही शव भी।अंतर केवल एक है, ईश्वरीय तत्व की अनुभूति। जिस शरीर में चेतना जागृत नहीं, वह शव है। और जिस चेतना ने शरीर को साधन बना लिया, वह शिव है। आज का मनुष्य इसी द्वंद्व में फंसा है। हम संसाधनों से घिरे हैं, लेकिन अनुभूति से वंचित। हम शरीर को ही स्वयं मान बैठे हैं, जबकि शरीर केवल उपकरण है। महाशिवरात्रि इसी बोध की रात्रि है कि हम शिव बनकर जिएं या शव बनकर, यह हमारा चयन है। विज्ञान भी स्वीकार करता है कि हर ऊर्जा शरीर तक सीमित नहीं होती, पर उसकी तरंगें और आवृत्तियां उसका अस्तित्व सिद्ध करती हैं। गुरुत्वाकर्षण, विद्युत-चुंबकीय बलकृये सभी बिना शरीर के भी अनुभव किए जाते हैं। ठीक इसी प्रकार शिव भी जैविक चेतना की उस अवस्था का नाम हैं, जहां शरीर और ब्रह्मांड के बीच की रेखा मिट जाती है।

द्वादश ज्योतिर्लिंग : जहां शिव स्वयं प्रकट हुए

यद्यपि शिव सर्वत्र हैं, किंतु पृथ्वी पर बारह ऐसे पवित्र स्थान माने गए हैं जहां भगवान शिव स्वयं ज्योति के रूप में प्रकट हुए, इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर 12 ऐसे स्थान हैं जहां भगवान शिव स्वयं ज्योति के रूप में प्रकट हुए। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। इनका स्मरण मात्र भी मोक्षदायी माना गया है।

1. सोमनाथ : पृथ्वी का प्रथम ज्योतिर्लिंग। श्रापग्रस्त चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण किया। यह ज्योतिर्लिंग पुनरुत्थान का प्रतीक है।

2. मल्लिकार्जुन : यह पिता - पुत्र और पारिवारिक प्रेम का प्रतीक है, जहां शिव - पार्वती पुत्र कार्तिकेय के वियोग में स्वयं ज्योति बन गए।

3. महाकालेश्वर : एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग। समय पर विजय का प्रतीक। यहां शिव काल के भी काल हैं।

4. ओंकारेश्वर : नर्मदा के आकार प्रवाह में स्थित यह लिंग नाद ब्रह्म का प्रतीक है।

5. केदारनाथ : जहां पांडवों के पाप भी हिमालय में गल गए।

6. भीमाशंकर : अत्याचार पर धर्म की विजय का प्रतीक।

7. काशी विश्वनाथ : शिव और शक्ति का अद्वैत स्वरूप :जहां शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं। काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि शिव-शक्ति का जीवंत दर्शन है। यहां शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं, दाहिने भाग में शक्ति स्वरूपा भगवती और वाम भाग में सौम्य शिव। यही अद्वैत भाव काशी को विश्व में अद्वितीय बनाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ वह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जिसके दर्शन मात्र से शेष 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

8. त्र्यंबकेश्वर : जहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ही लिंग में समाहित हैं।

9. वैद्यनाथ : जहां शिव स्वयं वैद्य बनते हैं।

10. नागेश्वर : भय और विष से मुक्ति का प्रतीक।

11. रामेश्वरम : जहां राम भी शिव के शरणागत हैं।

12. घृष्णेश्वर : जहां भक्ति मृत्यु पर भी विजय पा लेती है।

शिव : रोग, भय और मृत्यु से परे का तत्व

सनातन मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना से रोग, कष्ट, दरिद्रता और अकाल मृत्यु का भय नष्ट होता है। शिव किसी एक रूप में सीमित नहीं, वे कण-कण में व्याप्त चेतना हैं। यही कारण है कि शिव को केवल देव नहीं, तत्व कहा गया। यह तत्व जब जागृत होता है, तो जीवन में शांति स्वतः उतर आती है।

भक्ति से बोध तक

हिंदू धर्म ने भक्ति, प्रेम और कल्पना के माध्यम से ईश्वर को मूर्त रूप दिया, ताकि परिवर्तनशील परिस्थितियों में भी सत्य पर विश्वास अडिग रहे। किंतु दुर्भाग्यवश हम मूर्ति की आराधना में उलझ गए और अपने भीतर बसे ईश्वर को पहचानना भूल गए। जब चेतना शरीर की सीमाओं से परे जाएगी, तभी कर्म के माध्यम से वास्तविक धर्म की स्थापना संभव होगी, और तभी हम शव नहीं, शिव बनकर जी पाएंगे। महाशिवरात्रि आत्म-जागरण का पर्व है। यह याद दिलाने का अवसर कि जीवन केवल सांसों का गणित नहीं, चेतना की साधना है। निर्णय हमारा है, हम शव बनकर जिएँ या शिव बनकर।

जब शिव जागते हैं, तब सृष्टि स्वयं को पहचानती है

महाशिवरात्रि कोई साधारण पर्व नहीं है। यह रात्रि नहीं, काल का विराम है। यह वह क्षण है, जब सृष्टि की धड़कनें शिव के डमरू से ताल मिलाती हैं, जब अंधकार भी प्रकाश में परिवर्तित हो जाता है और जब मनुष्य अपनी सीमाओं से ऊपर उठकर ब्रह्म से संवाद करता है। सनातन परंपरा में यह वही रात्रि है, जब शिव केवल पूजे नहीं जाते, अनुभूत किए जाते हैं। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी की यह पावन रात्रि शिव-शक्ति के महासंयोग, सृष्टि के संतुलन और चेतना के जागरण का प्रतीक है। शास्त्रों के अनुसार इसी रात्रि भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। यही कारण है कि महाशिवरात्रि को शिव तत्व के प्राकट्य का उत्सव कहा गया है।

महाशिवरात्रि का तात्त्विक अर्थ

महाशिवरात्रि अंधकार से भयभीत होने की नहीं, अंधकार में उतरकर प्रकाश खोजने की रात्रि है। यह पर्व हमें सिखाता है कि शिव बिना शक्ति के अधूरे हैं, शक्ति बिना शिव के दिशाहीन है और मानव बिना आत्मबोध के अशांत है. उपवास, जागरण और रुद्राभिषेक का उद्देश्य केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि है। यह रात्रि काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय की साधना है।

रुद्राभिषेक और महामृत्युंजय : शिव कृपा का द्वार

शास्त्रों में महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक को अत्यंत फलदायी माना गया है। गंगाजल, दूध, दही, घी, शहद और बेलपत्र से किया गया अभिषेक जीवन की समस्त बाधाओं को शांत करता है। महामृत्युंजय मंत्र का जाप, “ त्र्यम्बकं यजामहे...” रोग, भय, ग्रह बाधा और अकाल मृत्यु से रक्षा का महामंत्र माना गया है। मान्यता है कि इस मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करने से जीवन में स्थिरता और मृत्यु के भय से मुक्ति मिलती है।

शिव : औघड़ भी, करुणामय भी

भस्म से विभूषित शरीर, जटाओं में गंगा, गले में सर्प और मस्तक पर चंद्रमा, शिव का स्वरूप विरोधाभासों का सौंदर्य है। वे औघड़ भी हैं और करुणामय भी। वे संहारक भी हैं और सृजनकर्ता भी। यही कारण है कि शिव को देवाधिदेव महादेव कहा गया है। शिव शब्द का अर्थ है, कल्याण। शिव ही शंकर हैं, जो हर विष को अमृत में बदल देते हैं।

आज की काशी, शाश्वत शिवत्व

श्री काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के निर्माण के बाद काशी ने आधुनिकता और सनातनता का अद्भुत संगम देखा है। करोड़ों श्रद्धालु हर वर्ष बाबा के दर्शन को आते हैं, लेकिन काशी की आत्मा वही है, अविचल, अविनाशी, अविमुक्त। 13 दिसंबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लोकार्पित श्रीकाशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर ने आस्था को नई भव्यता दी। 5.27 लाख वर्ग फीट में विस्तारित इस धाम ने काशी को वैश्विक आध्यात्मिक मानचित्र पर और सुदृढ़ किया। मंदिर न्यास के अनुसार, दिसंबर 2021 से जून 2025 तक 26.23 करोड़ श्रद्धालु बाबा के दरबार में शीश नवां चुके हैं। जबकि मंदिर की आय भी 2017 से 18 के 22 से 23 करोड़ से बढ़कर 2023 से 25 में 100 करोड़ के पार तक पहुंच चुकी है। हाल ही में भक्तों द्वारा अर्पित 32 किलो स्वर्ण से गर्भगृह और भी स्वर्णिम हो उठा है।

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