यूपी में सनातन, सियासत और प्रतीकों की राजनीति में नैरेटिव का संग्राम
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों “सनातन” और “अहंकार” जैसे शब्द केवल आध्यात्मिक विमर्श तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ खड़े हुए हैं। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के हालिया बयान, “अहंकारी कभी सनातनी नहीं हो सकता” ने सियासी गलियारों में नई चर्चा को जन्म दिया है। इस बयान को कई राजनीतिक विश्लेषक प्रदेश की वर्तमान सत्ता और हालिया संत-सम्बंधित विवादों से जोड़कर देख रहे हैं। यह विवाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़े हालिया प्रकरण के संदर्भ में चर्चा में है। बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक मंचों पर प्रतिक्रियाओं का दौर तेज हो गया। सत्तापक्ष के समर्थकों ने इसे आस्था पर राजनीति का आरोप बताते हुए पलटवार किया, वहीं विपक्ष ने इसे वैचारिक टिप्पणी बताया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में चल रही नीतियों, विशेषकर धार्मिक स्थलों के विकास, गौ-संरक्षण और कानून-व्यवस्थाकृको लेकर भी बहस फिर से तेज हो गई है
सुरेश गांधी
फिरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति इन
दिनों केवल नीतियों और
योजनाओं तक सीमित नहीं
है, बल्कि छवि, विचारधारा और
सोशल मीडिया नैरेटिव के इर्द-गिर्द
एक नए दौर में
प्रवेश कर चुकी है।
एक ओर विपक्षी बयानबाज़ी
है, तो दूसरी ओर
समर्थकों द्वारा प्रस्तुत विकास और प्रशासनिक मॉडल
का दावा। इसी क्रम में
सोशल मीडिया पर एक संदेश
तेजी से ट्रेंड कर
रहा है, “जब किसी
राज्य का शासक एक
संन्यासी होता है तब
उस राज्य का कल्याण अवश्य
होता है”, जिसे मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली से
जोड़कर देखा जा रहा
है। पिछले कुछ दिनों से
फेसबुक, एक्स और अन्य
डिजिटल मंचों पर राजनीतिक “वार-प्रतिवार” का सिलसिला तेज
हुआ है। एक तरफ
समाजवादी राजनीति से जुड़े बयान
चर्चा में हैं, तो
दूसरी ओर समर्थक योगी
आदित्यनाथ के नेतृत्व को
“निराशा से आशा तक
की यात्रा” के रूप में
प्रस्तुत कर रहे हैं।
यह पूरा विमर्श बताता
है कि अब राजनीति
केवल धरातल पर ही नहीं,
बल्कि डिजिटल मंचों पर भी आकार
ले रही है।
मतलब साफ है
राजनीतिक विमर्श का एक बड़ा
केंद्र अयोध्या धाम और उससे
जुड़े ऐतिहासिक संदर्भ रहे हैं। पूर्ववर्ती
सरकारों की नीतियों और
वर्तमान प्रशासनिक दृष्टिकोण की तुलना करते
हुए दोनों पक्ष अपने-अपने
तर्क प्रस्तुत कर रहे हैं।
किसानों के बीच छुट्टा
पशुओं की समस्या, अवैध
बूचड़खानों पर कार्रवाई और
सामाजिक प्रभाव जैसे मुद्दे भी
इसी बहस का हिस्सा
बन गए हैं। दरअसल,
उत्तर प्रदेश की राजनीति में
धार्मिक प्रतीकों का प्रभाव नया
नहीं है, लेकिन हाल
के वर्षों में यह विमर्श
और अधिक मुखर हुआ
है। ऐसे में बड़ा
सवाल तो यही है
क्या आस्था को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
का आधार बनाया जाना
चाहिए या इसे सांस्कृतिक
परंपरा के रूप में
राजनीति से ऊपर रखा
जाना चाहिए। खासकर चुनावी माहौल के करीब आते
ही शब्दों का यह संघर्ष
और तीखा हो सकता
है। परंतु लोकतंत्र की परिपक्वता इसी
में है कि मतभेदों
के बीच संवाद बना
रहे और आस्था का
विषय सामाजिक समरसता को मजबूत करने
का माध्यम बने, न कि
विभाजन का।
अखिलेश के बयान पर बृजलाल का पलटवार
सनातन और समकालीन राजनीति
को लेकर चल रही
बयानबाज़ी के बीच अखिलेश
यादव के बयान पर
प्रतिक्रिया देते हुए पूर्व
डीजीपी एवं राज्यसभा सांसद
बृजलाल ने सोशल मीडिया
पर तीखा पलटवार किया।
उन्होंने लिखा कि अखिलेश
यादव को सनातन पर
टिप्पणी करने से पहले
इतिहास को याद करना
चाहिए।
1990 की घटनाओं का उल्लेख
बृजलाल ने अपने वक्तव्य
में कहा कि स्वामी
अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी
स्वरूपानंद सरस्वती को 7 मई 1990 को
तत्कालीन सरकार के दौरान गिरफ्तार
किया गया था, जिसे
उन्होंने सनातन परंपरा के इतिहास की
अभूतपूर्व घटना बताया। उस
समय उत्तर प्रदेश में सरकार का
नेतृत्व मुलायम सिंह यादव कर
रहे थे। उन्होंने यह
भी आरोप लगाया कि
उस दौर में अयोध्या
धाम में कारसेवा से
जुड़े घटनाक्रमों ने व्यापक राजनीतिक
विवाद को जन्म दिया
और 1990 की गोलीकांड घटनाओं
का उल्लेख करते हुए समाजवादी
राजनीति पर तुष्टीकरण के
आरोप लगाए।
राजनीतिक विमर्श में सनातन का प्रश्न
पूर्व डीजीपी बृजलाल ने अपने बयान
में कहा कि धार्मिक
आस्था और राजनीतिक विमर्श
को लेकर भ्रम फैलाना
उचित नहीं है और
जनता इतिहास को भली-भांति
जानती है। उन्होंने यह
भी कहा कि सनातन
परंपरा को राजनीतिक दृष्टिकोण
से देखने के बजाय सांस्कृतिक
दृष्टि से समझा जाना
चाहिए।
संन्यास और सत्ताः भारतीय परंपरा का संदर्भ
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में संन्यास का
अर्थ केवल वैराग्य नहीं,
बल्कि अनुशासन, त्याग और लोककल्याण से
भी जोड़ा गया है।
प्राचीन ग्रंथों में राजधर्म और
धर्मनीति का उल्लेख मिलता
है, जहां शासक को
व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर
समाज के हित में
कार्य करने वाला माना
गया है। यही कारण
है कि जब कोई
संन्यासी राजनीति में सक्रिय भूमिका
निभाता है, तो उसकी
कार्यशैली को सामान्य राजनीतिक
दृष्टिकोण से अलग मानकर
देखा जाता है। उत्तर
प्रदेश जैसे विशाल और
जटिल राज्य में प्रशासनिक चुनौतियां
हमेशा से बड़ी रही
हैं। जनसंख्या, भौगोलिक विस्तार, सामाजिक विविधता और आर्थिक असमानता
जैसे कारकों ने यहां शासन
को कठिन बनाया है।
ऐसे में जब एक
धार्मिक पृष्ठभूमि से आए नेता
ने शासन की कमान
संभाली, तो स्वाभाविक रूप
से अपेक्षाएं भी अधिक रहीं।
बदलती छवि : कानून-व्यवस्था से निवेश तक
योगी आदित्यनाथ के
कार्यकाल को लेकर समर्थक
सबसे अधिक जिस विषय
को रेखांकित करते हैं, वह
कानून-व्यवस्था में सुधार का
दावा है। अपराध नियंत्रण,
संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई
और प्रशासनिक सख्ती को उनके शासन
की पहचान के रूप में
प्रस्तुत किया जाता है।
इसके साथ ही औद्योगिक
निवेश को लेकर भी
सरकार लगातार सक्रिय रही है। निवेश
शिखर सम्मेलनों, एक्सप्रेस-वे परियोजनाओं और
औद्योगिक कॉरिडोर के माध्यम से
राज्य को आर्थिक दृष्टि
से मजबूत बनाने की कोशिशें राजनीतिक
विमर्श का प्रमुख हिस्सा
बनी हैं। सरकार समर्थक
यह दावा करते हैं
कि उत्तर प्रदेश अब देश की
प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेजी से
उभर रहा है और
इसे भारत की दूसरी
सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने
का लक्ष्य रखा गया है।
हालांकि आर्थिक आंकड़ों को लेकर विशेषज्ञों
की अलग-अलग राय
भी सामने आती रही है,
लेकिन यह स्पष्ट है
कि विकास का नैरेटिव राजनीतिक
संवाद का केंद्रीय तत्व
बन चुका है।
महिला सुरक्षा का मुद्दा और राजनीतिक संदेश
सोशल मीडिया पर
ट्रेंड हो रहे संदेशों
में महिला सुरक्षा को विशेष रूप
से रेखांकित किया जा रहा
है। “बेटियों में सम्मान और
स्वाभिमान” जैसे वाक्य राजनीतिक
प्रचार का हिस्सा बनते
जा रहे हैं। एंटी-रोमियो स्क्वॉड, मिशन शक्ति और
महिला हेल्पलाइन जैसी योजनाओं को
सरकार की उपलब्धियों के
रूप में प्रस्तुत किया
जाता है। दूसरी ओर
विपक्ष इन दावों की
समीक्षा करते हुए वास्तविक
आंकड़ों और घटनाओं का
हवाला देता है। इस
प्रकार महिला सुरक्षा का मुद्दा भी
राजनीतिक विमर्श का प्रमुख आधार
बन गया है।
सोशल मीडिया का नया राजनीतिक रणक्षेत्र
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने राजनीति की
शैली बदल दी है।
पहले जहां बयान प्रेस
कॉन्फ्रेंस तक सीमित रहते
थे, वहीं अब हर
विचार कुछ ही मिनटों
में लाखों लोगों तक पहुंच जाता
है। हाल के दिनों
में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव के “अहंकार
और सनातन” संबंधी बयान के बाद
सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं की
बाढ़ आ गई। समर्थकों
और विरोधियों दोनों ने अपने-अपने
तर्कों के साथ पोस्ट,
वीडियो और ग्राफिक्स साझा
किए। समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता
पार्टी के समर्थक डिजिटल
मंचों पर लगातार सक्रिय
दिखाई दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
कि आने वाले चुनावों
में सोशल मीडिया की
भूमिका और निर्णायक हो
सकती है।
आस्था बनाम राजनीति : बहस का विस्तार
सनातन, मंदिर, धार्मिक प्रतीक और सांस्कृतिक पहचान,
ये सभी विषय उत्तर
प्रदेश की राजनीति में
लंबे समय से प्रभावी
रहे हैं। लेकिन पिछले
कुछ वर्षों में इनका प्रभाव
और अधिक स्पष्ट हुआ
है। समर्थक योगी आदित्यनाथ की
छवि को “संन्यासी प्रशासक”
के रूप में प्रस्तुत
करते हैं, जबकि विपक्ष
इसे राजनीतिक ब्रांडिंग बताता है। यही कारण
है कि हर बयान
के साथ वैचारिक बहस
भी तेज हो जाती
है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, आस्था
और प्रशासन का संतुलन ही
किसी भी सरकार की
दीर्घकालिक स्वीकार्यता तय करता है।
छुट्टा पशु, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जमीनी चुनौतियां
जहां एक ओर
विकास और निवेश की
चर्चा होती है, वहीं
दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों
में छुट्टा पशुओं की समस्या भी
राजनीतिक बहस का विषय
बनी हुई है। किसानों
की फसलों को नुकसान, गौशालाओं
की व्यवस्था और पशु संरक्षण
के व्यावहारिक पक्ष को लेकर
अलग-अलग दृष्टिकोण सामने
आते रहे हैं। विपक्ष
इसे सरकार की नीति से
जोड़कर सवाल उठाता है,
जबकि सत्तापक्ष इसे संक्रमणकालीन समस्या
बताकर समाधान के प्रयासों की
बात करता है। यह स्पष्ट करता
है कि जमीनी मुद्दे
अभी भी राजनीतिक विमर्श
का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
छवि निर्माण और नेतृत्व की राजनीति
राजनीति में नेतृत्व की
छवि हमेशा निर्णायक रही है। योगी
आदित्यनाथ को समर्थक “निर्णायक”
और “अनुशासित” नेता के रूप
में प्रस्तुत करते हैं। वहीं
विपक्ष उन्हें कठोर प्रशासनिक शैली
वाला नेता बताता है।
छवि निर्माण का यह दौर
केवल भाषणों तक सीमित नहीं
है, बल्कि योजनाओं, कार्यक्रमों और सोशल मीडिया
अभियानों के माध्यम से
लगातार मजबूत किया जा रहा
है।
डिजिटल युग में नैरेटिव की शक्ति
आज राजनीति में
केवल कार्य करना ही पर्याप्त
नहीं माना जाता, बल्कि
उस कार्य को प्रभावी तरीके
से जनता तक पहुंचाना
भी उतना ही महत्वपूर्ण
हो गया है। यही
कारण है कि सोशल
मीडिया टीम, डिजिटल अभियान
और ट्रेंडिंग पोस्ट अब राजनीतिक रणनीति
का हिस्सा बन चुके हैं।
विशेषज्ञों का मानना है
कि डिजिटल नैरेटिव कई बार वास्तविक
मुद्दों से भी अधिक
प्रभाव डालता है, क्योंकि वह
भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है।
विपक्ष की रणनीति और वैचारिक टकराव
अखिलेश यादव लगातार सामाजिक
न्याय, आर्थिक मुद्दों और किसानों की
समस्याओं को उठाते रहे
हैं। उनकी राजनीति विकास
और सामाजिक समीकरणों के संतुलन पर
आधारित बताई जाती है।
वहीं सत्तापक्ष सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और प्रशासनिक सख्ती
को अपनी प्रमुख पहचान
के रूप में प्रस्तुत
करता है। यही वैचारिक
अंतर उत्तर प्रदेश की राजनीति को
लगातार गतिशील बनाए हुए है।
क्या संन्यासी नेतृत्व का मॉडल टिकाऊ है?
यह प्रश्न राजनीतिक
विश्लेषण का महत्वपूर्ण विषय
बन चुका है कि
क्या धार्मिक पृष्ठभूमि से आए नेतृत्व
का मॉडल लंबे समय
तक राजनीतिक रूप से प्रभावी
रह सकता है। कुछ
विशेषज्ञ इसे भारतीय परंपरा
से जुड़ा मॉडल मानते
हैं, जबकि कुछ इसे
राजनीतिक प्रयोग बताते हैं। लेकिन यह
निर्विवाद है कि योगी
आदित्यनाथ का नेतृत्व उत्तर
प्रदेश की राजनीति में
एक अलग शैली लेकर
आया है।
बहस जारी रहेगी
सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहे संदेश, राजनीतिक बयान और वैचारिक प्रतिक्रियाएं बताती हैं कि उत्तर प्रदेश की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। यहां विकास, आस्था, पहचान और नेतृत्वकृसभी मिलकर राजनीतिक विमर्श को आकार दे रहे हैं। संभव है कि आने वाले समय में यह बहस और तीखी हो, लेकिन लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि विभिन्न विचारों के बीच संवाद चलता रहे। अंततः जनता ही तय करती है कि कौन सा मॉडल और कौन सा नेतृत्व उसके भविष्य की दिशा तय करेगा। राजनीति के इस बदलते परिदृश्य में इतना तय है कि संन्यास, सत्ता और सोशल मीडिया, इन तीनों का संगम आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति को और रोचक तथा निर्णायक भूमिका होंगे.



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