Thursday, 5 February 2026

काशी विश्वनाथ : जहां शिव स्वयं समय को थाम लेते हैं...

काशी विश्वनाथ : जहां शिव स्वयं समय को थाम लेते हैं...

आस्था, अध्यात्म और सनातन परंपरा की अनादि धारा का जीवंत प्रतीक काशी विश्वनाथ धाम केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि वह दिव्य केंद्र है जहां शिव स्वयं विश्व के स्वामी के रूप में विराजमान हैं। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित अविमुक्त क्षेत्र काशी को मोक्षदायिनी नगरी माना गया है, जहां मृत्यु भी अंत नहीं, बल्कि मुक्ति का द्वार मानी जाती है। बारह ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान रखने वाले श्री काशी विश्वनाथ के दर्शन के लिए देश ही नहीं, बल्कि दुनिया भर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और बाबा के चरणों में अपनी आस्था अर्पित करते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर की पंच आरतियां - मंगला, भोग, सप्तऋषि, श्रृंगार और शयन, सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सृष्टि के सृजन, पालन, ज्ञान, वैभव और लय के दार्शनिक स्वरूप का प्रतीक हैं। विशेष रूप से महाशिवरात्रि का पर्व काशी में अद्वितीय आध्यात्मिक उल्लास लेकर आता है, जिसे शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। इस दिन चार प्रहर पूजा, रुद्राभिषेक और जलाभिषेक का विशेष महत्व होता है, जिससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति की मान्यता जुड़ी है। इतिहास के अनेक उतार-चढ़ावों के बावजूद काशी विश्वनाथ मंदिर श्रद्धा का अटूट केंद्र बना रहा है। वर्तमान में विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के निर्माण के बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या निरंतर बढ़ी है और बीते वर्षों में करोड़ों भक्त बाबा के दर्शन कर चुके हैं। काशी की आध्यात्मिक ऊर्जा, परंपराएं और शिव भक्ति आज भी सनातन संस्कृति की जीवंत विरासत को संजोए हुए हैं 

सुरेश गांधी

गंगा के तट पर बसी काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि वह जीवंत आध्यात्मिक चेतना है जहां समय भी श्रद्धा के आगे नतमस्तक हो जाता है। यहां की हर सुबह मंगला आरती के साथ जन्म लेती है और हर रात शयन आरती के साथ ब्रह्मांडीय शांति में विलीन हो जाती है। इसी आध्यात्मिक प्रवाह के केंद्र में विराजमान हैंकृ विश्व के स्वामी, मोक्षदाता, काशी पुराधिपति भगवान श्री काशी विश्वनाथ। जब महाशिवरात्रि का पर्व आता है तो काशी का वातावरण केवल उत्सवमय नहीं होता, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं शिव इस नगरी में अपनी उपस्थिति को और प्रकट कर देते हैं। दीपों की रोशनी, मंत्रों की गूंज, गंगा की लहरें और श्रद्धालुओं का सैलाब, सब मिलकर आध्यात्मिक ब्रह्मांड का निर्माण करते हैं।

धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में काशी कोअविमुक्त क्षेत्रकहा गया है। इसका अर्थ है, वह स्थान जिसे भगवान शिव कभी नहीं छोड़ते। स्कंद पुराण के काशी खंड में वर्णन मिलता है कि जब सृष्टि का निर्माण भी पूर्ण रूप से नहीं हुआ था, तब भी काशी अस्तित्व में थी। पौराणिक कथा के अनुसार जब सृष्टि विस्तार के लिए विष्णु और शक्ति ने तपस्या करनी चाही, तब भगवान शिव ने अपने त्रिशूल पर एक दिव्य नगरी की रचना की। यही नगरी आगे चलकर पंचकोशी क्षेत्र और काशी के रूप में प्रसिद्ध हुई। मान्यता है कि जब विष्णु की तपस्या से निकली जलधारा से यह नगर डूबने लगा, तब शिव ने अपने त्रिशूल पर इसे सुरक्षित रखा। इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि काशी केवल भौतिक नगरी नहीं, बल्कि शिव चेतना का केंद्र है। पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी शाम 4ः23 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी शाम 5ः10 बजे तक रहेगी। हालांकि काशी में परंपरा के अनुसार महाशिवरात्रि का मुख्य पर्व 15 फरवरी की रात्रि को ही मनाया जाएगा।

काशी विश्वनाथः बारह ज्योतिर्लिंगों में अद्वितीय 

भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ का विशेष स्थान है। धार्मिक मान्यता है कि यहां स्थापित शिवलिंग स्वयंभू है। इसेविश्वेश्वरयाविशेश्वरभी कहा जाता है। माना जाता है कि अन्य ज्योतिर्लिंग जहां भक्तों को आशीर्वाद देते हैं, वहीं काशी विश्वनाथ मोक्ष प्रदान करते हैं। लोकमान्यता है कि काशी में मृत्यु होने पर स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र देकर जीव को जन्म-मरण के चक्र से मुक्त करते हैं।

इतिहास के उतार-चढ़ाव और विश्वनाथ धाम

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी भी है। कई आक्रमणों के दौरान मंदिर को क्षति पहुंचाई गई। किंतु श्रद्धा की ज्योति कभी बुझ नहीं सकी। अठारहवीं शताब्दी में मालवा की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्तमान मंदिर का निर्माण कराया। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखर को स्वर्ण से अलंकृत करवाया। आज काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के निर्माण के बाद यह परिसर वैश्विक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है।

पंच आरती : ब्रह्मांड की पांच अवस्थाओं का दर्शन

काशी विश्वनाथ मंदिर में होने वाली पांच आरतियां केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि इन्हें ब्रह्मांड यानी सृष्टि के पांच दार्शनिक यानी आध्यात्मिक अवस्थाओं का प्रतीक मानी जाती हैं।

1. मंगला आरती : सृष्टि का जागरण, सुबह ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली मंगला आरती को सृष्टि के जन्म का प्रतीक माना जाता है। जब मंदिर के पट खुलते हैं और शिवलिंग पर प्रथम प्रकाश पड़ता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रह्मांड में चेतना का उदय हो रहा हो। या यूं कहे सुबह तीन बजे बाबा विश्वनाथ को जागृत किया जाता है। मंत्रोच्चार और घंटियों की ध्वनि के बीच जब आरती होती है, तब श्रद्धालुओं को ऐसा अनुभव होता है मानो सृष्टि का पुनर्जन्म हो रहा हो।

2. भोग आरती : पालन और संतुलन, दोपहर में होने वाली भोग आरती सृष्टि के संरक्षण का प्रतीक है। इस समय भगवान शिव को भोग अर्पित किया जाता है। यह संदेश देती है कि शिव केवल संहारक नहीं, बल्कि जीवन के संरक्षक भी हैं।

3. सप्तऋषि आरती : ज्ञान का प्रकाश, संध्या समय होने वाली सप्तऋषि आरती सात महान ऋषियों की स्मृति में होती है। यह आरती आध्यात्मिक ज्ञान और वैदिक परंपरा का प्रतीक है। दीपों की कतारें और वैदिक मंत्र वातावरण को दिव्य बना देते हैं।

4. श्रृंगार आरती : सौंदर्य और वैभव, रात्रि में बाबा विश्वनाथ का अलंकरण किया जाता है। यह आरती शिव के सौंदर्य और दिव्य वैभव का उत्सव है। चंदन, फूल और अलंकारों से सजाए गए शिवलिंग का दर्शन भक्तों के मन को भक्ति से भर देता है।

5. शयन आरती : ब्रह्मांड की लय, दिन की अंतिम आरती ब्रह्मांडीय विश्राम का प्रतीक है। इसमें भगवान शिव को शयन कराया जाता है। बता दें, काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन प्रतिदिन सुबह तीन बजे से रात 11 बजे तक होते हैं। मंदिर सुबह 230 बजे खुलता है और मंगला आरती के साथ दर्शन प्रारंभ होते हैं। भोग आरती सुबह 1130 बजे तथा सप्तऋषि आरती शाम सात बजे होती है। इन आरती के दौरान स्पर्श दर्शन कुछ समय के लिए बंद किया जाता है।

महाशिवरात्रिः शिव और शक्ति का दिव्य मिलन

महाशिवरात्रि का पर्व शिव और पार्वती के पावन विवाह का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन शिव ने वैराग्य से गृहस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाया। ज्योतिषाचार्यो के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि मनाई जाती है। इस दिन प्रदोष काल और रात्रि पूजा का विशेष महत्व होता है। मतलब साफ है महाशिवरात्रि का पर्व काशी में भक्ति और अध्यात्म का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि और ईश्वर से मिलन का अवसर है। जब महाशिवरात्रि की रात काशी में उतरती है, तब मंदिरों की दीपशिखाएं, मंत्रों की ध्वनि और श्रद्धालुओं का समर्पण मिलकर ऐसा वातावरण बनाते हैं, जिसमें सांस लेना भी भक्ति का अनुभव कराता है।

महाशिवरात्रि पर चार प्रहर : पूजा का आध्यात्मिक रहस्य

महाशिवरात्रि की रात्रि में चार प्रहर पूजा का विधान है। प्रथम प्रहर : आत्मशुद्धि, द्वितीय प्रहर : समृद्धि और संतुलन, तृतीय प्रहर : ज्ञान प्राप्ति, चतुर्थ प्रहर : मोक्ष प्राप्ति, मान्यता है कि चारों प्रहर पूजा करने से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। खास यह है कि महाशिवरात्रि पर शिव को अर्पित किए जाने वाले पदार्थों का गहरा आध्यात्मिक महत्व है। बेलपत्र : त्रिगुण संतुलन का प्रतीक, गंगाजल : पवित्रता, दूध : शांति, भांग और धतूरा : वैराग्य और प्रकृति से जुड़ाव.

काशी में महाशिवरात्रि का अद्भुत दृश्य

महाशिवरात्रि की रात काशी जागती है। घाटों से लेकर गलियों तकहर हर महादेवका उद्घोष गूंजता है। श्रद्धालु पूरी रात जागकर रुद्राभिषेक और भजन करते हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर सहित समस्त शिवालयों में विशेष सजावट और सुरक्षा व्यवस्था की जाती है।

आस्था का विराट स्वरूप

पिछले कुछ वर्षों में काशी विश्वनाथ धाम में आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार 26 करोड़ से अधिक श्रद्धालु यहां दर्शन कर चुके हैं। यह संख्या काशी की वैश्विक आध्यात्मिक पहचान का प्रमाण है।

काशी : जहां शिव जीवन का हिस्सा हैं

काशी में शिव केवल देवता नहीं, बल्कि जीवन की शैली हैं। यहां की संस्कृति, संगीत, परंपरा और दर्शन, सब शिवमय हैं। काशी का दर्शन यह सिखाता है कि जीवन क्षणभंगुर है, पर आध्यात्मिक चेतना शाश्वत है। यहां मृत्यु भी उत्सव बन जाती है क्योंकि इसे मोक्ष का द्वार माना जाता है। अर्थात काशी में शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षण में उपस्थित हैं। यहां की गलियों में शिव कथा सुनाई देती है, घाटों पर शिव भक्ति दिखाई देती है और श्रद्धालुओं की आंखों में शिव के प्रति समर्पण झलकता है।

जब आरती में ब्रह्मांड झिलमिलाता है

जब काशी विश्वनाथ मंदिर में दीपों की लौ लहराती है और मंत्रों की ध्वनि गूंजती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रह्मांड स्वयं शिव की आराधना कर रहा हो। महाशिवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का अवसर है। काशी में यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन की अंतिम शरण शिव ही हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर और महाशिवरात्रि का पर्व यह संदेश देता है कि जीवन क्षणभंगुर है, पर शिव की शरण शाश्वत है। काशी में महाशिवरात्रि केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का उत्सव है। यह वही नगरी है जहां मृत्यु भी उत्सव बन जाती है और जहां हर आरती की लौ में ब्रह्मांड की धड़कन सुनाई देती है।

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