महाशिवरात्रि : जब आरती की लौ में सृष्टि सांस लेती है...
काशी में जब महाशिवरात्रि आती है, तो यह केवल एक पर्व नहीं होता, बल्कि वह क्षण होता है जब समय स्वयं ठहरकर शिव के ध्यान में लीन हो जाता है। गंगा की लहरों से उठती मंद स्वर लहरियां, मंदिरों की घंटियों की गूंज, और गलियों में गूंजता ‘हर हर महादेव’, सब मिलकर ऐसा प्रतीत कराते हैं मानो पूरा ब्रह्मांड शिव की उपासना में डूब गया हो। जब काशी विश्वनाथ मंदिर में दीपों की लौ लहराती है और मंत्रों की ध्वनि गूंजती है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो ब्रह्मांड स्वयं शिव की आराधना कर रहा हो। महाशिवरात्रि केवल पर्व नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण का अवसर है। काशी में यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन की अंतिम शरण शिव ही हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर और महाशिवरात्रि का पर्व यह संदेश देता है कि जीवन क्षणभंगुर है, पर शिव की शरण शाश्वत है। काशी में महाशिवरात्रि केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का उत्सव है। यह वही नगरी है जहां मृत्यु भी उत्सव बन जाती है और जहां हर आरती की लौ में ब्रह्मांड की धड़कन सुनाई देती है। इस वर्ष महाशिवरात्रि काशी में विशेष आध्यात्मिक उल्लास और भक्ति भाव के साथ मनाई जाएगी। पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 फरवरी शाम 4ः23 बजे से प्रारंभ होकर 16 फरवरी शाम 5ः10 बजे तक रहेगी। हालांकि काशी में परंपरा के अनुसार महाशिवरात्रि का मुख्य पर्व 15 फरवरी की रात्रि को ही मनाया जाएगासुरेश गांधी
जब संसार की
थकी हुई आत्माएं विश्राम
की तलाश करती हैं,
जब जीवन के प्रश्नों
का उत्तर कहीं नहीं मिलता,
तब कदम स्वयं काशी
की ओर बढ़ जाते
हैं। यह केवल एक
नगर नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक धाम
है जहाँ समय ठहर
जाता है और मृत्यु
भी मोक्ष का उत्सव बन
जाती है। गंगा की
गोद में बसी काशी
के हृदय में विराजमान
हैं भगवान शिव के विश्वरूप,
श्री काशी विश्वनाथ, जिन्हें
करोड़ों श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ के
नाम से पुकारते हैं।
काशी केवल तीर्थ नहीं,
बल्कि सनातन चेतना का जीवंत केंद्र
है। यहां हर सुबह
शिव नाम से आरंभ
होती है और हर
संध्या आरती की लौ
में आत्मा का प्रकाश दिखाई
देता है। सदियों से
यह नगरी भक्तों को
विश्वास दिलाती आई है कि
शिव केवल देव नहीं,
बल्कि जीवन और मृत्यु
के मध्य खड़े वह
करुणामय पिता हैं, जो
हर आत्मा को अपने आलिंगन
में समेट लेते हैं।
हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित है
कि भगवान शिव और काशी
का रिश्ता सृष्टि के आरंभ से
जुड़ा हुआ है। मान्यता
है कि जब सृष्टि
का अंत होता है
और सम्पूर्ण ब्रह्मांड नष्ट हो जाता
है, तब भी काशी
सुरक्षित रहती है, क्योंकि
यह नगरी भगवान शिव
के त्रिशूल पर विराजमान है।
शास्त्रों में कहा गया
है “काश्यां मरणान्मुक्तिः” अर्थात काशी में मृत्यु
होने पर आत्मा को
मोक्ष प्राप्त होता है। यही
विश्वास काशी को संसार
का अद्वितीय आध्यात्मिक केंद्र बनाता है। यहां आने
वाला हर श्रद्धालु केवल
दर्शन करने नहीं आता,
बल्कि आत्मा की मुक्ति का
मार्ग खोजने आता है। महाशिव
पुराण में काशी की
उत्पत्ति की कथा अत्यंत
अद्भुत और आध्यात्मिक रहस्यों
से भरी हुई है।
कथा के अनुसार भगवान
शिव स्वयं पुरुष स्वरूप और शक्ति स्त्री
स्वरूप में प्रकट हुए।
शिव और शक्ति के
संयोग से प्रकृति और
पुरुष की उत्पत्ति हुई।
प्रकृति और पुरुष ने
जब अपने सृष्टिकर्ता को
समझने का प्रयास किया
तो वे भ्रमित हो
गए। उसी समय आकाशवाणी
हुई कि सृष्टि के
विस्तार के लिए तपस्या
आवश्यक है। दोनों ने
भगवान शिव से तपस्या
के लिए स्थान मांगा।
तब भगवान शिव ने अपनी
दिव्य शक्ति से पंचकोशी क्षेत्र
की रचना की, जो
आगे चलकर काशी के
रूप में प्रसिद्ध हुआ।प्रकृति
और पुरुष ने इस दिव्य
नगरी में तपस्या प्रारंभ
की। उनकी तपस्या से
उत्पन्न जलधारा को भगवान शिव
ने अपने त्रिशूल पर
रोक लिया। यही वह क्षण
था जब काशी की
आध्यात्मिक ऊर्जा का जन्म हुआ।
ब्रह्मा द्वारा सृष्टि रचना का प्रारंभ
कथा के अनुसार
तपस्या के दौरान भगवान
विष्णु विश्राम करने लगे और
उनकी नाभि से कमल
प्रकट हुआ। उसी कमल
से ब्रह्मा जी का जन्म
हुआ। भगवान शिव की आज्ञा
से ब्रह्मा जी ने सृष्टि
की रचना प्रारंभ की।
मान्यता है कि भगवान
शिव ने पंचकोशी नगरी
को अपने त्रिशूल से
पृथ्वी पर स्थापित किया
और इसे मोक्षदायिनी नगरी
का स्वरूप प्रदान किया।
अविमुक्त क्षेत्र : जहाँ शिव कभी साथ नहीं छोड़ते
काशी को धार्मिक
ग्रंथों में ‘अविमुक्त क्षेत्र’
कहा गया है। इसका
अर्थ है वह स्थान
जिसे भगवान शिव कभी नहीं
छोड़ते। मान्यता है कि काशी
में शरीर त्यागने वाले
व्यक्ति के कान में
स्वयं भगवान शिव तारक मंत्र
का उच्चारण करते हैं। यह
मंत्र आत्मा को जन्म और
मृत्यु के चक्र से
मुक्त कर देता है।
इसी कारण काशी को
मोक्ष की नगरी कहा
जाता है।
बारह ज्योतिर्लिंगों में विश्वनाथ का सर्वोच्च स्थान
भगवान शिव के बारह
ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ
को विशेष स्थान प्राप्त है। ज्योतिर्लिंग का
अर्थ है दिव्य प्रकाश
स्तंभ, जिसमें भगवान शिव स्वयं विराजमान
होते हैं। विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग
को मोक्ष प्रदान करने वाला ज्योतिर्लिंग
माना जाता है। श्रद्धालुओं
का विश्वास है कि बाबा
विश्वनाथ के दर्शन मात्र
से जीवन के पाप
और कष्ट समाप्त हो
जाते हैं।
विश्वनाथ शिवलिंग की रहस्यमयी आध्यात्मिकता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विश्वनाथ
शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है।
कुछ कथाओं में कहा जाता
है कि इसकी स्थापना
माता शक्ति ने की, जबकि
अन्य मान्यताओं में भगवान विष्णु
द्वारा स्थापना का उल्लेख मिलता
है। शास्त्रों में बाबा विश्वनाथ
को ‘विश्वेश्वर’ कहा गया है,
अर्थात संपूर्ण संसार के स्वामी।
ज्ञानवापी और अविमुक्तेश्वर की परंपरा
धार्मिक ग्रंथों में ज्ञानवापी क्षेत्र
का उल्लेख मिलता है। कई विद्वान
इसे काशी का प्राचीन
आध्यात्मिक केंद्र मानते हैं। मान्यता है
कि अविमुक्तेश्वर शिवलिंग शिव और पार्वती
का आदि निवास स्थान
था। महाभारत के वन पर्व
में भी विश्वनाथ की
महिमा का वर्णन मिलता
है।
इतिहास के संघर्ष और पुनर्निर्माण की गाथा
काशी विश्वनाथ मंदिर
ने इतिहास के अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं।
मध्यकाल में मंदिर कई
बार आक्रमणों का शिकार हुआ।
कहा जाता है कि
आक्रमणों से बचाने के
लिए पुजारियों ने शिवलिंग को
सुरक्षित स्थान पर स्थापित किया।
18वीं शताब्दी में इंदौर की
महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने वर्तमान मंदिर
का निर्माण कराया। बाद में महाराजा
रणजीत सिंह ने मंदिर
के शिखर को स्वर्ण
मंडित कराया।
आस्था का आधुनिक स्वरूप
हाल के वर्षों
में काशी विश्वनाथ धाम
परियोजना ने मंदिर परिसर
को भव्य स्वरूप प्रदान
किया। अब गंगा घाट
से मंदिर तक सीधा मार्ग
उपलब्ध है। इस परियोजना
ने श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़ाई
और काशी को वैश्विक
धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में
स्थापित किया।
आरती परंपरा : शिव भक्ति का जीवंत अनुभव
काशी विश्वनाथ मंदिर
में होने वाली पांच
आरतियां केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं, बल्कि इन्हें ब्रह्मांड यानी सृष्टि के
पांच दार्शनिक यानी आध्यात्मिक अवस्थाओं
का प्रतीक मानी जाती हैं।
1. मंगला आरती
: सृष्टि का जागरण, सुबह
ब्रह्म मुहूर्त में होने वाली
मंगला आरती को सृष्टि
के जन्म का प्रतीक
माना जाता है। जब
मंदिर के पट खुलते
हैं और शिवलिंग पर
प्रथम प्रकाश पड़ता है, तब
ऐसा प्रतीत होता है मानो
ब्रह्मांड में चेतना का
उदय हो रहा हो।
या यूं कहे सुबह
तीन बजे बाबा विश्वनाथ
को जागृत किया जाता है।
मंत्रोच्चार और घंटियों की
ध्वनि के बीच जब
आरती होती है, तब
श्रद्धालुओं को ऐसा अनुभव
होता है मानो सृष्टि
का पुनर्जन्म हो रहा हो।
2. भोग आरती : पालन और संतुलन,
दोपहर में होने वाली
भोग आरती सृष्टि के
संरक्षण का प्रतीक है।
इस समय भगवान शिव
को भोग अर्पित किया
जाता है। यह संदेश
देती है कि शिव
केवल संहारक नहीं, बल्कि जीवन के संरक्षक
भी हैं।
3. सप्तऋषि आरती
: ज्ञान का प्रकाश, संध्या
समय होने वाली सप्तऋषि
आरती सात महान ऋषियों
की स्मृति में होती है।
यह आरती आध्यात्मिक ज्ञान
और वैदिक परंपरा का प्रतीक है।
दीपों की कतारें और
वैदिक मंत्र वातावरण को दिव्य बना
देते हैं।
4. श्रृंगार आरती
: सौंदर्य और वैभव, रात्रि
में बाबा विश्वनाथ का
अलंकरण किया जाता है।
यह आरती शिव के
सौंदर्य और दिव्य वैभव
का उत्सव है। चंदन, फूल
और अलंकारों से सजाए गए
शिवलिंग का दर्शन भक्तों
के मन को भक्ति
से भर देता है।
5. शयन आरती : ब्रह्मांड की लय, दिन
की अंतिम आरती ब्रह्मांडीय विश्राम
का प्रतीक है। इसमें भगवान
शिव को शयन कराया
जाता है। बता दें,
काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन प्रतिदिन
सुबह तीन बजे से
रात 11 बजे तक होते
हैं। मंदिर सुबह 2ः30 बजे खुलता
है और मंगला आरती
के साथ दर्शन प्रारंभ
होते हैं। भोग आरती
सुबह 11ः30 बजे तथा
सप्तऋषि आरती शाम सात
बजे होती है। इन
आरती के दौरान स्पर्श
दर्शन कुछ समय के
लिए बंद किया जाता
है।
काशी : संस्कृति, दर्शन और जीवन का संगम
काशी केवल धार्मिक
नगरी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और दर्शन का
केंद्र है। यहां संगीत,
साहित्य और अध्यात्म की
परंपरा सदियों से जीवित है।
काशी की गलियां, घाट
और मंदिर सनातन संस्कृति की जीवंत झलक
प्रस्तुत करते हैं। धार्मिक
मान्यता है कि काशी
में मृत्यु के समय भगवान
शिव स्वयं भक्त को तारक
मंत्र प्रदान करते हैं। यही
विश्वास काशी को संसार
का अद्वितीय मोक्ष धाम बनाता है।
श्रद्धा का अनंत आश्रय
श्रद्धालुओं के लिए काशी
विश्वनाथ केवल मंदिर नहीं,
बल्कि आत्मा की शांति और
मुक्ति का केंद्र है।
यहां आने वाला हर
व्यक्ति शिव की करुणा
का अनुभव करता है। पिछले कुछ
वर्षों में काशी विश्वनाथ
धाम में आने वाले
श्रद्धालुओं की संख्या में
अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। आंकड़ों
के अनुसार 26 करोड़ से अधिक
श्रद्धालु यहां दर्शन कर
चुके हैं। यह संख्या
काशी की वैश्विक आध्यात्मिक
पहचान का प्रमाण है।
जहाँ शिव स्वयं जीवन का अर्थ समझाते हैं
श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर केवल एक धार्मिक
स्थल नहीं, बल्कि सनातन आध्यात्मिक परंपरा का अमर प्रतीक
है। सदियों के संघर्ष और
पुनर्निर्माण के बावजूद यह
मंदिर श्रद्धालुओं के विश्वास का
केंद्र बना हुआ है।
काशी आज भी गंगा
की धारा, आरती की लौ
और शिव नाम की
गूंज के साथ यह
संदेश देती है कि
जीवन अस्थायी है, पर शिव
की शरण अनंत है।




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