Thursday, 19 February 2026

कालीन से करघे तक की खामोश चीख : क्या आर्थिक जंग में पिछड़ रहा है भारत?

कालीन से करघे तक की खामोश चीख : क्या आर्थिक जंग में पिछड़ रहा है भारत?

सुबह का वक्त भदोही की संकरी गलियों में करघों की आवाज अब पहले जैसी नहीं गूंजती। कुछ घरों में करघे बंद पड़े हैं, कुछ में धूल जमी है और कुछ जगहों पर मजदूर अब दूसरे काम की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। कालीन उद्योग, जो कभी इस इलाके की पहचान हुआ करता था, आज सस्ते वैश्विक उत्पादों और बाजार की प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा है। करीब 52 वर्षीय कालीन कारीगर रामजी बताते हैं पहले एक घर में चार-चार करघे चलते थे, अब मुश्किल से एक चलता है। बाजार में सस्ता सामान आ गया है, हमारी मेहनत की कीमत कम होती जा रही है। यह कहानी केवल भदोही की नहीं है। यह कहानी पूरे पूर्वांचल की है। यह कहानी उस बदलते आर्थिक ढांचे की है जिसमें पारंपरिक हुनर धीरे-धीरे बाजार की प्रतिस्पर्धा में कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है

सुरेश गांधी

वाराणसी का वस्त्र और हस्तशिल्प उद्योग सदियों से भारत की सांस्कृतिक पहचान रहा है। बनारसी साड़ी केवल वस्त्र नहीं बल्कि परंपरा और कला का प्रतीक रही है। लेकिन अब यहां भी स्थिति बदल रही है। मदनपुरा क्षेत्र के बुनकर असलम अंसारी बताते हैं काम तो है, लेकिन लागत बहुत बढ़ गई है। बिजली महंगी है, कच्चा माल महंगा है, और बाजार में मशीन से बने सस्ते उत्पाद आ रहे हैं। ग्राहक कीमत देखता है, मेहनत नहीं। व्यापारियों के अनुसार पिछले दशक में पारंपरिक बुनकरों की संख्या लगातार कम हुई है। युवा पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है क्योंकि इसमें स्थिर आय की गारंटी नहीं है। स्थानीय व्यापारियों का मानना है कि सस्ते विदेशी उत्पादों ने बाजार का संतुलन बदल दिया है। विशेष रूप से चीन से आने वाले उत्पाद कम कीमत और अधिक विविधता के कारण तेजी से बाजार पर कब्जा कर रहे हैं। वाराणसी के एक थोक व्यापारी बताते हैं ग्राहक सस्ता और जल्दी मिलने वाला सामान चाहता है। विदेशी उत्पाद यही सुविधा दे रहे हैं। स्थानीय उत्पाद गुणवत्ता में बेहतर होते हैं लेकिन महंगे पड़ते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार वैश्विक बाजार में उत्पादन लागत और लॉजिस्टिक्स का बड़ा महत्व है। बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाले देश कीमतों में प्रतिस्पर्धा कर पाते हैं, जबकि छोटे उद्योग इस दौड़ में पिछड़ जाते हैं। मिर्जापुर का कालीन उद्योग भी इसी बदलाव से प्रभावित हुआ है। यहां कई मजदूर अब निर्माण कार्य, छोटे व्यवसाय या अन्य असंगठित क्षेत्रों में काम करने लगे हैं। करीब 28 वर्षीय मजदूर सुरेश बताते हैं पहले घर पर ही काम मिल जाता था। अब कालीन का काम कम हो गया है, इसलिए शहर जाकर दिहाड़ी करनी पड़ती है। यह स्थिति केवल आर्थिक बदलाव नहीं दर्शाती, बल्कि सामाजिक संरचना में भी परिवर्तन का संकेत देती है। पारंपरिक उद्योगों के कमजोर होने से परिवारों की पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही आजीविका प्रभावित हो रही है।

पूर्वांचल के कई युवा अब पारंपरिक उद्योगों से हटकर नौकरी या आधुनिक व्यवसाय की ओर बढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक उद्योगों में मेहनत अधिक और आय अनिश्चित होती है। भदोही के एक युवा प्रशिक्षु कहते हैं हम अपने परिवार का काम सीखते हैं, लेकिन भविष्य सुरक्षित नहीं लगता। इसलिए नई तकनीक और नौकरी की तरफ जाना जरूरी लग रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक उद्योगों को आधुनिक तकनीक और बाजार से नहीं जोड़ा गया तो यह पीढ़ीगत बदलाव उद्योगों के लिए गंभीर संकट बन सकता है। पूर्वांचल के व्यापारियों का कहना है कि स्थानीय उद्योगों की सबसे बड़ी समस्या उत्पादन लागत है। बिजली, कच्चा माल और परिवहन खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। भदोही के सीईपीसी के प्रशासनिक सदस्यकालीन निर्यातक रवि पाटौदिया, सीनियर कालीन निर्यातक उमेश गुप्ता मुन्ना, जीतेन्द्र गुप्ता बताते हैं हम गुणवत्ता में बेहतर उत्पाद बनाते हैं लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत भी देखी जाती है। प्रतिस्पर्धा बहुत कठिन हो गई है। उनका कहना है कि यदि स्थानीय उद्योगों को तकनीकी और वित्तीय सहायता नहीं मिली तो निर्यात भी प्रभावित हो सकता है।

स्थानीय उद्योगों के कमजोर होने से केवल रोजगार नहीं घटता, बल्कि सामाजिक संरचना भी प्रभावित होती है। पारंपरिक कारीगरी, जो परिवारों और समुदायों की पहचान रही है, धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। पूर्वांचल के कई गांवों में करघों की जगह अब खाली कमरों ने ले ली है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ा है। सरकार द्वारा पारंपरिक उद्योगों और छोटे व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। कौशल विकास कार्यक्रम, लोन योजनाएं और निर्यात प्रोत्साहन जैसी पहलें लागू की गई हैं। लेकिन स्थानीय उद्योगों से जुड़े लोगों का कहना है कि योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। कई छोटे कारीगर वित्तीय प्रक्रियाओं और तकनीकी जानकारी के अभाव में इन योजनाओं से जुड़ नहीं पाते। विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक उद्योगों को बचाने के लिए उन्हें आधुनिक तकनीक और डिजिटल बाजार से जोड़ना जरूरी है। ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग से स्थानीय उत्पादों को नया बाजार मिल सकता है। यदि पारंपरिक उद्योग आधुनिक डिजाइन और वैश्विक मांग के अनुसार खुद को ढालते हैं तो उनकी प्रतिस्पर्धा क्षमता बढ़ सकती है।

पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में उद्योग और रोजगार सीधे तौर पर राजनीतिक मुद्दा बनते जा रहे हैं। बेरोजगारी और उद्योगों की गिरती स्थिति क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकती है। स्थानीय नेताओं का कहना है कि उद्योगों के पुनर्जीवन से रोजगार बढ़ेगा और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। यही मुद्दा भविष्य की राजनीति का आधार बन सकता है। अर्थशास्त्रियों और उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि पारंपरिक उद्योगों को बचाने के लिए कई स्तरों पर सुधार जरूरी हैं छोटे उद्योगों को आसान वित्तीय सहायता. तकनीकी प्रशिक्षण और डिजाइन नवाचार. डिजिटल मार्केटिंग और वैश्विक बाजार से जुड़ाव. लॉजिस्टिक्स और उत्पादन लागत में सुधार. स्थानीय उत्पादों के लिए ब्रांडिंग और पहचान निर्माण. मतलब साफ है पूर्वांचल के उद्योग केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। यदि यह उद्योग कमजोर होते हैं तो इसका असर केवल रोजगार पर नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विरासत पर भी पड़ेगा। भारत आज वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा के दौर से गुजर रहा है। स्थानीय उद्योगों को मजबूत करना केवल आर्थिक नीति का हिस्सा नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक संरक्षण का भी प्रश्न बनता जा रहा है। भदोही के करघों की धीमी होती आवाज, वाराणसी के बुनकरों की चिंता और मिर्जापुर के मजदूरों का पलायनये केवल स्थानीय कहानियां नहीं हैं, बल्कि बदलते भारत की आर्थिक कहानी हैं।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तर प्रदेश का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीडीपीएस) 2025-26 में करीब 30.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। यह आंकड़ा न केवल आर्थिक विस्तार का संकेत देता है बल्कि यह बताता है कि प्रदेश राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में अपनी हिस्सेदारी लगातार बढ़ा रहा है। राज्य सरकार का दावा है कि निवेश, औद्योगिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार के कारण आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। यही कारण है कि राज्य निवेश आकर्षण के मामले में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट भी प्रदेश को तेज आर्थिक विकास वाले राज्यों में शामिल करती रही है, जो इस बजट की आर्थिक पृष्ठभूमि को मजबूत बनाता है। बजट का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भारी निवेश है। एक्सप्रेसवे, मेट्रो परियोजनाएं, औद्योगिक कॉरिडोर और एयरपोर्ट विस्तार जैसी योजनाओं के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को जोड़ने वाले एक्सप्रेसवे प्रदेश की औद्योगिक क्षमता को नई ऊंचाई देने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। सड़क और परिवहन नेटवर्क के विस्तार से लॉजिस्टिक्स लागत कम होने और निवेश बढ़ने की संभावना है।

विश्व बैंक और अन्य वैश्विक संस्थाएं भी इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को क्षेत्रीय विकास का सबसे प्रभावी माध्यम मानती हैं। प्रदेश सरकार इसी रणनीति को अपनाते हुए ग्रामीण क्षेत्रों को औद्योगिक विकास से जोड़ने की योजना पर काम कर रही है। इस बजट की सबसे बड़ी विशेषता पूर्वांचल क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता देना है। बनारस, गोरखपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र, जौनपुर और भदोही जैसे जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क और पर्यटन परियोजनाओं के लिए विशेष धन आवंटित किया गया है। पूर्वांचल लंबे समय तक विकास से पिछड़ा क्षेत्र माना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र को राजनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाने लगा है। सरकार का यह निवेश सामाजिक असंतुलन दूर करने और राजनीतिक समर्थन मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश सरकार ने राज्य को ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निवेश, औद्योगिक विकास और इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी जरूर है, लेकिन इसके लिए लगातार निवेश और रोजगार सृजन आवश्यक होगा।

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