Friday, 6 February 2026

महाशिवरात्रि : शिवत्व का जागरण, राजयोग से समृद्धि व मोक्ष का महापर्व

महाशिवरात्रि : शिवत्व का जागरण, राजयोग से समृद्धि मोक्ष का महापर्व 

महाशिवरात्रि केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आध्यात्मिक जागरण का अवसर है। उपवास, रुद्राभिषेक, मंत्र जाप और दान-पुण्य के माध्यम से भक्त जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं। सनातन परंपरा में महाशिवरात्रि का संदेश स्पष्ट है, अहंकार का त्याग, संयम का पालन और आत्मा का परमात्मा से मिलन। जब आधी रात को शिव मंदिरों में घंटों की गूंज औरहर हर महादेवका उद्घोष होता है, तब यह पर्व केवल आस्था नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत आत्मा का उत्सव बन जाता है। जी हां, लक्ष्मी-नारायण योग से समृद्धि के संकेत, ज्योतिर्लिंगों में उमड़ेगी श्रद्धा और साधना की अद्भुत धारा. फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी का पावन दिवस जब महाशिवरात्रि के रूप में उदित होता है, तब संपूर्ण सनातन संस्कृति में भक्ति, साधना और आत्मशुद्धि का अनूठा संगम दिखाई देता है। इस वर्ष 15 फरवरी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, सांस्कृतिक चेतना और ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। खास यह है कि इस दिन कुंभ राशि में शुक्र और बुध की युति से लक्ष्मी-नारायण राजयोग का निर्माण हो रहा है, जिसे ज्योतिषीय मान्यताओं में समृद्धि, वैभव और सफलता का प्रतीक माना जाता है 

सुरेश गांधी

फिरहाल, सनातन संस्कृति में कुछ पर्व केवल परंपरा नहीं होते, बल्कि जीवन दर्शन और आध्यात्मिक जागरण का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं। महाशिवरात्रि ऐसा ही एक महापर्व है, जो आत्मशुद्धि, तपस्या, साधना और परमात्मा से आत्मा के मिलन का प्रतीक माना जाता है। 15 फरवरी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि अनेक दृष्टियों से विशेष महत्व रखती है। इस बार जहां एक ओर ज्योतिषीय दृष्टि से लक्ष्मी-नारायण राजयोग और सर्वार्थ सिद्धि योग जैसे दुर्लभ संयोग बन रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह पर्व सनातन दर्शन के मूल सिद्धांतकृअहंकार त्याग, समता और आत्मबोधकृका भी स्मरण कराता है। ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत शुभ योगों में मनाया जाएगा।

 15 फरवरी को सुबह 7 बजे से शाम 7 बजकर 48 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा। यह योग जीवन के सभी कार्यों में सफलता और उन्नति का संकेत देता है। इसी अवधि तक उत्तराषाढा नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जो स्थायित्व, सफलता और प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। इसके पश्चात श्रवण नक्षत्र प्रारंभ होगा, जो 16 फरवरी की सुबह 8 बजकर 47 मिनट तक रहेगा। श्रवण नक्षत्र को ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। इस दिन व्यतीपात योग पूरे दिन विद्यमान रहेगा, जो आध्यात्मिक साधना और मंत्र जाप के लिए अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। निशिता कालकृजो महाशिवरात्रि पूजा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय माना जाता है, रात 11 बजकर 52 मिनट से 12 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। इसके अतिरिक्त दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 57 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त और दोपहर 12 बजकर 59 मिनट से 2 बजकर 41 मिनट तक अमृतकाल रहेगा, जो पूजा और शुभ कार्यों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।

लक्ष्मी-नारायण राजयोग से समृद्धि के संकेत

इस बार महाशिवरात्रि पर कुंभ राशि में शुक्र और बुध की युति से लक्ष्मी-नारायण राजयोग बन रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह योग आर्थिक समृद्धि और जीवन में स्थायित्व का संकेत देता है। मिथुन राशि के जातकों के लिए यह समय नए आय स्रोतों और व्यापारिक सफलता का संकेत देता है। वृश्चिक राशि वालों के लिए आर्थिक मजबूती और करियर में उन्नति के योग बन रहे हैं। मकर राशि के जातकों को पुराने निवेश से लाभ और आर्थिक दबावों से राहत मिलने की संभावना है। कुंभ राशि के लिए यह योग विशेष रूप से शुभ माना जा रहा है, जिसमें अचानक धन लाभ और लक्ष्यों की प्राप्ति के संकेत मिल रहे हैं।

🕉 महाशिवरात्रि : तप, साधना और आत्मबोध का पर्व

महाशिवरात्रि केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का आध्यात्मिक अभियान है। अन्य पर्व जहां सामाजिक मेल-मिलाप का अवसर प्रदान करते हैं, वहीं महाशिवरात्रि आत्ममंथन और ईश्वर से आत्मिक मिलन का संदेश देती है। सनातन परंपरा में यह पर्व अहंकार त्यागकर शिवतत्त्व में समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व सिखाता है कि मानव के भीतर असीम शक्ति, शांति और आनंद विद्यमान है। जब मनुष्य शिवतत्त्व का चिंतन करता है, तब वह अपने भीतर छिपी दिव्यता का अनुभव कर सकता है।

शिव : समता और करुणा के प्रतीक

भगवान शिव को योगेश्वर कहा जाता है। उनकी दिव्यता का सबसे बड़ा संदेश समता है। शिव के परिवार में बैल और सिंह, सर्प और चूहा जैसे जन्मजात शत्रु भी बिना वैरभाव के साथ रहते हैं। यह संदेश मानव समाज को बताता है कि वैरभाव का अंत ही वास्तविक शांति का मार्ग है। शिव का हिमालय पर निवास इस बात का प्रतीक है कि जीवन में शीतलता, संयम और स्थिरता आवश्यक है। शिवतत्त्व मनुष्य को सुख-दुख से परे समभाव में जीने की प्रेरणा देता है।

पौराणिक कथाओं में महाशिवरात्रि का महत्व

महाशिवरात्रि का महत्व कई पौराणिक घटनाओं से जुड़ा हुआ है। समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने स्वयं पीकर संसार की रक्षा की थी। इसी कारण उन्हें नीलकंठ कहा जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह का पावन अवसर है, जो आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक माना जाता है। शिवपुराण में वर्णित कथा के अनुसार ब्रह्मा और विष्णु के बीच श्रेष्ठता विवाद समाप्त करने के लिए भगवान शिव अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे। यह घटना शिवतत्त्व की सर्वोच्चता और अहंकार त्याग का संदेश देती है।

द्वादश ज्योतिर्लिंग : जहां शिव स्वयं प्रकट हुए

यद्यपि शिव सर्वत्र हैं, किंतु पृथ्वी पर बारह ऐसे पवित्र स्थान माने गए हैं जहां भगवान शिव स्वयं ज्योति के रूप में प्रकट हुए, इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर 12 ऐसे स्थान हैं जहां भगवान शिव स्वयं ज्योति के रूप में प्रकट हुए। इन्हें द्वादश ज्योतिर्लिंग कहा जाता है। इनका स्मरण मात्र भी मोक्षदायी माना गया है।

1. सोमनाथ : पृथ्वी का प्रथम ज्योतिर्लिंग। श्रापग्रस्त चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें अपने मस्तक पर धारण किया। यह ज्योतिर्लिंग पुनरुत्थान का प्रतीक है।

2. मल्लिकार्जुन : यह पिता - पुत्र और पारिवारिक प्रेम का प्रतीक है, जहां शिव - पार्वती पुत्र कार्तिकेय के वियोग में स्वयं ज्योति बन गए।

3. महाकालेश्वर : एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग। समय पर विजय का प्रतीक। यहां शिव काल के भी काल हैं।

4. ओंकारेश्वर : नर्मदा के आकार प्रवाह में स्थित यह लिंग नाद ब्रह्म का प्रतीक है।

5. केदारनाथ : जहां पांडवों के पाप भी हिमालय में गल गए।

6. भीमाशंकर : अत्याचार पर धर्म की विजय का प्रतीक।

7. काशी विश्वनाथ : शिव और शक्ति का अद्वैत स्वरूप :जहां शिव स्वयं तारक मंत्र देते हैं। काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि शिव-शक्ति का जीवंत दर्शन है। यहां शिव और शक्ति एक साथ विराजमान हैं, दाहिने भाग में शक्ति स्वरूपा भगवती और वाम भाग में सौम्य शिव। यही अद्वैत भाव काशी को विश्व में अद्वितीय बनाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में काशी विश्वनाथ वह एकमात्र ज्योतिर्लिंग है, जिसके दर्शन मात्र से शेष 11 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।

8. त्र्यंबकेश्वर : जहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश एक ही लिंग में समाहित हैं।

9. वैद्यनाथ : जहां शिव स्वयं वैद्य बनते हैं। झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम को बारह ज्योतिर्लिंगों में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इसे रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि रावण ने कठोर तपस्या कर इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना की थी। यह धाम विशेष रूप से रोग निवारण और आध्यात्मिक शांति के लिए प्रसिद्ध है। सावन माह में सुल्तानगंज से देवघर तक 105 किमी की पदयात्रा श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है।

10. नागेश्वर : भय और विष से मुक्ति का प्रतीक।

11. रामेश्वरम : जहां राम भी शिव के शरणागत हैं। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने रावण वध के पश्चात ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति पाने के लिए यहां शिवलिंग की स्थापना की थी।

12. घृष्णेश्वर : जहां भक्ति मृत्यु पर भी विजय पा लेती है।

शिवगंगा और आरोग्य की परंपरा

पौराणिक कथा के अनुसार देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार ने शिवगंगा में स्नान कर भगवान शिव का अभिषेक किया और रोगमुक्त हो गए। इसी कारण यह स्थान आरोग्य और शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

महाशिवरात्रि पर पूजा और साधना की परंपरा

महाशिवरात्रि पर शिवलिंग का जलाभिषेक अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। जल, दूध, दही, शहद, घी, चंदन और बेलपत्र अर्पित करना शुभ माना जाता है। वहीं तुलसी, केतकी का फूल और सिंदूर चढ़ाना वर्जित माना गया है। बेलपत्र के तीन पत्ते त्रिगुणकृसत्व, रज और तमकृका प्रतीक माने जाते हैं, जिन्हें शिव को अर्पित करने का अर्थ है इन गुणों का समर्पण।

मंत्र जाप और आध्यात्मिक साधना

महाशिवरात्रि की रात्रि मंत्र साधना के लिए अत्यंत शुभ मानी जाती है। नमः शिवाय : मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति, महामृत्युंजय मंत्र : आरोग्य और दीर्घायु, शिव गायत्री मंत्र : ज्ञान और एकाग्रता, दरिद्रता दहन मंत्र : आर्थिक समृद्धि का प्रतीक, निशिता काल में रुद्राक्ष माला से मंत्र जाप विशेष फलदायी माना जाता है।

व्रत, जागरण और दान का महत्व

स्कंद पुराण के अनुसार शिवरात्रि का व्रत अत्यंत दुर्लभ और पुण्यदायी माना गया है। इस दिन किया गया उपवास सौ यज्ञों के समान फल प्रदान करता है। जागरण और ध्यान साधना आत्मिक शक्ति को जागृत करती है। दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है। गरीबों को वस्त्र, भोजन और आवश्यक वस्तुएं दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है।

घर में शुभता लाने वाले प्रतीक

महाशिवरात्रि के दिन रुद्राक्ष घर लाना मानसिक शांति का प्रतीक माना जाता है। शिवलिंग की स्थापना वास्तु दोष दूर करने का माध्यम मानी जाती है। नंदी की प्रतिमा घर में स्थापित करने से बाधाएं दूर होने की मान्यता है। बेलपत्र और शमी का पौधा सकारात्मक ऊर्जा और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

देशभर में महाशिवरात्रि के भव्य आयोजन

महाशिवरात्रि पर देश के विभिन्न मंदिरों में विशाल धार्मिक आयोजन होते हैं। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, रीवा का महामृत्युंजय मंदिर, गुजरात का भवनाथ मेला, हिमाचल का भूतनाथ मंदिर मेला, रामेश्वरम मंदिर, शिव खोरी गुफा और ऋषिकेश का नीलकंठ महादेव मंदिर इस पर्व की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। ये स्थल इस पर्व पर श्रद्धालुओं से भर उठते हैं।

आत्मोन्नति का आध्यात्मिक संदेश

महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्मपरिवर्तन है। यह पर्व सिखाता है कि जब मनुष्य निष्कामता, करुणा और समता को अपनाता है, तब वह शिवतत्त्व के निकट पहुंचता है। यह पर्व मानव को यह संदेश देता है कि पंचमहाभूतों से बने शरीर के पीछे जो चैतन्य शक्ति कार्य कर रही है, वही शिवतत्त्व है। उसी चैतन्य में अहंकार का समर्पण ही वास्तविक महाशिवरात्रि है।

शिवतत्त्व का जागरण ही महाशिवरात्रि का सार

महाशिवरात्रि केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है। यह पर्व मनुष्य को संयम, साधना, सेवा और समता का मार्ग दिखाता है। जब भक्त निशिता काल में शिव मंत्रों का जाप करता है, जब वह बेलपत्र अर्पित करता है और जब वह अपने भीतर के अहंकार का त्याग करता है, तभी महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ पूर्ण होता है। सनातन संस्कृति का यह दिव्य पर्व हमें याद दिलाता है कि शिव केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव और प्रत्येक चेतना में विद्यमान हैं। जब मानव अपने भीतर के शिवतत्त्व को जागृत करता है, तभी उसका जीवन कल्याण और समृद्धि की ओर अग्रसर होता है।

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