महाशिवरात्रि पर माता वैष्णो देवी से विश्वनाथ धाम पहुंचा प्रसाद व उपहार
शक्ति पीठ से
शिव
नगरी
तक
आध्यात्मिक
रिश्ते
हुए
और
प्रगाढ़,
सनातन
परंपरा
में
आत्मीयता
का
विस्तार,
नवाचार
की
भावपूर्ण
झलक
महादेव के
दरबार
में
शक्ति
का
श्रद्धा-सुमन,
भक्तों
में
उमड़ा
आध्यात्मिक
उत्साह
सुरेश गांधी
वाराणसी। महाशिवरात्रि के परम पावन
पर्व पर श्री काशी
विश्वनाथ धाम में इस
वर्ष सनातन परंपरा को नई आध्यात्मिक
ऊँचाइयों तक ले जाने
वाला एक अभिनव और
भावनात्मक अध्याय जुड़ गया है।
देवालयों के मध्य आस्था,
श्रद्धा और सांस्कृतिक एकात्मता
को सशक्त करने की परंपरा
को आगे बढ़ाते हुए
इस बार देश के
विख्यात शक्ति पीठ श्री माता
वैष्णो देवी धाम से
भगवान श्री विश्वेश्वर (काशी
विश्वनाथ महादेव) के लिए विशेष
उपहार एवं प्रसाद प्रेषित
किया गया है।
महाशिवरात्रि उत्सव के अवसर पर
विभिन्न प्रमुख देवालयों एवं देवी-देवताओं
की ओर से भगवान
विश्वनाथ को श्रद्धा-समर्पित
भेंट भेजे जाने की
यह परिकल्पना अपने आप में
एक अनूठा और आध्यात्मिक नवाचार
है। इसी क्रम में
शनिवार को श्री माता
वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड
की ओर से भेजा
गया पावन उपहार एवं
प्रसाद श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर न्यास कार्यालय में श्रद्धापूर्वक प्राप्त
हुआ। इस दिव्य भेंट
को सनातन संस्कृति की अखंड आध्यात्मिक
परंपरा का सजीव प्रतीक
माना जा रहा है।
माता वैष्णो देवी,
जो शक्ति स्वरूपा के रूप में
संपूर्ण सृष्टि की ऊर्जा और
संरक्षण की अधिष्ठात्री मानी
जाती हैं, उनकी ओर
से भगवान विश्वनाथ, जो सृष्टि के
संहार और पुनर्सृजन के
अधिपति हैं, को अर्पित
यह उपहार शिव और शक्ति
के शाश्वत संबंध की दिव्य अभिव्यक्ति
बनकर उभरा है। यह
आध्यात्मिक संवाद न केवल धार्मिक
परंपराओं की गहराई को
दर्शाता है, बल्कि सनातन
संस्कृति की एकात्म चेतना
को भी जनमानस के
समक्ष सशक्त रूप में प्रस्तुत
करता है।
श्री काशी विश्वनाथ
मंदिर न्यास ने इस पावन
भेंट के लिए श्री
माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड
के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया
है। न्यास ने यह भी
संकल्प व्यक्त किया कि माता
वैष्णो देवी के प्रधान
उत्सव अवसर पर भगवान
विश्वनाथ की ओर से
भी विशेष उपहार प्रेषित कर दोनों आस्था
केंद्रों के मध्य स्थायी
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंधों
को और अधिक सुदृढ़
किया जाएगा।
महाशिवरात्रि के इस दिव्य
पर्व पर प्राप्त यह
उपहार श्रद्धालुओं के लिए केवल
धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक अनुभूति
का प्रेरक माध्यम बनकर उभरेगा। यह
पहल सनातन संस्कृति के उस मूल
संदेश को पुनर्स्मरण कराती
है, जिसमें विविधता के मध्य एकता
और आस्था के मध्य समरसता
का भाव सर्वोपरि माना
गया है.

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