दबंगई की जगह लोकतांत्रिक मर्यादा का उदय
मंत्री
द्वारा
स्वयं
डीएम
को
मांगपत्र
सौंपना
सियासत
में
बदलती
कार्यशैली
का
संकेत
है,
जहां
सत्ता
का
अहंकार
नहीं,
बल्कि
सादगी
और
जवाबदेही
प्रमुख
बन
रही
है।
यह
घटना
विपक्ष
के
लिए
भी
संदेश
है
कि
लोकतंत्र
में
पद
की
गरिमा
प्रभाव
से
नहीं,
बल्कि
जनसेवा
और
नियमों
के
सम्मान
से
तय
होती
है...
सुरेश गांधी
भारतीय लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने
और सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं
है, बल्कि यह राजनीतिक संस्कारों
और जनसेवा की शैली का
भी प्रतिबिंब है। उत्तर प्रदेश
सरकार के मंत्री रविंद्र
जायसवाल द्वारा स्वयं जिला अधिकारी के
कार्यालय जाकर मांगपत्र सौंपने
की घटना ने सियासत
में एक नई बहस
को जन्म दिया है।
इस कदम को जहां
कुछ विपक्षी नेताओं ने पद की
गरिमा से जोड़कर आलोचना
का विषय बनाया, वहीं
इसे बदलती राजनीतिक कार्यशैली और लोकतांत्रिक परिपक्वता
के संकेत के रूप में
भी देखा जा रहा
है।
दरअसल, भारतीय राजनीति लंबे समय तक
सत्ता के प्रभाव और
विशेषाधिकारों की संस्कृति से
प्रभावित रही है। जनप्रतिनिधि
अक्सर प्रशासनिक तंत्र से दूरी बनाए
रखते थे, लेकिन वह
दूरी सम्मान की नहीं बल्कि
प्रभाव और दबाव की
राजनीति का प्रतीक बन
जाती थी। कई दौर
ऐसे भी रहे जब
सत्ता का अर्थ केवल
शासन नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन माना जाता था।
प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव, थानों
में हस्तक्षेप, और राजनीतिक प्रभाव
के जरिए निर्णय करवाने
जैसी शिकायतें अक्सर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रही
हैं।
ऐसे परिदृश्य में
जब कोई मंत्री स्वयं
प्रशासनिक अधिकारी के पास जाकर
औपचारिक प्रक्रिया का पालन करता
है, तो यह केवल
एक प्रशासनिक कदम नहीं बल्कि
राजनीतिक सोच में परिवर्तन
का संकेत भी है। यह
घटना यह संदेश देती
है कि लोकतंत्र में
पद की गरिमा का
अर्थ केवल अधिकार नहीं
बल्कि जवाबदेही भी है। जनप्रतिनिधि
यदि स्वयं को व्यवस्था से
ऊपर नहीं बल्कि उसी
का हिस्सा मानता है, तो यह
लोकतंत्र की मूल भावना
को मजबूत करता है।
विपक्ष द्वारा इसे गरिमा के
खिलाफ बताया जाना भी राजनीति
का स्वाभाविक हिस्सा है। लोकतंत्र में
मतभेद और आलोचना स्वस्थ
परंपरा का प्रतीक माने
जाते हैं। लेकिन यह
भी सच है कि
समय के साथ राजनीति
की परिभाषा और जनता की
अपेक्षाएं बदल रही हैं।
आज का मतदाता केवल
भाषणों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से प्रभावित नहीं
होता, बल्कि वह जनप्रतिनिधियों के
व्यवहार और कार्यशैली को
भी परखता है।
यदि हम पिछले
राजनीतिक दौरों पर नजर डालें,
तो कई बार यह
आरोप लगते रहे कि
सत्ता के प्रभाव का
उपयोग प्रशासनिक व्यवस्था को प्रभावित करने
के लिए किया जाता
था। कानून व्यवस्था को लेकर भी
सवाल उठते रहे। आम
नागरिक कई बार खुद
को असहाय महसूस करता था, क्योंकि
उसे लगता था कि
सत्ता और प्रशासन तक
उसकी पहुंच सीमित है। लेकिन जब
सत्ता में बैठा व्यक्ति
स्वयं प्रक्रिया का पालन करता
है, तो यह आम
नागरिक में विश्वास पैदा
करता है कि उसकी
आवाज भी समान रूप
से सुनी जा सकती
है।
मानवता के दृष्टिकोण से
यह घटना और अधिक
महत्वपूर्ण हो जाती है।
लोकतंत्र की आत्मा समानता
और सम्मान में निहित होती
है। जब मंत्री स्वयं
जिला अधिकारी के पास जाकर
मांगपत्र सौंपता है, तो यह
संदेश जाता है कि
व्यवस्था सभी के लिए
समान है। यह केवल
प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन नहीं
बल्कि सामाजिक विश्वास को मजबूत करने
का प्रयास भी है।
राजनीति में सादगी और
संवेदनशीलता की परंपरा भारत
के कई महान नेताओं
ने स्थापित की थी। लाल
बहादुर शास्त्री से लेकर अटल
बिहारी वाजपेयी तक, कई उदाहरण
ऐसे हैं जहां सत्ता
के शीर्ष पर बैठे नेताओं
ने विनम्रता और सादगी को
अपनी पहचान बनाया। आज जब राजनीति
अक्सर दिखावे और प्रभाव के
आरोपों से घिरी रहती
है, ऐसे में यदि
कोई जनप्रतिनिधि सादगी का उदाहरण प्रस्तुत
करता है तो इसे
लोकतांत्रिक मूल्यों की पुनर्स्थापना के
रूप में देखा जाना
चाहिए।
यह भी समझना
होगा कि लोकतंत्र में
सत्ता और प्रशासन के
बीच संतुलन बेहद आवश्यक होता
है। यदि सत्ता अत्यधिक
प्रभावशाली हो जाए तो
प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित होती है, और
यदि प्रशासन राजनीतिक जवाबदेही से पूरी तरह
मुक्त हो जाए तो
जनहित प्रभावित हो सकता है।
इसलिए जब जनप्रतिनिधि नियमों
के तहत अपनी बात
रखते हैं, तो यह
संतुलन मजबूत होता है।
विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र
में बेहद महत्वपूर्ण होती
है। विपक्ष केवल सरकार की
आलोचना करने के लिए
नहीं बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने
के लिए भी जिम्मेदार
होता है। यदि किसी
सकारात्मक पहल को केवल
राजनीतिक विरोध के दृष्टिकोण से
देखा जाएगा, तो इससे लोकतांत्रिक
संवाद कमजोर होगा। विपक्ष को भी यह
समझना होगा कि जनता
अब राजनीति में टकराव से
अधिक सहयोग और संवेदनशीलता देखना
चाहती है।
आज का मतदाता
जागरूक है। वह केवल
सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक
व्यवहार में बदलाव चाहता
है। वह ऐसे जनप्रतिनिधियों
को पसंद करता है
जो जनता के बीच
रहें, उनकी समस्याओं को
समझें और व्यवस्था को
नियमों के अनुसार चलने
दें। यही कारण है
कि सादगी और जवाबदेही आज
की राजनीति की नई पहचान
बनती जा रही है।
रविंद्र जायसवाल की यह पहल
केवल एक घटना नहीं
बल्कि बदलती राजनीतिक संस्कृति का प्रतीक बन
सकती है। यह घटना
यह संदेश देती है कि
राजनीति का भविष्य सत्ता
के अहंकार में नहीं बल्कि
सेवा के संस्कार में
निहित है। लोकतंत्र की
खूबसूरती भी इसी में
है कि जनप्रतिनिधि स्वयं
को जनता का सेवक
माने, न कि विशेषाधिकारों
का संरक्षक।
समय बदल रहा
है और राजनीति भी
बदल रही है। अब
जनता उन नेताओं को
याद रखती है जो
पद से नहीं, बल्कि
व्यवहार से बड़े बनते
हैं। सियासत यदि सादगी और
संवेदनशीलता की राह पर
आगे बढ़ती है, तो
लोकतंत्र और अधिक मजबूत
और जनोन्मुख बन सकता है।
यही लोकतंत्र की असली जीत
भी होगी और राजनीति
की सबसे बड़ी गरिमा
भी।


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