काशी में रंगों का आध्यात्मिक आरंभ : रंगभरी एकादशी पर बाबा संग होली खेलेंगे काशीवासी
ब्रह्ममुहूर्त पूजन,
बाबा
की
पालकी
और
फूलों
की
होली
से
गूंजेगी
शिवनगरी,
अगले
दिन
मणिकर्णिका
पर
होगी
‘मसान
होली’
की
अनूठी
परंपरा
सुरेश गांधी
वाराणसी। फाल्गुन मास की सुगंधित हवाओं के साथ शिवनगरी काशी एक बार फिर रंग और भक्ति के दिव्य संगम में डूबने जा रही है। काशीवासियों के लिए रंगभरी एकादशी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि अपने आराध्य के साथ आत्मीय संबंध का उत्सव है। इस दिन काशी विश्वनाथ धाम में सदियों पुरानी परंपरा जीवंत होती है, जब भक्त प्रतीकात्मक रूप से बाबा विश्वनाथ के साथ होली खेलते हैं और इसी के साथ काशी में होली का आध्यात्मिक शुभारंभ माना जाता
है।मान्यता है कि महाशिवरात्रि
पर विवाह के पश्चात रंगभरी
एकादशी के दिन भगवान
विश्वनाथ माता गौरा को
पहली बार काशी लेकर
आते हैं। इस अवसर
को ‘गौना’ के रूप में
मनाया जाता है और
बाबा को अबीर-गुलाल
अर्पित कर भक्त अपने
जीवन में प्रेम, उल्लास
और मंगल की कामना
करते हैं। यही कारण
है कि काशी में
होली का पहला रंग
बाबा के दरबार से
ही उठता है।
इस वर्ष 27 फरवरी
को पड़ रही रंगभरी
एकादशी पर ब्रह्ममुहूर्त में
विशेष पूजन की भव्य
तैयारी की गई है।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच बाबा
विश्वनाथ, माता गौरा और
प्रथमेश का पूजन पारंपरिक
विधि से संपन्न होगा।
सुबह 7 बजे भोग और
शृंगार के बाद 9 बजे
से श्रद्धालुओं के लिए दर्शन
प्रारंभ होंगे, जबकि दोपहर 12ः30
बजे भोग आरती का
आयोजन किया जाएगा। मंदिर
प्रशासन के अनुसार, श्रद्धालुओं
की भारी भीड़ को
देखते हुए सुरक्षा और
व्यवस्था के व्यापक इंतजाम
किए गए हैं।
शाम 5 बजे बाबा विश्वनाथ
की पारंपरिक पालकी मंदिर परिसर से प्रस्थान करेगी,
जो रंगभरी एकादशी का सबसे आकर्षक
और भावनात्मक दृश्य माना जाता है।
पालकी यात्रा काशी में होली
के औपचारिक आरंभ का प्रतीक
है। मार्ग में श्रद्धालु अबीर-गुलाल, रंग और गुलाब
की पंखुड़ियों से बाबा और
माता गौरा का स्वागत
करेंगे। ढोल-नगाड़ों, शंखध्वनि
और “हर-हर महादेव”
के जयघोष के बीच यह
यात्रा भक्तिरस की अलौकिक अनुभूति
कराती है। इस वर्ष
मंदिर न्यास ने परंपरा और
व्यवस्था के संतुलन को
ध्यान में रखते हुए
कुछ विशेष बदलाव भी किए हैं।
शिवार्चनम मंच पर आयोजित
सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अबीर-गुलाल
के स्थान पर फूलों की
होली आयोजित की जाएगी, ताकि
मंदिर परिसर की गरिमा और
स्वच्छता बनी रहे। वहीं
मंदिर प्रांगण के भीतर बाबा
की चल प्रतिमा के
साथ पारंपरिक रूप से रंगों
की होली खेलने की
अनुमति दी गई है।
वर्षों से चली आ
रही परंपरा के अनुसार बाबा
की चल प्रतिमा बाहर
से लाई जाती है
और काशीवासी अपने आराध्य के
साथ होली खेलते हैं।
हालांकि इस बार संकरी
गलियों और भीड़ प्रबंधन
को देखते हुए प्रशासन और
पूर्व महंत परिवार की
बैठक में निर्णय लिया
गया है कि प्रतिमा
के साथ आने वाले
श्रद्धालुओं की संख्या 64 तक
सीमित रहेगी, जिससे व्यवस्था सुचारु बनी रहे। मंदिर
परिसर को गेंदे, गुलाब
और विविध पुष्पों से सजाया गया
है, जिससे पूरा धाम रंग
और सुगंध की आध्यात्मिक आभा
में निखर उठा है।
शाम से आरंभ होने
वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम रात 10 बजे तक चलेंगे,
जिनमें शिवभक्ति से ओतप्रोत भजन,
पारंपरिक प्रस्तुतियां और ब्रज शैली
की फूलों की होली विशेष
आकर्षण होगी।
घाटों पर भी इस पर्व की अलग ही छटा दिखाई दे रही है। श्रद्धालु प्रातःकाल गंगा नदी में स्नान कर बाबा के दर्शन के लिए मंदिर की ओर बढ़ रहे हैं। गंगा तट से उठती आरती की ध्वनि और मंदिर में गूंजते शिवनाम के स्वर काशी की आध्यात्मिक पहचान को और अधिक प्रखर बना रहे हैं। रंगभरी एकादशी की सबसे अनूठी परंपरा इसके अगले दिन देखने को मिलती है, जब काशी के अद्भुत भक्त मणिकर्णिका घाट पर ‘मसान होली’ खेलते हैं। यहां जीवन और मृत्यु के दर्शन एक साथ उपस्थित होते हैं। चिताओं की अग्नि, डमरू की ध्वनि और शिवनाम के बीच खेली जाने वाली यह होली काशी की आध्यात्मिकता का गहनतम स्वरूप प्रस्तुत करती है। यह परंपरा संदेश देती है कि जीवन क्षणभंगुर है, पर भक्ति और उत्सव सनातन हैं। काशीवासियों के लिए रंगभरी एकादशी इसलिए भी विशेष होती है क्योंकि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपने आराध्य से आत्मीय संवाद का अवसर है। यहां भक्त केवल दर्शक नहीं होते, बल्कि उत्सव का हिस्सा बनते हैं। बाबा के साथ खेला गया यह रंग जीवन में आनंद, समर्पण और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।
जैसे-जैसे होली
का पर्व निकट आता
है, काशी का वातावरण
और अधिक उल्लासमय होता
जा रहा है। गलियों
में उड़ता गुलाल, मंदिरों
में गूंजते भजन और घाटों
पर उमड़ती आस्था यह संकेत दे
रही है कि शिवनगरी
में रंगों का यह उत्सव
केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव
है। रंगभरी एकादशी से प्रारंभ यह
आध्यात्मिक रंगोत्सव काशी की सनातन
संस्कृति, लोकआस्था और भक्ति की
उस परंपरा को जीवंत करता
है, जो सदियों से
इस नगरी को विश्व
की आध्यात्मिक राजधानी बनाती आई है।



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