Monday, 16 March 2026

खाड़ी देशों की जंग से झुलसा कारपेट इंडस्ट्री, 17,500 करोड़ के कालीनों पर लगा ग्रहण

निर्यात ठप, अप्रैल के कारपेट फेयर पर भी खतरे के बादल, 7 हजार करोड़ के नुकसान की आशंका

खाड़ी देशों की जंग से झुलसा कारपेट इंडस्ट्री, 17,500 करोड़ के कालीनों पर लगा ग्रहण 

पांच सौ करोड़ के माल पोर्ट पर डंप, बायर भी नहीं ले रहे जोखिम

निर्यात ठहरने से 20 लाख लोगों की आजीविका पर संकट

दिल्ली में आयोजित कारपेट फेयर रद्द हुआ तो 500 करोड़ का झटका

भदोही-मिर्जापुर के निर्यातकों पर संकट, विदेशी खरीदार भी पीछे हटे

सुरेश गांधी

वाराणसी/भदोही/मिर्जापुर। पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते युद्ध ने वैश्विक व्यापार की रफ्तार को अचानक धीमा कर दिया है। इसका सबसे बड़ा असर उत्तर प्रदेश की विश्व प्रसिद्ध कालीन नगरी भदोही-मिर्जापुर पर दिखाई दे रहा है। निर्यात आधारित यह उद्योग इस समय अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। समुद्री और हवाई मार्ग प्रभावित होने से कालीन का निर्यात लगभग ठप हो गया है और सैकड़ों करोड़ रुपये का माल बंदरगाहों से लेकर निर्यातकों के गोदामों तक फंसा पड़ा है। उद्योग से जुड़े कारोबारियों के मुताबिक फिलहाल 500 करोड़ रुपये से अधिक के ऑर्डर प्रभावित हो चुके हैं। यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो 6 से 7 हजार करोड़ रुपये तक के नुकसान की आशंका जताई जा रही है। 

बंदरगाहों पर डंप पड़ा करोड़ों का माल

युद्ध के कारण खाड़ी क्षेत्र के कई समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं। इसके चलते जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है और भारतीय कालीनों की सप्लाई चेन पर सीधा असर पड़ा है। महाराष्ट्र के नवाशेवा (जेएनपीटी) पोर्ट पर करीब 50 करोड़ रुपये का कालीन डंप पड़ा हुआ है, जबकि निर्यातक कंपनियों के गोदामों में लगभग 300 करोड़ रुपये से अधिक का तैयार माल फंसा हुआ है। कई कंटेनर ऐसे हैं जो बीच रास्ते में ही अटक गए हैं। निर्यातकों का कहना है कि कंटेनरों के रुकने से पोर्ट चार्ज और लॉजिस्टिक लागत भी लगातार बढ़ रही है, जिससे व्यापारियों की परेशानी और बढ़ गई है।

निर्यात लगभग शून्य, विदेशी खरीदार भी असमंजस में

भदोही-मिर्जापुर का कालीन उद्योग पूरी तरह निर्यात पर निर्भर है। अमेरिका, यूरोप और खाड़ी देशों में यहां से बड़ी मात्रा में हस्तनिर्मित कालीन भेजे जाते हैं। लेकिन युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार की रफ्तार थम गई है। कई विदेशी खरीदारों ने नए ऑर्डर रोक दिए हैं, जबकि पहले से भेजे गए माल पर भी छूट की मांग की जा रही है। कालीन निर्यातक उमेश गुप्ता, योगेन्द्र राय काका, रुपेश बरनवाल का कहना है कि मौजूदा हालात में बाजार पूरी तरह अनिश्चितता में है। खरीदार भी आगे की स्थिति को लेकर स्पष्ट निर्णय नहीं ले पा रहे हैं।

कारपेट फेयर पर भी मंडराए खतरे के बादल

युद्ध का असर अब 10 से 14 अप्रैल तक नई दिल्ली में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय कारपेट फेयर पर भी पड़ने लगा है। यह मेला भारतीय कालीन उद्योग के लिए वैश्विक व्यापार का सबसे बड़ा मंच माना जाता है। लेकिन वर्तमान हालात में कई विदेशी बायर यात्रा को लेकर हिचक रहे हैं। जहाजों का किराया बढ़ गया है और अंतरराष्ट्रीय मार्गों पर जोखिम बढ़ने के कारण कई खरीदार जोखिम लेने को तैयार नहीं हैं। निर्यातकों के अनुसार कई विदेशी खरीदारों ने मेले में आने से मना कर दिया है। यदि हालात ऐसे ही बने रहे और फेयर रद्द करना पड़ा तो उद्योग को करीब 500 करोड़ रुपये का सीधा आर्थिक झटका लग सकता है।

पहले टैरिफ की मार, अब युद्ध का संकट

प्रमुख कारोबारी ओपी गुप्ता, धरमप्रकाश गुप्ता, संजय मेहरोत्रा रियाजुल हसनैन अंसारी के अनुसार उद्योग पहले से ही अमेरिकी टैरिफ और वैश्विक आर्थिक मंदी की मार झेल रहा था। टैरिफ बढ़ने के बाद भारतीय कालीनों के निर्यात में लगभग 30 प्रतिशत तक गिरावट आई थी। अब ईरान-इजरायल युद्ध ने स्थिति और जटिल बना दी है, क्योंकि कालीन का अधिकांश निर्यात समुद्री मार्ग से होता है और वही मार्ग प्रभावित हो गए हैं।

बढ़ती लागत ने बढ़ाई चिंता

पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेज उछाल आया है। कालीन उद्योग में रंगाई-धुलाई, धागा निर्माण और परिवहन में पेट्रोलियम उत्पादों का व्यापक उपयोग होता है। ऐसे में पेट्रो पदार्थों की कीमतों में 50 से 60 प्रतिशत तक बढ़ोतरी ने उत्पादन लागत को काफी बढ़ा दिया है।

लाखों बुनकरों की रोजी-रोटी पर संकट

भदोही-मिर्जापुर का कालीन उद्योग केवल व्यापार नहीं बल्कि लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। गांव-गांव में बुनकर, रंगाई-धुलाई मजदूर, डिजाइनर और पैकिंग कर्मचारी इस उद्योग से जुड़े हैं। व्यापारियों के अनुसार यदि यही स्थिति बनी रही तो करीब 20 लाख लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो सकते हैं। कई जगह पावरलूम बंद होने की कगार पर हैं और बुनकरों के पास काम की कमी हो गई है।

एक नजर में (डेटा बॉक्स)

17,500 करोड़ : कालीन उद्योग का वार्षिक कारोबार

95 फीसदी : उत्पादन विदेशों में निर्यात

55 फीसदी : निर्यात का हिस्सा अमेरिका में

500 करोड़ : प्रभावित ऑर्डर

350 करोड़ : पोर्ट गोदामों में फंसा माल

6-7 हजार करोड़ : संभावित नुकसान का अनुमान

20 लाख लोग : उद्योग से जुड़े श्रमिक कारीगर

बोले कारोबारी

कालीन निर्यातक श्यामनारायण यादव ने कहा, युद्ध के कारण फ्लाइट और समुद्री रास्ते दोनों प्रभावित हैं। विदेशी खरीदार यात्रा से बच रहे हैं और कई ऑर्डर फिलहाल रोक दिए गए हैं। पहले अमेरिकी टैरिफ की मार थी, अब युद्ध ने हालात और कठिन बना दिए हैं। यदि जल्द स्थिति सामान्य नहीं हुई तो उद्योग गहरे संकट में जा सकता है।

करघों की रफ्तार थमी

भदोही और मिर्जापुर के गांवों में इन दिनों करघों की आवाज पहले जैसी नहीं सुनाई दे रही है। कई बुनकरों के पास काम कम हो गया है। निर्यात रुकने से तैयार कालीन गोदामों में पड़े हैं और नए ऑर्डर भी नहीं मिल रहे। स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि यदि वैश्विक हालात जल्द नहीं सुधरे तो हजारों परिवारों की आजीविका पर असर पड़ सकता है। फिलहाल कालीन नगरी की उम्मीद सिर्फ एक है, पश्चिम एशिया में जल्द शांति स्थापित हो, ताकि दुनिया के बाजार फिर से खुलें और भदोही-मिर्जापुर के करघों की रफ्तार दोबारा तेज हो सके।

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