तेल व
एलपीजी
संकट
की
आहट
से
थाली
से
ठेला
तक
बढ़ी
चिंता
जंग की आंच, जेब पर वार, महंगाई की मार
चाय-नाश्ते
से
सब्जी
तक
बढ़
सकते
हैं
दाम,
ठेला-खुमचा
वालों
की
चेतावनी
: “सिलेंडर
और
डीजल
बढ़ा
तो
10 की
चाय
15 करनी
पड़ेगी”
सुरेश गांधी
वाराणसी. दुनिया की भू-राजनीति
में कुछ घटनाएं ऐसी
होती हैं जिनका असर
केवल सीमाओं या सेनाओं तक
सीमित नहीं रहता, बल्कि
वह सीधे आम आदमी
के जीवन को प्रभावित
करने लगती हैं। पश्चिम
एशिया में अमेरिका-इजरायल
और ईरान के बीच
बढ़ता सैन्य तनाव इसी तरह
का संकट बनता जा
रहा है। यह संघर्ष
हजारों किमी दूर मिडिल
ईस्ट में भले चल
रहा हो, लेकिन इसकी
आंच भारत की रसोई
तक महसूस की जा रही
है। भारत में एलपीजी
सिलेंडरों की कीमतों में
बढ़ोतरी, कॉमर्शियल गैस सिलेंडरों की
कमी, छोटे दुकानदारों की
परेशानियां और होटल-रेस्तरां
उद्योग की चिंताएं इस
संकट के संकेत हैं।
चाय-नाश्ते की दुकानों से
लेकर बड़े रेस्तरां तक
गैस संकट की चर्चा
है।
दरअसल यह युद्ध केवल
तीन देशों के बीच की
लड़ाई नहीं है। इसके
पीछे तेल, डॉलर, वैश्विक
ऊर्जा व्यापार और भू-राजनीतिक
रणनीतियों का एक जटिल
समीकरण छिपा हुआ है।
यही कारण है कि
मिडिल ईस्ट की जंग
आज पूरी दुनिया की
अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर
रही है। मतलब साफ
है पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव
और वैश्विक तेल बाजार में
अनिश्चितता की आहट अब
भारत के बाजारों में
भी महसूस होने लगी है।
पेट्रोल-डीजल और रसोई
गैस की कीमतों को
लेकर बनी चिंता ने
रोजमर्रा के सामानों के
दाम बढ़ने की आशंका
को जन्म दे दिया
है। बाजार के जानकारों का
कहना है कि अगर
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल
की कीमतों में तेजी आती
है तो इसका असर
केवल पेट्रोल पंप तक सीमित
नहीं रहेगा, बल्कि सब्जी, दूध, आटा, दाल,
चाय-नाश्ता, मिठाई और होटल-ढाबों
की थाली तक दिखाई
देगा। वाराणसी समेत कई शहरों
में ठेला-खुमचा चलाने
वाले छोटे कारोबारियों और
रेहड़ी-पटरी वालों ने
पहले ही चिंता जतानी
शुरू कर दी है।
थाली से ठेला तक महंगाई का डर
महंगाई का सबसे पहला
असर रोजमर्रा के छोटे कारोबारों
पर पड़ता है। चाय
की दुकान, समोसे-कचौड़ी का ठेला, नाश्ते
के खोमचे और सड़क किनारे
के ढाबे, इन सबका खर्च
सीधे गैस और ईंधन
पर निर्भर होता है। कॉमर्शियल
सिलेंडरों की कमी के
कारण चाय-नाश्ते की
दुकानों और छोटे रेस्तरां
को मुश्किलों का सामना करना
पड़ रहा है। वाराणसी
के सिगरा क्षेत्र में चाय का
ठेला लगाने वाले राजेश कुमार
कहते हैं, “पहले ही सिलेंडर
महंगा है, अगर और
बढ़ा तो 10 रुपये वाली चाय 15 रुपये
करनी पड़ेगी। नहीं तो दुकान
चलाना मुश्किल हो जाएगा।” जहां
पहले 10 रुपये में मिलने वाली
चाय अब 15 या 20 रुपये में मिलने लगी
है, वहीं नाश्ते की
प्लेट और अन्य खाद्य
पदार्थों के दाम भी
बढ़ गए हैं। कुछ
दुकानदारों का कहना है
कि गैस सिलेंडर महंगा
होने के कारण उन्हें
अपनी कीमतें बढ़ानी पड़ी हैं। इसी तरह
भेल-पूरी का ठेला
लगाने वाले गुड्डू साहनी
कहते हैं कि बाजार
में पहले ही आलू,
तेल और मसाले महंगे
हो चुके हैं। “अगर
डीजल और गैस बढ़ा
तो सामान की ढुलाई भी
महंगी हो जाएगी। ऐसे
में हमें भी रेट
बढ़ाना पड़ेगा।”
सब्जी और राशन पर भी पड़ेगा असर
व्यापारियों का कहना है
कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें
बढ़ने से सबसे पहले
सब्जियों और खाद्यान्न की
ढुलाई महंगी हो जाती है।
मंडी से बाजार तक
सब्जियां ट्रकों और छोटे वाहनों
से आती हैं। डीजल
महंगा होने पर परिवहन
खर्च बढ़ जाता है,
जिसका असर सीधे खुदरा
कीमतों पर दिखाई देता
है। फल-सब्जी विक्रेता
रामदास गुप्ता बताते हैं “डीजल महंगा
हुआ तो ट्रांसपोर्टर तुरंत
किराया बढ़ा देते हैं।
इसका असर ग्राहक पर
ही पड़ता है। सब्जी
के दाम बढ़ाना मजबूरी
हो जाती है।”
होटल और रेस्तरां उद्योग की चिंता
एलपीजी संकट का असर
होटल और रेस्तरां उद्योग
पर भी दिखाई देने
लगा है। कई रेस्तरां
ने अपने मेनू में
बदलाव करना शुरू कर
दिया है। कुछ जगहों
पर व्यंजनों की संख्या कम
कर दी गई है,
जबकि कुछ जगहों पर
थाली के दाम बढ़ा
दिए गए हैं। कुछ
रेस्तरां अब गैस की
जगह इलेक्ट्रिक तंदूर और इंडक्शन चूल्हों
का इस्तेमाल करने लगे हैं।
होटल उद्योग से जुड़े संगठनों
का कहना है कि
यदि गैस आपूर्ति में
सुधार नहीं हुआ तो
कई होटल और रेस्तरां
बंद होने की स्थिति
में पहुंच सकते हैं। ढाबा
संचालक शिवकुमार यादव कहते हैं,
“खर्च लगातार बढ़ रहा है,
लेकिन ग्राहक उतना ही पैसा
देना चाहता है। अगर गैस
और डीजल बढ़ा तो
थाली के दाम बढ़ाना
ही पड़ेगा।”
जमाखोरी और कालाबाजारी का भी खतरा
तेल संकट या
महंगाई की आशंका के
समय बाजार में जमाखोरी और
कालाबाजारी का खतरा भी
बढ़ जाता है। अतीत
में कई बार देखा
गया है कि कुछ
व्यापारी आवश्यक वस्तुओं का भंडारण कर
लेते हैं, जिससे बाजार
में कृत्रिम कमी पैदा हो
जाती है और कीमतें
अचानक बढ़ जाती हैं।
खाद्य तेल, दाल, चीनी
और गैस सिलेंडर जैसे
सामानों में ऐसी स्थिति
पैदा होने का खतरा
हमेशा बना रहता है।
आम आदमी की बढ़ती चिंता
महंगाई का सीधा असर
आम परिवारों के मासिक बजट
पर पड़ता है। गैस
सिलेंडर, दूध, सब्जी, राशन,
बच्चों की पढ़ाई और
बिजली के बिल जैसे
खर्च पहले से ही
बढ़ रहे हैं। ऐसे
में यदि ईंधन की
कीमतें और बढ़ती हैं
तो घरेलू बजट और बिगड़
सकता है। मध्यम वर्ग
और निम्न आय वर्ग के
परिवारों के लिए यह
स्थिति सबसे ज्यादा चिंता
पैदा करने वाली है।
प्रशासन की नजर बाजार पर
महंगाई और संभावित कालाबाजारी
को देखते हुए प्रशासन भी
सतर्क हो गया है।
आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत जमाखोरी
और कालाबाजारी पर सख्ती की
जा सकती है। अधिकारियों
का कहना है कि
बाजार में कृत्रिम कमी
पैदा करने वालों के
खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसके
साथ ही तेल कंपनियां
भी आपूर्ति बनाए रखने की
कोशिश कर रही हैं
ताकि बाजार में किसी तरह
का संकट न पैदा
हो।
आने वाले दिनों पर टिकी निगाह
विशेषज्ञों का कहना है
कि आने वाले कुछ
सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण हो
सकते हैं। यदि वैश्विक
तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ती
है तो इसका असर
भारतीय बाजार में भी तेजी
से दिखाई दे सकता है।
ऐसी स्थिति में महंगाई केवल
आर्थिक मुद्दा नहीं रह जाती,
बल्कि यह आम आदमी
के जीवन और रोजमर्रा
की जरूरतों को सीधे प्रभावित
करने लगती है।
भारत और ऊर्जा आयात की मजबूरी
भारत दुनिया का
तीसरा सबसे बड़ा तेल
उपभोक्ता देश है। तेजी
से बढ़ती आबादी, औद्योगिक
विकास और शहरीकरण के
कारण देश में ऊर्जा
की मांग लगातार बढ़
रही है। लेकिन घरेलू
उत्पादन इस मांग को
पूरा करने के लिए
पर्याप्त नहीं है। भारत
अपनी कुल तेल जरूरतों
का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता
है। एलपीजी के मामले में
भी स्थिति लगभग इसी तरह
है। देश की कुल
एलपीजी आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत
हिस्सा आयात के जरिए
पूरा किया जाता है।
इन आयातों का बड़ा हिस्सा
खाड़ी देशों से आता है
और इनमें से अधिकांश आपूर्ति
होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते होती
है।
एलपीजी संकट और भारत की रसोई
भारत में एलपीजी की खपत पिछले एक दशक में तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के बाद करोड़ों नए परिवार गैस कनेक्शन से जुड़े हैं। आज देश में हर साल लगभग 31 मिलियन टन एलपीजी की खपत होती है। इसमें से लगभग 87 प्रतिशत गैस घरेलू रसोई में इस्तेमाल होती है, जबकि शेष हिस्सा होटल, रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों में उपयोग किया जाता है। जब मिडिल ईस्ट में युद्ध जैसी स्थिति बनती है और ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती है, तो उसका असर सबसे पहले गैस और पेट्रोलियम उत्पादों पर दिखाई देता है।

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