जब सुरों में सजेगा हनुमान दरबार, काशी बनेगी भक्ति का विराट मंच
हनुमज्जयंती पर
10 दिवसीय
महोत्सव,
12 पद्म
अवार्डी
और
21 नवप्रवेशी
साधक
करेंगे
साधना
दिखेगा परंपरा
और
प्रतिभा
का
मिलन,
पद्म
सम्मानित
कलाकारों
के
साथ
नई
पीढ़ी
भी
बिखेरेगी
सुरों
की
छटा
संकट मोचन
में
103वां
संगीत
समारोह,
6 अप्रैल
से
शुरू
होगा
अद्भुत
सांस्कृतिक
संगम
संतूर, सितार,
सरोद,
बांसुरी,
कथक,
ओडिसी
और
शास्त्रीय
गायन
की
विविध
विधाएं
एक
ही
मंच
पर
जीवंत
होंगी
सुरेश गांधी
वाराणसी। आस्था, अध्यात्म और शास्त्रीय संगीत
की अनवरत परंपरा के केंद्र काशी
में एक बार फिर
भक्ति का विराट सागर
उमड़ने को है। चैत्र
शुक्ल पूर्णिमा पर आरंभ होने
वाला संकट मोचन मंदिर
का दस दिवसीय हनुमज्जयंती
महोत्सव इस वर्ष भी
अपने भव्य और आध्यात्मिक
स्वरूप के साथ श्रद्धालुओं
और संगीत प्रेमियों को एक साथ
जोड़ने जा रहा है।
जो भक्ति और संगीत के
विराट स्वरूप को नई ऊंचाइयों
तक ले जाने को
तैयार है। यह आयोजन
केवल एक धार्मिक अनुष्ठान
नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उत्सव
है, जहां रामचरितमानस की
प्रसंगों की गूंज पर
जब शास्त्रीय संगीत के सुर थिरकेंगे,
तो पूरा संकट मोचन
परिसर मानो जीवंत हनुमान
दरबार में परिवर्तित हो
उठेगा।
मंदिर के महंत प्रो.
विश्वम्भरनाथ मिश्र ने बताया कि
2 अप्रैल को हनुमान जयंती
के दिन विशेष श्रृंगार,
झांकी, पूजन और आरती
के साथ महोत्सव का
शुभारंभ होगा। प्रातःकाल शहनाई की मंगल ध्वनि,
रुद्राभिषेक, मानस का एकाह
पाठ, सुंदरकांड और सीताराम संकीर्तन
से वातावरण भक्तिरस में डूब जाएगा।
सायंकाल रामकृष्ण मिशन की कीर्तन
मंडलियों द्वारा भक्ति की स्वर लहरियां
प्रवाहित होंगी, जो रात्रि पर्यंत
अखंड रामायण पाठ में परिणत
होंगी। उन्होंने बताया कि 3 से 5 अप्रैल
तक आयोजित होने वाला सार्वभौम
रामायण सम्मेलन
महोत्सव को वैचारिक ऊंचाई
प्रदान करेगा। देशभर के प्रख्यात मानस
वक्ता, पं. उमाशंकर शर्मा,
डॉ. भारत भूषण पांडेय
और पं. चंद्रकांत चतुर्वेदी,
रामकथा के माध्यम से
समाज, संस्कृति और जीवन मूल्यों
की गहराई को उजागर करेंगे।
यह केवल कथा नहीं,
बल्कि भारतीय चेतना का पुनर्स्मरण होगा।
इसके बाद 6 अप्रैल से 11 अप्रैल तक शुरू होगा
103वां संकट मोचन संगीत
समारोह, जो अपनी परंपरा
और प्रतिष्ठा के लिए विश्वविख्यात
है। मुक्ताकाशी मंच पर रात्रिव्यापी
चलने वाला यह आयोजन
शास्त्रीय संगीत को भक्ति के
साथ जोड़ते हुए उसे साधना
का स्वरूप देता है। इस
वर्ष समारोह की विशेषता है,
12 पद्म पुरस्कार से सम्मानित कलाकारों
और 21 नवप्रवेशी साधकों की सहभागिता, जो
परंपरा और नवीनता का
अद्भुत संतुलन प्रस्तुत करेंगे।
छह दिनों तक
चलने वाले इस महोत्सव
में संतूर, सितार, सरोद, बांसुरी, कथक, ओडिसी और
शास्त्रीय गायन की विविध
विधाएं एक ही मंच
पर जीवंत होंगी। देश-विदेश के
नामचीन कलाकार अपनी प्रस्तुतियों से
न केवल कला का
प्रदर्शन करेंगे, बल्कि उसे भगवान हनुमान
के चरणों में समर्पित भी
करेंगे। यही इस आयोजन
की आत्मा है, जहां संगीत
प्रदर्शन नहीं, बल्कि भक्ति की अभिव्यक्ति बन
जाता है। हर सुर
भगवान हनुमान को अर्पित होता
है और हर ताल
भक्ति का स्पंदन बन
जाती है। संकट मोचन
का यह आयोजन वर्षों
से इस परंपरा को
जीवित रखे हुए है
कि कलाकार यहां पारिश्रमिक नहीं,
बल्कि श्रद्धा लेकर आते हैं।
उनके लिए यह मंच
एक साधना स्थल है, जहां
सुर ही पूजा बन
जाते हैं और ताल
ही अर्पण।
काशी में आयोजित
यह महोत्सव केवल एक कार्यक्रम
नहीं, बल्कि उस सनातन संस्कृति
का जीवंत प्रतीक है, जिसमें मानस
की चौपाइयां, संगीत की लहरियां और
भक्ति की भावधारा मिलकर
आत्मा को स्पर्श करने
वाला दिव्य अनुभव रचती हैं। काशी
की यह परंपरा यह
भी सिद्ध करती है कि
यहां संगीत केवल कला नहीं,
बल्कि ईश्वर तक पहुंचने का
माध्यम है। यही कारण
है कि यह मंच
देश-विदेश के कलाकारों के
लिए केवल प्रदर्शन स्थल
नहीं, बल्कि साधना का तीर्थ बन
चुका है।

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