जहां गिरा सती का कर, वहीं विराजती हैं मां कड़ा : धाम में मुंडन से दूर होती हैं संतानों की बाधाएं
गंगा के पावन तट पर स्थित कड़ा शीतला धाम आस्था, विश्वास और सनातन परंपरा का अद्भुत केंद्र है। मान्यता है कि यहीं देवी सती का दाहिना कर गिरा था, जिसके कारण यह स्थान 51 शक्तिपीठों में विशिष्ट स्थान रखता है। मंदिर परिसर में स्थित पवित्र कुंड से निरंतर बहने वाली जलधारा भक्तों के लिए दिव्य आशीर्वाद का प्रतीक मानी जाती है। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु यहां अपने बच्चों का मुंडन संस्कार कराते हैं और मानते हैं कि मां शीतला की कृपा से संतानों के जीवन की बाधाएं दूर हो जाती हैं। नवरात्र और चैत्र मेले के समय यह धाम भक्ति और उत्साह से भर उठता है, जब लाखों श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए उमड़ पड़ते हैं। घंटों की प्रतीक्षा के बाद जब भक्त मां के चरणों में पहुंचते हैं, तो उन्हें अद्भुत शांति और संतोष की अनुभूति होती है। यही कारण है कि कड़ा धाम केवल मंदिर नहीं, बल्कि श्रद्धा का जीवंत तीर्थ है
सुरेश गांधी
उत्तर प्रदेश की आस्था-परंपरा
में कुछ ऐसे तीर्थ
हैं, जहां केवल दर्शन
ही नहीं बल्कि पीढ़ियों
की उम्मीदें और विश्वास भी
जुड़े होते हैं। प्रयागराज
और कौशाम्बी की सीमा पर
मानिकपुर क्षेत्र
में गंगा तट के
निकट स्थित कड़ा धाम का
मां शीतला मंदिर ऐसा ही एक
पवित्र स्थल है, जिसे
51 शक्तिपीठों में विशेष स्थान
प्राप्त है। मान्यता है
कि यहां देवी सती
का दाहिना कर—अर्थात हाथ
का पंजा—गिरा था,
जिसकी स्मृति आज भी मंदिर
परिसर में मौजूद पवित्र
कुंड के रूप में
जीवित है। यही कारण
है कि इस धाम
को ‘कड़ा देवी’ या
‘कड़ा शीतला माता’ के नाम से
जाना जाता है। यहां
आने वाले भक्तों की
सबसे बड़ी आस्था यह
है कि मां के
दरबार में बच्चों का
मुंडन संस्कार कराने से जीवन की
बाधाएं दूर हो जाती
हैं और संतानों का
जीवन सुखमय बनता है।
मंदिर परिसर में एक पवित्र
कुंड है, जिसके बारे
में मान्यता है कि इसमें
सती के कर की
दिव्य उपस्थिति आज भी विद्यमान
है। इस कुंड से
निरंतर जल की धारा
निकलती रहती है, जिसे
अत्यंत पवित्र माना जाता है।
भक्तजन इस कुंड को
जल या दूध से
भरवाते हैं और मानते
हैं कि ऐसा करने
से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण
होती हैं। कड़ा धाम की सबसे
विशेष परंपराओं में बच्चों का
मुंडन संस्कार प्रमुख है। पूर्वांचल और
उत्तर प्रदेश के कई जिलों
से माता-पिता अपने
बच्चों को यहां लाकर
उनका पहला मुंडन कराते
हैं।
लोकमान्यता है कि मां
शीतला के दरबार में
मुंडन कराने से बच्चों के
जीवन में आने वाली
बाधाएं समाप्त हो जाती हैं
और वे स्वस्थ, दीर्घायु
तथा सुखी जीवन प्राप्त
करते हैं। इसी आस्था का परिणाम है
कि यहां प्रतिवर्ष लाखों
की संख्या में मुंडन संस्कार
होते हैं। इतना ही
नहीं, मेले के दौरान
मुंडन का ठेका लाखों
रुपये में छोड़ा जाता
है। बताया जाता है कि
एक माह तक चलने
वाले चैत्र मेले में मुंडन
का ठेका 60 लाख रुपये से
भी अधिक में जाता
है। यह
तथ्य इस धाम की
लोकप्रियता और श्रद्धालुओं की
गहरी आस्था को स्पष्ट करता
है।
नवरात्र और चैत्र मेले में उमड़ता है श्रद्धा का सागर
कड़ा शीतला धाम
में वर्ष भर श्रद्धालुओं
का आना-जाना लगा
रहता है, लेकिन चैत्र
और आश्विन नवरात्र के दौरान यहां
का दृश्य अद्भुत हो जाता है।
इन दिनों मंदिर परिसर में सुबह से
देर रात तक मेले
जैसा वातावरण रहता है। भक्त
घंटों लंबी कतारों में
खड़े होकर मां के
दर्शन करते हैं। विशेष
रूप से सोमवार और
रविवार को यहां श्रद्धालुओं
की संख्या डेढ़ से दो
लाख तक पहुंच जाती
है। दूर-दूर से
आने वाले भक्त मंदिर
परिसर के बाहर चादर
बिछाकर रुकते हैं, वहीं भोजन
बनाते हैं और कई
दिन तक माता के
दर्शन की प्रतीक्षा करते
हैं। गर्मी, धूल और अन्य
कठिनाइयों के बावजूद उनकी
आस्था कम नहीं होती।
वाराणसी, मिर्जापुर,
भदोही, जौनपुर, सोनभद्र, प्रतापगढ़, रायबरेली, अमेठी, सुल्तानपुर, आजमगढ़, गाजीपुर और बलिया जैसे
जिलों के अलावा राजस्थान,
मध्यप्रदेश और हरियाणा से
भी बड़ी संख्या में
श्रद्धालु यहां आते हैं।
मां शीतला : रोगों से रक्षा की अधिष्ठात्री देवी
कड़ा धाम का गौरवशाली इतिहास
कड़ा धाम का
इतिहास केवल धार्मिक नहीं
बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि
से भी महत्वपूर्ण रहा
है। मंदिर के पास ही
प्राचीन किला स्थित है,
जिसे राजा जयचंद्र से
जोड़ा जाता है। यह
वही जयचंद्र हैं जिनका नाम
भारतीय इतिहास में अक्सर पृथ्वीराज
चौहान के समय से
जुड़ा हुआ मिलता है।
इतिहासकारों के अनुसार मध्यकाल
में यहां कई महत्वपूर्ण
घटनाएं घटीं। मुगल काल में
अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के
दौरान यहां कई लोगों
की मृत्यु हुई थी, जिनकी
कब्रों के निशान आज
भी क्षेत्र में देखे जा
सकते हैं। इसके अलावा यह स्थान संतों
और कवियों की साधना भूमि
भी रहा है। संत
मलूकदास, ख्वाजा कड़क शाह बाबा
और कई प्रसिद्ध उर्दू
शायर यहां निवास कर
चुके हैं।
मिर्जापुर के अदलपुरा में भी है मां का प्रसिद्ध धाम
पूर्वांचल में मां शीतला
का एक और प्रसिद्ध
धाम मिर्जापुर जिले के अदलपुरा
में स्थित है। यहां भी
वर्ष भर श्रद्धालुओं का
तांता लगा रहता है।
मान्यता है कि कड़ा
धाम और अदलपुरा दोनों
स्थानों का आपस में
आध्यात्मिक संबंध है। कई श्रद्धालु
दोनों धामों की यात्रा को
पूर्ण तीर्थ मानते हैं।
दर्शन की विशेष परंपरा : पहले हनुमान, फिर काल भैरव
कड़ा धाम में
दर्शन की एक विशेष
परंपरा भी है। मंदिर
के पुजारियों के अनुसार भक्तों
को पहले पवनपुत्र हनुमान
जी के दर्शन करने
चाहिए और उसके बाद
काल भैरव के। इसके
बाद ही मां शीतला
के दर्शन करना शुभ माना
जाता है। ऐसा करने
से माता प्रसन्न होकर
भक्तों की सभी मनोकामनाएं
पूर्ण करती हैं।
शीतला अष्टमी और बसौड़ा व्रत का महत्व
मां शीतला की
पूजा विशेष रूप से चैत्र
मास की कृष्ण अष्टमी
को की जाती है,
जिसे शीतला अष्टमी या बसौड़ा कहा
जाता है। इस दिन विशेष रूप
से ठंडा भोजन चढ़ाने
की परंपरा है। मान्यता है
कि इस दिन चूल्हा
नहीं जलाया जाता और एक
दिन पहले बना भोजन
माता को भोग लगाया
जाता है। व्रत की
विधि में रसोई की
दीवार पर घी से
पांच उंगलियों के निशान बनाकर
रोली और चावल चढ़ाए
जाते हैं। इसके बाद
शीतला स्तोत्र का पाठ किया
जाता है। इस व्रत
को करने से परिवार
में सुख-शांति और
संतानों की लंबी आयु
का आशीर्वाद मिलता है।
शीतलाष्टक : शिव द्वारा रचित स्तुति
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला
देवी की स्तुति में
“शीतलाष्टक” नामक स्तोत्र का
वर्णन मिलता है, जिसकी रचना
भगवान शिव ने लोककल्याण
के लिए की थी।
इस स्तोत्र में माता के
स्वरूप का वर्णन इस
प्रकार किया गया है
:—
“वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्
मार्जनी कलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।”
अर्थात मैं उस भगवती
शीतला को प्रणाम करता
हूं जो गर्दभ पर
विराजमान हैं, जिनके हाथ
में झाड़ू और कलश है
तथा जिनका मस्तक सूप से अलंकृत
है।
आस्था के आगे छोटी पड़ जाती हैं कठिनाइयां
कड़ा धाम में
आने वाले श्रद्धालुओं की
आस्था इतनी गहरी है
कि वे कई दिन
तक मंदिर परिसर में ही रुककर
मां के दर्शन करते
हैं। कई परिवार अपने
बच्चों के मुंडन संस्कार,
विवाह की मनोकामना या
संतान प्राप्ति के लिए यहां
मन्नत मांगते हैं। भक्तों का विश्वास है
कि मां शीतला के
दर्शन से जीवन के
कष्ट दूर हो जाते
हैं और परिवार में
सुख-समृद्धि आती है।
प्रशासन की विशेष व्यवस्थाएं
नवरात्र और चैत्र मेले
के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को
देखते हुए जिला प्रशासन
विशेष व्यवस्था करता है। श्रद्धालुओं
की सुविधा और सुरक्षा के
लिए अलग से “शीतला
माता बोर्ड” का गठन किया
गया है। इसके माध्यम
से मेले की व्यवस्था,
सुरक्षा, स्वच्छता और यातायात की
निगरानी की जाती है।
धाम में लगेगा दो दिवसीय विशाल गदर्भ मेला
कड़ा धाम की धार्मिक परंपराओं में शीतला
अष्टमी के अवसर पर लगने वाला दो दिवसीय गदर्भ मेला अत्यंत विशिष्ट और ऐतिहासिक माना
जाता है। इस वर्ष भी 11 मार्च से यहां यह अनोखा मेला आयोजित होने जा रहा है, जिसमें
देश के विभिन्न हिस्सों से व्यापारी और श्रद्धालु बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। मान्यता
है कि शीतला अष्टमी के दिन हजारों श्रद्धालु मां शीतला के दरबार में दर्शन-पूजन के
लिए कड़ा धाम आते हैं। दर्शन के पश्चात भक्त
मेले में जाकर मां के वाहन माने जाने वाले गर्दभ (गधे) को दूध पिलाते हैं तथा उसे चना
और घास खिलाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इस मेले की एक और विशेषता यहां होने वाली
गधों और खच्चरों की बड़ी खरीद-फरोख्त है। पंजाब, हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, बिहार
और जम्मू-कश्मीर तक से व्यापारी और खरीदार यहां पहुंचते हैं। यहां बिकने वाले कई गधे
और खच्चर बाद में वैष्णो देवी की कठिन चढ़ाई में श्रद्धालुओं की सेवा के लिए उपयोग
में लाए जाते हैं। मेले को लेकर जिला प्रशासन द्वारा सुरक्षा, साफ-सफाई और यातायात
की समुचित व्यवस्था की गई है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
दैत्य विस्फोटक के वध से जुड़ी है मां शीतला
की महिमा
कड़ा धाम की प्राचीन मान्यताओं में एक
रोचक किवदंती भी प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में कङ्कोटक वन क्षेत्र में
विस्फोटक नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य रहता था। उसके आतंक के कारण उस क्षेत्र
में साधु-संत और महात्मा यज्ञ, तप और धार्मिक अनुष्ठान नहीं कर पाते थे। दैत्य को यह
वरदान प्राप्त था कि वह किसी भी अस्त्र-शस्त्र से नहीं मरेगा। साधु-संतों की पुकार
पर भगवान विष्णु ने दैत्य विस्फोटक को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों के बीच हजारों वर्षों
तक भीषण युद्ध चला, किंतु किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा। अंततः दैत्य विस्फोटक ज्वर
(बुखार) का रूप धारण कर भगवान विष्णु के शरीर में प्रवेश कर गया, जिससे उनके शरीर का
ताप बढ़ गया और फफोले निकल आए। पीड़ा से व्याकुल होकर भगवान विष्णु ने आदि शक्ति मां
शीतला की अष्टक स्तुति कर उनका आवाह्न किया। तब माता शीतला प्रकट हुईं और उन्होंने
मार्जनी से शीतल जल का छिड़काव कर श्रीहरि की ज्वर पीड़ा शांत की। इसके बाद मार्जनी
के प्रहार से दैत्य विस्फोटक का वध कर उसे मुक्ति प्रदान की। मान्यता है कि जहां दैत्य
का शरीर धरती पर गिरा, वहां एक कुंडनुमा गड्ढा बन गया। उसी स्थान पर आज भगवान शिव भैरव
रूप में विराजमान हैं और असुरी शक्तियों के प्रसार पर नियंत्रण रखते हैं।
आस्था, परंपरा और संस्कृति का अद्भुत केंद्र
कड़ा शीतला धाम
केवल एक मंदिर नहीं,
बल्कि आस्था और परंपरा का
जीवंत केंद्र है। यहां धर्म,
इतिहास और लोकविश्वास एक
साथ दिखाई देते हैं। गंगा
तट पर स्थित यह
शक्तिपीठ आज भी लाखों
लोगों की श्रद्धा का
आधार है। मां शीतला
के दरबार में आने वाला
हर भक्त यही अनुभव
करता है कि यहां
केवल दर्शन ही नहीं, बल्कि
विश्वास और आशा की
नई ऊर्जा भी मिलती है।
शायद यही कारण है
कि जो भक्त एक
बार यहां आता है,
वह बार-बार मां
के चरणों में शीश नवाने
की इच्छा लेकर लौटता है।






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