Saturday, 11 April 2026

प्रेम ही सबसे बड़ा राग है, और समरसता ही उसकी सबसे सुंदर बंदिश… रोनू मजूमदार

संगीत ही वह सेतु है, जो मनुष्य को मनुष्य से और मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है

प्रेम ही सबसे बड़ा राग है, और समरसता ही उसकी सबसे सुंदर बंदिश… रोनू मजूमदार 

काशी की सांध्य बेला में जब गंगा आरती की लौ आकाश से संवाद करती है और मंदिरों की घंटियों के बीच कहीं दूर से बांसुरी की तान सुनाई देती है, तब वह केवल संगीत नहीं रह जाता, वह आत्मा की अनुभूति बन जाता है। ऐसे ही सुरों के साधक हैं रोनू मजूमदार, जिनकी बांसुरी में काशी की आध्यात्मिकता और विश्व संगीत का विस्तार एक साथ धड़कता है। चार दशकों से अधिक लंबी अपनी संगीत यात्रा में उन्होंने केवल हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की परंपरा को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर भी स्थापित किया। पद्मश्री से सम्मानित इस कलाकार की विशेषता यह है कि वे परंपरा में रचे-बसे रहते हुए भी निरंतर नवाचार की राह पर चलते हैं। चाहे राग दरबारी कन्नाड़ा की गहराई हो, संत मीरा बाई की भक्ति हो या सूफी संत अमीर खुसरो की रचनाओं का प्रेम, रोनू मजूमदार की बांसुरी हर भाव को जीवंत कर देती है. उनका मानना है, “संगीत ही वह सेतु है, जो मनुष्य को मनुष्य से और मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है।” 

सुरेश गांधी

वाराणसी की आध्यात्मिक फिजाओं में जब भी संगीत की बात होती है, तो संकट मोचन संगीत समारोह का नाम स्वतः ही स्मरण हो आता है। यह केवल एक मंच नहीं, बल्कि वह तपोभूमि है जहां सुर, साधना और श्रद्धा एक साथ प्रवाहित होते हैं। इसी पावन अवसर पर देश के ख्यातिप्राप्त बांसुरी वादक रानू मजूमदार से सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी की हुई एक विस्तृत बातचीत ने संगीत के उस गूढ़ पक्ष को उजागर किया, जो केवल सुनने का नहीं, बल्कि जीने का विषय है। यह संवाद केवल प्रश्न-उत्तर नहीं, बल्कि एक साधक के अंतर्मन की यात्रा है, जहां रागों की गंभीरता, भक्ति की मधुरता और जीवन की सादगी एक साथ उपस्थित हैं। यह विशेष साक्षात्कार केवल एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि उस साधना की यात्रा है, जिसमें सुर ही साध्य हैं और सुर ही साधना। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंशः-

सुरेश गांधी : आज की प्रस्तुति में आपने राग दरबारी कन्नाड़ा जैसे गंभीर राग को चुना, क्या विशेष रहा इसमें?

रोनू मजूमदार : देखिए, हर मंच की एक आत्मा होती है, और संकट मोचन का मंच तो स्वयं में एक साधना स्थल है। यहां पर मैंने राग दरबारी कन्नाड़ा को इसलिए चुना क्योंकि यह राग गहराई, धैर्य और आत्ममंथन का प्रतीक है। सच कहूं तो 103 वर्षों के इस मंच पर हमने कुछ ऐसा प्रस्तुत करने का प्रयास किया, जो पहले यहां शायद ही कभी हुआ हो। इस राग में रूपक ताल और तीनताल में पुरानी बंदिशअभी कैसे बने मोरी बात सजनीको मैंने अपने भावों के साथ ढालने की कोशिश की। यह केवल तकनीकी प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि मेरे वर्षों की साधना का निचोड़ थी।

प्रश्न : आपकी बांसुरी में आज भक्ति और सूफी रंग का अनूठा संगम देखने को मिला...?

जवाब : संगीत की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि वह किसी एक धर्म, जाति या भाषा में बंधा नहीं है। मैंने संत मीरा बाई के भजन और सूफी संत अमीर खुसरो की रचनाछाप तिलकको इसलिए प्रस्तुत किया, क्योंकि दोनों का संदेश एक ही है, प्रेम और समर्पण। मीरा कहती हैंप्रेम रतन धन पायो”, और खुसरो कहते हैंछाप तिलक सब छीनी रे...दोनों ही आत्मा के मिलन की बात करते हैं। मैंने यही बताने की कोशिश की कि ईश्वर एक है, बस उसे पाने के रास्ते अलग-अलग हैं।

प्रश्न : आपने अपने संदेश में धार्मिक एकता की बात कही, क्या यह आज के समय की आवश्यकता है?

जवाब : बिल्कुल, आज के समय में सबसे बड़ी जरूरत है, समझ और सहिष्णुता। कोई पीले वस्त्र पहनकर प्रभु राम की पूजा करता है, तो कोई अल्लाह की इबादत करता है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ऊपर वाला एक ही है। संगीत वह माध्यम है, जो इन सभी सीमाओं को मिटा सकता है। जब सुर गूंजते हैं, तो वे किसी धर्म या भाषा में नहीं बंधते, वे सीधे दिल तक पहुंचते हैं।

प्रश्न : आपने कहा कि आज की प्रस्तुति आपके जीवन की विशेष प्रस्तुतियों में से एक रही...?

जवाब : हाँ, सच में। मैंने अपने पूरे जीवन में शायद 10-12 बार ही ऐसा महसूस किया होगा, जैसा आज हुआ। सुबह से ही एक अलग ऊर्जा थी, एक अलग शांति थी। ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य शक्ति मेरे साथ है। संगीत में यह अवस्था बहुत दुर्लभ होती है, जब आप स्वयं को भूल जाते हैं और केवल सुर ही बोलते हैं। आज वही दिन था।

प्रश्न : आपके पुत्र और शिष्य ने भी आज मंच पर साथ दिया...?

जवाब : हाँ, मेरे पुत्र ऋषिकेश मजूमदार और शिष्य रोहन बॉस ने आज बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। एक गुरु के लिए इससे बड़ा सुख क्या हो सकता है कि उसकी अगली पीढ़ी उससे आगे बढ़े। उन दोनों ने आज जिस तरह से संगत की, वह मेरे लिए गर्व का क्षण था।

प्रश्न : आपने 1991 में पहली बार इस मंच पर प्रस्तुति दी थी, उस समय और आज में क्या अंतर देखते हैं?

जवाब : 1991 में जब मैं पहली बार यहां आया था, तब मैं बहुत छोटा था, सिर्फ एक कलाकार के रूप में सीखने आया था। आज 35 साल बाद जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है कि यह मंच मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। तब के श्रोता और आज के श्रोताओं में भी फर्क आया है, लेकिन एक चीज़ आज भी वैसी ही है, यहां का प्रेम और श्रद्धा।

प्रश्न : आपने नई पीढ़ी के संगीत सीखने के तरीके पर भी टिप्पणी की...?

जवाब : आज की पीढ़ी मोबाइल और गूगल से बहुत कुछ सीख रही है, जो कि अच्छी बात है। लेकिन संगीत केवल तकनीक नहीं है, यह साधना है। हमारे समय में गुरु-शिष्य परंपरा थी, जहां केवल राग ही नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका भी सिखाया जाता था। आज वह थोड़ा कम हो गया है, और यही चिंता का विषय है। आज के युवा बहुत प्रतिभाशाली हैं, लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि संगीत केवल तकनीक नहीं है। अनुशासन जरूरी है, निरंतर अभ्यास जरूरी है और सबसे जरूरी, अपनी पहचान बनाना. मोबाइल और गूगल से आप सीख सकते हैं, लेकिन असली संगीत गुरु-शिष्य परंपरा से ही आता है।

प्रश्न : आपके जीवन में आपके पिता का क्या योगदान रहा?

जवाब : मेरे पिता भानु दादा मेरे पहले गुरु थे। बनारस में उन्हेंभानु दादाके नाम से जाना जाता था। उन्होंने मुझे केवल बांसुरी बजाना नहीं सिखाया, बल्कि संगीत की आत्मा को समझाया। उन्होंने मुझे सिखाया कि संगीत केवल सुरों का खेल नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। आज जो कुछ भी हूँ, उन्हीं की देन है।

प्रश्न : आपका बचपन वाराणसी में बीता। उस वातावरण ने आपके संगीत को किस तरह आकार दिया?

जवाब : काशी केवल एक शहर नहीं है, यह एक जीवंत संस्कृति है, एक अनवरत साधना है। मेरा बचपन गंगा के घाटों, मंदिरों की घंटियों और महान संगीतकारों की छाया में बीता। आठ वर्ष की आयु में ही मुझे उस्ताद बिस्मिल्लाह खान जैसे महान कलाकारों के घर जाने का सौभाग्य मिला। उनके यहां बैठकर मैंने केवल संगीत नहीं सुना, बल्कि यह समझा कि संगीत कैसे जीवन का हिस्सा बनता है। पंडित किशन महाराज और गिरिजा देवी जैसी विभूतियों के साथ बिताए क्षणों ने मेरे भीतर संगीत के प्रति एक गहरी श्रद्धा जगाई।

प्रश्न : आपको पद्मश्री से सम्मानित किया गया, इस उपलब्धि को कैसे देखते हैं?

जवाब : सरकार द्वारा दिया गया पद्मश्री निश्चित रूप से एक बड़ा सम्मान है, लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार श्रोताओं का प्रेम है। जब लोग आपकी धुन को सुनकर भावुक हो जाते हैं, तो वही असली सम्मान होता है।

प्रश्न : आपकी संगीत यात्रा में आपके गुरुओं की क्या भूमिका रही?

जवाब : गुरु के बिना संगीत अधूरा है। मेरे पिता ने मुझे अनुशासन सिखाया, और फिर मुंबई आकर मैंने पंडित विजय राघव राव से शिक्षा प्राप्त की। लेकिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब मुझे पंडित रवि शंकर का सान्निध्य मिला। वे केवल गुरु नहीं, बल्कि एक दृष्टा थे। उन्होंने मुझे अपनी शैली खोजने की प्रेरणा दी। उन्होंने हमेशा कहा, “दूसरों की नकल मत करो, अपनी आवाज़ खोजो।यही बात आज भी मेरे संगीत का आधार है।

प्रश्न : आपने शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ फिल्म और फ्यूजन संगीत में भी काम किया है। यह संतुलन कैसे बनता है?

जवाब : संगीत की कोई सीमा नहीं होती। मैंने आर.डी. बर्मन और विशाल भारद्वाज जैसे संगीतकारों के साथ काम किया, और आशा भोसले के साथ भी प्रस्तुति दी। लेकिन चाहे मंच कोई भी हो, मेरे लिए संगीत की आत्मा वही रहती है। शास्त्रीय संगीत मेरी जड़ है, और बाकी सब उसकी शाखाएं हैं। फ्यूजन तब तक सार्थक है, जब तक वह अपनी मूल पहचान को बनाए रखे।

प्रश्न : मॉस्को फेस्टिवल का आपका अनुभव काफी चर्चित रहा है...?

जवाब : वह मेरे जीवन का एक निर्णायक क्षण था। मैं केवल 24 वर्ष का था, और एक बहुत बड़े मंच पर प्रस्तुति दे रहा था। जब मैंने बांसुरी बजाई, तो पूरा सभागार खड़ा हो गया। उस समय मेरे गुरु पंडित रवि शंकर ने मुझसे कहा, “तुमने भारत को गौरवान्वित किया।वह क्षण आज भी मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत है।

प्रश्नः आपने गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बनाया है, उसके बारे में बताइए...?

जवाब : यह मेरे लिए एक सपना था, जो काफी समय बाद पूरा हुआ। हमने मियां भैरव, मियां की तोड़ी और दरबारी जैसे रागों को एक साथ पिरोकर एक बड़ी संगीत संरचना बनाई। इतने बड़े ऑर्केस्ट्रा के साथ काम करना आसान नहीं था, लेकिन जब वह सफल हुआ, तो वह एक ऐतिहासिक क्षण बन गया।

प्रश्न : अंत में, संगीत आपके लिए क्या है?

जवाब : मेरे लिए संगीत केवल कला नहीं है, यह साधना है, यह पूजा है, यह जीवन है। और एक आध्यात्मिक यात्रा है। जब मैं बांसुरी बजाता हूँ, तो मैं खुद को भूल जाता हूँ। केवल सुर ही रह जाते हैं, और वही मुझे ईश्वर के करीब ले जाते हैं।

सुरों में समरसता का संदेश

रानू मजूमदार का यह संवाद केवल एक कलाकार की बात नहीं, बल्कि एक साधक की आत्मा की आवाज़ है। उनके सुरों में जहां रागों की गहराई है, वहीं उनके शब्दों में समाज को जोड़ने का संदेश भी। संकट मोचन की इस पावन भूमि पर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है, जो मनुष्य को मनुष्य से और मनुष्य को ईश्वर से जोड़ती है। उनकी बांसुरी की तान आज भी गूंज रही है, एक संदेश के साथ... “प्रेम ही सबसे बड़ा राग है, और समरसता ही उसकी सबसे सुंदर बंदिश।जब गंगा के किनारे कोई बांसुरी बजती है, तो वह केवल एक धुन नहीं होती, वह एक संदेश होती है... “संगीत ही वह सेतु है, जो मनुष्य को मनुष्य से और मनुष्य को ईश्वर से जोड़ता है।

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