सुरों से सजी साधना : सौ तारों में गूंजी अभय सोपोरी की सूफियाना विरासत, तानों में बोली परंपरा
काशी
की
पावन
धरती
पर
जब
संकट
मोचन
संगीत
समारोह
की
छठी
निशा
सजी,
तो
संतूर
की
झंकार
ने
एक
बार
फिर
समय,
साधना
और
संवेदना
को
एक
सूत्र
में
पिरो
दिया।
मंच
पर
विराजमान
अभय
रुस्तम
सोपोरी
केवल
एक
कलाकार
नहीं,
बल्कि
तीन
शताब्दियों
पुरानी
सूफियाना
विरासत
के
संवाहक
के
रूप
में
उपस्थित
थे।
उनके
हाथों
में
थमा
संतूर,
‘शततंत्री
वीणा’
की
परंपरा
को
आगे
बढ़ाते
हुए
हर
सुर
में
अपने
पिता
पंडित
भजन
सोपोरी
की
स्मृतियों
को
जीवंत
कर
रहा
था।
यह
प्रस्तुति
मात्र
संगीत
का
कार्यक्रम
नहीं
थी,
बल्कि
भावों
की
ऐसी
साधना
थी,
जिसमें
राग
सरस्वती
के
गंभीर
आलाप
से
लेकर
तानों
की
कोमलता
तक,
हर
क्षण
आध्यात्मिक
अनुभूति
से
भरा
रहा।
पखावज
पर
प्रो.
विश्वम्भर
नाथ
मिश्रा
की
संगत
ने
इस
सुर-यात्रा
को
और
अधिक
गूढ़
और
प्रभावशाली
बना
दिया।
इस
विशेष
अवसर
पर
अभय
सोपोरी
ने
न
केवल
अपनी
कला
से,
बल्कि
अपने
विचारों
से
भी
श्रोताओं
को
छुआ,
जहां
संगीत,
समाज
और
संवेदना
एक
साथ
प्रवाहित
हुए
सुरेश गांधी
सुरेश
गांधी
: संकट
मोचन
के
इस
मंच
पर
25वीं
प्रस्तुति...
यह
क्षण
आपके
लिए
कितना
खास
है?
अभय
सोपोरी
: यह मेरे लिए केवल
एक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा
है। करीब 25 साल पहले मैं
अपने पिता के साथ
यहां आया था। उस
समय की स्मृतियां आज
भी उतनी ही जीवंत
हैं। आज जब मैं
25वीं बार इस मंच
पर बैठा हूं, तो
लगता है जैसे समय
एक वृत्त बनाकर वहीं आ खड़ा
हुआ है। यह मेरे
जीवन के सबसे खूबसूरत
क्षणों में से एक
है।
सवाल
: आपने
इस
बार
राग
सरस्वती
का
चयन
किया,
इसके
पीछे
क्या
भाव
रहा?
सवाल
: आपके
वादन
में
एक
अलग
भाव
और
गहराई
नजर
आती
है,
इसका
रहस्य
क्या
है?
अभय
सोपोरी
: संगीत केवल तकनीक नहीं
है, यह साधना है।
यह भीतर से आता
है। जब आप सुरों
के साथ जीने लगते
हैं, तब हर राग
एक संवाद बन जाता है,
अपने आप से, अपने
गुरु से और ईश्वर
से। मैंने हमेशा यही कोशिश की
है कि हर प्रस्तुति
में सच्चाई और समर्पण बना
रहे।
सवाल
: आपके
पिता
पंडित
भजन
सोपोरी
की
विरासत
को
आगे
बढ़ाना
कितना
चुनौतीपूर्ण
है?
अभय
सोपोरी
: यह मेरे लिए गर्व
भी है और जिम्मेदारी
भी। उन्होंने जो परंपरा स्थापित
की, उसे आगे बढ़ाना
आसान नहीं है। लेकिन
मैंने हमेशा यही सोचा कि
उनकी सीख और उनके
मूल्यों को अपने संगीत
में जीवित रखूं। यही मेरे लिए
सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।
सवाल
: इस
बार
पखावज
पर
प्रो.
विश्वम्भर
नाथ
मिश्रा
के
साथ
आपकी
जुगलबंदी
रही,
अनुभव
कैसा
रहा?
अभय
सोपोरी
: यह मेरे लिए एक
नया और अद्भुत अनुभव
था। पखावज की गंभीरता और
संतूर की मधुरता का
संगम बहुत कम देखने
को मिलता है। उनकी संगत
ने मेरी प्रस्तुति को
एक अलग ही ऊंचाई
दी। यह संवाद मेरे
लिए भी उतना ही
सीखने वाला रहा जितना
श्रोताओं के लिए आनंददायक।
सवाल
: आपने
प्रस्तुति
से
पहले
कैंसर
जागरूकता
की
बात
की,
यह
पहल
क्यों?
अभय
सोपोरी
: संगीतकार होने के साथ-साथ हम समाज
का भी हिस्सा हैं।
अगर हम अपने मंच
से लोगों को किसी जरूरी
बात के लिए जागरूक
कर सकें, तो यह हमारी
जिम्मेदारी है। मैंने अस्पतालों
में छोटे बच्चों को
इस बीमारी से जूझते देखा
है, जो बहुत पीड़ादायक
है। अगर समय पर
जांच हो, तो बहुत
कुछ बचाया जा सकता है।
सवाल
: कश्मीर
और
काशी,
दोनों
से
आपका
गहरा
रिश्ता
रहा
है,
इसे
कैसे
देखते
हैं?
अभय
सोपोरी
: कश्मीर मेरी जन्मभूमि है
और काशी मेरी आत्मा
का निवास। दोनों ही स्थान आध्यात्मिक
ऊर्जा से भरे हुए
हैं। जब मैं यहां
आता हूं, तो एक
अलग ही शांति और
अपनापन महसूस होता है। यह
रिश्ता शब्दों में बयान करना
मुश्किल है। काशी का
संकट मोचन दरबार मेरे
लिए एक मंदिर से
बढ़कर है, यह एक
साधना स्थल है, जहां
हर प्रस्तुति ईश्वर को समर्पित होती
है।
सवाल
: संतूर
आपके
लिए
क्या
है,
एक
वाद्य,
एक
साधना
या
जीवन
का
मार्ग?
अभय
सोपोरी
: मेरे लिए संतूर केवल
एक वाद्य यंत्र नहीं है, यह
जीवन जीने का एक
तरीका है। मैं ऐसे
परिवार से आता हूं,
जहां संगीत, रहस्यवाद और आध्यात्मिकता की
जड़ें 300 वर्षों से भी अधिक
पुरानी हैं। संतूर हमारे
परिवार का देश को
दिया गया एक उपहार
है। जब आप सौ
तारों के बीच जन्म
लेते हैं, तो संगीत
आपके भीतर सांसों की
तरह बस जाता है।
बचपन में मैं अपने
पिता पंडित भजन सोपोरी को
देर रात तक रियाज
करते सुनता था। वह ध्वनि
मेरे अवचेतन में समा गई,
और शायद वहीं से
मेरी असली शिक्षा शुरू
हुई.
सवाल
: आपके
सूफ़ियाना
घराने
की
परंपरा
कितनी
पुरानी
है?
अभय
सोपोरी
: हमारा सूफ़ियाना घराना छह पीढ़ियों से
संतूर वादन को समर्पित
है, लेकिन इसकी जड़ें 300 वर्षों
से भी अधिक पुरानी
हैं। मेरे दादा पंडित
शंभू नाथ सोपोरी और
पिता ने इस परंपरा
को न केवल जीवित
रखा, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों
तक पहुंचाया।यह घराना केवल संगीत नहीं
सिखाता, बल्कि एक दर्शन सिखाता
है, जहां सुर ईश्वर
तक पहुंचने का माध्यम बनते
हैं.
सवाल
: संतूर
के
इतिहास
और
स्वरूप
को
आप
कैसे
देखते
हैं?
अभय
सोपोरी
: संतूर को ‘शततंत्री वीणा’
कहा जाता है, सौ
तारों वाली वीणा। इसका
नाम फ़ारसी भाषा से आया,
लेकिन इसकी आत्मा भारतीय
है। यह केवल एक
वाद्य नहीं, बल्कि एक ‘यंत्र’ है,
जिसका संबंध श्रीयंत्र और शैव परंपरा
से भी जुड़ा हुआ
है। इसका समलम्बाकार आकार
और इसकी ध्वनि एक
गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा को प्रकट करते
हैं। इसकी तरंगें मन
और तंत्रिका तंत्र को शांत करती
हैं, इसलिए इसे सुनना केवल
संगीत सुनना नहीं, बल्कि ध्यान की अवस्था में
प्रवेश करना है।
सवाल
: पंडित
भजन
सोपोरी
की
विरासत
को
आगे
बढ़ाना
कितना
चुनौतीपूर्ण
है?
अभय
सोपोरी
: यह मेरे लिए गर्व
की बात है, लेकिन
उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी
भी। मेरे पिता ने
संतूर को एक पूर्ण
एकल वाद्य यंत्र का दर्जा दिलाया।
उनका मानना था कि संगीत
में कुछ भी ‘गलत’
नहीं होता, हर गलती एक
नई संभावना है। यही सोच
मेरे विकास की नींव बनी।
2022 में उनका जाना मेरे
जीवन की सबसे बड़ी
क्षति थी... लेकिन उसी ने मुझे
और मजबूत किया, अब यह मेरी
जिम्मेदारी है कि इस
परंपरा को आगे बढ़ाऊं.
सवाल
: आपने
संतूर
में
कई
नए
प्रयोग
किए
हैं,
उनके
बारे
में
बताइए?
अभय
सोपोरी
: मैंने हमेशा कोशिश की कि संतूर
में तंत्रकारी (वाद्य शैली) के साथ गायकी
(वोकल एप्रोच) का समन्वय हो।
संतूर को पारंपरिक सीमाओं
से बाहर निकालकर मैंने
उसमें भावों की अभिव्यक्ति को
और विस्तृत किया। आज यह वाद्य
शास्त्रीय संगीत के साथ-साथ
फ्यूजन, फिल्म और अंतरराष्ट्रीय मंचों
पर भी अपनी जगह
बना चुका है.
सवाल
: आज
के
युवाओं
के
लिए
आपका
क्या
संदेश
है?
अभय सोपोरी : संगीत हो या जीवन, धैर्य और निरंतरता सबसे जरूरी है। जल्दी सफलता पाने की बजाय साधना पर ध्यान देना चाहिए। अगर आप सच्चे मन से मेहनत करेंगे, तो सफलता जरूर मिलेगी। फिरहाल, संतूर की झंकार के बीच यह बातचीत केवल एक साक्षात्कार नहीं, बल्कि एक साधक के मन की गूंज थी, जहां विरासत का गर्व है, साधना की गहराई है और समाज के प्रति संवेदनशीलता की सच्ची अभिव्यक्ति भी।



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