संतूर की विरासत, पखावज की प्रतिष्ठा : गूंजा सुरों का स्वर्णिम अध्याय, सुनाया श्रद्धा का अमर राग
छठी निशा
में
अभय
रुस्तम
सोपोरी
की
25वीं
प्रस्तुति,
राग
सरस्वती
में
पिता
को
नमन,
पखावज
पर
प्रो.
विश्वम्भर
नाथ
मिश्रा
संग
अद्भुत
जुगलबंदी
ने
बांधा
समां
प्रस्तुति में
भाव,
भक्ति
और
लय
का
अद्भुत
संगम
सुरेश गांधी
वाराणसी। संकट मोचन संगीत
समारोह की छठी निशा
की चौथी प्रस्तुति संगीत,
श्रद्धा और परंपरा के
अद्भुत संगम का साक्षी
बनी। जैसे ही मंच
पर संतूर के साधक अभय
रुस्तम सोपोरी विराजमान हुए, पूरा मंदिर
प्रांगण एक विशेष भावभूमि
में प्रवेश कर गया, एक
ऐसी भावभूमि, जहां सुरों में
स्मृतियां थीं, लय में
विरासत और हर ध्वनि
में भक्ति का स्पंदन। यही
वजह रहा संगीत रसिकों
को एक अविस्मरणीय अनुभूति
दी। या यूं कहे
इस दरबार में संतूर वादन
की परंपरा का एक और
स्वर्णिम अध्याय जुड़ा।
प्रस्तुति की शुरुआत में
संतूर के तारों से
निकला गंभीर आलाप मानो श्रोताओं
को ध्यान की अवस्था में
ले गया। धीरे-धीरे
राग का विस्तार होता
गया और हर सुर
में गहराई, संतुलन और सूक्ष्मता का
अद्भुत समन्वय दिखा। आलाप की गाम्भीर्यपूर्ण
रचना ने वातावरण में
ऐसी तन्मयता पैदा की कि
श्रोता पूरी तरह सुरों
में डूबते चले गए। जैसे-जैसे वादन आगे
बढ़ा, संतूर की मधुरता और
कोमलता ने अपना प्रभाव
और गहरा किया। हर
तान में भावों की
सहज अभिव्यक्ति और तकनीकी निपुणता
का सुंदर संतुलन देखने को मिला। मंद्र
से तार सप्तक तक
की यात्रा में हर स्वर
सजीव हो उठा। तानों
की तरलता, मींड की महीनता
और लयकारी की सटीकता ने
यह सिद्ध कर दिया कि
यह प्रस्तुति केवल अभ्यास का
परिणाम नहीं, बल्कि वर्षों की साधना और
आत्मिक जुड़ाव का प्रतिफल है।
इस सुरमयी यात्रा
को नई ऊंचाई दी
पखावज पर पहली बार
संगत कर रहे प्रो.
विश्वम्भर नाथ मिश्रा ने।
उनकी थाप में जहां
ध्रुपद की गंभीरता थी,
वहीं लय के सूक्ष्म
विन्यास ने संतूर के
हर स्वर को सुदृढ़
आधार प्रदान किया। पखावज के गूंजते बोल,
धा, तित, किता, जब
संतूर की झंकार के
साथ संगति करते, तो एक ऐसा
अद्भुत संगम बनता जो
विरल ही सुनने को
मिलता है। दोनों कलाकारों
के बीच संवादात्मक जुगलबंदी
इस प्रस्तुति का चरम बिंदु
रही। कहीं संतूर आगे
बढ़ता, तो कहीं पखावज
उसे चुनौती देता; कहीं लय थमती,
तो कहीं अचानक गति
पकड़ लेती, इस संपूर्ण संवाद
में संगीत का एक जीवंत
खेल दिखाई देता रहा। यह
जुगलबंदी सचमुच अद्भुत, अकल्पनीय और अविश्वसनीय रही,
जिसने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर
दिया।
हर सम पर
पड़ती सशक्त थाप और उसके
साथ संतूर की सटीक तान
पर श्रोताओं की “वाह” गूंज
उठती। मंदिर प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से
बार-बार मुखरित होता
रहा। देर रात तक
श्रोता अपने स्थान पर
डटे रहे, मानो इस
सुरधारा से बाहर निकलना
उन्हें स्वीकार न हो। इस
प्रस्तुति ने यह सिद्ध
कर दिया कि संकट
मोचन का मंच केवल
संगीत का आयोजन नहीं,
बल्कि साधना, परंपरा और आध्यात्मिक ऊर्जा
का केंद्र है। यहां हर
कलाकार अपनी कला के
माध्यम से ईश्वर से
संवाद करता है और
श्रोता उस संवाद के
साक्षी बनते हैं। छठी
निशा की यह प्रस्तुति
लंबे समय तक संगीत
प्रेमियों की स्मृतियों में
जीवित रहेगी, एक ऐसी स्मृति,
जिसमें संतूर की झंकार में
पिता की विरासत गूंजती
रही, पखावज की थाप में
काशी की परंपरा बोलती
रही और हर सुर
में भक्ति का अमिट रंग
घुला रहा।
कैंसर के प्रति जागरुक रहने की दरख्वाश
इसी भावुक क्षण
में अभय रुस्तम सोपोरी
ने संगीत से थोड़ा हटकर
समाज के प्रति अपनी
जिम्मेदारी भी निभाई। उन्होंने
श्रोताओं से एक विनम्र
अपील करते हुए कहा
कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारी
के प्रति जागरूकता बेहद आवश्यक है।
उन्होंने साझा किया कि
अस्पतालों में छोटे-छोटे
बच्चों को इस बीमारी
से जूझते देखना कितना पीड़ादायक होता है। उन्होंने
कहा, “मैं आप सबसे
एक छोटी-सी रिक्वेस्ट
करना चाहता हूं... 30-35 साल की उम्र
के बाद अपने परिवार,
दोस्तों और रिश्तेदारों को
नियमित चेकअप के लिए जरूर
प्रेरित करें। खासकर महिलाओं के लिए कुछ
जरूरी जांच समय-समय
पर कराना बेहद जरूरी है।
अगर बीमारी समय पर पकड़
में आ जाए, तो
उसका इलाज संभव है।”
यह संदेश केवल शब्द नहीं
थे, बल्कि एक कलाकार के
भीतर छिपे संवेदनशील इंसान
की पुकार थीकृजो अपनी कला के
साथ-साथ समाज के
प्रति भी उतना ही
सजग है।
ओडिसी नृत्य से सजी शुरुआत
इसके पूर्व छठी निशा का शुभारंभ ओडिसी नृत्य की भावमयी प्रस्तुति से हुआ। वर्ष 1978 में अपने गुरुदेव और पिता पंडित केलु चरण महापात्र के साथ इस मंच पर पहली बार उपस्थित होने वाले रतिकांत महापात्र ने इस बार प्रस्तुति का दायित्व स्वयं संभाला। उन्होंने अपनी पत्नी सुजाता महापात्र और शिष्यों के साथ रामचरितमानस के विविध भावों और मार्मिक प्रसंगों को ओडिसी की मुद्राओं और भंगिमाओं में सजीव कर दिया। वंदना से आरंभ हुई प्रस्तुति में सुजाता महापात्र ने केकी कंठम नीलम की भाव-व्यंजना से दर्शकों को अभिभूत किया। इसके बाद युगल पल्लवी की सधी हुई संरचना और फिर शबरी प्रसंग की करुणा ने वातावरण को भाव-विभोर कर दिया। इसके बाद मंच पर सितार और तबले की जुगलबंदी ने शास्त्रीय संगीत की गंभीरता को नई ऊंचाई दी। दिल्ली के युवा सितार वादक मेहताब अली नियाज़ी और मुंबई के तबला वादक ईशान घोष ने अपनी प्रस्तुति से श्रोताओं को सुर और लय की गहराइयों से रूबरू कराया। मेहताब के सितार में रागदारी की स्पष्टता, स्वर-विस्तार की कोमलता और तानों की परिपक्वता साफ झलकती रही। वहीं ईशान घोष की जटिल लयकारी और सटीक संगत ने प्रस्तुति को संतुलन और ऊर्जा प्रदान की। सितार की मधुर गमकदार तानों और तबले की लयकारी का यह समन्वय देर तक श्रोताओं के मन में गूंजता रहा। इसके पश्चात गायन की प्रस्तुति में कला रामनाथ पिणी कोमली ने अपने स्वर-साधना का परिचय दिया। महान गायक पंडित कुमार गंधर्व की परंपरा से जुड़ी इस विदुषी ने राग नंद में विलंबित और द्रुत ख्याल प्रस्तुत कर शास्त्रीयता और भाव की सुंदर अभिव्यक्ति दी। उनके गायन में घराने की गहराई, सुरों की शुद्धता और भावों की स्वच्छता का अद्भुत संगम देखने को मिला। तबले पर रामेंद्र सिंह सोलंकी, संवादिनी पर पंडित धर्मनाथ मिश्र और सारंगी पर विनायक सहाय ने उत्कृष्ट संगत कर प्रस्तुति को पूर्णता प्रदान की. पूरी निशा में भक्ति, परंपरा और शास्त्रीय संगीत का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने हनुमत दरबार को सुरों की तपोभूमि में परिवर्तित कर दिया।


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