ज्ञान, भक्ति और अद्वैत की अनुगूंज : काशी में शंकर की जयंती पर गूंजे वेदांत के स्वर
श्री काशी
विश्वनाथ
धाम
में
विद्यार्थियों
ने
स्तोत्र-पाठ
से
रचा
आध्यात्मिक
वातावरण
सुरेश गांधी
वाराणसी.
वाराणसी की पावन धरा,
जहां हर श्वास में
शिवत्व का स्पंदन है,
वहीं आज श्री काशी
विश्वनाथ मंदिर परिसर एक बार फिर
अद्वैत वेदांत की दिव्य ज्योति
से आलोकित हो उठा। अवसर
था जगद्गुरु आदि गुरु शंकराचार्य
की जयंती का—एक ऐसा
क्षण, जब ज्ञान, भक्ति
और साधना एक साथ सजीव
हो उठे। मंदिर परिसर में आयोजित इस
विशेष कार्यक्रम ने केवल एक
धार्मिक अनुष्ठान का रूप नहीं
लिया, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की गहराइयों को
अनुभव कराने वाला आध्यात्मिक उत्सव
बन गया। प्रो. सिद्धिदात्री
जी के मार्गदर्शन में
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने
जब शंकराचार्य जी की प्रतिमा
के समक्ष आसन ग्रहण किया,
तो वह दृश्य मानो
समय के प्रवाह को
थाम लेने जैसा था—जहां गुरु और
शिष्य परंपरा पुनः साकार हो
रही थी।
कार्यक्रम का शुभारंभ ‘गणेश
पंचरत्नम्’ के मधुर और
शास्त्रीय उच्चारण से हुआ। इसके
पश्चात अन्नपूर्णा स्तोत्रम्, शिव मानस पूजन,
वेद शरणम् शिव स्तुति, भवान्यष्टकम्,
निर्वाणषट्कम् तथा दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
का क्रमबद्ध पाठ किया गया।
हर श्लोक के साथ वातावरण
में एक अलग ही
कंपन उत्पन्न होता गया—मानो
काशी की वायु स्वयं
वेदों की ध्वनि को
अपने भीतर समेट रही
हो। विद्यार्थियों की एकाग्रता और
भावनात्मक समर्पण ने इस आयोजन
को विशेष ऊँचाई प्रदान की। उनके स्वर
केवल शब्द नहीं थे,
बल्कि साधना की वह धारा
थे, जो श्रोताओं के
अंतर्मन तक पहुंचकर उन्हें
आत्मचिंतन के लिए प्रेरित
कर रही थी। उपस्थित
श्रद्धालु भी इस दिव्य
वातावरण में डूबते चले
गए और स्वतः ही
उनके मन में श्रद्धा
और शांति का संचार होता
रहा।
यह आयोजन केवल
एक स्मरण नहीं था, बल्कि
उस अद्वैत दर्शन की पुनर्प्रतिष्ठा भी
था, जिसे शंकराचार्य जी
ने पूरे भारत में
स्थापित किया। उनका संदेश—“ब्रह्म
सत्यं जगन्मिथ्या”—आज भी उतना
ही प्रासंगिक है, जितना शताब्दियों
पूर्व था। मंदिर प्रशासन ने इस अवसर
को भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा
के संरक्षण की दिशा में
एक महत्वपूर्ण पहल बताया। उनके
अनुसार, ऐसे आयोजन न
केवल नई पीढ़ी को
अपनी जड़ों से जोड़ते हैं,
बल्कि उन्हें आध्यात्मिक चेतना के प्रति जागरूक
भी बनाते हैं। काशी में आज का
यह आयोजन केवल एक उत्सव
नहीं, बल्कि उस सनातन परंपरा
की पुनः पुष्टि था,
जो समय की सीमाओं
से परे है—जहां
ज्ञान ही पूजा है
और साधना ही जीवन का
सार।

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