Wednesday, 22 April 2026

नारी शक्ति आरक्षण पर सियासी संग्राम : “सहमति बनी, लेकिन विपक्ष ने रोका”—मेघवाल

नारी शक्ति आरक्षण पर सियासी संग्राम : “सहमति बनी, लेकिन विपक्ष ने रोका”—मेघवाल 

कानून मंत्री बोले परिसीमन और जनगणना की बाध्यता के बिना लागू नहीं हो सकता अधिनियम, विपक्ष पर लगायाक्रेडिट राजनीतिका आरोप  

सुरेश गांधी

वाराणसी. महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच टकराव तेज हो गया है। केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने प्रेस वार्ता में साफ कहा कि सरकार इस ऐतिहासिक कानून को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन संवैधानिक प्रावधानों और परिसीमन की प्रक्रिया के कारण इसमें समय लगना स्वाभाविक है। उन्होंने विपक्षी दलों पर आरोप लगाया कि वे केवल राजनीतिक लाभ और श्रेय की राजनीति के चलते इस मुद्दे पर बाधा उत्पन्न कर रहे हैं।

 संविधान की बाध्यता को समझना होगा

मेघवाल ने कहा कि 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए पहले जनगणना और उसके बाद परिसीमन अनिवार्य है। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1976 से 2026 तक लोकसभा सीटों का परिसीमन फ्रीज है, जिसे बदले बिना आरक्षण लागू करना संभव नहीं। उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेदों में स्पष्ट प्रावधान हैं। परिसीमन आयोग के बिना सीटों का पुनर्निर्धारण नहीं हो सकता, इसलिए अधिनियम को लागू करने की एक प्रक्रिया तय है।

सरकार का फॉर्मूला : 33% आरक्षण का गणित

कानून मंत्री ने बताया कि सरकार ने सभी दलों से चर्चा के बाद एक फॉर्मूला तैयार किया था : लोकसभा की मौजूदा सीटें : 543.. परिसीमन के बाद संभावित सीटें : लगभग 815... इनमें 33% आरक्षण : करीब 272 सीटें महिलाओं के लिए. उन्होंने कहा कि यह फॉर्मूला सभी दलों के साथ साझा किया गया था और अधिकांश दलों ने प्रारंभिक सहमति भी जताई थी।

विपक्ष पर हमला: “क्रेडिट की राजनीति हावी

मेघवाल ने विपक्ष पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि जब विधेयक पास हुआ था, तब सभी दलों ने समर्थन दिया था, लेकिन अब इसे लागू करने के समय अलग-अलग बहाने बनाए जा रहे हैं।विपक्ष को डर है कि इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  को मिल जाएगा, इसलिए वे इसे टालने की कोशिश कर रहे हैं।

 विपक्ष की आपत्तियां : अलग-अलग सुर

प्रेस वार्ता में मेघवाल ने विपक्ष के तर्कों को भी विस्तार से रखा :

समाजवादी पार्टी : मुस्लिम महिलाओं को अलग आरक्षण देने की मांग-

डीएमके : दक्षिण भारत की सीटें कम होने की आशंका

कांग्रेस : अधिनियम को तुरंत लागू करने की मांग

इन पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने कहा : धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान में संभव नहीं. परिसीमन के बाद भी राज्यों की राजनीतिक ताकत संतुलित बनी रहेगी. बिना प्रक्रिया पूरी किए जल्दबाजी में लागू करना कानूनन गलत होगा.

इतिहास का हवाला : 100 साल का संघर्ष

मेघवाल ने महिला आरक्षण के इतिहास को याद करते हुए कहा: 1927 में पहली बार महिलाओं के अधिकारों की मांग उठी. बी.आर. अम्बेडकर  ने महिलाओं को पुरुषों के साथ समान मतदान अधिकार दिलाया. 1996 में पहली बार महिला आरक्षण बिल संसद में आया. अटल  बिहारी  वाजपायी सरकार ने भी प्रयास किए, लेकिन सफलता नहीं मिली. उन्होंने कहा कि 2023 में पहली बार यह कानून पारित हुआ, जो ऐतिहासिक उपलब्धि है।

 महिलाओं की उम्मीदों के साथ खिलवाड़

कानून मंत्री ने कहा कि देश की महिलाएं इस कानून से जुड़ी उम्मीदें लगाए बैठी हैं, लेकिन विपक्ष की राजनीति के कारण यह प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। यह मातृशक्ति को सशक्त करने का अवसर था, लेकिन विपक्ष ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया। मेघवाल ने संकेत दिया कि सरकार 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया के तुरंत बाद इस अधिनियम को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाएगी। मतलब साफ है नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर जारी विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण दलगत राजनीति से ऊपर उठ पाएगा? सरकार जहां संवैधानिक प्रक्रिया का हवाला दे रही है, वहीं विपक्ष इसे देरी और टालमटोल की रणनीति बता रहा है। फिलहाल, महिलाओं को 33% आरक्षण मिलने का सपना परिसीमन और राजनीतिक सहमति के बीच अटका हुआ नजर रहा है। इस अवसर पर जिलाध्यक्ष प्रदीप अग्रहरी, एमएलसी सीमा द्विवेदी, साधना सिंह, वीनिता सिंह व मंजू सिंह आदि मौजूद थे. इस अवसर पर जिलाध्यक्ष प्रदीप अग्रहरी, एमएलसी सीमा द्विवेदी, साधना वेदांती, वीनिता सिंह व मंजू सिंह आदि मौजूद थे.

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