काशी में ‘परफेक्शन की परीक्षा’ : पीएम दौरे से पहले सिस्टम पर योगी का सख्त पहरा
सुरक्षा, स्वच्छता,
महिला
सम्मेलन
और
विकास,
हर
मोर्चे
पर
‘जीरो
टॉलरेंस’
का
संदेश;
जुलाई
तक
अंतरराष्ट्रीय
स्टेडियम
का
वादा
सुरेश गांधी
वाराणसी. प्रधानमंत्री के संभावित वाराणसी
दौरे ने एक बार
फिर यह साबित कर
दिया है कि काशी
केवल आस्था की राजधानी नहीं,
बल्कि प्रशासनिक दक्षता की भी कसौटी
बन चुकी है। मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ का हालिया दौरा
और उसमें दिए गए निर्देश
महज एक नियमित समीक्षा
नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के
लिए ‘अग्निपरीक्षा’ का संकेत हैं।
योगी सरकार ने
साफ कर दिया है
कि अब आयोजन सिर्फ
भीड़ जुटाने का माध्यम नहीं
रह गया, बल्कि यह
सुशासन की ‘लाइव टेस्टिंग’
बन चुका है। सुरक्षा
व्यवस्था पर विशेष जोर
इसी बात का प्रतीक
है कि किसी भी
स्तर पर लापरवाही अब
विकल्प नहीं रही। रूट
डायवर्जन से लेकर भीड़
प्रबंधन तक, हर बिंदु
पर सूक्ष्म योजना की अपेक्षा इस
बात को दर्शाती है
कि सरकार केवल दिखावे नहीं,
बल्कि व्यवस्थित निष्पादन पर विश्वास कर
रही है। सबसे दिलचस्प
और महत्वपूर्ण पहलू है महिला
सम्मेलन पर दिया गया
विशेष फोकस। यह आयोजन केवल
एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण के उस नैरेटिव
को मजबूत करने की कोशिश
है, जिसे केंद्र और
प्रदेश सरकार लगातार आगे बढ़ा रही
हैं। यदि व्यवस्थाएं सुचारु
रहती हैं, तो यह
सम्मेलन सरकार के लिए एक
‘पॉलिटिकल मैसेज’ के साथ-साथ
‘सोशल सिग्नल’ भी बन सकता
है।
हालांकि, सवाल यह भी
है कि क्या हर
बार वीवीआईपी दौरे के समय
ही शहर की सफाई,
ट्रैफिक और अव्यवस्थाओं पर
इतनी गंभीरता दिखाई जाएगी? मुख्यमंत्री का स्ट्रीट डॉग्स
और छुट्टा पशुओं को हटाने, वेंडरों
को व्यवस्थित करने का निर्देश
यह संकेत देता है कि
समस्या पुरानी है, लेकिन समाधान
अक्सर ‘इवेंट-ड्रिवन’ बनकर रह जाता
है। काशी जैसे शहर
के लिए यह दृष्टिकोण
दीर्घकालिक नहीं हो सकता।
विकास परियोजनाओं की समीक्षा में
भी वही पुराना सवाल
उभरता है, क्या तय
समयसीमा सच में अंतिम
होगी? गंजारी में बन रहा
अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम जुलाई तक पूरा होने
का दावा करता है,
लेकिन ऐसे कई प्रोजेक्ट्स
पहले भी समयसीमा के
जाल में उलझते रहे
हैं। मुख्यमंत्री का ‘युद्धस्तर’ पर
काम का निर्देश इसीलिए
अहम है, क्योंकि अब
जनता केवल घोषणाएं नहीं,
परिणाम देखना चाहती है।
इस पूरे परिदृश्य में एक बात स्पष्ट है, काशी अब सिर्फ धार्मिक पहचान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजनीतिक, प्रशासनिक और विकासात्मक प्रयोगों की प्रयोगशाला बन चुकी है। प्रधानमंत्री का हर दौरा यहां केवल कार्यक्रम नहीं, बल्कि सरकार के कामकाज का ‘पब्लिक ऑडिट’ भी होता है। मतलब साफ है योगी आदित्यनाथ का सख्त रुख यह दर्शाता है कि सरकार अब ‘इवेंट मैनेजमेंट’ से आगे बढ़कर ‘गवर्नेंस मॉडल’ स्थापित करना चाहती है। लेकिन असली चुनौती यही है कि यह तत्परता केवल दौरे तक सीमित न रह जाए, बल्कि काशी की रोजमर्रा की व्यवस्था का स्थायी हिस्सा बने। तभी ‘परफेक्शन की परीक्षा’ में सिस्टम वास्तव में पास हो सकेगा।

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