सुरों में सत्ता, भक्ति में बदलाव : काशी की रात में गूंजा नया भारत
काशी के पावन धाम संकट मोचन हनुमान मंदिर की उस दिव्य रात में जब अनूप जलोटा के सुर गूंजे, तो यह केवल एक सांगीतिक प्रस्तुति नहीं रही, यह बदलते भारत का जीवंत आख्यान बन गई। काशी, जो कभी अपनी आध्यात्मिक स्थिरता के लिए जानी जाती थी, आज विकास और दर्शन के संगम का प्रतीक बन चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काशी के कायाकल्प और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की आस्था-आधारित नीतियों ने इस शहर की छवि को नया आयाम दिया है। यही प्रभाव अब मंच से उठती ध्वनियों और श्रोताओं की प्रतिक्रियाओं में भी स्पष्ट झलकता है। “काशी बदली, अयोध्या बदली, अब मथुरा की बारी” जैसे स्वर केवल गीत नहीं, बल्कि समय की नब्ज बन चुके हैं। संकट मोचन संगीत समारोह की यह संध्या इस बदलाव की सजीव मिसाल रही, जहां एक ओर “ऐसी लागी लगन...” की तान आत्मा को भीतर तक भिगो रही थी, वहीं दूसरी ओर जयघोषों में एक नए भारत की आकांक्षाएं स्पष्ट सुनाई दे रही थीं। बदलती बनारस की यह तस्वीर बताती है कि अब यहां भक्ति केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवर्तन की भी भाषा बन चुकी है
सुरेश गांधी
सुरेश
गांधी
: आप
पिछले
25 वर्षों
से
इस
महोत्सव
में
आ
रहे
हैं।
आज
की
काशी
को
आप
किस
रूप
में
देखते
हैं?
सवाल : आपकी जीवन यात्रा फगवाड़ा से लेकर वैश्विक मंचों तक कैसे आकार लेती गई?
अनूप
जलोटा
: मेरा जन्म पंजाब के
फगवाड़ा में हुआ, लेकिन
मेरी शिक्षा लखनऊ में हुई।
संगीत मुझे विरासत में
मिला, मेरे पिता, स्वर्गीय
पुरुषोत्तम दास जलोटा, स्वयं
एक महान भजन गायक
थे और मेरे गुरु
भी। मैंने अपने करियर की
शुरुआत ऑल इंडिया रेडियो
में कोरस गायक के
रूप में की। वहां
से शुरू हुआ यह
सफर आज दुनिया के
100 से अधिक शहरों तक
पहुंच चुका है।
सवाल
: आपके
संगीत
करियर
की
उपलब्धियां
असाधारण
रही
हैं,
क्या
आप
उसे
एक
पड़ाव
मानते
हैं
या
यात्रा
जारी
है?
अनूप
जलोटा
: संगीत में कोई अंतिम
पड़ाव नहीं होता। मैंने
1200 से अधिक भजन, ग़ज़ल
और गीत रिकॉर्ड किए
हैं, 4000 से अधिक लाइव
कॉन्सर्ट किए हैं, और
150 से ज्यादा एल्बम रिलीज किए हैं। 1998 में
मुझे 58 गोल्ड और प्लेटिनम डिस्क
मिले, जो अपने आप
में एक रिकॉर्ड था।
लेकिन सच कहूं तो
यह सब ईश्वर की
कृपा है, मैं खुद
को आज भी एक
विद्यार्थी ही मानता हूं।
सवाल
: आपकी
गायकी
में
भक्ति
और
लोकप्रियता
का
अद्भुत
संतुलन
दिखता
है,
इसका
रहस्य
क्या
है?
अनूप
जलोटा
: भजन को केवल बुजुर्गों
तक सीमित नहीं रखना चाहिए।
मैं इस तरह गाता
हूं कि युवा भी
उससे जुड़ सकें। देखिए,
भगवान कृष्ण, राधा, राम, इनके विषय
में इतनी विविधता है
कि इसे नीरस कहना
गलत होगा। बस, प्रस्तुति में
ऊर्जा और भाव होना
चाहिए। अगर भजन को
जोश और प्रेम से
गाया जाए, तो वह
हर पीढ़ी को छूता
है।
सवाल
: आपने
फिल्मी
गीतों
से
लेकर
रियलिटी
शो
तक,
हर
मंच
पर
खुद
को
साबित
किया।
यह
बहुमुखी
प्रतिभा
कैसे
संभव
हुई?
अनूप
जलोटा
(मुस्कुराते
हुए)
: दुनिया बहुत खूबसूरत है,
और हर पहलू को
अनुभव करना चाहिए। “बिग
बॉस 12” मेरे लिए एक
सशुल्क छुट्टी जैसा था! (हंसते
हैं) लेकिन गंभीरता से कहूं तो,
कलाकार को सीमित नहीं
होना चाहिए, हर अनुभव उसे
समृद्ध बनाता है।
सवाल
: आपके
भजनों
में
जो
सहजता
और
आत्मिक
शक्ति
है,
उसका
स्रोत
क्या
है?
अनूप
जलोटा
: मैं शाम चौरासी घराने
से जुड़ा हूं, और
सात साल की उम्र
से मंच पर गा
रहा हूं। नियमित रियाज़
और अनुशासन मेरी ताकत हैं।
71 साल की उम्र में
भी मैं रोज अभ्यास
करता हूं, क्योंकि स्वर
ईश्वर का दिया हुआ
है, उसे संजोकर रखना
हमारी जिम्मेदारी है।
सवाल
: आपके
जीवन
के
कुछ
सबसे
यादगार
क्षण
कौन
से
रहे?
अनूप
जलोटा
: 1990 में ज़ाकिर हुसैन के साथ अमेरिका
और कनाडा में कॉन्सर्ट, और
उससे पहले मेहदी हसन
और गुलाम अली के साथ
संगीतमय यात्राएं, ये सब अविस्मरणीय
हैं। लेकिन सबसे खास पल
वह था जब पंडित
रवि शंकर ने मुझे
49 गोल्ड और प्लेटिनम डिस्क
एक साथ प्रदान किए।
सवाल
: आज
की
प्रस्तुति
में
“काशी
बदली,
अयोध्या
बदली,
अब
मथुरा
की
बारी”
पर
श्रोताओं
की
विशेष
प्रतिक्रिया
दिखी,
आप
इसे
कैसे
देखते
हैं?
अनूप
जलोटा
: यह लोगों की आस्था और
भावनाओं का प्रकटीकरण है।
जब भजन “ऐसी लागी
लगन...” या “अच्युतम केशवम्...”
गूंजते हैं, तो भक्त
खुद को उससे जोड़
लेते हैं। और जब
“काशी बदली...” जैसा भाव आता
है, तो वह जनभावना
का रूप ले लेता
है।
सवाल
: संकट
मोचन
की
इस
संध्या
में
आपकी
प्रस्तुति
को
आप
कैसे
याद
रखेंगे?
अनूप
जलोटा
: आज की रात विशेष
रही। मैंने “जग में सुंदर
हैं दो नाम...”, “मेरी
झोपड़ी के भाग खुल
जाएंगे...”, “मेरे मन में
राम...” जैसे भजनों से
शुरुआत की और फिर
“काशी बदली अयोध्या बदली...”
पर पूरा परिसर झूम
उठा। “जय श्रीराम”, “हर-हर महादेव” और
“जय बजरंगबली” के उद्घोष ने
इसे एक उत्सव बना
दिया।
सवाल
: आपने
मंच
से
हनुमान
जी
के
आशीर्वाद
की
बात
भी
कही,
उस
प्रसंग
के
बारे
में
बताइए?
अनूप
जलोटा
: जब मैं 12 साल का था,
लखनऊ के अमीनाबाद में
एक मंदिर में गा रहा
था। अचानक मुझे लगा कि
हनुमान जी मेरे पास
बैठे हैं। मैं भावुक
होकर रोने लगा और
गा नहीं पाया। उसी
दिन से मुझे लंबी
सांस की शक्ति मिली,
क्योंकि वे पवनपुत्र हैं।
हालांकि मैं बाबा रामदेव
के प्राणयाम से प्रभावित हूं
और इसे रोजना करता
हूं. लंबी सांस के
पीछे एक बड़ी वजह
यह भी है.
सवाल
: संगीत
और
सीमाओं
के
बीच
संतुलन
कैसे
देखते
हैं,
खासकर
अंतरराष्ट्रीय
सहयोग
के
संदर्भ
में?
अनूप
जलोटा
: हम चाहते हैं कि संगीत
की कोई सीमा न
हो, लेकिन समय और परिस्थितियों
का भी ध्यान रखना
पड़ता है। फिलहाल हम
कुछ देशों के कलाकारों के
साथ काम नहीं करते,
लेकिन दुनिया के अन्य हिस्सों
के साथ सहयोग जारी
है।
सवालः
आपके
लिए
संगीत
का
अंतिम
उद्देश्य
क्या
है?
अनूप
जलोटा
: संगीत केवल मनोरंजन नहीं
है, यह आत्मा का
माध्यम है। जब कोई
श्रोता अपना समय निकालकर
आपको सुनने आता है, तो
आपका कर्तव्य है कि उसे
आनंद और शांति दोनों
मिले।
सवाल
: संकट
मोचन
के
इस
पावन
मंच
पर
आपकी
प्रस्तुति
हर
बार
एक
अलग
ही
ऊंचाई
छूती
है।
आज
की
संध्या
को
आप
किस
रूप
में
देखते
हैं?
अनूप
जलोटा
: देखिए, संकट मोचन का
मंच मेरे लिए केवल
एक कार्यक्रम स्थल नहीं, बल्कि
एक साधना-पीठ है। यहां
बैठते ही कलाकार नहीं,
एक साधक जागृत हो
जाता है। आज जब
मैंने “ऐसी लागी लगन...”
की तान छेड़ी, तो
लगा जैसे मैं नहीं
गा रहा, कुछ भीतर
से गवाया जा रहा है।
काशी की यह विशेषता
है कि यहां संगीत
भी पूजा बन जाता
है।
सवालः
आपकी
आवाज़
में
जो
स्थिरता
और
भक्ति
की
गहराई
है,
वह
दशकों
से
बनी
हुई
है।
इस
निरंतरता
का
आधार
क्या
है?
अनूप
जलोटा
: यह निरंतरता अभ्यास से नहीं, विश्वास
से आती है। रियाज़
तो हर गायक करता
है, लेकिन भजन गाने के
लिए केवल रियाज़ नहीं,
आत्मिक जुड़ाव चाहिए। मैंने हमेशा अपने संगीत को
साधना माना, करियर नहीं। जब आप भजन
को ईश्वर तक पहुंचने का
माध्यम मानते हैं, तो उसमें
स्वतः गहराई आ जाती है।
सवाल
: आज
के
समय
में
भक्ति
संगीत
भी
बाज़ारवाद
के
प्रभाव
में
आता
दिख
रहा
है।
आप
इसे
कैसे
देखते
हैं?
अनूप
जलोटा
: यह एक यथार्थ है,
जिससे हम आंख नहीं
मूंद सकते। लेकिन मुझे लगता है
कि भक्ति का मूल स्वभाव
इतना मजबूत है कि वह
हर दौर में अपना
रास्ता बना लेती है।
आज भी अगर कोई
सच्चे मन से भजन
गाता है, तो श्रोता
उसे पहचान लेते हैं। फर्क
सिर्फ इतना है कि
अब मंच बदल गया
है, पहले मंदिर थे,
अब मोबाइल स्क्रीन भी है।
सवाल
: आपने
आज
की
प्रस्तुति
में
देखा
होगा
कि
श्रोताओं
के
बीच
“काशी
बदली,
अयोध्या
बदली,
अब
मथुरा
की
बारी”
जैसे
स्वर
भी
उठे।
इस
जनभावना
को
आप
किस
नजर
से
देखते
हैं?
अनूप
जलोटा
: यह हमारे समय की भावनाओं
का प्रतिबिंब है। आस्था जब
गहरी होती है, तो
वह अभिव्यक्ति भी चाहती है।
लेकिन मैं हमेशा यही
कहता हूं कि भक्ति
का मूल प्रेम और
शांति है। अगर हम
उसे बनाए रखें, तो
हर भावना सकारात्मक दिशा में जाएगी।
सवाल
: क्या
आपको
लगता
है
कि
भक्ति
संगीत
आज
के
युवाओं
को
जोड़ने
में
सक्षम
है?
अनूप
जलोटा
: बिल्कुल। युवा केवल मनोरंजन
नहीं चाहता, वह अर्थ भी
खोजता है। अगर हम
भजन को आधुनिकता के
साथ प्रस्तुत करें, लेकिन उसकी आत्मा को
न बदलें, तो वह निश्चित
रूप से युवाओं को
आकर्षित करेगा। आज कई युवा
कलाकार भक्ति को नए रूप
में प्रस्तुत कर रहे हैं,
जो एक अच्छा संकेत
है।
सवाल
: डिजिटल
युग
ने
संगीत
को
लोकतांत्रिक
बना
दिया
है।
हर
कोई
गा
सकता
है,
अपलोड
कर
सकता
है।
क्या
यह
गुणवत्ता
के
लिए
चुनौती
है?
अनूप
जलोटा
: यह अवसर भी है
और चुनौती भी। अवसर इसलिए
कि हर प्रतिभा को
मंच मिला है, और
चुनौती इसलिए कि शोर में
सच्ची आवाज़ को पहचानना
कठिन हो गया है।
ऐसे में कलाकार की
जिम्मेदारी और बढ़ जाती
है कि वह अपने
कंटेंट की गुणवत्ता बनाए
रखे।
सवाल
: काशी,
अयोध्या,
मथुरा
जैसे
धार्मिक
केंद्र
आज
केवल
आध्यात्मिक
नहीं,
बल्कि
सांस्कृतिक
विमर्श
के
केंद्र
भी
बन
गए
हैं।
आप
इसे
कैसे
देखते
हैं?
अनूप
जलोटा
: ये स्थान केवल भूगोल नहीं
हैं, ये हमारी चेतना
का हिस्सा हैं। जब काशी
में गाते हैं, तो
लगता है कि यह
परंपरा हजारों वर्षों से बह रही
है और हम उसका
एक छोटा सा हिस्सा
हैं। यह जुड़ाव ही
हमारी सांस्कृतिक शक्ति है।
सवाल
: आपने
ग़ज़ल
और
भजन
दोनों
में
काम
किया,
लेकिन
आपकी
पहचान
भजन
से
ही
बनी।
क्या
यह
एक
सचेत
निर्णय
था?
अनूप
जलोटा
: नहीं, यह एक स्वाभाविक
प्रक्रिया थी। मैंने ग़ज़ल
भी गाई, लेकिन भजन
में जो आत्मिक संतोष
मिलता है, वह कहीं
और नहीं मिला। श्रोता
भी मुझे उसी रूप
में अधिक स्वीकारते गए।
सवाल
: आपके
लिए
सबसे
यादगार
प्रस्तुति
कौन
सी
रही?
अनूप
जलोटा
: हर प्रस्तुति अपने आप में
खास होती है, लेकिन
संकट मोचन की संध्याएं
हमेशा विशेष रही हैं। यहां
जो ऊर्जा मिलती है, वह कहीं
और नहीं मिलती।
सवालः
आज
के
दौर
में
जब
तनाव
और
भागदौड़
बढ़
रही
है,
भक्ति
संगीत
की
क्या
भूमिका
हो
सकती
है?
अनूप
जलोटा
: भक्ति संगीत एक तरह का
मेडिटेशन है। यह मन
को शांत करता है,
भीतर स्थिरता लाता है। अगर
लोग दिन में कुछ
समय भजन सुनें या
गाएं, तो उनका जीवन
संतुलित हो सकता है।
सवाल
: आने
वाले
समय
में
आपके
क्या
लक्ष्य
हैं?
अनूप
जलोटा
: मेरा लक्ष्य बहुत सरल है,
भक्ति को आगे बढ़ाना।
मैं चाहता हूं कि नई
पीढ़ी इस परंपरा से
जुड़े और इसे अपने
तरीके से आगे ले
जाए।
सवाल
: अंत
में,
काशी
और
आपके
श्रोताओं
के
लिए
कोई
संदेश?
अनूप
जलोटा
: काशी स्वयं में एक अनुभव
है। यहां आकर हर
बार लगता है कि
कुछ नया सीखने को
मिला। मेरा बस यही
कहना है, भक्ति को
अपने जीवन का हिस्सा
बनाइए, क्योंकि वही आपको सच्ची
शांति और संतुलन देगी।
सवालः
आज
के
कलाकारों
के
लिए
आपका
संदेश?
अनूप
जलोटा
: अगर आप लंबे समय
तक टिकना चाहते हैं, तो संगीत
को पेशा नहीं, साधना
मानिए। लोकप्रियता के बाद जिम्मेदारियां
बढ़ती हैं, और सम्मान
अर्जित करना सबसे बड़ी
चुनौती होती है.
सवाल
: आज
के
युवाओं
में
भक्ति
संगीत
की
क्या
स्थिति
देखते
हैं?
अनूप
जलोटा
: आज का युवा बहुत
जागरूक है। वह फ्यूजन
सुनता है, लेकिन साथ
ही “राम” और “कृष्ण”
को भी महसूस करना
चाहता है। जरूरत है
कि हम भजन को
आधुनिक प्रस्तुति के साथ पेश
करें, लेकिन उसकी आत्मा को
बनाए रखें।
सवाल
: अपने
श्रोताओं
और
काशी
के
लिए
कोई
संदेश?
अनूप
जलोटा
: काशी तो स्वयं में
मोक्ष की नगरी है।
यहां आकर हर बार
लगता है कि कुछ
पा लिया। मेरा बस यही
कहना है, भक्ति को
जीवन का हिस्सा बनाइए,
क्योंकि वही सच्ची शांति
देती है।
फिरहाल, संकट मोचन परिसर
में अनूप जलोटा केवल
गायक नहीं थे, वे
एक युग की आवाज़
बनकर उभरे। उनके भजनों में
जहां “ऐसी लागी लगन...”
की आध्यात्मिकता थी, वहीं “काशी
बदली, अयोध्या बदली...” की जनभावना भी
थी। यह संवाद यह
स्पष्ट करता है कि
बदलते समय में भी
भक्ति का स्वर न
तो मद्धिम हुआ है और
न ही अप्रासंगिक, बल्कि
वह नए रूपों में,
नई पीढ़ियों के बीच और
अधिक प्रखर होकर उभर रहा
है। काशी की इस
रात में सुरों ने
इतिहास को छुआ, वर्तमान
को जिया और भविष्य
की दिशा भी तय
कर दी, जहां भक्ति,
संगीत और समाज एक
ही धारा में प्रवाहित
होते नजर आए। संकट
मोचन की उस आध्यात्मिक
रात में यह संवाद
केवल एक इंटरव्यू नहीं
रहा, यह एक युग
की धड़कनों को समझने का
प्रयास बन गया। अनूप
जलोटा के शब्दों में
जहां एक साधक की
विनम्रता है, वहीं एक
अनुभवी कलाकार की दूरदृष्टि भी
स्पष्ट झलकती है। आज जब
दुनिया तेजी से बदल
रही है, तब भी
काशी की गलियों में,
संकट मोचन हनुमान मंदिर
के प्रांगण में, और भजनों
की मधुर तानों में
एक स्थिरता बनी हुई है,
जो हमें हमारी जड़ों
से जोड़ती है। यह संवाद
इस बात का प्रमाण
है कि संगीत केवल
मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर
है, और जब वह
भक्ति से जुड़ता है,
तो वह समय की
सीमाओं को पार कर
जाता है। बदलते समय
में भी भक्ति की
धारा कभी सूखती नहीं,
वह हर युग में
नए रूप में बहती
रहती है। उनके शब्द
और स्वर दोनों ही
यह अहसास कराते हैं कि संगीत
जब साधना बन जाता है,
तो वह सीधे हृदय
से होकर आत्मा तक
पहुंचता है।




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