Thursday, 9 April 2026

हर दिल से निकला राम, नरूला के सुरों ने जगाई काशी

हर दिल से निकला राम, नरूला के सुरों ने जगाई काशी 

संकट मोचन की रात : राम आएंगे की पुकार, बनी आस्था का महासागर, जिसे काशी सदियों तक याद रखेगी

बनारस घराने की परंपरा से लेकर भक्ति की गूंज तक, तबला, सितार और सुरों की त्रिवेणी, पर केंद्र में रहीं जसपिंदर नरूला

सुरेश गांधी

वाराणसी. काशी की आध्यात्मिक धड़कनों के बीच, हनुमज्जयन्ती के पावन अवसर पर आयोजित संकट मोचन संगीत समारोह की तीसरी निशा मानो सुरों की एक दिव्य यज्ञशाला बन गई। मुक्ताकाशी मंच पर सजी इस संगीतमयी साधना में देश के ख्याति प्राप्त वरिष्ठ और युवा कलाकारों का संगम ऐसा था, जहां परंपरा ने अनुभव के साथ शिक्षा दी और नव्यता ने विनम्रता से उसे आत्मसात किया। यह मंच केवल प्रस्तुति का स्थल नहीं, बल्कि वह आध्यात्मिक भूमि है, जहां कलाकार और श्रोता दोनों बंधनों से मुक्त होकर संगीत के विराट रूप में विलीन हो जाते हैं।

पहला पुष्प् : राग भूपाली में सुरों का उदय

तीसरी निशा का प्रथम अध्याय पुणे से पधारे पं. उल्हास कशालकर के गंभीर और साधनापूर्ण गायन से आरंभ हुआ। राग भूपाली में तिलवाड़ा ताल की विलंबित बंदिश और तीनताल में द्रुत तथा तराना ने वातावरण को शास्त्रीय गरिमा से भर दिया। इसके बाद राग सहाना में झपताल और एकताल की बंदिशों ने प्रस्तुति को और भी समृद्ध किया। तबले पर पं. सुरेश तलवलकर, संवादिनी पर डॉ. विनय मिश्र और संगत में ओजश प्रताप सिंह ने इस प्रस्तुति को सामूहिक साधना का रूप दिया।

बांसुरी की तान : राग जोग में रस का प्रवाह

दूसरी प्रस्तुति में मुंबई से आए श्री विवेक सोनार की बांसुरी ने राग जोग की मधुरता को जीवंत कर दिया। आलापचारी के बाद मत्तताल और तीनताल की बंदिशों ने श्रोताओं को एक अलौकिक यात्रा पर ले जाया। तबले पर पं. शुभ महाराज की संगत ने इस प्रस्तुति को संतुलन और लय का उत्कृष्ट उदाहरण बना दिया।

और फिर... भक्ति का केंद्रकृजसपिंदर नरूला

तीसरी निशा का सबसे भावपूर्ण और केंद्रबिंदु क्षण वह था, जब मंच पर आईं पद्मश्री सम्मानित गायिका जसपिंदर नरूला। उनकी उपस्थिति ने पूरे वातावरण को एक नई ऊर्जा से भर दिया। राम भजन से आरंभ कर उन्होंने हनुमान भक्ति और फिर कृष्ण भक्ति तक भजनों की ऐसी श्रृंखला प्रस्तुत की, जिसमें भक्ति का विस्तार और गहराई दोनों दिखाई दिए।राम आएंगे...” की पुकार ने वातावरण को राममय कर दिया, तोतू संभाले तो मुझे कौन संभाले, हनुमान...” ने हर श्रोता के भीतर छिपे समर्पण को जागृत किया। बारिश ने भी इस भक्ति-धारा को रोकने का प्रयास किया, लेकिन श्रोताओं की आस्था अडिग रही। कोई अपनी जगह से नहीं हटा, यह दृश्य स्वयं इस बात का प्रमाण था कि जब संगीत भक्ति बन जाए, तो प्रकृति भी उसके सामने झुक जाती है। उनके साथ अंकित शर्मा, कृति सिंह, गुरुविंदर भोला, संजय शर्मा, विनय प्रसन्ना और सतनारायण की संगत ने इस प्रस्तुति को पूर्णता प्रदान की।

ठुमरी की मिठासः कौशिकी चक्रवर्ती की स्वर साधना

चौथी प्रस्तुति में कोलकाता से पधारी विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती ने राग अभोगी में झुमरा ताल से शुरुआत कर अपनी गायकी की गहराई का परिचय दिया। इसके बाद ठुमरी की मिठास ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। तबले पर आर्चिक बनर्जी, सारंगी पर उस्ताद मुराद अली खां और संवादिनी पर ज्योतिर्मय बनर्जी ने इस प्रस्तुति को ऊंचाई दी।

गिटार की जादुई तानः परंपरा का आधुनिक विस्तार

पांचवीं प्रस्तुति में पं. देवाशीष भट्टाचार्या ने गिटार के माध्यम से राग हनुमान कान्हाड़ा की अवतारणा कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया। झपताल, एकताल और तीनताल की गतकारी में उनकी तैयारी अद्भुत रही। पीलू की ठुमरी के साथ उन्होंने प्रस्तुति को एक मधुर विराम दिया।

स्वर साधना का विस्तारः महेश काल का गायन

छठवीं प्रस्तुति में पं. महेश काल ने राग रागेश्री और परम सोहिनी के माध्यम से अपनी गायकी की विविधता का परिचय दिया। झूमरा, झपताल और तीनताल में निबद्ध बंदिशों ने श्रोताओं को शास्त्रीय संगीत की गहराई में डुबो दिया।

सरोद की स्वर लहरियां

अंतिम प्रस्तुति में पं. आलोक लाहिड़ी और अभिषेक लाहिड़ी ने राग बसंत मुखारी की अवतारणा कर भोर को आमंत्रित किया। उनकी सरोद की तान में राग की मानसिकता स्पष्ट झलक रही थी। तबले पर पं. समर साहा की संगत ने इस प्रस्तुति को पूर्णता दी और एक सुरीली सुबह का आगाज़ हुआ।

जब सुर बन जाएं प्रार्थना

इस पूरी संगीतमयी यात्रा में जहां हर कलाकार ने अपनी साधना का परिचय दिया, वहीं पूरी महफ़िल की आत्मा बनकर उभरीं जसपिंदर नरूला। उनकी आवाज़ में भक्ति, अनुभव और जीवन-दर्शन का ऐसा संगम था, जिसने तीसरी निशा को एक ऐतिहासिक पहचान दे दी। काशी की इस पावन धरती पर एक बार फिर यह सिद्ध हुआ संगीत जब साधना बनता है, तो वह केवल सुनाई नहीं देता... वह आत्मा में उतरकर ईश्वर का अनुभव करा जाता है।

No comments:

Post a Comment

भक्ति की तान, सुरों का प्रणाम : अनूप जलोटा के भजनों पर थिरकी श्रद्धा

काशी से अयोध्या तक गूंजी आस्था , अब मथुरा की बारी : जयघोषों के बीच झूम उठे श्रद्धालु भक्ति की तान , सुरों का प्रणाम : अ...