Sunday, 10 May 2026

योगी कैबिनेट विस्तार: समर्पण व निष्ठा नहीं, ‘समीकरण’ व ‘उपयोगिता’ बना सबसे बड़ा मंत्र!

योगी कैबिनेट विस्तार: समर्पण निष्ठा नहीं, ‘समीकरणउपयोगिताबना सबसे बड़ा मंत्र

कभी भाजपा अपनी पहचानकार्यकर्ताओं की पार्टीके रूप में करती थी। कहा जाता था कि यहां पद नहीं, परिश्रम बोलता है... यहां परिवारवाद नहीं, संगठन सर्वोपरि होता है... और यहां वर्षों तक झंडा उठाने वाला साधारण कार्यकर्ता भी सम्मान पाता है। लेकिन यूपी के ताजा मंत्रिमंडल विस्तार ने इन दावों के सामने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। आज भाजपा के भीतर सबसे ज्यादा बेचैनी विपक्ष में नहीं, बल्कि उन्हीं कार्यकर्ताओं के बीच दिखाई दे रही है जिन्होंने दशकों तक पार्टी को जमीन से खड़ा किया। वे कार्यकर्ता जो बूथ से लेकर सड़क तक लाठी खाते रहे, पोस्टर लगाते रहे, दरी बिछाते रहे, भीड़ जुटाते रहे... लेकिन सत्ता के दरवाजे खुलते ही वही चेहरे फिर सामने गए जो या तो दलबदल कर आए, या फिर संगठन और सरकार दोनों में लगातार मलाई काटते रहे। वाराणसी से लेकर लखनऊ तक चर्चा सिर्फ मंत्रियों की नहीं, बल्कि भाजपा के बदलते राजनीतिक चरित्र की है। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या अब पार्टी में वैचारिक निष्ठा की जगह चुनावी उपयोगिता ने ले ली है? क्याएक व्यक्ति, एक पदअब सिर्फ भाषणों का विषय रह गया है? और सबसे बड़ा सवाल क्या भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता अब सिर्फ मंच सजाने तक सीमित कर दिया गया है

सुरेश गांधी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मंत्रिमंडल विस्तार हमेशा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं होता। यह सत्ता के भीतर चल रही राजनीतिक धड़कनों, सामाजिक समीकरणों और आने वाले चुनावी संकेतों का सबसे बड़ा आईना भी माना जाता है। योगी आदित्यनाथ सरकार 2.0 के दूसरे मंत्रिमंडल विस्तार को भी कुछ इसी नजर से देखा जा रहा हैं। क्योंकि इस बार केवल नए मंत्रियों की शपथ नहीं हो रही, बल्कि भाजपा 2027 विधानसभा चुनाव की पूरी सामाजिक और राजनीतिक बिसात सजाती दिखाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि यह विस्तार ऐसे समय में हो रहा है जब पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर नई ऊर्जा दी है और पार्टी अब उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ और मजबूत करने के लिए नए सामाजिक समीकरण गढ़ रही है। लेकिन दूसरी तरफ इस विस्तार ने भाजपा के भीतर वर्षों से दबे असंतोष को भी सतह पर ला दिया है। भाजपा विधायक आशा मौर्या की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस असंतोष को सार्वजनिक कर दिया। उन्होंने लिखा कि अब भाजपा कोनिष्ठावान कार्यकर्ताओंकी जरूरत नहीं रह गई है, बल्कि पार्टीदलबदलुओं और बागियोंको प्राथमिकता दे रही है।

यह सिर्फ एक नाराज विधायक की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि संगठन के भीतर उन हजारों कार्यकर्ताओं की मनःस्थिति का प्रतिबिंब भी थी, जो वर्षों तक पार्टी का झंडा ढोने के बावजूद सत्ता के गलियारों से दूर हैं। यही वजह है कि योगी कैबिनेट विस्तार इस बार केवल मंत्री बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि भाजपा के बदलते राजनीतिक चरित्र पर भी गंभीर बहस का कारण बन गया है। भाजपा लंबे समय तक स्वयं कोकैडर आधारित पार्टीबताती रही है। पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसका संगठन, बूथ स्तर तक सक्रिय कार्यकर्ता और वैचारिक प्रतिबद्धता मानी जाती रही है। यही कारण था कि भाजपा में लंबे समय तक यह संदेश दिया जाता रहा कि यहांएक व्यक्ति, एक पदकी परंपरा है और समर्पित कार्यकर्ताओं को संगठन में सम्मान मिलता है। लेकिन समय के साथ भाजपा की राजनीति का स्वरूप बदला है। अब पार्टी केवल वैचारिक राजनीति नहीं कर रही, बल्कि अत्यंत व्यावहारिक चुनावी राजनीति के मॉडल पर आगे बढ़ रही है। जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन, प्रभावशाली चेहरे, दलबदलू नेताओं की उपयोगिता और चुनावी लाभ, ये सभी अब टिकट वितरण से लेकर मंत्रिमंडल गठन तक की राजनीति के प्रमुख आधार बन चुके हैं। योगी कैबिनेट विस्तार उसी नई भाजपा का चेहरा प्रस्तुत करता है।

2027 की तैयारी शुरू

इस पूरे मंत्रिमंडल विस्तार को यदि एक पंक्ति में समझना हो तो कहा जा सकता है कि भाजपा ने 2027 की चुनावी तैयारी अभी से शुरू कर दी है। जाट समीकरण: दलित प्रतिनिधित्व, अति पिछड़ा वर्ग, ब्राह्मण संतुलन, पश्चिम यूपी बनाम पूर्वांचल. दलबदलू नेताओं की उपयोगिता. संगठन और सरकार के बीच तालमेल. इन सभी को ध्यान में रखकर यह विस्तार किया गया है। सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी, लेकिन इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल अभी भी वही है, क्या भाजपा अबकार्यकर्ता आधारित पार्टीसे पूरी तरहचुनाव आधारित मशीनबनती जा रही है? क्या वैचारिक प्रतिबद्धता और संगठनात्मक निष्ठा अब केवल भाषणों तक सीमित रह गई है? क्या राजनीति में उपयोगिता ही सबसे बड़ा मूल्य बन चुकी है? और सबसे महत्वपूर्ण... क्या भाजपा का पारंपरिक कार्यकर्ता इस बदलाव को सहजता से स्वीकार कर पाएगा?

मोदी योगी का क्षेत्र भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में आने वाले वर्षों में इन सवालों के जवाब ही भाजपा की अगली दिशा तय करेंगे। पूर्वांचल, जहां से यूपी की सत्ता का रास्ता निकलता है, वहां भी भाजपा ने संतुलन बनाने की कोशिश की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर क्षेत्र भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का सवाल है। इसलिए हंसराज विश्वकर्मा जैसे चेहरे को आगे कर भाजपा ने अतिपिछड़े समाज में संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि भाजपा का यह विस्तार जितना सामाजिक समीकरणों का खेल है, उतना ही संगठन के भीतर बढ़ती बेचैनी का कारण भी बन सकता है। क्योंकि जमीन पर वर्षों तक पार्टी का झंडा उठाने वाले कार्यकर्ता अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या भाजपा में समर्पण की जगह अब केवल चुनावी उपयोगिता ही बची है? भाजपा भले इसे सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक संतुलन का विस्तार बताए, लेकिन सच्चाई यह है कि यह पूरा मंत्रिमंडल विस्तार 2027 की चुनावी बिसात पर बिछाई गई एक बेहद सोची-समझी चाल नजर आता है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह मंत्रिमंडल विस्तार?

उत्तर प्रदेश केवल एक राज्य नहीं, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति की धुरी है। लोकसभा की 80 सीटें और देश की सबसे बड़ी आबादी वाला राज्य होने के कारण यहां की राजनीति सीधे दिल्ली की सत्ता तय करती है। 2022 विधानसभा चुनाव में भाजपा भले सत्ता में लौट आई, लेकिन पार्टी को पूर्वांचल और अवध क्षेत्रों में अपेक्षा से कम प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। समाजवादी पार्टी ने यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ पिछड़े वर्गों में भी प्रभाव बढ़ाया। कई सीटों पर भाजपा का वोट प्रतिशत घटा। इसी पृष्ठभूमि में 2027 चुनाव भाजपा के लिए केवल सत्ता बचाने का नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक पकड़ बनाए रखने का चुनाव होगा। इसलिए यह मंत्रिमंडल विस्तार आने वाले चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है।

कौन-कौन बने मंत्री और क्या है राजनीतिक संदेश?

इस विस्तार में जिन चेहरों को जगह मिली है, वे केवल व्यक्ति नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदेश हैं:-

भूपेंद्र सिंह चैधरी: पश्चिम यूपी और जाट समीकरण. भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चैधरी को कैबिनेट मंत्री बनाया जाना केवल संगठनात्मक सम्मान नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट राजनीति का बड़ा प्रभाव है। किसान आंदोलन के बाद भाजपा को जाट समुदाय में कुछ राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा था। भूपेंद्र चैधरी को फिर से कैबिनेट में शामिल करके भाजपा ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पश्चिम यूपी अभी भी उसकी राजनीतिक प्राथमिकता है। 

मनोज कुमार पांडेय: दलबदल की राजनीति का पुरस्कार?: रायबरेली के ऊंचाहार से विधायक मनोज कुमार पांडेय कभी समाजवादी पार्टी के बड़े ब्राह्मण चेहरे माने जाते थे। उन्होंने सपा से दूरी बनाकर भाजपा के करीब आने का रास्ता चुना। अब उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जा रहा है। यहीं से भाजपा के भीतर सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है। वर्षों से पार्टी में संघर्ष कर रहे नेताओं की तुलना में दलबदल कर आए नेता को सीधा कैबिनेट में जगह मिलना कार्यकर्ताओं के लिए असहज संदेश माना जा रहा है। लेकिन भाजपा इसे अलग नजर से देख रही है। पार्टी को लगता है कि ब्राह्मण समाज में मनोज पांडेय की राजनीतिक उपयोगिता 2027 में महत्वपूर्ण हो सकती है।

वाराणसी और हंसराज विश्वकर्मा: सबसे ज्यादा चर्चा क्यों?: इस मंत्रिमंडल विस्तार का सबसे चर्चित नाम वाराणसी के एमएलसी और भाजपा जिलाध्यक्ष हंसराज विश्वकर्मा हैं। हंसराज विश्वकर्मा को राज्य मंत्री बनाए जाने के पीछे भाजपा की स्पष्ट रणनीति दिखाई देती है। विश्वकर्मा समाज उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में मौजूद है और भाजपा पिछले कुछ वर्षों से अति पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है। लेकिन वाराणसी भाजपा के भीतर इस नाम को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है। कारण यह है कि हंसराज विश्वकर्मा पिछले दस वर्षों में लगातार संगठन और सत्ता दोनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां पा चुके हैं। जिलाध्यक्ष... फिर एमएलसी... और अब मंत्री... ऐसे में पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं कि क्या बनारस भाजपा में बाकी नेता अप्रासंगिक हो चुके हैं? क्या वरिष्ठ नेताओं की भूमिका केवल भीड़ जुटाने तक सीमित हो गई है? काशी भाजपा लंबे समय तक मजबूत संगठन और सामूहिक नेतृत्व के लिए जानी जाती रही है। लेकिन अब कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि अवसर सीमित चेहरों तक सिमटते जा रहे हैं।

कृष्णा पासवान और दलित समीकरण: फतेहपुर की खागा सीट से विधायक कृष्णा पासवान को मंत्री बनाकर भाजपा ने दलित समाज को संदेश देने की कोशिश की है। बसपा के कमजोर होने के बाद भाजपा लगातार दलित वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने में लगी हुई है। भाजपा जानती है कि यदि दलित और पिछड़े वर्गों का गठजोड़ उसके साथ बना रहा, तो विपक्ष के लिए सत्ता तक पहुंचना मुश्किल होगा। कृष्णा पासवान का मंत्री बनना उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

सुरेंद्र दिलेर और पश्चिम यूपी का संदेश: अलीगढ़ के खैर से विधायक सुरेंद्र दिलेर का नाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित और पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व के तौर पर देखा जा रहा है। पश्चिम यूपी में जाट, दलित और ओबीसी समीकरण 2027 में निर्णायक भूमिका निभाएंगे। भाजपा इस क्षेत्र में कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। यही कारण है कि पश्चिम यूपी का दबदबा इस विस्तार में भी साफ दिखाई देता है। कैलाश सिंह राजपूत: पिछड़ा वर्ग और मध्य यूपी का संतुलन. कन्नौज के तिर्वा से विधायक कैलाश सिंह राजपूत को मंत्रिमंडल में शामिल कर भाजपा ने पिछड़े वर्गों में अपना विस्तार जारी रखने का संकेत दिया है। कन्नौज सपा का मजबूत गढ़ माना जाता है। ऐसे में वहां से भाजपा नेता को मंत्री बनाना केवल क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।

प्रमोशन की सियासत

इस विस्तार में केवल नए चेहरे ही शामिल नहीं हुए, बल्कि कुछ मंत्रियों को प्रमोशन भी मिला। मेरठ दक्षिण से विधायक डॉ. सोमेंद्र तोमर और कानपुर देहात के अजीत पाल को राज्य मंत्री से स्वतंत्र प्रभार का दर्जा दिया गया है। यह भाजपा की आंतरिक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पार्टी संगठन और सरकार दोनों में यह संदेश देना चाहती है कि प्रदर्शन और राजनीतिक उपयोगिता का पुरस्कार मिलेगा।

पश्चिम यूपी का दबदबा क्यों कायम?

यदि पूरे मंत्रिमंडल को क्षेत्रीय आधार पर देखें तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभाव सबसे ज्यादा दिखाई देता है। इसके पीछे कई राजनीतिक कारण हैं, किसान आंदोलन के बाद पैदा हुई राजनीतिक दूरी. जाट वोट बैंक को साधने की जरूरत. रालोद और सपा के संभावित गठजोड़ की चुनौती. मुस्लिम बहुल सीटों पर समीकरण संतुलित करने की रणनीति. भाजपा जानती है कि पश्चिम यूपी में थोड़ा सा राजनीतिक नुकसान भी 2027 में भारी पड़ सकता है। इसलिए वहां के नेताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।

पूर्वांचल: भाजपा की प्रतिष्ठा का सवाल

पूर्वांचल हमेशा से भाजपा की राजनीतिक ताकत का केंद्र रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गोरखपुर क्षेत्र इसी इलाके में आता है। लेकिन 2022 चुनाव में भाजपा को पूर्वांचल में अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सपा ने यहां कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी। यही वजह है कि भाजपा अब अति पिछड़े और गैर-यादव ओबीसी समुदायों को और मजबूती से अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाना उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

भाजपा में बदलती कार्यकर्ता संस्कृति

भाजपा की सबसे बड़ी ताकत हमेशा उसका कार्यकर्ता रहा है। बूथ स्तर तक सक्रिय संगठन और समर्पित कार्यकर्ता भाजपा की पहचान रहे हैं। लेकिन अब कार्यकर्ताओं के बीच यह चर्चा बढ़ रही है कि पार्टी में वैचारिक निष्ठा की जगह चुनावी उपयोगिता अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। दलबदल कर आए नेताओं को सीधे मंत्री बनाना, सीमित चेहरों को बार-बार अवसर देना और पुराने कार्यकर्ताओं की अनदेखी, ये सभी बातें संगठन के भीतर असंतोष पैदा कर रही हैं। आशा मौर्या की पोस्ट इसी असंतोष की सार्वजनिक अभिव्यक्ति मानी जा रही है।

क्या भाजपा के सामने आंतरिक चुनौती बढ़ रही है?

भाजपा फिलहाल देश की सबसे मजबूत राजनीतिक पार्टी है। लेकिन किसी भी बड़े संगठन की सबसे बड़ी चुनौती बाहरी विपक्ष नहीं, बल्कि आंतरिक असंतोष होता है। यदि कार्यकर्ताओं को लगे कि समर्पण का मूल्य कम हो रहा है, तो संगठनात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है। हालांकि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इस कला में माहिर माना जाता है कि वह असंतोष को सार्वजनिक विद्रोह बनने से पहले नियंत्रित कर लेता है। लेकिन उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में लगातार बढ़ती राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को संतुलित करना आसान नहीं होगा।

No comments:

Post a Comment

योगी कैबिनेट विस्तार: समर्पण व निष्ठा नहीं, ‘समीकरण’ व ‘उपयोगिता’ बना सबसे बड़ा मंत्र!

योगी कैबिनेट विस्तार : समर्पण व निष्ठा नहीं , ‘ समीकरण ’ व ‘ उपयोगिता ’ बना सबसे बड़ा मंत्र !  कभी भाजपा अपनी पहचान “ कार्यकर्...