गोली, गैंग और राजनीति! आखिर किसे चुप कराना चाहता है बंगाल का सियासी खेल?
पश्चिम बंगाल एक बार फिर लोकतंत्र नहीं, बल्कि डर, गोलियों और राजनीतिक खून-खराबे की प्रयोगशाला बनता दिखाई दे रहा है। चुनाव खत्म हो चुके हैं, सत्ता तय हो चुकी है, लेकिन सड़कों पर अब भी बारूद की गंध तैर रही है। भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी के बेहद करीबी सहयोगी और निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की निर्मम हत्या ने पूरे बंगाल की राजनीति को झकझोर दिया है। सवाल सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक मानसिकता का है जहां विरोधियों को हराने के लिए अब बहस नहीं, बल्कि बंदूकें इस्तेमाल होती दिखाई दे रही हैं। भाजपा इसे सुनियोजित राजनीतिक हत्या बता रही है, जबकि तृणमूल कांग्रेस आरोपों को सियासी ड्रामा कह रही है। लेकिन सच यह भी है कि बंगाल लंबे समय से चुनावी हिंसा, बमबाजी और राजनीतिक प्रतिशोध की खबरों से दहलता रहा है। ऐसे में यह हत्या महज अपराध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की छाती पर पड़ा वह ताजा घाव है जिसने फिर सवाल खड़ा कर दिया है, क्या बंगाल में सत्ता की लड़ाई अब संवैधानिक दायरे से निकलकर खूनी संघर्ष में बदल चुकी है? लोकतंत्र के उत्सव के बाद खून की सियासत क्यों?
सुरेश गांधी
पश्चिम बंगाल की राजनीति एक
बार फिर खून, हिंसा
और सियासी टकराव की आग में
झुलसती दिखाई दे रही है।
चुनावी नतीजों की धूल अभी
पूरी तरह बैठी भी
नहीं थी कि भाजपा
के वरिष्ठ नेता और विधानसभा
में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु
अधिकारी के करीबी सहयोगी
और निजी सहायक चंद्रनाथ
रथ की गोली मारकर
हत्या ने पूरे राज्य
को हिला दिया। यह
सिर्फ एक हत्या नहीं,
बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति
पर बड़ा सवाल है
जिसके लिए बंगाल लंबे
समय से बदनाम रहा
है। सवाल यह है
कि क्या बंगाल में
लोकतंत्र अब मतपत्र से
नहीं बल्कि बंदूक और बम से
तय होने लगा है?
क्या चुनावी हार और राजनीतिक
असुरक्षा ने हिंसा को
फिर हवा दे दी
है? या फिर इसके
पीछे कोई और गहरी
साजिश है? घटना ने
बंगाल की राजनीति को
फिर उसी पुराने मोड़
पर ला खड़ा किया
है जहां राजनीतिक मतभेद
अक्सर खून-खराबे में
बदल जाते हैं।
बताया जा रहा है
कि शुभेंदु अधिकारी के पीए चंद्रनाथ
तंजी देर रात कार
से लौट रहे थे।
इसी दौरान बाइक सवार हमलावरों
ने उनकी गाड़ी को
घेर लिया और बेहद
नजदीक से ताबड़तोड़ गोलियां
बरसा दीं। हमला इतना
सुनियोजित था कि हमलावर
वारदात को अंजाम देकर
आसानी से फरार हो
गए। प्रारंभिक जांच में सामने
आया कि हमलावर काफी
देर से उनका पीछा
कर रहे थे। फर्जी
नंबर प्लेट, पेशेवर अंदाज और सीधी फायरिंग
यह संकेत दे रही है
कि हत्या अचानक नहीं बल्कि पूरी
तैयारी के साथ की
गई। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज
है कि आखिर ऐसा
कौन था जो शुभेंदु
अधिकारी के सबसे भरोसेमंद
सहयोगी को रास्ते से
हटाना चाहता था? चंद्रनाथ रथ
सिर्फ एक निजी सहायक
नहीं थे। वे शुभेंदु
अधिकारी के बेहद करीबी
रणनीतिक सहयोगी माने जाते थे।
पूर्व वायुसेना कर्मी होने के कारण
उनमें अनुशासन और सुरक्षा समझ
दोनों थी। भाजपा संगठन
में उनकी गहरी पकड़
थी और वे कई
महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियों का समन्वय संभालते
थे। यही वजह है
कि भाजपा इस हत्या को
साधारण आपराधिक घटना मानने को
तैयार नहीं है। पार्टी
का कहना है कि
यह सीधे-सीधे “राजनीतिक
टारगेट किलिंग” है।
घटना के बाद
शुभेंदु अधिकारी बेहद आक्रामक दिखाई
दिए। उन्होंने साफ कहा कि
यह हत्या कई दिनों की
रेकी के बाद की
गई और इसके पीछे
राजनीतिक ताकतों का हाथ है।
भाजपा नेताओं ने सीधे तौर
पर तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते
हुए कहा कि बंगाल
में विपक्ष के लोगों को
चुन-चुनकर निशाना बनाया जा रहा है।
भाजपा का आरोप है
कि चुनावी नतीजों के बाद राज्य
में फिर “पोस्ट पोल
वायलेंस” शुरू हो गया
है। पार्टी नेताओं का कहना है
कि बंगाल में राजनीतिक विरोध
अब लोकतांत्रिक तरीके से नहीं बल्कि
हिंसा के जरिए दबाया
जा रहा है। हत्या
के कुछ घंटों बाद
भाजपा कार्यकर्ताओं पर कथित बमबाजी
और हमलों की खबरों ने
इन आरोपों को और हवा
दे दी। दूसरी ओर
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और
तृणमूल कांग्रेस ने घटना की
निंदा करते हुए खुद
को आरोपों से अलग बताया
है। टीएमसी नेताओं का कहना है
कि भाजपा बिना जांच पूरी
हुए राजनीतिक लाभ लेने की
कोशिश कर रही है।
पार्टी ने यहां तक
कहा कि मामले की
सीबीआई जांच होनी चाहिए
ताकि सच्चाई सामने आ सके। लेकिन
बड़ा सवाल तो यही
है, यदि राज्य की
कानून व्यवस्था मजबूत है तो फिर
विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं पर
लगातार हमले क्यों हो
रहे हैं? यही वह
प्रश्न है जो ममता
सरकार को कठघरे में
खड़ा कर रहा है।
क्या बंगाल में हिंसा राजनीतिक संस्कृति बन चुकी है?
बंगाल में राजनीतिक हिंसा
कोई नई बात नहीं
है। वामपंथी दौर से लेकर
तृणमूल शासन तक, सत्ता
परिवर्तन के साथ हिंसा
की घटनाएं हमेशा चर्चा में रही हैं।
2021 के विधानसभा चुनाव के बाद भी
राज्य में व्यापक हिंसा
हुई थी। भाजपा ने
आरोप लगाया था कि उसके
कार्यकर्ताओं की हत्या, घरों
में आगजनी और महिलाओं के
साथ अत्याचार हुए। मामला अदालत
तक पहुंचा और राष्ट्रीय मानवाधिकार
आयोग ने भी गंभीर
टिप्पणियां की थीं। अब
एक बार फिर वही
तस्वीर लौटती दिखाई दे रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है
कि बंगाल की राजनीति में
वैचारिक संघर्ष अब “अस्तित्व की
लड़ाई” में बदल गया
है। यहां चुनाव सिर्फ
सत्ता का संघर्ष नहीं
बल्कि राजनीतिक वर्चस्व की जंग बन
चुका है।
हार का डर या सत्ता बचाने की बेचैनी?
इस पूरे घटनाक्रम
के पीछे सबसे बड़ा
राजनीतिक पहलू यही माना
जा रहा है कि
बंगाल में भाजपा लगातार
अपनी जमीन मजबूत कर
रही है। शुभेंदु अधिकारी
ममता बनर्जी के सबसे बड़े
राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे हैं।
नंदीग्राम में ममता को
हराने के बाद शुभेंदु
सिर्फ विपक्ष के नेता नहीं
रहे, बल्कि वे भाजपा के
“बंगाल मिशन” का चेहरा बन
गए। ऐसे में उनके
करीबी सहयोगी की हत्या ने
सियासी तापमान और बढ़ा दिया
है। भाजपा इसे डर और
राजनीतिक असुरक्षा का परिणाम बता
रही है। पार्टी का
कहना है कि जब
लोकतांत्रिक मुकाबले में चुनौती बढ़ती
है तो हिंसा का
सहारा लिया जाता है।
हालांकि टीएमसी इन आरोपों को
पूरी तरह खारिज कर
रही है। लेकिन क्या
कहानी इतनी सीधी है?
इस मामले का दूसरा पहलू
भी उतना ही महत्वपूर्ण
है। कई राजनीतिक पर्यवेक्षक
मानते हैं कि बंगाल
में हर बड़ी हिंसक
घटना तुरंत राजनीतिक रंग ले लेती
है। ऐसे में यह
भी संभव है कि
हत्या के पीछे कोई
आपराधिक या व्यक्तिगत कारण
हो, जिसे राजनीतिक रूप
दिया जा रहा हो।
जांच एजेंसियां फिलहाल हर एंगल से
जांच कर रही हैं।
पुलिस सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और हमलावरों की
गतिविधियों का विश्लेषण कर
रही है। अभी तक
किसी राजनीतिक संगठन का नाम आधिकारिक
रूप से सामने नहीं
आया है। यानी फिलहाल
आरोप बहुत हैं, लेकिन
अंतिम सच अभी जांच
के दायरे में है।
लोकतंत्र का सबसे बड़ा संकट
इस घटना ने
एक बार फिर देश
के सामने बड़ा सवाल खड़ा
कर दिया हैकृ क्या
भारत के कुछ हिस्सों
में राजनीति अब लोकतांत्रिक विमर्श
से आगे निकलकर हिंसक
संघर्ष में बदलती जा
रही है? जब राजनीतिक
कार्यकर्ता और नेताओं के
करीबी लोग खुलेआम मारे
जाने लगें, जब चुनाव के
बाद भी हिंसा जारी
रहे, जब विरोधी विचारधारा
दुश्मनी में बदल जाए,
तब लोकतंत्र कमजोर होता है। बंगाल
की जनता विकास, रोजगार
और शांति चाहती है, लेकिन उसे
बार-बार राजनीतिक संघर्ष
की आग में झोंका
जा रहा है।
सच्चाई सामने आनी ही चाहिए
चंद्रनाथ रथ की हत्या का सच चाहे जो हो, लेकिन यह घटना बेहद गंभीर है। यदि यह राजनीतिक हत्या है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है। और यदि इसके पीछे कोई साजिश है, तो उसे भी बेनकाब होना चाहिए। राजनीतिक दलों के आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर अब जरूरत निष्पक्ष और तेज जांच की है। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष दुश्मन नहीं होता, बल्कि सत्ता को संतुलित रखने वाली सबसे बड़ी ताकत होता है। बंगाल को अब राजनीति नहीं, शांति चाहिए। वरना चुनाव खत्म होंगे, लेकिन हिंसा कभी खत्म नहीं होगी।


No comments:
Post a Comment