नंदीग्राम से नवाबगंज तक… अब ‘राइटर्स बिल्डिंग’ पर अधिकारी का राज
ममता युग का अंत, शुभेंदु अधिकारी होंगे राज्य के अगले मुख्यमंत्री
संघर्ष, विद्रोह
और
संगठन
कौशल
ने
दिलाई
नई
पहचान
नंदीग्राम आंदोलन से निकला
नेता अब संभालेगा बंगाल की सत्ता
रवींद्र जयंती पर पहली
भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण आज
ब्रिगेड परेड ग्राउंड बनेगा
ऐतिहासिक पल का गवाह
सुरेश गांधी
पश्चिम बंगाल की राजनीति ने आखिरकार वह
दिन देख लिया, जिसकी कल्पना कुछ वर्ष पहले तक असंभव मानी जाती थी। कभी वामपंथ के लाल
किले के रूप में पहचाने जाने वाले बंगाल में अब भगवा सत्ता का सूर्योदय होने जा रहा
है। तृणमूल कांग्रेस के डेढ़ दशक लंबे शासन का अंत हो चुका है और भाजपा विधायक दल ने
सर्वसम्मति से सुवेंन्दु अधिकारी को अपना नेता चुन लिया है।
कोलकाता में हुई भाजपा विधायक दल की ऐतिहासिक
बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मोहन
चरण माझी की मौजूदगी में शुभेंदु अधिकारी के नाम पर अंतिम मुहर लगी। इसके साथ
ही यह तय हो गया कि बंगाल की पहली भाजपा सरकार की कमान अब शुभेंदु अधिकारी के हाथों
में होगी।
अब 9 मई की सुबह 11 बजे कोलकाता के ऐतिहासिक
ब्रिगेड परेड ग्राउंड
में शुभेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। यह संयोग ही नहीं, बल्कि
राजनीतिक प्रतीकवाद भी है कि जिस दिन पूरा बंगाल रबिन्द्रनाथ टैगोर की
जयंती मना रहा होगा, उसी दिन राज्य में पहली बार भाजपा सरकार सत्ता संभालेगी। राजनीतिक
गलियारों में इसे “बंगाल की नई सुबह” और “पूर्वी भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक
क्रांति” कहा जा रहा है।
ममता के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार से सबसे
बड़े प्रतिद्वंद्वी तक
शुभेंदु अधिकारी की कहानी किसी सामान्य
राजनीतिक नेता की यात्रा नहीं है। यह संघर्ष, संगठन, विद्रोह और सत्ता परिवर्तन की
ऐसी कहानी है जिसने बंगाल की राजनीति की पूरी दिशा बदल दी। पूर्वी मिदनापुर के प्रभावशाली
अधिकारी परिवार में जन्मे शुभेंदु के पिता सीसीर अधिकारी बंगाल की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे। लेकिन शुभेंदु
ने अपनी पहचान विरासत से नहीं, बल्कि आंदोलनों की आग से बनाई।
साल 2007… नंदीग्राम आंदोलन
यही वह मोड़ था जिसने बंगाल की राजनीति
की जड़ों को हिला दिया। उस समय वाम मोर्चा सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उठी
जनता की आवाज को गांव-गांव तक पहुंचाने वाले नेताओं में सबसे आगे शुभेंदु अधिकारी थे।
नंदीग्राम केवल जमीन बचाने की लड़ाई नहीं थी। वह बंगाल की सत्ता परिवर्तन की शुरुआत
थी। इसी आंदोलन ने वामपंथी शासन की नींव कमजोर की और ममता बनर्जी
को सत्ता तक पहुंचाने का रास्ता बनाया। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि
ममता बनर्जी आंदोलन का चेहरा थीं, तो शुभेंदु अधिकारी उसकी जमीन थे।
तृणमूल का संकटमोचक
ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद
शुभेंदु अधिकारी तेजी से तृणमूल कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए।
पंचायत राजनीति से लेकर संगठन विस्तार तक, हर चुनाव में उनकी रणनीति निर्णायक मानी
जाती थी। उन्हें परिवहन, सिंचाई और जल संसाधन जैसे अहम मंत्रालयों की जिम्मेदारी दी
गई। दक्षिण बंगाल में उनकी पकड़ इतनी मजबूत मानी जाती थी कि उन्हें “तृणमूल का चाणक्य”
तक कहा जाने लगा।
लेकिन समय बदला…
पार्टी के भीतर मतभेद बढ़े। अधिकारी परिवार
और तृणमूल नेतृत्व के बीच दूरियां खुलकर सामने आने लगीं। शुभेंदु खुद को उपेक्षित महसूस
करने लगे। और फिर वर्ष 2020 में उन्होंने ऐसा फैसला लिया जिसने बंगाल की राजनीति में
भूचाल ला दिया— उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थाम लिया।
यह केवल दल परिवर्तन नहीं था, बल्कि बंगाल की राजनीति में वैचारिक युद्ध की शुरुआत
थी।
नंदीग्राम बना राजनीतिक महाभारत
2021 विधानसभा चुनाव में पूरा देश जिस
सीट पर टिका था, वह थी नंदीग्राम। एक तरफ थीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दूसरी तरफ
उनके पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी। यह चुनाव केवल एक सीट का नहीं, बल्कि बंगाल की
राजनीतिक प्रतिष्ठा का युद्ध बन गया था। जब परिणाम आया तो शुभेंदु अधिकारी ने ममता
बनर्जी को करीबी मुकाबले में पराजित कर दिया। यही वह क्षण था जब भाजपा ने उन्हें बंगाल
में अपने सबसे बड़े चेहरे के रूप में स्थापित कर दिया। हालांकि उस समय भाजपा सत्ता
तक नहीं पहुंच सकी, लेकिन शुभेंदु लगातार संगठन मजबूत करते रहे। सीमावर्ती जिलों, ग्रामीण
क्षेत्रों और हिंदू मतदाताओं के बीच भाजपा का आधार तेजी से बढ़ा। राजनीतिक जानकारों
का मानना है कि बंगाल में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे यदि किसी एक चेहरे की सबसे
बड़ी भूमिका रही, तो वह शुभेंदु अधिकारी ही हैं।
“बंगाल चलाएंगे अधिकारी” क्यों बना सबसे बड़ा
नारा
पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने बंगाल
में जिस आक्रामक रणनीति के साथ चुनाव लड़ा, उसका केंद्रीय चेहरा शुभेंदु अधिकारी ही
रहे। उनकी सभाओं में बंगाल की सांस्कृतिक अस्मिता, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, कटमनी,
तुष्टीकरण और घुसपैठ जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठते रहे। विधानसभा के भीतर उनका आक्रामक
तेवर और सड़क पर लगातार संघर्ष करने की छवि भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उन्हें सबसे
लोकप्रिय नेता बनाती गई। यही कारण है कि चुनाव परिणाम आने के बाद टीवी चैनलों से लेकर
सोशल मीडिया तक एक ही नारा गूंजने लगा— “अब बंगाल चलाएंगे अधिकारी…”
रवींद्र जयंती पर शपथ… राजनीतिक संदेश भी
गहरा
9 मई को होने वाला शपथ ग्रहण केवल संवैधानिक
प्रक्रिया नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर की
जयंती पर भाजपा सरकार का शपथ ग्रहण यह संकेत देने की कोशिश मानी जा रही है कि भाजपा
अब बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को अपने साथ जोड़कर आगे बढ़ना चाहती है। सूत्रों के अनुसार
शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी , अमित शाह समेत कई राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल होंगे। भाजपा इस कार्यक्रम
को शक्ति प्रदर्शन और “नए बंगाल” की शुरुआत के रूप में प्रस्तुत करना
चाहती है।
दो डिप्टी सीएम फॉर्मूला और नई सामाजिक
इंजीनियरिंग
सूत्रों के अनुसार नई सरकार में दो उपमुख्यमंत्री
बनाए जा सकते हैं। भाजपा सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश में है। एक महिला
चेहरे को भी बड़ी जिम्मेदारी दिए जाने की चर्चा है। इसके अलावा उत्तर बंगाल, जंगलमहल
और सीमावर्ती क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देकर भाजपा अपने व्यापक जनादेश को संतुलित
करने की रणनीति बना रही है।
राज्यपाल ने भंग की विधानसभा
भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद पश्चिम
बंगाल के राज्यपाल R. N. Ravi ने 7 मई को विधानसभा भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी।
कोलकाता गजट में जारी अधिसूचना के बाद राज्य में नई सरकार गठन की प्रक्रिया तेज हो
गई।
अब सबसे बड़ी चुनौती— उम्मीदों का बंगाल
हालांकि सत्ता तक पहुंचने की लड़ाई खत्म
हो चुकी है, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। बेरोजगारी, उद्योगों का पलायन, राजनीतिक
हिंसा, सीमा पार घुसपैठ, प्रशासनिक विश्वास और कानून-व्यवस्था जैसी चुनौतियां नई सरकार
के सामने होंगी। भाजपा ने “सोनार बांग्ला” का जो सपना दिखाया है, उसे जमीन पर उतारना
शुभेंदु अधिकारी के लिए सबसे बड़ी कसौटी होगा।
बंगाल की राजनीति का निर्णायक मोड़
ज्योति बसु का लंबा वाम शासन…
फिर ममता बनर्जी का आक्रामक जनआंदोलन… और अब शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में
भाजपा का उदय… बंगाल ने तीन अलग-अलग राजनीतिक युग देख लिए हैं। आज कोलकाता
की सड़कों पर ढाक की थाप, भगवा अबीर और “जय श्रीराम” के नारों के बीच भाजपा कार्यकर्ता जश्न
मना रहे हैं। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन का समय है। लेकिन इतिहास
के इस मोड़ पर सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की है, वह एक ही है—
“नंदीग्राम का योद्धा… अब बंगाल का सरदार”

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