खामोश चीखों से हौसलों की उड़ान तक
मदर्स डे : जब जिंदगी ने सब कुछ छीन लिया, तब एक मां ने अपने आंसुओं से बच्चों का भविष्य लिख दिया
पति की मौत के बाद अक्सर जिंदगी सिर्फ यादों में बदल जाती है। घर की दीवारें वही रहती हैं, लेकिन उनमें बसने वाली आवाजें हमेशा के लिए खो जाती हैं। कुछ ऐसा ही हुआ निधि मिश्रा के साथ। कैंसर ने उनके पति को छीन लिया, जिम्मेदारियों ने बची हुई जिंदगी को घेर लिया और तीन मासूम बच्चों की आंखों में भविष्य का डर उतर आया। लेकिन उसी टूटन के बीच एक मां ने हार मानने से इनकार कर दिया। उसने अपने आंसुओं को तकिए तक सीमित रखा और बच्चों के सामने मुस्कान ओढ़ ली। फीस की चिंता, अकेलेपन का दर्द, समाज की बेरुखी और भीतर का सन्नाटा… सब कुछ सहते हुए वह चुपचाप लड़ती रहीं। आज उनकी बेटियां अपने सपनों की उड़ान भर रही हैं और बेटा भविष्य की तैयारी में जुटा है। यह सिर्फ एक मां की कहानी नहीं, बल्कि उस अदृश्य शक्ति की दास्तान है, जो टूटकर भी अपने बच्चों के लिए हर दिन फिर जी उठती है
सुरेश गांधी
रात जब बहुत गहरी हो जाती है, तब इंसान की सबसे सच्ची आवाज उसके भीतर सुनाई देती है। वह आवाज, जिसे दुनिया कभी नहीं सुन पाती। वह दर्द, जो शब्दों में नहीं उतरता। वह खालीपन, जो हर दिन मुस्कुराते चेहरे के पीछे चुपचाप सांस लेता रहता है। कुछ ऐसी ही खामोश चीखों के साथ पिछले आठ वर्षों से जी रही हैं निधि मिश्रा। बाहर से देखने पर वह एक सामान्य कामकाजी महिला दिखती हैं। सुबह नौकरी पर जाना, बच्चों की पढ़ाई की चिंता करना, घर संभालना, लोगों से मुस्कुराकर मिलना और जिम्मेदारियों को सहजता से निभाना। लेकिन इस सहज चेहरे के भीतर एक ऐसा अथाह सन्नाटा है, जिसे सिर्फ वही महसूस कर सकती हैं।
एक ऐसा खालीपन, जो
हर सुबह उन्हें उस
जीवन की याद दिलाता
है, जो कभी उनका
सबसे सुंदर सच था। मदर्स डे
के अवसर पर निधि
मिश्रा की कहानी सिर्फ
एक मां की कहानी
नहीं है। यह उस
भारतीय स्त्री की कहानी है,
जो टूटती जरूर है, लेकिन
बिखरती नहीं। जो हर बार
अपने बच्चों के लिए खुद
को फिर से खड़ा
कर लेती है। जो
अपने हिस्से का दर्द चुपचाप
पीकर बच्चों के हिस्से में
मुस्कान छोड़ देती है।
जब जिंदगी सामान्य थी और सपनों में उजाला था
वर्ष 2002 में शुरू हुआ वैवाहिक जीवन बिल्कुल सामान्य खुशियों से भरा हुआ था। पति विनोद मिश्रा के साथ जीवन संघर्षपूर्ण जरूर था, लेकिन उसमें साथ था, भरोसा था और भविष्य के प्रति उम्मीद थी। परिवार में हंसी थी, बच्चों की किलकारियां थीं और छोटे-छोटे सपनों से सजा हुआ संसार था।
समय के साथ तीन बच्चों — संस्कृति, सुकृति और संस्कार — ने घर को जीवंत बना दिया। बच्चों की मुस्कान ही परिवार की सबसे बड़ी पूंजी थी। जिंदगी साधारण थी, लेकिन संतोष से भरी हुई थी। लेकिन जिंदगी हमेशा चेतावनी देकर नहीं बदलती।
दिसंबर 2017 में अचानक पता चला कि विनोद मिश्रा को माउथ कैंसर है। यह खबर किसी भूकंप की तरह पूरे परिवार पर गिरी। जिस व्यक्ति ने हमेशा परिवार की ढाल बनकर जिंदगी जी, वही अचानक अस्पतालों और दवाइयों के बीच जिंदगी की सबसे कठिन लड़ाई लड़ने लगा।कानपुर के
जेके कैंसर अस्पताल में इलाज शुरू
हुआ। उम्मीदें थीं, दुआएं थीं,
विश्वास था कि सब
ठीक हो जाएगा। परिवार
ने हर संभव कोशिश
की। लेकिन बीमारी हर उम्मीद से
बड़ी साबित हुई।
22 फरवरी 2018…
यह तारीख निधि मिश्रा की जिंदगी में हमेशा के लिए ठहर गई। उस दिन सिर्फ एक पति नहीं गया था। एक स्त्री का सहारा चला गया था।
तीन बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया था। एक परिवार अचानक अधूरा हो गया था। उस समय बड़ी बेटी संस्कृति स्कूल में थीं। छोटी बेटी सुकृति बचपन और समझदारी के बीच खड़ी थी।बेटा संस्कार दुनिया की सच्चाइयों को समझने के लिए बहुत छोटा था। घर में रिश्तेदार थे, सांत्वनाएं थीं, लोग थे…
लेकिन जो
खालीपन भीतर पैदा हुआ
था, उसे कोई भर
नहीं सकता था। तीनों बच्चों
की आंखों में सिर्फ एक
सवाल था — “अब क्या होगा?”
और शायद यहीं एक
मां का दूसरा जन्म
होता है।
जब आंसुओं को ताकत बनाना पड़ा
काशी ने टूटने नहीं दिया
7 मई 2018 को निधि मिश्रा काशी आईं। एक ऐसा शहर, जिसे उन्होंने कभी अपने जीवन का हिस्सा नहीं सोचा था। उस समय बनारस उनके लिए सिर्फ एक शहर था — घाटों, मंदिरों, गलियों और भीड़ से भरा हुआ शहर। लेकिन धीरे-धीरे यही शहर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बन गया। काशी की सुबहें उनके भीतर उतरने लगीं। गंगा के घाटों पर बहती हवा, मंदिरों की घंटियां, बाबा विश्वनाथ की आरती और बनारस की आत्मीयता ने उनके भीतर टूट चुकी उम्मीदों को फिर से जोड़ना शुरू किया।
उन्होंने नौकरी शुरू की। हिंदुस्तान परिवार ने कठिन समय में उन्हें सहारा दिया। उनके पति विनोद मिश्रा गाजीपुर में हिंदुस्तान के ब्यूरो चीफ रहे थे। संस्थान ने निधि को अवसर दिया। यह सिर्फ रोजगार नहीं था, बल्कि जिंदगी को फिर से संभालने का पहला आधार था। इसके साथ ही उन्होंने स्कूल में पढ़ाना भी शुरू किया।सुबह घर संभालना, फिर नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, बाजार, फीस, जिम्मेदारियां, रात की चिंता और अगले दिन की तैयारी—जिंदगी एक निरंतर संघर्ष बन चुकी थी। लेकिन इस संघर्ष में कोई शोर नहीं था। वह चुपचाप लड़ रही थीं। दुनिया को सिर्फ उनकी मुस्कान दिखाई देती थी, भीतर की थकान नहीं।
“मैंने बस जीना सीख लिया है, तुम्हारे बिना…” कुछ समय पहले उन्होंने अपने मन की पीड़ा को शब्दों में ढाला और सोशल मीडिया पर एक कविता लिखी।कविता की शुरुआत थी - “एक दर्द भरी चीख सबको सुनाई देती है, लेकिन जो चीख बेआवाज होती है, वही सबसे ज्यादा जला देती है…” यह सिर्फ कविता नहीं थी। यह आठ वर्षों से भीतर दबे दर्द का विस्फोट था।
उन्होंने लिखा कि बच्चों के बीच बैठकर जब वह हंसती हैं, तब भी उन्हें लगता है कि उस हंसी की परछाईं में पति की कमी खड़ी है। बच्चों की बातों में वह आज भी उनकी आवाज ढूंढती हैं। रात के सन्नाटे में कई बार ऐसा लगता है कि दरवाजा खुलेगा और वह सामने खड़े होंगे।
लेकिन फिर वही सन्नाटा लौट आता है। कविता सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। हजारों लोगों ने उसे पढ़ा, साझा किया और महसूस किया। क्योंकि वह सिर्फ निधि मिश्रा की कहानी नहीं थी। वह उन लाखों महिलाओं की कहानी थी, जो अपने हिस्से का दुःख चुपचाप जीती हैं। सबसे ज्यादा लोगों को उनकी यह पंक्ति भीतर तक छू गई — “लोग समझते हैं निधि संभल गई है, पर सच्चाई ये है, मैंने बस जीना सीख लिया है, तुम्हारे बिना…”बच्चे अब उनकी ताकत बन चुके हैं
समाज अक्सर मान लेता है कि समय हर घाव भर देता है। लेकिन सच यह है कि कुछ दर्द कभी खत्म नहीं होते।
इंसान सिर्फ उनके साथ जीना सीख जाता है। निधि मिश्रा ने भी यही किया। उन्होंने अपने बच्चों के लिए खुद को फिर से गढ़ा। आज बड़ी बेटी संस्कृति एमबीए कर रही हैं।
छोटी बेटी सुकृति बी-फार्मा की पढ़ाई में जुटी हैं। बेटा संस्कार 12वीं का छात्र है। इन बच्चों की उपलब्धियां सिर्फ शैक्षणिक सफलता नहीं हैं। यह एक मां की तपस्या का परिणाम हैं।कई रातें
ऐसी थीं जब फीस
भरने की चिंता में
नींद नहीं आती थी।
कई बार अपनी जरूरतों
को खत्म करके बच्चों
की जरूरतें पूरी करनी पड़ीं।
लेकिन जब बच्चों को
आगे बढ़ते देखती हैं, तो लगता
है कि संघर्ष व्यर्थ
नहीं गया। निधि कहती
हैं — “जिंदगी किसी के जाने
से खत्म नहीं होती…
लेकिन उसके बाद जीना
फिर से सीखना पड़ता
है।”
काशी अब उनके पुनर्जन्म की भूमि है
पुनर्जन्म की
भूमि है। एक ऐसा
शहर, जिसने उन्हें टूटने नहीं दिया। वह
कहती हैं — “काशी ने मुझे
सिर्फ रोजगार नहीं दिया, बल्कि
गिरकर फिर संभलना सिखाया।”
सच भी यही है।
बनारस सिर्फ आध्यात्मिक शहर नहीं, टूटे
हुए लोगों को फिर से
जीना सिखाने वाला शहर भी
है। यहां की गंगा
सिर्फ पाप नहीं धोती,
कई बार मन का
दुःख भी बहा ले
जाती है।
मां सिर्फ ममता नहीं, संघर्ष का दूसरा नाम है
वह अपने टूटे हुए सपनों पर बच्चों का भविष्य खड़ा करने वाली सबसे मजबूत दीवार होती है। समाज अक्सर स्त्री की सहनशीलता की बात करता है। लेकिन स्त्री की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सहनशीलता नहीं, बल्कि हर बार टूटकर फिर खड़े हो जाने की क्षमता है।
आज जब
निधि पीछे मुड़कर देखती
हैं, तो दर्द अब
भी उतना ही है।
पति की यादें अब
भी हैं। मां की
कमी अब भी महसूस
होती है। लेकिन अब
उन्होंने जिंदगी से शिकायत करना
छोड़ दिया है। उन्होंने
जीना सीख लिया है।
अपने बच्चों के लिए। अपने
अधूरे सपनों के लिए। और
उन तमाम स्त्रियों के
लिए, जिन्हें यह समाज अक्सर
कमजोर समझ लेता है।
अंत में उनकी लिखी
ये पंक्तियां मानो पूरे संघर्ष
का सार बन जाती
हैं — “सफर कठिन था
मगर हौसलों ने हार नहीं
मानी, मैं मां थी
साहब… इसलिए जिंदगी फिर संभाल ली…”.












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