मौत के मुहाने पर तीर्थनगरियां, सिस्टम को अगली लाशों का इंतजार?
दिल्ली में
21 जिंदगियां
बुझीं,
लेकिन
धार्मिक
शहरों
में
सुरक्षा
खामियों
पर
अब
भी
नहीं
टूटी
प्रशासन
की
नींद
दिल्ली के
‘फ्लूरिश
स्टे’
अग्निकांड
ने
खोली
व्यवस्था
की
पोल,
वाराणसी-अयोध्या-प्रयागराज
में
होटल,
धर्मशालाओं
और
पेइंग
गेस्ट
हाउसों
की
सुरक्षा
पर
बड़े
सवाल
सुरेश गांधी
वाराणसी। दिल्ली के मालवीय नगर
स्थित ‘फ्लूरिश स्टे’ में लगी आग
में 21 लोगों की मौत केवल
एक दुर्घटना नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का
भयावह दस्तावेज है। जांच में
सामने आया कि जिस
प्रतिष्ठान को महज छह
कमरों के बेड एंड
ब्रेकफास्ट (बी एंड बी)
संचालन की अनुमति थी,
वहां 25 कमरे चलाए जा
रहे थे। मालिक को
परिसर में रहना था,
लेकिन वह मौजूद नहीं
था। घरेलू बिजली-पानी के कनेक्शन
पर व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थीं।
फायर एनओसी नहीं थी, आपातकालीन
निकास नहीं था और
छत तक पहुंचने का
रास्ता भी बंद था।
यह सब प्रशासनिक एजेंसियों
की आंखों के सामने होता
रहा और आखिरकार 21 लोग
जिंदा जल गए। दिल्ली
की यह त्रासदी अब
केवल राजधानी की कहानी नहीं
रह गई है। यह
वाराणसी, अयोध्या, प्रयागराज, मथुरा, वृंदावन और हरिद्वार जैसे
उन धार्मिक नगरों के लिए भी
चेतावनी है, जहां हर
दिन लाखों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते
हैं, लेकिन उनकी सुरक्षा व्यवस्था
कितनी मजबूत है, इसका कोई
स्पष्ट जवाब नहीं है।
खास यह है कि हादसे के
बाद जांच होती है,
हर बार दोषी पकड़े
जाते हैं, हर बार
सुधार के दावे होते
हैं। फिर भी आग
लौट आती है। आखिर
कब तक लाशें गिनकर
जागेगा सिस्टम?
बी एंड बी नीति का उद्देश्य और जमीन की हकीकत
कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 से पहले दिल्ली
में कमरों की कमी को
देखते हुए 2007 में बेड एंड
ब्रेकफास्ट (बी एंड बी)
नीति लागू की गई
थी। मकसद था कि
लोग अपने घरों के
कुछ कमरे पर्यटकों को
किराये पर दें। नियम
स्पष्ट थे—मालिक उसी
मकान में रहेगा, अधिकतम
छह कमरे ही किराये
पर दिए जा सकेंगे
और कुल कमरों के
दो-तिहाई से अधिक हिस्से
का व्यावसायिक उपयोग नहीं होगा। 2008 में
नियम और कड़े किए
गए ताकि केवल वास्तविक
मालिक ही इस योजना
का लाभ उठा सकें।
2025 तक दिल्ली पुलिस की अनुमति और
सत्यापन भी अनिवार्य था।
पुलिस न केवल दस्तावेजों
की जांच करती थी
बल्कि भौतिक सत्यापन भी करती थी।
उद्देश्य यह था कि
कोई संदिग्ध व्यक्ति या फर्जी संचालक
इस व्यवस्था का दुरुपयोग न
कर सके। लेकिन समय
के साथ निगरानी ढीली
पड़ती गई और कई
स्थानों पर बी एंड
बी व्यवस्था छोटे होटलों में
बदलती चली गई। दिल्ली
का ताजा हादसा इसी
विफल निगरानी का परिणाम माना
जा रहा है।
वाराणसी में भी तेजी से बढ़ा पेइंग गेस्ट हाउस मॉडल
महाकुंभ के बाद काशी
में पर्यटकों और श्रद्धालुओं की
संख्या तेजी से बढ़ी।
होटल क्षमता कम पड़ने लगी
तो पेइंग गेस्ट हाउसों को प्रोत्साहन मिला।
आज गोदौलिया, दशाश्वमेध, सोनारपुरा, अस्सी, लंका, शिवाला, नगवा, रविंद्रपुरी और काशी विश्वनाथ
धाम के आसपास बड़ी
संख्या में मकानों को
पर्यटक आवास में बदला
जा चुका है। सैकड़ों
पेइंग गेस्ट हाउस पंजीकृत हैं
और बड़ी संख्या में
ऐसे प्रतिष्ठान भी हैं जो
विभिन्न श्रेणियों में संचालित हो
रहे हैं। सवाल यह
नहीं कि वे वैध
हैं या अवैध, बल्कि
यह है कि क्या
सभी स्थानों पर सुरक्षा मानकों
का पालन हो रहा
है? काशी की गलियों
में आधी रात को
आग लगी तो क्या
होगा? यह सवाल अब
पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण
हो गया है। पुरानी
काशी की गलियां इतनी
संकरी हैं कि कई
स्थानों पर दोपहिया वाहन
निकालना भी मुश्किल होता
है। गोदौलिया, चौक, विश्वनाथ गली,
दशाश्वमेध और आसपास के
क्षेत्रों में यदि किसी
बहुमंजिला भवन में आग
लगती है तो दमकल
वाहनों की पहुंच अपने
आप में चुनौती बन
सकती है।
सवाल कई हैं—
कितने होटलों और गेस्ट हाउसों
का नियमित फायर ऑडिट होता
है? कितने प्रतिष्ठानों में कार्यशील अग्निशमन
यंत्र हैं? कितनों के
पास वैकल्पिक निकास मार्ग है? कितने भवन
स्वीकृत मानचित्र के अनुरूप हैं?
कितने स्थानों पर क्षमता से
अधिक लोगों को ठहराया जा
रहा है? इन सवालों
के जवाब जितने स्पष्ट
होने चाहिए, उतने दिखाई नहीं
देते।
अयोध्या में विकास की रफ्तार, सुरक्षा की रफ्तार कितनी?
राम मंदिर के
उद्घाटन के बाद अयोध्या
में होटल और गेस्ट
हाउस उद्योग ने अभूतपूर्व विस्तार
देखा है। हजारों नए
कमरे बने हैं। नए
होटल, धर्मशालाएं और होम-स्टे
लगातार खुल रहे हैं।
लेकिन जिस गति से
निर्माण हुआ है, क्या
उसी गति से सुरक्षा
तंत्र विकसित हुआ है? विशेषज्ञों
का मानना है कि तीर्थनगरी
में बढ़ती भीड़, बहुमंजिला निर्माण और सीमित शहरी
ढांचे को देखते हुए
नियमित सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य होना
चाहिए। छोटी चूक भी
बड़े हादसे का कारण बन
सकती है।
ये हादसे नहीं, व्यवस्था की हत्याएं हैं
दिल्ली का अग्निकांड कोई
पहला मामला नहीं है। 1997 में
उपहार सिनेमा अग्निकांड में 59 लोगों की मौत। 2011 में
कोलकाता के एएमआरआई अस्पताल
में 90 से अधिक लोगों
की मौत। 2019 में करोलबाग होटल
अग्निकांड में 17 लोगों की मौत। 2019 में
अनाज मंडी फैक्ट्री अग्निकांड
में 43 लोगों की मौत। 2022 में
मुंडका फैक्ट्री हादसे में दर्जनों लोगों
की मौत। 2026 में दिल्ली के
फ्लूरिश स्टे में 21 लोगों
की मौत। हर जांच
रिपोर्ट में लगभग एक
जैसी बातें सामने आईं—अवैध निर्माण,
बंद निकास, सुरक्षा मानकों की अनदेखी और
प्रशासनिक ढिलाई।
कागजों में जांच, जमीन पर धंधा
हर बड़े हादसे
के बाद वही क्रम
दोहराया जाता है— मजिस्ट्रेटी
जांच. एफआईआर. निलंबन. मुआवजे
की घोषणा. विशेष जांच अभियान. लेकिन कुछ
महीनों बाद सब कुछ
सामान्य हो जाता है।
नियम फिर टूटते हैं,
निरीक्षण फिर कमजोर पड़
जाते हैं और अगली
त्रासदी की जमीन तैयार
होने लगती है। यही कारण
है कि दिल्ली की
आग के बाद सबसे
बड़ा सवाल किसी एक
होटल का नहीं, बल्कि
पूरे सिस्टम का है।
धार्मिक शहरों में खतरा अधिक क्यों?
धार्मिक नगरों में जोखिम कई
गुना बढ़ जाता है
क्योंकि— त्योहारों और विशेष आयोजनों
में क्षमता से कई गुना
अधिक भीड़ उमड़ती है।
पुराने शहरों की गलियां संकरी
और घनी आबादी वाली
हैं। बड़ी संख्या में
आवासीय भवनों का व्यावसायिक उपयोग
हो रहा है। आपदा
की स्थिति में निकासी और
बचाव अभियान जटिल हो जाता
है।
पड़ताल
दिल्ली में 21 लोग केवल आग
से नहीं मरे। वे
नियमों की अनदेखी, कमजोर
निगरानी, बंद निकास, सुरक्षा
मानकों की अवहेलना और
प्रशासनिक उदासीनता के शिकार हुए।
यदि वाराणसी, अयोध्या, प्रयागराज और अन्य तीर्थनगरियों
में होटल, धर्मशालाओं, होम-स्टे और
पेइंग गेस्ट हाउसों का स्वतंत्र और
व्यापक सुरक्षा ऑडिट आज नहीं
हुआ, तो अगली बड़ी
खबर किसी और शहर
से आ सकती है।
सवाल यह नहीं कि
अगला हादसा होगा या नहीं।
सवाल यह है कि
क्या सिस्टम उसके होने का
इंतजार कर रहा है?
चेतावनी देते आंकड़े : 29 साल में बड़े अग्निकांड, सैकड़ों मौतें
वर्ष घटना मृतक
1997 उपहार
सिनेमा, दिल्ली 59
2011 एएमआरआई
अस्पताल, कोलकाता 90+
2019 होटल अर्पित पैलेस, दिल्ली 17
2019 अनाज मंडी फैक्ट्री, दिल्ली 43
2022 मुंडका
फैक्ट्री दर्जनों
2026 फ्लूरिश
स्टे, दिल्ली 21

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