लखनऊ अग्निकांड : रिश्वत की इमारत में जिंदा जल गए सपने…
लखनऊ के अलीगंज में जो कुछ हुआ, उसे महज एक अग्निकांड कह देना उन मासूम जिंदगियों के साथ अन्याय होगा, जिनकी सांसें धुएं में घुट गईं। यह हादसा केवल आग से नहीं, बल्कि वर्षों से पल रही प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट तंत्र और नियमों की सुनियोजित हत्या से पैदा हुआ है। जिस इमारत में भविष्य गढ़ने की उम्मीद लेकर युवा पहुंचे थे, वह देखते ही देखते मौत की कैद में बदल गई। बाहर निकलने का रास्ता नहीं था, सुरक्षा के इंतजाम नहीं थे, लेकिन कारोबार पूरे शोर-शराबे के साथ चल रहा था। सवाल यह नहीं कि आग कैसे लगी; सवाल यह है कि उसे इतना भयावह बनने की छूट किसने दी? यदि एक आवासीय भवन को व्यावसायिक परिसर में बदलने, फायर सुरक्षा नियमों की अनदेखी करने और दर्जनों युवाओं की जान जोखिम में डालने के बावजूद वर्षों तक कोई जिम्मेदार नहीं जागा, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि व्यवस्था का सामूहिक अपराध है। अब गिरफ्तारी, निलंबन और मुआवजे से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करनी होगी। क्योंकि हर बार हादसे के बाद संवेदनाएं व्यक्त करना आसान है, लेकिन अगला हादसा रोकने के लिए व्यवस्था का चरित्र बदलना ही असली न्याय होगा। मतलब साफ है लखनऊ अग्निकांड ने सिर्फ 15 जिंदगियां नहीं छीनीं, बल्कि भ्रष्ट तंत्र, नियमों की खरीद-फरोख्त और सरकारी लापरवाही की पूरी इमारत को बेनकाब कर दिया। अब सवाल सिर्फ शॉर्ट सर्किट का नहीं, उस सिस्टम का है जिसने रिश्वत के तारों से मौत का जाल बुना
सुरेश गांधी
जी हां, यह आग शॉर्ट सर्किट
से नहीं, व्यवस्था के चरित्र में
लगे शॉर्ट सर्किट से भड़की है।
लखनऊ के अलीगंज में
जली वह इमारत केवल
ईंट, सीमेंट और लोहे का
ढांचा नहीं थी। वह
भ्रष्टाचार, प्रशासनिक उदासीनता और नियमों की
खुलेआम नीलामी का जीवित प्रमाण
थी। सोमवार को जब आग
की लपटें उस भवन को
निगल रही थीं, तब
केवल कमरे नहीं जल
रहे थे; देश के
उन सपनों की भी चिताएं
सज रही थीं जिन्हें
लेकर सैकड़ों किलोमीटर दूर से आए
युवा अपने भविष्य का
निर्माण करने पहुंचे थे।
इन मृतकों की उम्र बीस
से चौबीस वर्ष के बीच
थी। कोई 3डी गेम
डेवलपर बनने का सपना
देख रहा था, कोई
एनीमेशन की दुनिया में
पहचान बनाना चाहता था, कोई अपने
परिवार की पहली पीढ़ी
था जो उच्च तकनीकी
शिक्षा लेकर गरीबी का
चक्र तोड़ना चाहता था। लेकिन उनकी
मंजिल नौकरी नहीं, मौत बन गई।
प्रश्न यह नहीं है
कि आग कैसे लगी।
प्रश्न यह है कि
आग लगने के बाद
बचने का कोई रास्ता
क्यों नहीं था? किसने
उस इमारत को रिहायशी नक्शे
पर व्यावसायिक गतिविधियों का अड्डा बनने
दिया? किस अधिकारी ने
आंखें मूंद लीं? किसने
फायर एनओसी के बिना संचालन
होने दिया? किसने एक ही सीढ़ी
वाले भवन में दर्जनों
छात्रों और कर्मचारियों को
बैठने की अनुमति दी?
किसने इमरजेंसी एग्जिट के बिना क्लासें
चलने दीं? यदि इन
प्रश्नों के उत्तर केवल
भवन मालिक, स्टूडियो संचालक और मैनेजर तक
सीमित कर दिए गए,
तो यह न्याय नहीं
होगा। क्योंकि जिस व्यवस्था की
जेब में रिश्वत चली
जाती है, वहां मौत
का वारंट पहले ही लिख
दिया जाता है। हर
बड़े हादसे के बाद वही
क्रम दोहराया जाता है—मुख्यमंत्री
का दौरा, एसआईटी का गठन, अधिकारियों
का निलंबन, मुआवजे की घोषणा और
फिर धीरे-धीरे सब
कुछ फाइलों में दफन। लेकिन
जिन परिवारों के घरों में
अब बेटे-बेटियां कभी
वापस नहीं लौटेंगे, उनके
लिए दो लाख रुपये
की सहायता किसी जीवन का
विकल्प नहीं हो सकती।
यह केवल अग्निकांड
नहीं, प्रशासनिक हत्या का मामला है।
यदि किसी भवन में
इमरजेंसी एग्जिट नहीं है, यदि
फायर सेफ्टी सिस्टम नहीं है, यदि
ऑटोमैटिक गेट लोगों को
बाहर निकलने से रोक देता
है, यदि भवन का
उपयोग स्वीकृत नक्शे के विपरीत किया
जा रहा है और
इसके बावजूद वर्षों तक कोई कार्रवाई
नहीं होती, तो यह दुर्घटना
नहीं बल्कि संस्थागत अपराध है। आज बुलडोजर
चलाने की मांग बहुत
लोग कर रहे हैं।
लेकिन बुलडोजर केवल जली हुई
इमारत पर चले, इससे
न्याय पूरा नहीं होगा।
बुलडोजर उस मानसिकता पर
चलना चाहिए जिसने नियमों को बेच दिया।
उन अधिकारियों की जवाबदेही तय
होनी चाहिए जिनकी कलम के नीचे
अवैध निर्माण वैध बनते रहे।
जिन निरीक्षकों ने रिपोर्टों में
सब कुछ ठीक लिखा,
जिन विभागों ने आंखें बंद
रखीं, जिन लोगों ने
सुविधा शुल्क लेकर मौत की
इमारत को खड़ा रहने
दिया—उन सबकी जवाबदेही
अदालत के कठघरे तक
पहुंचनी चाहिए।
यह भी दुर्भाग्य
है कि भारत में
हर बड़ी त्रासदी के
बाद नियमों की याद आती
है। कुछ दिनों तक
अभियान चलता है, नोटिस
जारी होते हैं, निरीक्षण
होते हैं, फिर सब
कुछ सामान्य हो जाता है।
लेकिन अगली आग, अगला
पुल, अगली इमारत और
अगली मौतें फिर उसी चक्र
को दोहराती हैं। सवाल केवल
लखनऊ का नहीं है।
देश के लगभग हर
शहर में हजारों ऐसी
इमारतें हैं जहां कोचिंग
सेंटर, लाइब्रेरी, हॉस्टल, अस्पताल, गेमिंग स्टूडियो और व्यावसायिक प्रतिष्ठान
बिना पर्याप्त अग्नि सुरक्षा के संचालित हो
रहे हैं। क्या प्रशासन
अगले हादसे का इंतजार कर
रहा है? ऊपर वाले
की लाठी में आवाज
नहीं होती। लेकिन जब न्याय प्रकृति
करती है तो सबसे
पहले अहंकार टूटता है। यदि इस
घटना के बाद भी
व्यवस्था नहीं बदली, यदि
जिम्मेदार लोगों को केवल निलंबन
और औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रखा
गया, यदि पूरे प्रदेश
में सुरक्षा मानकों की व्यापक समीक्षा
नहीं हुई, तो यह
मान लेना चाहिए कि
हमने इन 15 युवाओं की मौत से
भी कोई सबक नहीं
सीखा।
उन जली हुई
लाशों से एक ही
आवाज उठ रही है—हमें मुआवजा नहीं,
जवाब चाहिए। हमें संवेदना नहीं,
जवाबदेही चाहिए। हमें भाषण नहीं,
ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें किसी मां को
अपने बच्चे का जला हुआ
शरीर पहचानने के लिए अस्पतालों
के चक्कर न लगाने पड़ें।
इतिहास गवाह है कि सभ्यताएं
बाहरी आक्रमणों से कम और
भीतर की सड़ांध से
अधिक नष्ट होती हैं।
यदि भ्रष्टाचार, लापरवाही और नियमों की
खरीद-फरोख्त इसी तरह जारी
रही, तो हर शहर
में ऐसी इमारतें खड़ी
होंगी जो बाहर से
आधुनिक दिखेंगी, लेकिन भीतर मौत का
कुआं साबित होंगी। लखनऊ का यह
अग्निकांड केवल 15 युवाओं की मृत्यु नहीं
है। यह उस व्यवस्था
के चेहरे पर लगा ऐसा
कालिख का धब्बा है
जिसे केवल जांच आयोगों
से नहीं, कठोर दंड, पारदर्शी
जवाबदेही और ईमानदार प्रशासनिक
सुधारों से ही मिटाया
जा सकता है। क्योंकि
हादसे ईश्वर नहीं करवाता... हादसे
अक्सर वही व्यवस्था करवाती
है, जो रिश्वत के
बदले मौत को भी
अनुमति-पत्र जारी कर
देती है।
जहां सपने धुएं में बदल गए
अलीगंज के पुरनिया इलाके
में मंगलवार की सुबह भी
धुएं की हल्की गंध
हवा में तैर रही
थी। जिस बहुमंजिला इमारत
में सोमवार दोपहर तक कंप्यूटर स्क्रीन
पर भविष्य के सपने डिजाइन
किए जा रहे थे,
वहां अब जले हुए
शीशे, मुड़े हुए लोहे, राख
और सन्नाटा पसरा था। चारों
ओर पुलिस का पहरा था,
दमकल की गाड़ियां अब
भी खड़ी थीं और
मलबे के बीच जांच
एजेंसियों की टीम हर
उस सुराग को तलाश रही
थी, जो इस भयावह
त्रासदी की असल वजह
तक पहुंचा सके। घटनास्थल के
बाहर सबसे दर्दनाक दृश्य
उन परिवारों का था, जिनकी
आंखें हर निकलते स्ट्रेचर
पर अपने बेटे या
बेटी को तलाश रही
थीं। किसी के हाथ
में मोबाइल था, जिसमें आखिरी
बार आए कॉल की
घंटी अब भी सुरक्षित
थी। कोई अस्पतालों के
चक्कर लगा रहा था
तो कोई पुलिस अधिकारियों
से सिर्फ एक सवाल पूछ
रहा था—"मेरा बच्चा कहां
है?"
चीखते रहे बच्चे, मदद
करों...
स्थानीय लोगों के अनुसार, आग
लगने के कुछ ही
मिनटों में पूरा भवन
घने धुएं से भर
गया। अंदर मौजूद युवक-युवतियां पहले नीचे उतरने
का प्रयास करते रहे, लेकिन
एकमात्र सीढ़ी धुएं और लपटों
की चपेट में आ
गई। इसके बाद कई
लोग बाथरूम और कमरों में
खुद को बंद कर
मदद का इंतजार करने
लगे। बाहर मौजूद लोगों
ने खिड़कियों से मदद के
लिए पुकारते युवाओं की आवाजें सुनीं,
लेकिन आग की तीव्रता
इतनी अधिक थी कि
तत्काल राहत पहुंचाना आसान
नहीं था। दमकल कर्मियों ने बताया कि
सबसे बड़ी चुनौती भवन
के भीतर प्रवेश करना
था। धुएं के कारण
दृश्यता लगभग समाप्त हो
चुकी थी। कई स्थानों
पर दीवारें तोड़कर अंदर फंसे लोगों
तक पहुंचना पड़ा। कुछ युवाओं को
गंभीर अवस्था में बाहर निकाला
गया, जबकि कई लोग
तब तक दम तोड़
चुके थे। जांच के
दौरान सामने आया कि जिस
भवन को मूल रूप
से आवासीय उपयोग के लिए स्वीकृति
मिली थी, उसमें बाद
में कोचिंग सेंटर, एनीमेशन स्टूडियो, लाइब्रेरी और अन्य व्यावसायिक
गतिविधियां संचालित होने लगीं। प्रारंभिक
जांच में इमरजेंसी एग्जिट,
पर्याप्त अग्निशमन उपकरण और वैकल्पिक निकास
जैसी मूलभूत सुरक्षा व्यवस्थाओं का अभाव भी
सामने आया है। इसी
आधार पर पुलिस ने
भवन स्वामी, स्टूडियो संचालक और प्रबंधन से
जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई
शुरू की है, जबकि
संबंधित विभागों के कुछ अधिकारियों
को भी निलंबित किया
गया है।
जिम्मेदारी उन सभी तय हो जिन्होंने नियमों
को कागजों तक सीमित रहने दिया…
मुख्यमंत्री ने घटनास्थल और अस्पताल पहुंचकर घायलों का हाल जाना तथा विशेष जांच दल (एसआईटी) को सात दिनों में विस्तृत रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। प्रशासन का दावा है कि दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होगी, लेकिन स्थानीय नागरिकों का कहना है कि यदि समय रहते नियमों का पालन कराया गया होता, तो शायद इतने घरों के चिराग एक साथ नहीं बुझते। अब यह इमारत केवल एक हादसे की जगह नहीं, बल्कि उस चेतावनी का प्रतीक बन चुकी है कि शहरों में तेजी से बढ़ रही व्यावसायिक गतिविधियों के बीच सुरक्षा मानकों की अनदेखी कितनी भयावह कीमत वसूल सकती है। जांच आगे बढ़ रही है, लेकिन इस मलबे के बीच अब भी सबसे बड़ा सवाल खड़ा है—क्या यह त्रासदी टाली जा सकती थी? यदि जवाब "हां" है, तो फिर इस हादसे की जिम्मेदारी केवल आग पर नहीं, बल्कि उन सभी पर भी तय होनी चाहिए जिन्होंने नियमों को कागजों तक सीमित रहने दिया।


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