Sunday, 28 June 2026

नौनिहालों के सपनों को नए पंख : बदलते विद्यालय, बदलता उत्तर प्रदेश का बचपन

नौनिहालों के सपनों को नए पंख : बदलते विद्यालय, बदलता उत्तर प्रदेश का बचपन 

किसी भी राज्य का भविष्य उसके विश्वविद्यालयों में नहीं, बल्कि उन प्राथमिक विद्यालयों में आकार लेता है, जहां पहली बार किसी बच्चे के हाथ में किताब, स्लेट या पेंसिल थमाई जाती है। यही वह स्थान है, जहां अक्षरों से परिचय के साथ सपनों की नींव रखी जाती है। उत्तर प्रदेश में भी पिछले एक दशक के दौरान प्राथमिक शिक्षा का परिदृश्य तेजी से बदला है। एक समय था जब अनेक सरकारी विद्यालय जर्जर भवनों, अधूरी सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और घटती छात्र उपस्थिति की पहचान बन चुके थे। अभिभावकों का भरोसा कमजोर पड़ रहा था और बड़ी संख्या में बच्चे पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते थे। लेकिन समय के साथ तस्वीर बदलने लगी। विद्यालयों का कायाकल्प हुआ, आधारभूत सुविधाओं का विस्तार हुआ, स्कूल चलो अभियान ने नए बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा और डिजिटल निगरानी ने ड्रॉपआउट पर नियंत्रण की दिशा में नई राह दिखाई। आज उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े स्कूली शिक्षा तंत्र का संचालन कर रहा है। हालांकि, यह यात्रा अभी अधूरी है, क्योंकि अब चुनौती केवल बच्चों को विद्यालय तक लाने की नहीं, बल्कि उन्हें ऐसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की है जो जीवनभर उनके व्यक्तित्व, कौशल और भविष्य की मजबूत आधारशिला बन सके 

सुरेश गांधी

उत्तर प्रदेश की पहचान कभी ऐसे राज्य के रूप में होती थी, जहां प्राथमिक विद्यालयों में नामांकन तो होता था, लेकिन बच्चों का नियमित स्कूल पहुंचना बड़ी चुनौती था। अनेक विद्यालयों में शिक्षक कम थे, भवन जर्जर थे, शौचालय और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं। कई बच्चे कक्षा 1 में प्रवेश लेते थे, लेकिन कक्षा 5 तक पहुंचने से पहले ही पढ़ाई छोड़ देते थे। पिछले लगभग नौ वर्षों में यह तस्वीर काफी बदली है। सरकारी दावों, यूडीआईएसई, समग्र शिक्षा अभियान और विभिन्न स्वतंत्र सर्वेक्षणों के अनुसार विद्यालयों के आधारभूत ढांचे, नामांकन और ड्रॉपआउट नियंत्रण में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि शिक्षा केवल बच्चों को स्कूल तक लाने का नाम नहीं, बल्कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का दायित्व भी है। यही वह कसौटी है जिस पर आने वाले वर्षों में उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक मूल्यांकन होगा।

2017 से पहले प्रदेश के हजारों प्राथमिक विद्यालय अनेक समस्याओं से जूझ रहे थे। अनेक विद्यालयों में केवल एक शिक्षक पूरे स्कूल का संचालन करता था। कई स्कूलों में बिजली, पेयजल, शौचालय और फर्नीचर जैसी सुविधाएं नहीं थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों की उपस्थिति कम रहती थी। प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर राष्ट्रीय औसत से अधिक थी। बड़ी संख्या में बच्चे मजदूरी, पारिवारिक जिम्मेदारियों या सामाजिक कारणों से स्कूल छोड़ देते थे। तत्कालीन योजनाओं में स्कूल से बाहर बच्चों की पहचान कर उन्हें पुनः विद्यालय से जोड़ने पर विशेष बल दिया जाता था, जिससे स्पष्ट था कि समस्या गंभीर थी। प्रदेश सरकार ने प्राथमिक शिक्षा को सुधारने के लिए कई बड़े अभियान शुरू किए। ऑपरेशन कायाकल्प अभियान के अंतर्गत लाखों विद्यालयों में नए भवन, शौचालय, पेयजल, बिजली, बाउंड्रीवाल, स्मार्ट क्लास, डेस्क-बेंच, खेल सामग्री जैसी आधारभूत सुविधाओं का विस्तार किया गया। सरकार का दावा है कि अधिकांश सरकारी विद्यालय अब निर्धारित बुनियादी मानकों तक पहुंच चुके हैं।

हर वर्ष विशेष अभियान चलाकर उन बच्चों की पहचान की जाती है जो स्कूल नहीं जा रहे हैं। शिक्षकों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और ग्राम पंचायतों की मदद से ऐसे बच्चों का पुनः नामांकन कराया जाता है। यूडीआईएसई शारदा पोर्टल और अन्य डिजिटल प्रणालियों के माध्यम से बच्चों की उपस्थिति, नामांकन और ड्रॉपआउट पर पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित निगरानी संभव हुई है। उत्तर प्रदेश आज देश का सबसे बड़ा स्कूली शिक्षा तंत्र संचालित करता है। प्रदेश में स्कूल शिक्षा (सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी) में कुल नामांकन लगभग 4 करोड़ से अधिक विद्यार्थियों का है। केवल सरकारी बेसिक विद्यालयों में लगभग दो करोड़ के आसपास बच्चे अध्ययनरत हैं। हर वर्ष लाखों नए बच्चों का कक्षा 1 में प्रवेश कराया जाता है।

हाल के यूडीआईएसई आंकड़ों के अनुसार प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है। कक्षा 3 से 5 के स्तर पर कई वर्षों की तुलना में अत्यधिक सुधार दर्ज हुआ। माध्यमिक स्तर पर भी ड्रॉपआउट दर पहले की तुलना में घटी है, हालांकि यह चुनौती अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। आज सरकारी विद्यालयों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल ड्रॉपआउट नहीं, बल्कि घटती छात्र संख्या भी है। कई ग्रामीण विद्यालयों में छात्रों की संख्या बहुत कम हो गई है। इसका एक बड़ा कारण है निजी विद्यालयों का बढ़ता आकर्षण, कम जन्मदर, शहरों की ओर पलायन। इसी कारण सरकार ने कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों के युग्मीकरण (पेयरिंग) की नीति भी अपनाई, जिस पर व्यापक बहस हुई। सरकार का कहना है कि इससे स्कूल बंद नहीं होंगे बल्कि संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या केवल भवन बन जाने से शिक्षा सुधर जाती है? विद्यालय में रंगीन दीवारें, स्मार्ट क्लास, डेस्क-बेंच, शौचालय जरूरी हैं, लेकिन पर्याप्त नहीं। यदि कक्षा 5 का विद्यार्थी कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पा रहा, यदि गणित के सामान्य प्रश्न हल नहीं कर पा रहा, तो शिक्षा व्यवस्था को अभी लंबा सफर तय करना है।

हालांकि स्वतंत्र आकलनों में उत्तर प्रदेश के बच्चों की पढ़ने और गणित की क्षमता में पहले की तुलना में सुधार भी दर्ज किया गया है। फिर भी सीखने की गुणवत्ता को और मजबूत करना आवश्यक है। अब प्राथमिक शिक्षा की अगली लड़ाई इन मुद्दों पर होगी गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, डिजिटल शिक्षा, प्रशिक्षित शिक्षक, बच्चों की नियमित उपस्थिति, आधारभूत साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान, कक्षा 8 के बाद ड्रॉपआउट रोकना। मतलब साफ है उत्तर प्रदेश की प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था ने पिछले वर्षों में निश्चित रूप से लंबी दूरी तय की है। जर्जर भवनों से आधुनिक कक्षाओं तक, ड्रॉपआउट से डिजिटल ट्रैकिंग तक और न्यूनतम सुविधाओं से ऑपरेशन कायाकल्प तक परिवर्तन दिखाई देता है। यह बदलाव केवल सरकारी दावों तक सीमित नहीं, बल्कि उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों में भी परिलक्षित होता है। फिर भी शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल बच्चों का नामांकन नहीं, बल्कि उन्हें ऐसा ज्ञान, कौशल और संस्कार देना है जिससे वे भविष्य के सक्षम नागरिक बन सकें। यदि उत्तर प्रदेश अब सीखने की गुणवत्ता, शिक्षक प्रशिक्षण और सरकारी विद्यालयों में समाज का विश्वास और मजबूत करने में सफल होता है, तो यह परिवर्तन केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का होगा।

एक पाती, अनेक संदेश : शिक्षा को जनआंदोलन बनाने का आह्वान

किसी राज्य का भविष्य केवल उसके बजट, सड़कों या उद्योगों से तय नहीं होता, बल्कि उन विद्यालयों से तय होता है, जहां नन्हे हाथ पहली बार कलम थामते हैं। इसलिए जब नए शैक्षणिक सत्र के आरंभ से पहले प्रदेश का मुख्यमंत्री स्वयं बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों के नाम पाती लिखता है, तो उसका महत्व एक सरकारी औपचारिकता से कहीं अधिक हो जाता है। यह केवल संदेश नहीं, बल्कि शिक्षा को समाज के केंद्र में स्थापित करने का एक व्यापक प्रयास है। मुख्यमंत्री की पाती का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें शिक्षा को केवल विद्यालयों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे पूरे समाज का दायित्व बताया गया है। "स्कूल चलो अभियान" को सरकारी कार्यक्रम मानकर जनआंदोलन बनाने की अपील इस सोच को स्पष्ट करती है कि जब तक समाज स्वयं प्रत्येक बच्चे की शिक्षा की जिम्मेदारी नहीं लेगा, तब तक शत-प्रतिशत साक्षरता और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य अधूरा रहेगा। यह पाती ऐसे समय आई है, जब प्रदेश में नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने जा रहा है और सरकार ने 15 जुलाई तक विशेष प्रवेश अभियान चलाने का निर्णय लिया है। ऐसे में यह संदेश केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि प्रशासन, शिक्षकों और अभिभावकों के लिए एक स्पष्ट दिशा भी है कि कोई भी बच्चा विद्यालय से वंचित रहे। विशेष रूप से ड्रॉपआउट बच्चों को फिर से विद्यालय से जोड़ने का आह्वान इस बात का संकेत है कि सरकार अब केवल नामांकन नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे की निरंतर शिक्षा सुनिश्चित करना चाहती है। मुख्यमंत्री ने अपनी पाती में गुरुकुल परंपरा, संस्कार, चरित्र निर्माण और राष्ट्रनिर्माण का उल्लेख किया है। यह बताता है कि सरकार शिक्षा को केवल परीक्षा और रोजगार का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देख रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय की यह सोच नई शिक्षा नीति की भावना से भी मेल खाती है। इस पत्र का एक महत्वपूर्ण संदेश अभिभावकों के लिए भी है। बच्चों का मूल्यांकन केवल परीक्षा के अंकों से नहीं, बल्कि उनकी जिज्ञासा, मेहनत और नियमित विद्यालय जाने की आदत से करने की अपील शिक्षा के मानवीय पक्ष को सामने लाती है। आज जब अंकों की होड़ बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ा रही है, तब यह संदेश संतुलित और समयानुकूल प्रतीत होता है। साथ ही, इस पाती में ऑपरेशन कायाकल्प, मिशन प्रेरणा, निपुण भारत, बाल वाटिका और मध्याह्न भोजन जैसी योजनाओं का उल्लेख यह भी दर्शाता है कि सरकार सरकारी विद्यालयों में हुए बदलावों के प्रति समाज का विश्वास मजबूत करना चाहती है। पिछले कुछ वर्षों में विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं में व्यापक सुधार हुआ है, लेकिन अब सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा की गुणवत्ता, बच्चों की नियमित उपस्थिति और सीखने के स्तर को और बेहतर बनाने की है। निस्संदेह, मुख्यमंत्री की यह पहल प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। जब सर्वोच्च स्तर से शिक्षा को प्राथमिकता का संदेश जाता है, तो जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग और विद्यालयों की जवाबदेही स्वतः बढ़ जाती है। इससे अभियान को गति मिलने की संभावना भी बढ़ती है। मुख्यमंत्री की यह पाती केवल नए सत्र का स्वागत संदेश नहीं है। यह उस विचार का विस्तार है, जिसमें शिक्षा को सरकार की योजना नहीं, बल्कि समाज की साझा संस्कृति और सामूहिक जिम्मेदारी माना गया है। यदि यह संदेश केवल कागज तक सीमित रहकर गांव-गांव, घर-घर और प्रत्येक विद्यालय तक पहुंचे, तो इसका प्रभाव नामांकन बढ़ाने से कहीं अधिक व्यापक होगा। तब विद्यालय केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं, बल्कि संस्कार, समान अवसर और सशक्त भारत की नई आधारशिला बनेंगे। शिक्षा का वास्तविक उत्सव भी तभी होगा, जब प्रदेश का प्रत्येक बच्चा विद्यालय पहुंचे, सीखे, आगे बढ़े और अपने सपनों को साकार करने का अवसर पाए।

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