राम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है; इसलिए हर प्रश्न का उत्तर पारदर्शिता से देना होगा
गंगा, गीता,
राम
और
राष्ट्र—इन
पर
आंच
आई
तो
भारत
की
आत्मा
आहत
होगी
: स्वामी
जितेन्द्रानन्द
अयोध्या से
काशी-मथुरा
तक,
विश्वास
की
डोर
नहीं
टूटनी
चाहिए
श्रीराम की
मर्यादा
कहती
है—सत्य
सामने
आए,
दोषी
बचे
नहीं,
निर्दोष
झुके
नहीं
सनातन की
शक्ति
आस्था
है
और
आस्था
की
नींव
विश्वास
सत्य से
किसी
को
डरने
की
जरूरत
नहीं,
जांच
से
विश्वास
और
मजबूत
होगा
राम मंदिर
आंदोलन
की
सबसे
बड़ी
पूंजी
करोड़ों
श्रद्धालुओं
का
विश्वास
है
सुरेश गांधी
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि
तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को लेकर उठे
सवालों ने केवल मंदिर
प्रबंधन ही नहीं, बल्कि
करोड़ों रामभक्तों की भावनाओं और
विश्वास को भी चर्चा
के केंद्र में ला दिया
है। आरोपों, प्रत्यारोपों और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं
के बीच काशी के
प्रख्यात संत एवं अखिल भारतीय संत
समिति के महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानन्द
सरस्वती का मानना है
कि यह विवाद किसी
व्यक्ति या संस्था का
नहीं, बल्कि सनातन समाज की विश्वसनीयता
और आस्था से जुड़ा विषय
है। उनका कहना है
कि यदि समाज के
मन में शंका है
तो उसका समाधान आरोपों
से नहीं, बल्कि निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध जांच
से होना चाहिए। वे
मानते हैं कि श्रीराम
का जीवन स्वयं सत्य,
मर्यादा और उत्तरदायित्व का
संदेश देता है, इसलिए
राम के नाम पर
चलने वाली हर व्यवस्था
को भी इन्हीं मूल्यों
पर खरा उतरना होगा।
स्वामी जी का यह
भी कहना है कि
अयोध्या, काशी और मथुरा
केवल तीर्थ नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक
चेतना के आधार स्तंभ
हैं। ऐसे में इनसे
जुड़े हर निर्णय में
समाज का विश्वास सर्वोपरि
होना चाहिए। सीनियर पत्रकार सुरेश गांधी की विशेष बातचीत
में स्वामी जितेन्द्रानन्द सरस्वती ने आस्था, गंगा,
सनातन, पारदर्शिता, सामाजिक विश्वास और भविष्य की
चुनौतियों पर बेबाकी से
अपने विचार रखे. प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख
अंश:-
प्रश्न
: महाराज
जी,
अयोध्या
में
श्रीराम
जन्मभूमि
तीर्थ
क्षेत्र
ट्रस्ट
को
लेकर
उठे
विवाद
को
आप
किस
दृष्टि
से
देखते
हैं?
क्या
यह
केवल
आर्थिक
अनियमितताओं
के
आरोपों
तक
सीमित
है?
उत्तर
: मैं इसे केवल आर्थिक
प्रश्न नहीं मानता। यह
करोड़ों रामभक्तों की श्रद्धा, विश्वास
और समर्पण से जुड़ा विषय
है। जब कोई श्रद्धालु
रामलला के चरणों में
अपना अर्पण करता है, तो
वह केवल धन नहीं
देता, बल्कि अपनी आस्था समर्पित
करता है। इसलिए यदि
कोई आरोप सामने आता
है तो उसका निष्पक्ष
परीक्षण आवश्यक है। सत्य सामने
आने से ही समाज
का विश्वास और मजबूत होगा।
यदि कोई इसे केवल धन
या हिसाब-किताब का मामला मान
रहा है तो वह
इसकी गंभीरता को नहीं समझ
रहा। अयोध्या करोड़ों हिंदुओं की आस्था का
केंद्र है। वहाँ पर
चढ़ाया गया एक-एक
रुपया श्रद्धालुओं की भक्ति और
विश्वास का प्रतीक है।
इसलिए यदि किसी प्रकार
के आरोप सामने आते
हैं तो उनका निष्पक्ष,
पारदर्शी और समयबद्ध परीक्षण
होना चाहिए। सत्य सामने आएगा
तो श्रद्धा और मजबूत होगी।
यदि कोई दोषी है
तो उसे दंड मिलना
चाहिए और यदि आरोप
असत्य हैं तो संबंधित
लोगों का सम्मान भी
उसी दृढ़ता से पुनर्स्थापित होना
चाहिए।
प्रश्न
: आपने
कहा
कि
इस
पूरे
प्रकरण
में
पारदर्शिता
सबसे
बड़ा
उत्तर
है।
ऐसा
क्यों?
उत्तर
: क्योंकि विश्वास का निर्माण पारदर्शिता
से होता है। यदि
समाज के मन में
कोई शंका है तो
उसे दबाया नहीं जाना चाहिए,
बल्कि तथ्यों से उसका समाधान
होना चाहिए। धर्म का आधार
सत्य है। यदि हम
स्वयं सत्य और पारदर्शिता
के मार्ग पर चलेंगे तो
किसी विरोधी को समाज में
भ्रम फैलाने का अवसर नहीं
मिलेगा।
प्रश्न
: आपने
श्री
चंपत
राय
के
उस
निर्णय
का
स्वागत
किया
है,
जिसमें
उन्होंने
जांच
पूरी
होने
तक
अयोध्या
में
रहकर
सहयोग
करने
की
बात
कही
है।
इस
निर्णय
को
आप
कैसे
देखते
हैं?
उत्तर
: सार्वजनिक जीवन में नैतिक
उत्तरदायित्व और मर्यादा अत्यंत
महत्वपूर्ण है। यदि कोई
व्यक्ति स्वयं कहता है कि
वह हर जांच का
सामना करेगा और सत्य सामने
आने तक अपने दायित्व
से पीछे नहीं हटेगा,
हर प्रश्न का उत्तर देगा
तो यह स्वागतयोग्य है।
लेकिन अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों और
न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा।
यही कानूनसम्मत मार्ग है। मतलब साफ है सार्वजनिक जीवन में यह
संदेश भी महत्वपूर्ण है
कि समाज के सामने
उठे प्रश्नों से बचा नहीं
जाए।
प्रश्न
: क्या
आपको
लगता
है
कि
इस
विवाद
का
प्रभाव
काशी
और
मथुरा
जैसे
आस्था
के
विषयों
पर
भी
पड़
सकता
है?
उत्तर
: काशी, मथुरा और अयोध्या ना
ही केवल धार्मिक स्थल
नहीं हैं, बल्कि भारत
की सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक हैं।
समाज का विश्वास जितना
मजबूत होगा, इन विषयों पर
भी उतना ही सकारात्मक
वातावरण बनेगा। इसलिए आज सबसे बड़ा
दायित्व विश्वास को सुदृढ़ करना
है। वैसे भी श्रीराम का आंदोलन किसी
व्यक्ति या संस्था का
आंदोलन नहीं है। वह
भारत की सांस्कृतिक चेतना
का आंदोलन है। किसी भी
विवाद को उस महान
आंदोलन से जोड़कर नहीं
देखना चाहिए। हाँ, इतना अवश्य
है कि समाज के
विश्वास की रक्षा करना
हम सबका दायित्व है।
इसलिए पारदर्शिता जितनी अधिक होगी, राम
मंदिर के प्रति श्रद्धा
उतनी ही मजबूत होगी।
प्रश्न
: आपने
कई
बार
कहा
है
कि
गंगा,
गौ,
गीता
और
राम
भारत
की
सांस्कृतिक
पहचान
हैं।
वर्तमान
समय
में
इन
मूल्यों
की
रक्षा
कैसे
हो?
उत्तर
: केवल नारों से नहीं, बल्कि
आचरण से। यदि गंगा
को स्वच्छ रखना है तो
हमें अपने व्यवहार में
परिवर्तन लाना होगा। यदि
राम के आदर्शों की
बात करते हैं तो
सार्वजनिक जीवन में मर्यादा
और ईमानदारी भी दिखनी चाहिए।
समाज आदर्श देखकर प्रेरित होता है।
प्रश्न
: सोशल
मीडिया
पर
इस
पूरे
प्रकरण
को
लेकर
अनेक
प्रकार
की
बातें
कही
जा
रही
हैं।
आप
इसे
किस
रूप
में
देखते
हैं?
उत्तर
: आज सूचना बहुत तेज़ी से
फैलती है, लेकिन सत्य
हमेशा उतनी तेज़ी से
सामने नहीं आता। इसलिए
मैं सभी से आग्रह
करता हूँ कि अपुष्ट
सूचनाओं पर विश्वास न
करें। धैर्य रखें और प्रमाणित
तथ्यों की प्रतीक्षा करें।
प्रश्न
: कुछ
लोग
इसे
सनातन
के
विरुद्ध
अभियान
बताते
हैं,
जबकि
कुछ
इसे
सामान्य
प्रशासनिक
विवाद
मानते
हैं।
आपका
दृष्टिकोण
क्या
है?
उत्तर
: किसी भी घटना का
मूल्यांकन तथ्यों के आधार पर
होना चाहिए। यदि किसी को
किसी व्यापक षड्यंत्र का संदेह है,
तो उसे प्रमाणों के
साथ अपनी बात रखनी
चाहिए। बिना प्रमाण के
निष्कर्ष निकालना उचित नहीं। सनातन
की सबसे बड़ी शक्ति
सत्य, संयम और धैर्य
है। इतिहास बताता है कि सनातन
पर समय-समय पर
वैचारिक और सामाजिक चुनौतियाँ
आती रही हैं। लेकिन
किसी भी वर्तमान घटना
के बारे में व्यापक
निष्कर्ष निकालने से पहले तथ्य
और प्रमाण आवश्यक हैं। हमारी शक्ति
तथ्यों और सत्य में
होनी चाहिए, केवल भावनात्मक आरोपों
में नहीं।
प्रश्न
: आप
काशी
के
संत
हैं।
गंगा
और
सनातन
के
संबंध
को
आप
किस
प्रकार
देखते
हैं?
उत्तर
: गंगा केवल नदी नहीं,
हमारी सांस्कृतिक चेतना की धारा है।
अयोध्या मर्यादा
का प्रतीक है और सनातन
हमारी जीवन-पद्धति। जैसे
गंगा सबको जोड़ती है,
वैसे ही सनातन समाज
को जोड़ने का कार्य करता
है। यदि हम अपने
तीर्थों, मंदिरों और परंपराओं में
पारदर्शिता, सेवा और नैतिकता
को सर्वोच्च स्थान देंगे, तो समाज का
विश्वास और गहरा होगा।
मतलब साफ है यदि गंगा
निर्मल होगी, मंदिरों का प्रबंधन पारदर्शी
होगा और समाज में
नैतिकता मजबूत होगी, तभी भारत की
आध्यात्मिक शक्ति विश्व का मार्गदर्शन कर
सकेगी।
प्रश्न
: आज
के
युवाओं
को
क्या
संदेश
देना
चाहेंगे?
उत्तर
: भावनाएँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विवेक
भी उतना ही आवश्यक
है। किसी भी सूचना
को सत्य मानने से
पहले उसके स्रोत और
प्रमाण देखें। सनातन का संदेश अंधानुकरण
नहीं, बल्कि सत्य की खोज
है। सनातन का मूल संदेश
विवेक, संयम और सत्य
है। इन्हीं मूल्यों के साथ आगे
बढ़ना चाहिए।
प्रश्न
: अंत
में
करोड़ों
रामभक्तों
के
लिए
आपका
संदेश?
उत्तर
: मैं सभी से यही
कहूँगा कि श्रीराम का
जीवन हमें मर्यादा, सत्य
और न्याय का मार्ग दिखाता
है। यदि कोई प्रश्न
उठता है तो उसका
समाधान भी सत्य और
न्याय से ही होगा।
समाज को एकजुट रहना
चाहिए, धैर्य रखना चाहिए और
जांच की प्रक्रिया पर
विश्वास रखना चाहिए। हमारा
लक्ष्य किसी व्यक्ति की
विजय नहीं, बल्कि धर्म, सत्य और समाज
के विश्वास की विजय होना
चाहिए। यही सनातन की
शक्ति है और यही
भारत की आत्मा भी।
लेकिन यदि शंकाएँ बनी रहेंगी तो
विरोधी तत्व उन्हीं शंकाओं
का लाभ उठाने का
प्रयास करेंगे। इसलिए मेरा आग्रह है
कि हर प्रश्न का
समाधान तथ्यों और पारदर्शिता से
किया जाए।
प्रश्न
: इस
पूरे
घटनाक्रम
में
आपको
सबसे
बड़ी
चुनौती
क्या
दिखाई
देती
है?
उत्तर : सबसे बड़ी चुनौती सोशल मीडिया का अनियंत्रित वातावरण है। आधी-अधूरी जानकारी, अपुष्ट दावे और भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ बहुत तेजी से फैलती हैं। इससे समाज में भ्रम पैदा होता है। हमें धैर्य रखना चाहिए और जांच के निष्कर्षों की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

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