Thursday, 2 July 2026

समय से आगे चलता एक विचार : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और आधुनिक भारत का वैचारिक अधिष्ठान

समय से आगे चलता एक विचार : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और आधुनिक भारत का वैचारिक अधिष्ठान  

स्वतंत्र भारत के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे हैं, जिन्हें केवल उनकी राजनीतिक भूमिका से नहीं, बल्कि उनके विचारों की स्थायी प्रासंगिकता से याद किया जाता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रपुरुष थे। वे एक साथ शिक्षाविद्, संवैधानिक चिंतक, स्वतंत्र भारत के पहले उद्योग मंत्री, प्रखर सांसद और राष्ट्रीय एकता के दृढ़ समर्थक थे। उन्होंने ऐसे समय में अनेक मूलभूत प्रश्न उठाए, जब नवस्वतंत्र भारत अपनी दिशा तय कर रहा था। शिक्षा की भारतीय दृष्टि, आर्थिक आत्मनिर्भरता, लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष की भूमिका, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राष्ट्रीय अखंडता जैसे विषय उनके चिंतन के केंद्र में रहे। उनके अनेक विचार उस समय विवाद का विषय बने, लेकिन समय के साथ वे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनते गए। यही कारण है कि सात दशक बाद भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की वैचारिक यात्रा को समझने का एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनकर हमारे सामने उपस्थित है  

सुरेश गांधी

कुछ व्यक्तित्व इतिहास में घटनाओं के कारण नहीं, बल्कि उन विचारों के कारण अमर होते हैं जो समय के साथ और अधिक प्रासंगिक होते चले जाते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रपुरुष थे। वे केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की वैचारिक बहसों के प्रमुख स्तंभ थे। शिक्षा से संसद तक, उद्योग से राष्ट्रीय एकता तक और लोकतंत्र से सांस्कृतिक आत्मविश्वास तकउन्होंने जिन प्रश्नों को उठाया, वे आज भी भारत के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा हैं। मतलब साफ है स्वतंत्र भारत का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है। यह विचारों के संघर्ष, राष्ट्र निर्माण की विभिन्न अवधारणाओं और लोकतांत्रिक विमर्श की निरंतर विकसित होती यात्रा का इतिहास भी है। आज़ादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं थी, बल्कि यह तय करना भी था कि नवगठित राष्ट्र किस दिशा में आगे बढ़ेगा। उसकी आर्थिक नीति क्या होगी, शिक्षा का स्वरूप कैसा होगा, लोकतंत्र की आत्मा किन मूल्यों पर टिकेगी, सांस्कृतिक पहचान का स्थान क्या होगा और राष्ट्रीय एकता को किस प्रकार मजबूत किया जाएगा। इन सभी प्रश्नों पर अनेक नेताओं ने अपने-अपने विचार रखे। उन्हीं में एक अत्यंत प्रभावशाली और दूरदर्शी स्वर थाडॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का।

डॉ. मुखर्जी का जीवन किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा की सीमाओं में समेटकर नहीं देखा जा सकता। वे उन विरले नेताओं में थे जिन्होंने शिक्षा, प्रशासन, उद्योग, संसद और राष्ट्रीय नीतिहर क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान छोड़ी। उनका सार्वजनिक जीवन यह प्रमाणित करता है कि राष्ट्र निर्माण केवल सरकारों के निर्णयों से नहीं, बल्कि उन विचारों से होता है जो पीढ़ियों को दिशा देते हैं। 6 जुलाई 1901 को कोलकाता के एक प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मे डॉ. मुखर्जी को विद्वता विरासत में मिली। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी भारतीय शिक्षा जगत के ऐसे महान व्यक्तित्व थे जिन्होंने आधुनिक शिक्षा और भारतीय आत्मबोध के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया। उसी वातावरण ने श्यामा प्रसाद के व्यक्तित्व को आकार दिया। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। शिक्षा के प्रत्येक चरण में उन्होंने असाधारण सफलता प्राप्त की और मात्र 33 वर्ष की आयु में कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति बने। इतनी कम आयु में इस पद पर पहुँचना केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस समय की बौद्धिक दुनिया में उनकी स्वीकार्यता का प्रमाण था।

कुलपति के रूप में उनका दृष्टिकोण अत्यंत व्यापक था। वे विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा और डिग्री देने वाले संस्थान नहीं मानते थे। उनका विश्वास था कि यदि शिक्षा चरित्र, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का निर्माण नहीं करती, तो उसका उद्देश्य अधूरा रह जाता है। वे भारतीय भाषाओं, विज्ञान, तकनीकी शिक्षा और शोध को समान महत्व देने के पक्षधर थे। आज जब नई शिक्षा नीति भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा और नवाचार पर बल देती है, तब उनके कई विचार आश्चर्यजनक रूप से समकालीन प्रतीत होते हैं। शिक्षा से राजनीति की ओर उनका कदम किसी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम नहीं था। बंगाल की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने शीघ्र ही यह अनुभव किया कि यदि नीति निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी हो, तो समाज और राष्ट्र के दीर्घकालिक हितों की रक्षा कठिन हो जाती है। बंगाल की राजनीति में उनका उदय ऐसे समय हुआ जब सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था और ब्रिटिश शासन की 'फूट डालो और राज करो' की नीति समाज को विभाजित कर रही थी। उन्होंने बंगाल विधानसभा में अपनी प्रभावशाली भूमिका निभाई और बाद में फजलुल हक के नेतृत्व वाली सरकार में वित्त मंत्री बने।

प्रशासनिक क्षमता और स्पष्ट निर्णय लेने की उनकी शैली ने उन्हें अलग पहचान दिलाई। किंतु जहां उन्हें लगा कि सिद्धांतों से समझौता करना पड़ेगा, वहां उन्होंने पद छोड़ना अधिक उचित समझा। यही उनके व्यक्तित्व का सबसे सशक्त पक्ष थासत्ता उनके लिए साध्य नहीं, साधन थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद देश की पहली केंद्रीय सरकार में उन्हें उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बनाया गया। उस समय भारत औद्योगिक रूप से अत्यंत कमजोर था। संसाधन सीमित थे, उत्पादन क्षमता कम थी और आर्थिक आत्मनिर्भरता एक बड़ी चुनौती थी। डॉ. मुखर्जी का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब भारत आर्थिक रूप से भी आत्मविश्वासी बने। उन्होंने औद्योगिक विकास, उत्पादन क्षमता और राष्ट्रीय संसाधनों के बेहतर उपयोग पर बल दिया। आज 'आत्मनिर्भर भारत', 'मेक इन इंडिया' और विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने जैसे प्रयासों की पृष्ठभूमि में उनके आर्थिक दृष्टिकोण की प्रतिध्वनि सुनी जा सकती है।

हालाँकि समय के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. मुखर्जी के बीच कई नीतिगत प्रश्नों पर मतभेद उभरे। यह मतभेद केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के विकास की दिशा को लेकर दो अलग दृष्टिकोणों का था। नेहरू संसदीय लोकतंत्र, समाजवादी झुकाव और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की अपनी परिकल्पना पर आगे बढ़ रहे थे, जबकि डॉ. मुखर्जी राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास, मजबूत संघीय ढांचे और अधिक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति के पक्षधर थे। लोकतंत्र की यही सुंदरता है कि उसमें भिन्न विचारधाराएँ साथ-साथ चलती हैं और बहस के माध्यम से राष्ट्र अपनी दिशा तय करता है। नेहरू-लियाकत समझौते तथा कुछ अन्य नीतिगत मुद्दों पर असहमति के बाद डॉ. मुखर्जी ने 1950 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र के शुरुआती वर्षों में सिद्धांत-आधारित राजनीति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। इसके बाद उन्होंने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। यह केवल एक नए दल का गठन नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में संगठित वैचारिक विपक्ष के उदय का संकेत भी था। उन्होंने यह स्थापित किया कि स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक एक मजबूत और रचनात्मक विपक्ष भी है।

डॉ. मुखर्जी के सार्वजनिक जीवन का सबसे चर्चित अध्याय जम्मू-कश्मीर से जुड़ा है। उनका मत था कि भारत की संप्रभुता और संवैधानिक व्यवस्था में स्थायी द्वैत उचित नहीं है। इसी संदर्भ में उनका प्रसिद्ध कथन—"एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे"—राष्ट्रीय राजनीति का स्थायी हिस्सा बन गया। 1952 में जम्मू की सभा में उन्होंने घोषणा की कि वे इस प्रश्न पर पीछे नहीं हटेंगे। 1953 में बिना परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने पर उन्हें गिरफ्तार किया गया और हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को उनका निधन हो गया। उनकी मृत्यु भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और विवादास्पद प्रसंगों में गिनी जाती है। दशकों बाद 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को निष्प्रभावी करने का निर्णय लिया। इस कदम को लेकर देश में व्यापक बहस हुई। समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम और डॉ. मुखर्जी के लंबे समय से व्यक्त विचारों के अनुरूप माना, जबकि आलोचकों ने इसके संवैधानिक और संघीय पक्षों पर प्रश्न उठाए। यह विविध मत लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं। किंतु इतना स्पष्ट है कि इस निर्णय के बाद डॉ. मुखर्जी का नाम और उनके विचार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में गए।

डॉ. मुखर्जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे राष्ट्रवाद को केवल राजनीतिक अवधारणा नहीं मानते थे। उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ थासंविधान के प्रति निष्ठा, लोकतंत्र में विश्वास, सांस्कृतिक आत्मगौरव, आर्थिक आत्मनिर्भरता और नागरिकों के बीच साझा राष्ट्रीय चेतना। वे भारत की विविधता का सम्मान करते थे, लेकिन यह भी मानते थे कि विविधता का आधार राष्ट्रीय एकता को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करना चाहिए। आज जब भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है, डिजिटल क्रांति का नेतृत्व कर रहा है, नई शिक्षा नीति लागू कर रहा है और विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विचारों का पुनर्पाठ आवश्यक हो जाता है। वे हमें बताते हैं कि राष्ट्र केवल आर्थिक विकास से महान नहीं बनता; उसकी वास्तविक शक्ति उसके नागरिकों के चरित्र, उसकी शिक्षा की गुणवत्ता, उसके लोकतंत्र की परिपक्वता और उसकी सांस्कृतिक चेतना में निहित होती है। इतिहास में कुछ लोग अपने समय के नायक होते हैं और कुछ समय की सीमाओं से आगे निकलकर युगद्रष्टा बन जाते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का स्थान दूसरी श्रेणी में है। उनके विचारों से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन यह अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने आधुनिक भारत की वैचारिक यात्रा को गहराई से प्रभावित किया। आज उन्हें याद करना केवल एक राजनीतिक परंपरा का निर्वाह नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के बौद्धिक, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय विकास की उस यात्रा को समझना है, जिसमें विविध विचारों ने मिलकर आधुनिक भारत की नींव रखी।

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