आखिर कब तक आस्था से खिलवाड़?
भारत में धर्म केवल पूजा-पद्धति का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति और भावनात्मक पहचान का आधार है। इसलिए जब किसी धर्म के आराध्य या पूजनीय व्यक्तित्व के संबंध में सार्वजनिक मंच से ऐसा दावा किया जाता है जो उस धर्म की मूल मान्यताओं से मेल नहीं खाता, तो विवाद केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज के व्यापक विमर्श का विषय बन जाता है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद की संवेदनशील पृष्ठभूमि के बीच मौलाना जरजिश अंसारी का वायरल बयान इसी कारण तीखी प्रतिक्रियाओं का केंद्र बन गया है। ब्रज के संत समाज, विभिन्न हिंदू संगठनों और अनेक जनप्रतिनिधियों ने इसे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था पर आघात बताते हुए कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है, जबकि कई स्थानों पर कानूनी कार्रवाई की मांग भी उठी है। यह घटनाक्रम केवल एक वायरल वीडियो का विवाद नहीं है, बल्कि एक बड़े प्रश्न को सामने लाता है. क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर किसी भी धर्म के आराध्य की मनमानी व्याख्या स्वीकार की जा सकती है? या फिर लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति उसी संतुलन में है, जहाँ विचार स्वतंत्र हों, किंतु शब्द समाज की संवेदनशीलता और संवैधानिक मर्यादा का भी सम्मान करें?
सुरेश गांधी
भारत की सभ्यता
हजारों वर्षों से विविध आस्थाओं,
अनेक मतों और असंख्य
परंपराओं को अपने भीतर
समेटे हुए है। यही
वह भूमि है जहाँ
शास्त्रार्थ हुए, मतभेद हुए,
दर्शन विकसित हुए, किंतु अंततः
समाज को जोड़ने का
प्रयास ही सर्वोपरि रहा।
शायद इसी कारण भारत
विश्व में केवल लोकतंत्र
का नहीं, बल्कि सहिष्णुता और सांस्कृतिक उदारता
का भी सबसे बड़ा
उदाहरण माना जाता है।
किंतु विडंबना यह है कि
आज वही समाज समय-समय पर ऐसे
विवादों में उलझ जाता
है, जिनका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि सनसनी और टकराव अधिक
प्रतीत होता है।
मतलब
साफ है भारत की पहचान केवल
दुनिया के सबसे बड़े
लोकतंत्र के रूप में
नहीं है। उसकी वास्तविक
पहचान उस सभ्यता से
है जिसने हजारों वर्षों तक विविध आस्थाओं,
अनेक विचारधाराओं और भिन्न-भिन्न
धार्मिक परंपराओं को एक साथ
जीने की संस्कृति विकसित
की। यही कारण है
कि भारत में धर्म
केवल पूजा-पद्धति का
विषय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और करोड़ों लोगों
की भावनात्मक पहचान का आधार भी
है।
इसलिए जब किसी धर्म के पूजनीय व्यक्तित्व के संबंध में सार्वजनिक मंच से ऐसा दावा किया जाता है जिसे उस धर्म के अनुयायी स्वीकार नहीं करते, तो वह केवल एक बयान नहीं रह जाता, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रतिक्रिया का कारण बन जाता है। मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि से जुड़े विवाद के बीच एक वायरल वीडियो ने देशभर में नई बहस छेड़ दी। वीडियो में भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में मौलाना जरजिश अंसारी का किया गया दावा स्वाभाविक रूप से करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए अस्वीकार्य माना गया और व्यापक प्रतिक्रिया सामने आई।
वीडियो में भगवान श्रीकृष्ण के संबंध में दिए गए उनके कथनों को लेकर साधु-संतों, विभिन्न हिंदू संगठनों और कई जनप्रतिनिधियों ने तीखी आपत्ति दर्ज कराई। अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए और संबंधित व्यक्तियों ने कानूनी कार्रवाई की मांग भी उठाई।यह केवल एक बयान का विवाद नहीं है, बल्कि उस सोच का प्रश्न है जिसमें दूसरे धर्म की आस्था को अपनी सुविधा के अनुसार परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है। यह उस बड़े प्रश्न को सामने लाता है कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ किसी दूसरे धर्म की मूल आस्था की मनमानी व्याख्या करना भी है?
यह समझना होगा कि आस्था किसी तर्क प्रतियोगिता का विषय नहीं होती। किसी धर्म के आराध्य, पैगंबर, गुरु या अवतार उस समाज की आध्यात्मिक चेतना के केंद्र होते हैं। उन्हें किसी दूसरी धार्मिक पहचान में स्थापित करने का प्रयास न तो इतिहास को बदल सकता है और न ही श्रद्धा को। हाँ, इससे अविश्वास, तनाव और सामाजिक दूरी अवश्य बढ़ सकती है।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। किंतु संविधान ने इस स्वतंत्रता के साथ उत्तरदायित्व की भावना भी जोड़ी है। सार्वजनिक व्यवस्था, सामाजिक सद्भाव और दूसरे नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किसी भी लोकतंत्र की परिपक्वता इसी संतुलन से तय होती है कि वह अधिकारों और जिम्मेदारियों के बीच कैसे सामंजस्य स्थापित करता है। भगवान श्रीकृष्ण भारतीय संस्कृति के ऐसे व्यक्तित्व हैं जिनका प्रभाव केवल धार्मिक जीवन तक सीमित नहीं है।
वे दर्शन, नीति, कूटनीति, करुणा, कर्मयोग और लोकमंगल की भारतीय अवधारणा के केंद्रीय प्रतीक हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हो चुका है और उसे मानव जीवन के महान दार्शनिक ग्रंथों में स्थान प्राप्त है। ऐसे में उनके संबंध में किसी भी प्रकार का सार्वजनिक दावा यदि स्थापित धार्मिक परंपराओं और स्वीकार्य संदर्भों से भिन्न होगा, तो स्वाभाविक रूप से वह बहस और विरोध का कारण बनेगा।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा हमें यह नहीं सिखाती कि दूसरे की आस्था को बदलो; वह यह सिखाती है कि दूसरे की आस्था का सम्मान करो। यही कारण है कि इस देश में विभिन्न धर्म सदियों से साथ-साथ विकसित हुए। मंदिरों के शंख और मस्जिदों की अज़ान, गुरुद्वारों का कीर्तन और गिरजाघरों की घंटियाँ—ये सभी भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं। इस विरासत की रक्षा केवल कानून से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान से होती है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में किसी भी धर्म के पूजनीय व्यक्तित्व के प्रति असम्मानजनक या उत्तेजक टिप्पणी केवल एक समुदाय तक सीमित प्रभाव नहीं डालती। अतीत में विभिन्न धर्मों के महापुरुषों पर दिए गए विवादित बयानों ने भी सामाजिक तनाव पैदा किया है। इसलिए यह सिद्धांत सार्वभौमिक होना चाहिए कि किसी भी धर्म के आराध्य, पैगंबर, गुरु, संत या धार्मिक ग्रंथ के बारे में बोलतेसमय तथ्य, संवेदनशीलता और मर्यादा सर्वोपरि रहें। आज सोशल मीडिया ने संवाद की गति को अभूतपूर्व बना दिया है। कोई भी वीडियो या बयान कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। इसके परिणामस्वरूप प्रतिक्रिया भी उतनी ही तीव्र होती है। ऐसे समय में धार्मिक नेताओं, जनप्रतिनिधियों, शिक्षकों, मीडिया और सार्वजनिक जीवन से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी पहले से कहीं अधिक बढ़ जाती है। लोकप्रियता प्राप्त करने या वैचारिक ध्रुवीकरण के उद्देश्य से दिए गए उत्तेजक वक्तव्य समाज को जोड़ने के बजाय विभाजित करते हैं। धर्म और इतिहास पर विमर्श होना चाहिए। विभिन्न परंपराओं का अध्ययन भी होना चाहिए। अकादमिक बहस किसी भी लोकतांत्रिक समाज का स्वस्थ संकेत है। किंतु अकादमिक विमर्श और सार्वजनिक उत्तेजना में मूलभूत अंतर होता है। शोध का आधार प्रमाण होता है, जबकि उत्तेजक बयान प्रायः भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। यदि किसी धार्मिक ग्रंथ की व्याख्या करनी है, तो उसके मूल संदर्भ, भाषा, परंपरा और मान्य भाष्यों का सम्मान आवश्यक है। बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत करना विद्वत्ता नहीं, बल्कि विवाद का कारण बन सकता है।आज आवश्यकता इस
बात की है कि
धर्म समाज को जोड़ने
का माध्यम बने, राजनीतिक या
सामाजिक ध्रुवीकरण का औजार नहीं।
किसी भी धर्म के
पूजनीय व्यक्तित्व के संबंध में
सार्वजनिक वक्तव्य देते समय शब्दों
की गंभीरता और उनके सामाजिक
प्रभाव को समझना होगा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र
का प्राण है, लेकिन मर्यादा
उसका चरित्र है। जब दोनों
साथ चलते हैं, तभी
समाज में विश्वास, शांति
और राष्ट्रीय एकता बनी रहती
है। अंततः, भारत की शक्ति
इस बात में नहीं
कि कौन किसकी आस्था
पर प्रश्न उठाता है, बल्कि इस
बात में है कि
अलग-अलग आस्थाओं के
बावजूद हम एक-दूसरे
के सम्मान की रक्षा कैसे
करते हैं। यही भारतीय
लोकतंत्र की परिपक्वता है,
यही हमारी सांस्कृतिक विरासत का सार है
और यही वह मार्ग
है जो भविष्य के
भारत को अधिक मजबूत,
अधिक संवेदनशील और अधिक समरस
बना सकता है। आज सोशल
मीडिया के युग में
एक वीडियो, एक पोस्ट या
एक बयान कुछ ही
मिनटों में लाखों लोगों
तक पहुँच जाता है। ऐसे
समय में सार्वजनिक जीवन
से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी कई
गुना बढ़ जाती है।
लोकप्रियता पाने की होड़
में दिए गए उत्तेजक
वक्तव्य कुछ समय के
लिए चर्चा तो दिला सकते
हैं, लेकिन समाज में लंबे
समय तक अविश्वास का
बीज भी बो सकते
हैं। सार्वजनिक जीवन का दायित्व
तालियाँ बटोरना नहीं, बल्कि समाज को दिशा
देना है।
इतिहास और धर्म पर
शोध होना चाहिए। मतभेद
भी होने चाहिए। अकादमिक
विमर्श भी आवश्यक है।
किंतु उसके लिए प्रमाण,
संदर्भ और गंभीरता चाहिए।
किसी धार्मिक व्यक्तित्व के बारे में
बिना व्यापक ऐतिहासिक या धार्मिक आधार
के सनसनीखेज दावे करना न
तो विद्वता है और न
ही वैचारिक साहस। यह केवल विवाद
को जन्म देता है।
यह भी उतना ही
आवश्यक है कि किसी
विवादित बयान पर समाज
की प्रतिक्रिया कानून और संविधान की
मर्यादा में रहे। यदि
किसी वक्तव्य से किसी समुदाय
की धार्मिक भावनाएँ आहत होने का
आरोप है, तो उसका
निर्णय न्यायपालिका और कानून के
दायरे में होना चाहिए।
लोकतंत्र में न्याय का
मार्ग अदालत से होकर जाता
है, सड़क से नहीं।
भारत का भविष्य केवल
आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि
सामाजिक विश्वास से भी तय
होगा। यदि समाज का
ताना-बाना कमजोर होगा,
तो विकास की इमारत भी
स्थायी नहीं रह सकेगी।
इसलिए हर नागरिक, हर
धार्मिक नेता, हर जनप्रतिनिधि और
हर सार्वजनिक वक्ता को यह स्मरण
रखना होगा कि शब्दों
की भी सामाजिक जिम्मेदारी
होती है। एक असावधान
वाक्य वर्षों की सद्भावना को
क्षति पहुँचा सकता है।
भारत ने दुनिया
को "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया
है। यह संदेश किसी
एक धर्म की विजय
का नहीं, बल्कि सभी आस्थाओं के
सम्मान का है। यदि
हम वास्तव में अपनी सांस्कृतिक
विरासत के प्रति ईमानदार
हैं, तो हमें किसी
दूसरे धर्म के पूजनीय
व्यक्तित्व की नई पहचान
गढ़ने के बजाय उसके
अनुयायियों की आस्था का
सम्मान करना सीखना होगा।
आज आवश्यकता किसी नए विवाद
की नहीं, बल्कि नई संवेदनशीलता की
है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र
का गौरव है, किंतु
मर्यादा उसकी आत्मा है।
जब शब्द संयमित होते
हैं, तभी समाज सुरक्षित
रहता है। और जब
आस्था का सम्मान बना
रहता है, तभी राष्ट्र
की एकता भी अक्षुण्ण
रहती है। अंततः, भारत की शक्ति
इस बात में नहीं
कि कौन किसकी आस्था
पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि इस
बात में है कि
अलग-अलग आस्थाओं के
बावजूद हम एक-दूसरे
के सम्मान की रक्षा कैसे
करते हैं। यही लोकतंत्र
की परिपक्वता है, यही भारतीय
संस्कृति की पहचान है
और यही आने वाली
पीढ़ियों के लिए सबसे
बड़ी विरासत भी।
यह पहली बार नहीं... विवादों से पुराना नाता
मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद के बीच वायरल हुआ मौलाना जरजिश अंसारी का बयान अचानक सामने आई कोई अकेली घटना नहीं माना जा रहा। सार्वजनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि अंसारी इससे पहले भी कई विवादों के कारण चर्चा में रहे हैं। वर्ष 2022 में महिलाओं को लेकर उनकी टिप्पणी ने भी तीखी प्रतिक्रिया पैदा की थी। इसी वर्ष वाराणसी की एक फास्ट ट्रैक अदालत ने वर्ष 2016 के दुष्कर्म और ब्लैकमेल से जुड़े एक मामले में उन्हें दोषी ठहराते हुए दस वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात भी सामने आई। अब भगवान श्रीकृष्ण को लेकर दिए गए उनके हालिया बयान ने एक बार फिर देशव्यापी बहस छेड़ दी है। अनेक धार्मिक संगठनों ने इसे हिंदू समाज की आस्था पर चोट बताया है, जबकि उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज आपके दूसरे प्रश्न का उत्तर पहले दे देता हूँ।







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