जब काशी के पहिए पर चला जगन्नाथ का रथ, आस्था के महासागर में डूब गया पूरा शहर
उमस व चिपचिपाती गर्मी
भी नहीं रोक सकी श्रद्धा की बयार
•
रथयात्रा क्षेत्र में उमड़ा जनसैलाब
•
डमरुओं, शंखध्वनि और "जय जगन्नाथ" के उद्घोष से गूंजती रही काशी
•
तीन दिवसीय ऐतिहासिक मेले का शुभारंभ, सुरक्षा के रहे चाक-चौबंद इंतजाम
सुरेश गांधी
वाराणसी. काशी में बादलों के बीच भारी उमस व चिपचिपाती
गर्मी थीं, लेकिन आस्था का ज्वार उससे कहीं अधिक प्रबल था। गुरुवार को भगवान जगन्नाथ
की ऐतिहासिक रथयात्रा और तीन दिवसीय मेले के शुभारंभ के साथ रथयात्रा क्षेत्र मानो
श्रद्धा के महासागर में परिवर्तित हो गया। रथयात्रा चौराहा, कमच्छा, लक्सा, बेनियाबाग
और आसपास की गलियां सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं के सैलाब से अटी रहीं। हर ओर केवल
एक ही स्वर सुनाई दे रहा था—"जय जगन्नाथ... जगन्नाथ स्वामी नयनपथगामी
भवतु मे..."
काशी की यह रथयात्रा केवल एक धार्मिक
आयोजन नहीं, बल्कि सदियों से जीवित उस सांस्कृतिक विरासत का उत्सव है, जिसमें लोकजीवन,
अध्यात्म और परंपरा एक साथ सांस लेते हैं। जैसे-जैसे भगवान का दिव्य रथ आगे बढ़ता गया,
वैसे-वैसे श्रद्धा की लहरें भी पूरे नगर में फैलती चली गईं। घरों की छतों, बालकनियों
और गलियों से श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा कर भगवान का स्वागत किया। अनेक स्थानों पर
महिलाओं ने मंगलगीत गाए, युवाओं ने डमरू और ढोल-नगाड़ों की थाप पर भक्ति का उल्लास
बिखेरा, जबकि बुजुर्ग प्रभु के दर्शन कर भावविभोर होते रहे।
इससे पहले बुधवार को भगवान जगन्नाथ, बड़े
भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा फूलों से सुसज्जित डोली पर विराजमान होकर अस्सी स्थित मंदिर
से मनफेर के लिए निकले थे। अस्सी से रथयात्रा तक का पूरा मार्ग श्रद्धालुओं से पट गया
था। 108 डमरुओं की गूंज, शंखध्वनि, शहनाई और ढोल-ताशों के बीच निकली डोली यात्रा ने
पूरे शहर को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। पुरी से मंगाए गए 108 पीले ध्वज पूरे मार्ग
में लहराते रहे, मानो काशी और पुरी की आध्यात्मिक परंपरा एक सूत्र में बंध गई हो।
भोर में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान
को विधिविधान से अष्टकोणीय दिव्य रथ पर प्रतिष्ठित किया गया। पीतांबर धारण कर भगवान
जगन्नाथ, बलभद्र और माता सुभद्रा ने भक्तों को दर्शन दिए। पहले दिन भगवान को पीले पुष्पों
से विशेष श्रृंगार किया गया और पके कोहड़े की सब्जी, पूड़ी तथा हलवे का विशेष भोग अर्पित
किया गया। हजारों श्रद्धालुओं ने महाप्रसाद ग्रहण कर स्वयं को धन्य माना।
रथयात्रा चौराहे पर दोपहर बाद ऐसा दृश्य
था, मानो पूरी काशी एक साथ उमड़ पड़ी हो। श्रद्धालु रथ की रस्सी छू लेने और उसे खींचने
के लिए आतुर दिखाई दिए। मान्यता है कि भगवान के रथ को खींचने से जीवन में सुख-समृद्धि,
आरोग्य और पुण्य की प्राप्ति होती है। इसी विश्वास के साथ महिला, पुरुष, युवा और बुजुर्ग
सभी श्रद्धा की डोर से बंधे दिखाई दिए। वातावरण में "जय जगन्नाथ" के जयघोष
ने ऐसा आध्यात्मिक दृश्य रचा, जिसने काशी की सनातन परंपरा को फिर जीवंत कर दिया।
मेले में पारंपरिक दुकानों पर भी भारी
भीड़ रही। लकड़ी के खिलौने, मिट्टी के बर्तन, घरेलू सामान, श्रृंगार सामग्री, झूले
और स्थानीय व्यंजनों की दुकानों पर लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था। बच्चों के
चेहरे पर मेले की चमक थी तो बुजुर्गों की आंखों में वर्षों पुरानी रथयात्राओं की स्मृतियां
तैरती दिखीं। यही कारण है कि काशी का रथयात्रा मेला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक
और सांस्कृतिक जीवन का भी सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है।
श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए
प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। पूरे मेला क्षेत्र में 85 सीसीटीवी कैमरों
से निगरानी की जा रही है। रथयात्रा चौराहे पर अस्थायी कंट्रोल रूम स्थापित कर प्रत्येक
गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। पुलिस, पीएसी, महिला पुलिस, यातायात कर्मियों और स्वयंसेवकों
की तैनाती के साथ बैरिकेडिंग, चिकित्सा सहायता और पेयजल जैसी व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित
की गई हैं।
उधर, भैरवतालाब का ऐतिहासिक रथयात्रा
मेला भी शुरू हो गया है, जहां परंपरा के अनुसार काशीराज परिवार के अनंत नारायण सिंह
भगवान के रथ को खींचकर यात्रा का शुभारंभ करेंगे। वहीं शिवपुर का 117 वर्ष पुराना ऐतिहासिक
रथयात्रा मेला 19 जुलाई को आयोजित होगा, जिसकी तैयारियां अंतिम चरण में हैं। काशी में
रथयात्रा का यह उत्सव हर वर्ष यह संदेश देता है कि समय बदल सकता है, लेकिन आस्था की
परंपराएं कभी पुरानी नहीं होतीं। भगवान जगन्नाथ का रथ जब काशी की गलियों से गुजरता
है, तब केवल लकड़ी का रथ नहीं चलता, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति, लोकविश्वास और सनातन
चेतना भी पूरे वैभव के साथ आगे बढ़ती है। यही काशी की पहचान है और यही उसकी आत्मा।

No comments:
Post a Comment