Monday, 27 July 2026

रविदास के सहारे यूपी-पंजाब के दलित रण में भाजपा की बड़ी घेराबंदी

रविदास के सहारे यूपी-पंजाब के दलित रण में भाजपा की बड़ी घेराबंदी 

राजनीति में समय का अपना महत्व होता है और भाजपा का "संत श्री गुरु रविदास सामाजिक समरसता संकल्प अभियान" ऐसे समय शुरू हो रहा है, जब उत्तर प्रदेश और पंजाब की राजनीति नए सामाजिक समीकरणों की तलाश में है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या यह केवल संत रविदास की 650वीं जयंती का सांस्कृतिक आयोजन है या इसके पीछे चुनावी रणनीति भी है। राजनीतिक संकेतों पर नजर डालें तो यह अभियान केवल धार्मिक आयोजनों तक सीमित नहीं दिखता। सात महीने तक चलने वाले कार्यक्रम, कलश यात्राएं, संत संपर्क, छात्रावास संवाद और बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता इस बात का संकेत हैं कि भाजपा दलित समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता और संगठनात्मक पकड़ को और मजबूत करना चाहती है। उत्तर प्रदेश में रविदास समाज कई संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों में प्रभावशाली है, जबकि पंजाब में रविदासिया समुदाय का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव और भी अधिक माना जाता है। ऐसे में वाराणसी से शुरू होकर पंजाब के सचखंड बल्लां तक जुड़ने वाली समरसता यात्रा को केवल संयोग मानना कठिन होगा। हालांकि भाजपा इसे सामाजिक समरसता और संत रविदास के विचारों के प्रसार का अभियान बता रही है, लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रम और चुनावी रणनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं होते; अक्सर दोनों साथ-साथ चलते हैं। आने वाले उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनावों की पृष्ठभूमि में यह अभियान भाजपा को दलित समाज के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का अवसर अवश्य देता है। यानी, इसे केवल चुनावी अभियान कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह कहना भी कठिन है कि इसका चुनावी लाभ भाजपा की रणनीति का हिस्सा नहीं है। भारतीय राजनीति में सामाजिक अभियान और चुनावी गणित अक्सर एक ही रथ के दो पहिए होते हैं

सुरेश गांधी

भारतीय राजनीति में चुनाव केवल वोटों से नहीं, बल्कि प्रतीकों, महापुरुषों और सामाजिक चेतना के माध्यम से भी लड़े जाते हैं। आजादी के बाद लंबे समय तक दलित राजनीति का केंद्र डॉ. भीमराव आंबेडकर रहे, लेकिन पिछले एक दशक में भाजपा ने दलित समाज के अन्य संतों और महापुरुषों को भी अपनी सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया है। अब इसी कड़ी में संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज की 650वीं जयंती को भाजपा ने वर्षभर चलने वाले राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया है। इसे केवल धार्मिक आयोजन मानना राजनीतिक दृष्टि से बड़ी भूल होगी। 29 जुलाई 2026 से 20 फरवरी 2027 तक चलने वाले "संत श्री गुरु रविदास सामाजिक समरसता संकल्प अभियान" के पीछे केवल श्रद्धा नहीं, बल्कि एक सुविचारित सामाजिक और राजनीतिक रणनीति भी स्पष्ट दिखाई देती है। वाराणसी स्थित संत रविदास जन्मस्थली से इसकी शुरुआत होगी, जहां भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, संत समाज और हजारों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में अभियान का शुभारंभ होगा। इसके बाद 131 पवित्र कलश देश के सभी राज्यों तक पहुंचेंगे, वहां से जिलों और मंडलों तक जाएंगे। 51 हजार स्थानों पर दीप प्रज्ज्वलित होंगे, समरसता यात्राएं निकलेंगी, छात्रावासों में संवाद होगा और संत संपर्क अभियान चलाया जाएगा। यह केवल धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि बूथ स्तर तक पहुंचने वाला एक विशाल संगठनात्मक अभियान है। भाजपा ने राष्ट्रीय, प्रदेश, जिला और मंडल स्तर तक कार्यशालाएं आयोजित कर इसकी तैयारी पहले ही पूरी कर ली है। प्रत्येक कार्यक्रम के माध्यम से कार्यकर्ता सीधे समाज के उस वर्ग तक पहुंचेंगे, जिसे दशकों से दलित राजनीति का मूल आधार माना जाता रहा है।

रविदास क्यों बने भाजपा की नई राजनीतिक धुरी?

संत रविदास केवल धार्मिक संत नहीं थे। उन्होंने सामाजिक समानता, कर्मयोग, भक्ति और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध आवाज उठाई। उनका "बेगमपुरा" का सपना और "ऐसा चाहूं राज मैं..." जैसी वाणी सामाजिक न्याय की ऐसी अवधारणा प्रस्तुत करती है, जो आज भी प्रासंगिक है। यही कारण है कि रविदास समाज का उत्तर प्रदेश, पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और उत्तराखंड सहित अनेक राज्यों में व्यापक प्रभाव है। भाजपा अच्छी तरह जानती है कि यदि रविदास के विचारों के माध्यम से दलित समाज के भीतर भावनात्मक और वैचारिक जुड़ाव स्थापित होता है तो इसका सीधा राजनीतिक लाभ भी मिल सकता है। यही वजह है कि अभियान का स्वरूप केवल वाराणसी तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि इसे राष्ट्रीय विस्तार दिया गया है।

दलित वोट बैंक पर नजर

इस अभियान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसका चुनावी समय है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में अगले चुनावों की तैयारी शुरू हो चुकी है। भाजपा जानती है कि अनुसूचित जाति के मतदाता चुनावी परिणाम तय करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि अभियान में मंदिर, संत, छात्रावास, प्रबुद्धजन, गांव, मंडल और बूथ तक पहुंचने की पूरी रूपरेखा बनाई गई है। कलश यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं होगी, बल्कि यह प्रत्येक जिले में संगठन को सक्रिय करने और सामाजिक संवाद बढ़ाने का माध्यम भी बनेगी। छात्रावास संपर्क अभियान के जरिए युवा वर्ग तक पहुंचने की कोशिश होगी, जबकि संत संपर्क अभियान धार्मिक नेतृत्व को साथ जोड़ने का प्रयास करेगा।

विपक्ष पर सीधा हमला

भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लाल सिंह आर्य ने साफ कहा कि अन्य राजनीतिक दलों ने संत रविदास, डॉ. भीमराव आंबेडकर और भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुषों को वह सम्मान नहीं दिया जो भाजपा ने दिया है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा केवल महापुरुषों की जयंती नहीं मनाती, बल्कि उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य करती है। यह बयान केवल वैचारिक नहीं बल्कि राजनीतिक भी है। भाजपा लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि दलित समाज के सम्मान और महापुरुषों के संरक्षण का वास्तविक कार्य वही कर रही है, जबकि विपक्ष केवल वोट बैंक की राजनीति करता रहा।

समरसता बनाम सामाजिक समीकरण

यह भी सच है कि संत रविदास का जीवन किसी राजनीतिक दल की सीमा में नहीं बंधता। उन्होंने जाति-विहीन समाज, समानता और मानवता का संदेश दिया था। उनका दर्शन पूरी मानवता के लिए है। लेकिन भारतीय राजनीति में महापुरुषों के विचारों का राजनीतिक उपयोग कोई नई बात नहीं है। गांधी, आंबेडकर, सरदार पटेल, दीनदयाल उपाध्याय, बिरसा मुंडा और अब संत रविदासलगभग सभी महापुरुष विभिन्न दलों की राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। भाजपा ने इस बार संत रविदास की 650वीं जयंती को वर्षभर के राष्ट्रीय अभियान में बदलकर स्पष्ट संकेत दिया है कि वह दलित समाज के बीच अपनी वैचारिक और संगठनात्मक पकड़ को और मजबूत करना चाहती है। संत रविदास के विचार भारतीय समाज के लिए अमूल्य धरोहर हैं। उनका संदेश सामाजिक समरसता, समान अवसर और मानवता का है। यदि उनके विचार वास्तव में समाज तक पहुंचते हैं तो यह सकारात्मक पहल होगी। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह भी उतना ही स्पष्ट है कि भाजपा का यह अभियान केवल आध्यात्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि दलित समाज के बीच अपने जनाधार को और मजबूत करने की एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति भी है। आने वाले महीनों में यह अभियान कितना सामाजिक परिवर्तन लाता है और कितना चुनावी लाभ देता है, इसका उत्तर भविष्य देगा। फिलहाल इतना तय है कि संत रविदास की 650वीं जयंती भाजपा के लिए श्रद्धा का अवसर होने के साथ-साथ दलित वोट बैंक को साधने की सबसे बड़ी राजनीतिक मुहिम बन चुकी है।

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