संत शिरोमणि गुरु रविदास महाराज किसी एक समाज के नहीं, पूरे राष्ट्र की चेतना हैं...!
दलित वोट बैंक नहीं, महापुरुषों के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना भाजपा का संकल्प : लाल सिंह आर्य
भारतीय राजनीति में सामाजिक बदलाव की सबसे बड़ी लड़ाई अब केवल संसद और विधानसभाओं में नहीं, बल्कि महापुरुषों की विरासत के इर्द-गिर्द लड़ी जा रही है। जो दल कभी विकास, जाति या धर्म के मुद्दों पर आमने-सामने थे, वे अब इतिहास के उन संतों और समाज सुधारकों की वैचारिक विरासत पर भी अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं, जिन्होंने सदियों पहले सामाजिक बराबरी का सपना देखा था। संत शिरोमणि गुरु रविदास की 650वीं जयंती पर भारतीय जनता पार्टी का सात महीने लंबा 'समरसता संकल्प अभियान' इसी बदलती राजनीतिक धारा का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। काशी की धरती से शुरू होने वाला यह अभियान केवल धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला नहीं है। 131 कलश, हजारों कार्यकर्ता, संत संपर्क, छात्रावास संवाद, समरसता यात्रा और देशभर में दीपोत्सव—इन सबके जरिए भाजपा एक साथ कई संदेश देना चाहती है। पहला, संत रविदास के सामाजिक दर्शन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाना। दूसरा, दलित समाज के बीच अपने वैचारिक विस्तार को मजबूत करना। और तीसरा, उस राजनीतिक धारणा को चुनौती देना कि दलित समाज पर केवल कुछ चुनिंदा दलों का ही नैतिक या राजनीतिक अधिकार है। भाजपा भले इसे सामाजिक समरसता का अभियान बता रही हो, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थों से इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर तब, जब उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में रविदासिया समाज का प्रभाव चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता हो। ऐसे में यह अभियान श्रद्धा, सामाजिक संदेश और सियासी रणनीति—तीनों का संगम बन गया है. हिन्दुस्तान, जनसंदेश टाइम्स सहित कई समाचार पत्रों एवं आज तक टीवी न्यूज जैसे चैनलों की रिर्पोटिंग कर चुके सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में भाजपा अनुसूचित वर्ग मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बोले— विपक्ष ने महापुरुषों को चुनाव तक सीमित रखा, भाजपा उन्हें राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा बना रही. यूपी और पंजाब चुनाव से अभियान को जोड़ना उचित नहीं. उनका कहना है कि भाजपा का उद्देश्य चुनाव नहीं, बल्कि महापुरुषों के विचारों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना है। विशेष बातचीत में लाल सिंह आर्य ने कहा कि भाजपा ने कभी महापुरुषों को वोट बैंक की राजनीति का माध्यम नहीं बनाया। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने का काम किया है। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:-
प्रश्न
: विपक्ष
का
आरोप
है
कि
भाजपा
संत
रविदास
की
650वीं
जयंती
के
बहाने
दलित
वोट
बैंक
को
साधना
चाहती
है।
लाल
सिंह
आर्य
: यह विपक्ष का राजनीतिक चश्मा
है। जो लोग दशकों
तक दलित समाज को
केवल वोट बैंक मानते
रहे, वे हर सामाजिक
कार्यक्रम में चुनाव तलाशते
हैं। भाजपा संत रविदास को
किसी जाति या वर्ग
का संत नहीं मानती।
वे पूरे मानव समाज
के मार्गदर्शक हैं। उनके समरसता,
समानता और कर्मयोग के
विचार आज भी प्रासंगिक
हैं। यदि उन विचारों
को जन-जन तक
पहुंचाने का प्रयास किया
जा रहा है, तो
उसे चुनावी राजनीति कहना उचित नहीं
होगा।
प्रश्न
: लेकिन
यह
अभियान
ऐसे
समय
शुरू
हो
रहा
है,
जब
उत्तर
प्रदेश
और
पंजाब
की
राजनीति
दलित
समीकरणों
के
इर्द-गिर्द
घूम
रही
है।
उत्तर
: चुनाव लोकतंत्र की सतत प्रक्रिया
है। यदि किसी कार्यक्रम
को चुनाव से जोड़ना है
तो फिर कोई भी
सामाजिक या सांस्कृतिक आयोजन
नहीं हो सकेगा। भाजपा
महापुरुषों के विचारों पर
केवल चुनाव के समय नहीं,
पूरे वर्ष काम करती
है। डॉ. भीमराव आंबेडकर
के पंचतीर्थ हों, भगवान बिरसा
मुंडा का जनजातीय गौरव
दिवस हो, महर्षि वाल्मीकि
हों या संत रविदास—हमने सभी को
राष्ट्रीय सम्मान देने का काम
किया है। यह हमारी
विचारधारा का हिस्सा है,
चुनावी रणनीति नहीं।
प्रश्न
: फिर
सात
महीने
तक
चलने
वाले
इतने
बड़े
अभियान
की
आवश्यकता
क्यों
महसूस
हुई?
उत्तर
: संत रविदास की 650वीं जयंती साधारण
अवसर नहीं है। ऐसे
महापुरुष बार-बार नहीं
आते। उनका संदेश आज
भी समाज को दिशा
देता है। इसलिए हमने
तय किया कि इसे
केवल एक दिन का
कार्यक्रम नहीं, बल्कि जन-जागरण का
अभियान बनाया जाए। इसमें कलश
यात्रा, संत संपर्क, छात्रावास
संपर्क, समरसता यात्रा और दीप अभियान
जैसे कार्यक्रम होंगे, ताकि समाज का
हर वर्ग जुड़ सके।
प्रश्न
: क्या
भाजपा
दलित
समाज
के
बीच
अपनी
स्वीकार्यता
और
बढ़ाना
चाहती
है?
उत्तर
: भाजपा समाज के हर
वर्ग के बीच काम
करती है। यदि कोई
दलित समाज भाजपा से
जुड़ता है तो वह
किसी लालच या तुष्टीकरण
से नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास
और सामाजिक न्याय के एजेंडे से
जुड़ता है। भाजपा किसी
समाज को वोट बैंक
नहीं मानती।
प्रश्न
: विपक्ष
कहता
है
कि
भाजपा
महापुरुषों
के
नाम
पर
राजनीति
कर
रही
है।
उत्तर
: राजनीति किसने की, यह देश
जानता है। जिन लोगों
ने दशकों तक महापुरुषों को
केवल जयंती और माल्यार्पण तक
सीमित रखा, वे आज
हमें उपदेश दे रहे हैं।
भाजपा ने उनके विचारों
को सरकारी योजनाओं, स्मारकों और राष्ट्रीय आयोजनों
के माध्यम से सम्मान दिया।
हम केवल प्रतिमा नहीं
बनाते, उनके विचारों को
समाज तक पहुंचाने का
काम भी करते हैं।
प्रश्न
: पंजाब
में
रविदासिया
समाज
का
बड़ा
प्रभाव
है।
क्या
समरसता
यात्रा
का
जालंधर
से
शुरू
होना
भी
इसी
रणनीति
का
हिस्सा
है?
उत्तर
: संत रविदास का डेरा सचखंड
बल्लां से गहरा आध्यात्मिक
संबंध है। इसलिए यात्रा
का वहां से प्रारंभ
होना स्वाभाविक है। इसे चुनावी
नजर से नहीं, धार्मिक
और सांस्कृतिक परंपरा के रूप में
देखा जाना चाहिए।
प्रश्न
: विपक्ष
का
दावा
है
कि
भाजपा
सामाजिक
समरसता
की
बात
करती
है,
लेकिन
जमीनी
स्तर
पर
भेदभाव
खत्म
नहीं
हुआ।
उत्तर
: सामाजिक परिवर्तन एक दिन में
नहीं आता। लेकिन दिशा
सही होनी चाहिए। प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व
में सामाजिक न्याय और समरसता के
लिए जितना काम हुआ है,
वह पहले कभी नहीं
हुआ। योजनाओं का लाभ बिना
भेदभाव के अंतिम व्यक्ति
तक पहुंचा है। यही सामाजिक
समरसता का वास्तविक स्वरूप
है।
सियासी संदेश स्पष्ट
लाल सिंह आर्य
भले ही इस पूरे
अभियान को चुनावी राजनीति
से अलग बताते हों,
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में
सात महीने तक चलने वाला
यह अभियान उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे
राज्यों में भाजपा के
सामाजिक आधार को और
मजबूत करने का प्रयास
भी माना जा रहा
है। विशेषकर रविदासिया समाज के बीच
व्यापक जनसंपर्क, संतों से संवाद, छात्रावास
संपर्क और कलश यात्राएं
भाजपा को दलित समाज
के बीच अपनी वैचारिक
स्वीकार्यता बढ़ाने का अवसर देंगी।
हालांकि भाजपा का दावा है
कि यह अभियान किसी
चुनाव को ध्यान में
रखकर नहीं, बल्कि संत रविदास के
समरसता, सेवा और मानवता
के संदेश को राष्ट्रीय स्तर
पर स्थापित करने के उद्देश्य
से चलाया जा रहा है।
चुनावी लाभ होगा या
नहीं, इसका फैसला आने
वाला समय और मतदाता
करेंगे, लेकिन इतना तय है
कि संत रविदास की
650वीं जयंती को भाजपा ने
अपने सबसे बड़े सामाजिक
अभियानों में शामिल कर
लिया है।
क्यों अहम है यह अभियान?
29 जुलाई 2026 से 20 फरवरी 2027 तक चलेगा।
पहली बार संत
रविदास जयंती वर्ष को राष्ट्रीय
अभियान का रूप।
131 कलश पूरे देश
में भेजे जाएंगे।
51 हजार स्थानों पर
समरसता दीपोत्सव।
संत, छात्र, सामाजिक
संगठनों और गांवों तक
पहुंचने की रणनीति।
यूपी और पंजाब पर सबसे ज्यादा नजर
दोनों राज्यों में रविदासिया समाज
का प्रभाव।
अनेक लोकसभा और
विधानसभा सीटों पर निर्णायक भूमिका।
काशी से जालंधर
तक समरसता यात्रा का विशेष राजनीतिक
महत्व।
सामाजिक संपर्क के जरिए संगठन
विस्तार की कोशिश।
भाजपा क्या कह रही है?
यह चुनाव नहीं,
सामाजिक समरसता का अभियान है।
संत रविदास के विचारों को
जन-जन तक पहुंचाना
उद्देश्य। महापुरुषों को केवल जयंती
तक सीमित नहीं रखना चाहते।
विकसित भारत के संकल्प
से जोड़ने का प्रयास।
विपक्ष के सामने चुनौती
अभियान का विरोध करना
आसान नहीं। संत रविदास की
विरासत पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
तेज। दलित समाज के
बीच वैचारिक प्रभाव बनाए रखना बड़ी
चुनौती। चुनाव से पहले सामाजिक
विमर्श भाजपा के पक्ष में
जाने की आशंका।
सियासी संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में
यह केवल सांस्कृतिक आयोजन
नहीं, बल्कि भाजपा का दीर्घकालिक सामाजिक
निवेश है। यदि यह
अभियान जमीनी स्तर पर व्यापक
भागीदारी जुटाने में सफल रहता
है, तो इसका असर
केवल धार्मिक या सामाजिक क्षेत्र
तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि
उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों
की चुनावी राजनीति में भी दिखाई
दे सकता है।
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