Wednesday, 29 July 2026

आडंबर नहीं, संस्कार से बचेगा समाज : स्वामी संभव राम जी

आडंबर नहीं, संस्कार से बचेगा समाज : स्वामी संभव राम जी 

न्यायालयों में बढ़ते पति-पत्नी विवाद, भाई-भाई के झगड़े और जमीनी मुकदमे समाज में कमजोर पड़ते संस्कारों का परिणाम हैं। भौतिक प्रदर्शन, अहंकार और आर्थिक प्रतिस्पर्धा ने रिश्तों की आत्मीयता को प्रभावित किया है। विवाह संस्कार के बजाय प्रतिष्ठा प्रदर्शन बनता जा रहा है, जिससे परिवार तनाव और विवाद की ओर बढ़ रहे हैं। तकनीक उपयोगी है, लेकिन चरित्र निर्माण परिवार, गुरु और संस्कारों से होता है। बड़ों के प्रति सम्मान और गुरु परंपरा से दूरी समाज के नैतिक आधार को कमजोर कर रही है। जंगल, जल और जीव-जंतु मानव जीवन के आधार हैं। वृक्षारोपण, जल संरक्षण और जैव विविधता की रक्षा सामाजिक तथा आध्यात्मिक दायित्व है। केवल डिग्री नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति, अनुशासन और सेवा भाव से युक्त संस्कारित नागरिक तैयार करना ही सच्ची शिक्षा है। मतलब साफ है आडंबर छोड़कर सादगी, सहयोग और संस्कार आधारित जीवन अपनाया जाए, तभी परिवार और समाज में स्थायी शांति संभव होगी… 

सुरेश गांधी

गुरु पूर्णिमा आश्रम परिसर में असाधारण शांति थी। बाहर श्रद्धालुओं की आवाजाही थी, भीतर संतों का गंभीर वातावरण। इसी आध्यात्मिक परिवेश में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी ने श्री सर्वेश्वरी समूह के अध्यक्ष स्वामी बाबा औघड़ संभव राम जी से लंबी बातचीत की। विषय केवल धर्म नहीं था; परिवार, समाज, युवा, पर्यावरण, शिक्षा और सेवासब इस संवाद के केंद्र में थे। स्वामी जी के शब्दों में संत का करुण भाव था और समाजशास्त्री की चिंता भी। प्रस्तुत है वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी की विशेष बातचीत :-

प्रश्न : महाराज जी, गुरु पूर्णिमा को आप किस रूप में देखते हैं?

स्वामी बाबा औघड़ संभव राम जी : गुरु पूर्णिमा भारतीय आत्मा का उत्सव है। यह केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। गुरु वह है जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। हमारे ऋषियों ने तप और साधना से जो ज्ञान पाया, उसे समाज तक पहुँचाने की परंपरा ही गुरु परंपरा है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हम गुरु को केवल मंदिर की मूर्ति मानें, बल्कि जीवन का मार्गदर्शक मानें। जब तक विचार जीवन में नहीं उतरते, तब तक पर्व केवल अनुष्ठान रह जाता है।

प्रश्न : आज परिवारों में कलह, संपत्ति विवाद और रिश्तों में अविश्वास बढ़ रहा है। क्या यह सामाजिक संकट है?

स्वामी जी : निश्चित रूप से। न्यायालयों में बढ़ते पारिवारिक मुकदमे समाज की आंतरिक पीड़ा का संकेत हैं। भाई भाई से लड़ रहा है, पति पत्नी अलग हो रहे हैं, बुजुर्ग उपेक्षित हो रहे हैं। इसकी जड़ में तीन बातें हैंअहंकार, अर्थ और प्रदर्शन। पहले विवाह संस्कार था, अब प्रतिष्ठा प्रदर्शन बनता जा रहा है। जन्मदिन, शादी, अंतिम संस्कारहर जगह प्रतिस्पर्धा है। जिसके पास साधन नहीं हैं, वह भी समाज के दबाव में अपनी क्षमता से अधिक खर्च करता है। कर्ज, तनाव और विवाद यहीं से जन्म लेते हैं। समस्या केवल कानून से हल नहीं होगी; उसके लिए संस्कार चाहिए। 

प्रश्न : क्या सादगी वास्तव में सामाजिक तनाव कम कर सकती है?

स्वामी जी : सादगी केवल आर्थिक उपाय नहीं, मानसिक मुक्ति है। हम लोगों को बताते हैं कि पूजा का सार भाव है, वस्तु नहीं। एक लोटा जल श्रद्धा से अर्पित किया जाए तो वही पर्याप्त है। हमारे यहाँ जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक सरल संस्कारों की व्यवस्था है। सामूहिक विवाह भी इसी भावना का विस्तार है। यदि युवक और युवती परस्पर सहमत हैं तो अनावश्यक खर्च क्यों? समाज का उद्देश्य दो जीवनों को जोड़ना होना चाहिए, परिवारों को कर्ज में डुबोना नहीं।

प्रश्न : युवाओं के लिए आपका क्या संदेश है?

स्वामी जी : युवा ऊर्जा हैं, लेकिन दिशा के बिना ऊर्जा विनाश भी कर सकती है। मैं युवाओं से कहता हूँमहापुरुषों को पढ़ो, समझो और उनके जीवन पर चिंतन करो। आज सूचना बहुत है, लेकिन विवेक कम हो रहा है। मोबाइल ज्ञान दे सकता है, चरित्र नहीं। चरित्र परिवार, गुरु और आत्मअनुशासन से बनता है। यदि युवा अपने भीतर संयम, श्रम और राष्ट्रबोध जगाएँगे तो भारत का भविष्य अत्यंत उज्ज्वल होगा।

प्रश्न : क्या गुरु के प्रति श्रद्धा और बड़ों के सम्मान में कमी आई है?

स्वामी जी : कुछ हद तक हाँ। पहले संयुक्त परिवार संस्कार की पाठशाला थे। आज व्यक्ति अपने करियर, व्यवसाय और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं में इतना उलझ गया है कि सामूहिक जीवन कमजोर पड़ गया है। गुरु का अर्थ केवल संन्यासी नहीं है। माता-पिता, शिक्षक, मार्गदर्शकजो हमें सही दिशा दें, वे सब गुरु हैं। यदि सम्मान की यह संस्कृति टूटेगी तो समाज का नैतिक आधार भी कमजोर होगा।

प्रश्न : पर्यावरण संरक्षण को लेकर श्री सर्वेश्वरी समूह क्या कार्य कर रहा है?

स्वामी जी : प्रकृति की रक्षा मानव अस्तित्व की रक्षा है। यदि जंगल नहीं रहेंगे, जल स्रोत समाप्त हो जाएंगे और जैव विविधता नष्ट होगी तो मानव जीवन भी सुरक्षित नहीं रह सकेगा। हमारे समूह ने लाखों बीज-बॉल तैयार कर जंगल क्षेत्रों में विसर्जित किए हैं ताकि प्राकृतिक रूप से वृक्ष उग सकें। पक्षियों के लिए दाना-पानी, जल संरक्षण, देशी पशुधन संरक्षण और पर्यावरण जागरण के कार्यक्रम लगातार चल रहे हैं। यदि जंगल समाप्त होंगे तो मानव सभ्यता भी सुरक्षित नहीं रह सकेगी।

प्रश्न : शिक्षा के क्षेत्र में आपकी दृष्टि क्या है?

स्वामी जी : केवल डिग्री देना शिक्षा नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य संस्कारित नागरिक तैयार करना है। हमारे विद्यालयों में पुस्तक ज्ञान के साथ अनुशासन, राष्ट्रभक्ति, सेवा और संस्कृति पर बल दिया जाता है। जब बच्चा अपने समाज और देश के प्रति उत्तरदायित्व समझने लगता है, तभी शिक्षा सार्थक होती है।

प्रश्न : सेवा कार्यों के कुछ प्रमुख उदाहरण बताइए।

स्वामी जी : चिकित्सा सहायता, वस्त्र वितरण, कंबल वितरण, जनजातीय क्षेत्रों में राहत, आपदा सहायताये सब निरंतर चलने वाले कार्य हैं। छत्तीसगढ़ और अन्य दूरस्थ क्षेत्रों में हमारी टोली पहुँची तो लोगों ने कहा कि पहली बार कोई संस्था उनकी समस्याएँ सुनने आई है। सेवा का अर्थ यही हैजहाँ कोई पहुँचे, वहाँ पहुँचना।

प्रश्न : समाज के लिए आपका अंतिम संदेश?

स्वामी जी : यदि समाज में शांति चाहिए तो हमें अपने भीतर झांकना होगा। ईश्वर हमारे भीतर की चेतना है। जब भीतर परिवर्तन होता है तो व्यवहार बदलता है, परिवार बदलता है और समाज बदलने लगता है। आडंबर छोड़िए, संस्कार अपनाइए। प्रतिस्पर्धा छोड़िए, सहयोग बढ़ाइए। गुरु के बताए मार्ग पर चलिए। यही शांति, समरसता और सुदृढ़ समाज का सबसे सरल मार्ग है। स्वामी जी ने युवाओं से महापुरुषों के जीवन और विचारों का अध्ययन, मनन और आत्मसात करने का आह्वान किया। मैं जब आश्रम से लौट रहा था उस वक्त शाम उतर रही थी। भजन की ध्वनि दूर तक फैल रही थी। बातचीत का सबसे गहरा वाक्य मन में बार-बार गूंजता रहा—"परिवार टूट रहे हैं क्योंकि प्रदर्शन ने रिश्तों की आत्मा को ढक लिया है।" शायद यही इस संवाद का सार है। गुरु पूर्णिमा केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर बचे हुए मनुष्य को खोजने का अवसर भी है।

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