गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर संत चरणों में पहुंचा पत्रकार समाज
सर्वेश्वरी समूह
के
अध्यक्ष
बाबा
औघड़
संभव
राम
जी
को
काशी
पत्रकार
संघ
की
डायरी
भेंट,
लिया
आशीर्वचन
सुरेश गांधी
वाराणसी। काशी की आध्यात्मिक
परंपरा में गुरु पूर्णिमा
केवल एक पर्व नहीं,
बल्कि ज्ञान, साधना और संस्कारों के
प्रति समर्पण का महोत्सव है।
इसी पावन भावना के
साथ गुरु पूर्णिमा की
पूर्व संध्या पर काशी पत्रकार
संघ के महामंत्री जितेन्द्र
श्रीवास्तव ने श्री सर्वेश्वरी
समूह के अध्यक्ष बाबा
औघड़ संभव राम जी
से भेंट कर संघ
की वार्षिक डायरी समर्पित की तथा उनका
आशीर्वचन प्राप्त किया।
सर्वेश्वरी समूह के आश्रम में आयोजित यह आत्मीय मुलाकात श्रद्धा, संवाद और सामाजिक उत्तरदायित्व का अद्भुत संगम बन गई। काशी की संत परंपरा और पत्रकारिता के दायित्वों पर हुए विमर्श में बाबा औघड़ संभव राम जी ने कहा कि पत्रकार समाज की सजग चेतना का प्रतिनिधि होता है। सत्य, संवेदना और लोककल्याण की भावना से किया गया लेखन समाज को सही दिशा देता है। उन्होंने पत्रकारों से सकारात्मक दृष्टि, नैतिक मूल्यों और जनहित को सर्वोपरि रखने का आह्वान किया।
महामंत्री जितेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि
काशी पत्रकार संघ सदैव समाज,
संस्कृति और जनसरोकारों के
प्रश्नों को प्रमुखता से
उठाने के लिए प्रतिबद्ध
रहा है। गुरु पूर्णिमा
की पूर्व संध्या पर संत चरणों
में उपस्थित होकर आशीर्वाद प्राप्त
करना संघ के लिए
गौरव और प्रेरणा का
विषय है। उन्होंने बाबा
औघड़ संभव राम जी
को संघ की गतिविधियों
की जानकारी भी दी।
इस अवसर पर
उपस्थित पत्रकारों ने काशी की
संत परंपरा, सामाजिक समरसता और जनसेवा के
क्षेत्र में सर्वेश्वरी समूह
की भूमिका की सराहना की।
आश्रम का वातावरण वैदिक
मंगलध्वनि, आध्यात्मिक शांति और आत्मीय संवाद
से अनुप्राणित रहा।
भेंट कार्यक्रम में
काशी पत्रकार संघ के पूर्व
अध्यक्ष केडीएन राय, उपाध्यक्ष पुरुषोत्तम
चतुर्वेदी, उमेश गुप्ता, सुरेश
गांधी, विजय शंकर गुप्ता,
ज्ञान सिंह रौतेला, संजय
सिंह, अवधेश सिंह सहित अनेक
पत्रकार उपस्थित रहे। सभी ने
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर
पर संत चरणों में
श्रद्धा अर्पित करते हुए समाज
में सद्भाव, सेवा और सकारात्मक
पत्रकारिता के संकल्प को
दोहराया।
गुरु पूर्णिमा की
पूर्व संध्या पर आयोजित यह
आत्मीय मिलन काशी की
उस जीवंत परंपरा का प्रतीक बना,
जहां ज्ञान, अध्यात्म और समाजसेवा एक
साथ प्रवाहित होते हैं। पत्रकार
समाज का संतों से
संवाद केवल औपचारिकता नहीं,
बल्कि लोकमंगल की साझा चेतना
का सशक्त संदेश बनकर उभरा.


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