Saturday, 11 July 2026

राम मंदिर से ताजमहल तक : साक्ष्य बोलेंगे, इतिहास खुद गवाही देगा

राम मंदिर से ताजमहल तक : साक्ष्य बोलेंगे, इतिहास खुद गवाही देगा

सुरेश गांधी

राम जन्मभूमि के निर्णय के बाद देश में जिन धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों ने सबसे अधिक चर्चा बटोरी, उनमें वाराणसी का ज्ञानवापी परिसर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, धार की भोजशाला, दिल्ली का कुतुब मीनार परिसर और संभल के धार्मिक स्थल प्रमुख हैं। और अगर देश की न्यायिक और वैचारिक बहस के केंद्र में आज यदि कोई अधिवक्ता सबसे अधिक चर्चा में है, तो वह हैं सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन। इन बहुचर्चित मामलों में उनकी कानूनी रणनीति, अदालतों में पेश किए गए तर्क और ऐतिहासिक दस्तावेज़ लगातार राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं। समर्थकों के लिए वे भारतीय इतिहास के विवादित अध्यायों को न्यायपालिका के समक्ष साक्ष्यों के आधार पर रखने वाले अधिवक्ता हैं, जबकि आलोचक उनके मुकदमों को अलग नजरिए से देखते हैं। सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी से हुई विस्तृत और बेबाक बातचीत में विष्णु शंकर जैन ने पहली बार एक साथ उन सभी महत्वपूर्ण मामलों पर विस्तार से अपनी कानूनी सोच, रणनीति और तर्क रखे, जिनकी देशभर में चर्चा है। उनका कहना है कि उनकी पूरी लड़ाई किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, बल्कि संविधान, न्यायपालिका और साक्ष्यों के माध्यम से उन ऐतिहासिक प्रश्नों का समाधान तलाशने की है, जिन्हें उनके अनुसार लंबे समय तक अनुत्तरित छोड़ दिया गया। राम मंदिर की लड़ाई ने भारत की न्यायिक चेतना बदल दी, अब इतिहास के अनुत्तरित प्रश्न अदालत के दरवाजे पर हैं. कोर्ट में जाने का अधिकार किसी समुदाय ने नहीं दिया, संविधान ने दिया है न्यायालय केवल तर्क, साक्ष्य और कानून से चलता है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का कहना है कि राम जन्मभूमि आंदोलन की न्यायिक विरासत से प्रेरित होकर उन्होंने श्रीकृष्ण जन्मभूमि, ज्ञानवापी, भोजशाला, कुतुब मीनार, ताजमहल और अन्य विवादित स्थलों से जुड़े मुकदमों में हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व किया है। उनकी पूरी लड़ाई किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि संविधान, न्यायपालिका और साक्ष्यों के माध्यम से इतिहास के उन प्रश्नों का उत्तर खोजने की है, जिन्हें उनके अनुसार दशकों तक अनदेखा किया गया। राम मंदिर के सात दशक लंबे मुकदमे से लेकर ज्ञानवापी के वैज्ञानिक सर्वेक्षण, श्रीकृष्ण जन्मभूमि, भोजशाला, संभल, कुतुब मीनार और ताजमहल से जुड़े मुकदमों तक, जैन इस विशेष बातचीत में अपने पक्ष के दस्तावेज़ों, कानूनी आधारों और न्यायिक दृष्टिकोण को विस्तार से रखते हैं। उनके अनुसार ताजमहल से जुड़े कई ऐतिहासिक प्रश्न ऐसे हैं, जिनकी न्यायिक और वैज्ञानिक जांच होनी चाहिए। उनका कहना है कि अदालत में उठाए गए उनके सभी प्रश्न उपलब्ध दस्तावेजों, ऐतिहासिक स्रोतों और शोध सामग्री पर आधारित हैं। प्रस्तुत है वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन से सीनियर रिपोर्टर सुरेश गांधी की विशेष बातचीत के कुछ प्रमुख अंश:-

प्रश्न : ताजमहल को लेकर आपकी याचिका का मूल उद्देश्य क्या है?

विष्णु शंकर जैन : सबसे पहले मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि हमारा उद्देश्य किसी स्मारक का अपमान करना या किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। हमारा आग्रह केवल इतना है कि जिन प्रश्नों पर वर्षों से बहस होती रही है, उनकी निष्पक्ष जांच हो। हमने न्यायालय में कहा है कि ताजमहल परिसर के कुछ बंद कमरों को वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत खोला जाए और यदि आवश्यक हो तो विशेषज्ञों की टीम उनकी जांच करे। यदि उन कमरों में कुछ नहीं है, तो वह भी सामने जाएगा; यदि कुछ ऐतिहासिक सामग्री है, तो उसका भी वस्तुनिष्ठ परीक्षण होना चाहिए।

प्रश्न : आप बार-बार कहते हैं कि 'ताजमहल प्यार की निशानी' वाली कथा अधूरी है। आपका आशय क्या है?

विष्णु शंकर जैन : यह मेरी कानूनी और ऐतिहासिक बहस का हिस्सा है। मैंने सार्वजनिक रूप से कहा है कि उपलब्ध स्रोतों का पुनर्परीक्षण होना चाहिए। मेरे अनुसार कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों और अभिलेखों में ऐसे संदर्भ हैं जिनकी न्यायिक समीक्षा आवश्यक है। मैं अदालत से यही कह रहा हूँ कि यदि किसी दावे के समर्थन में दस्तावेज प्रस्तुत किए गए हैं, तो उनकी जांच कराई जाए। किसी भी ऐतिहासिक निष्कर्ष तक पहुँचने का सही तरीका यही है।

प्रश्न : आपने अपने वक्तव्य में बादशाहनामा और राजा जय सिंह का भी उल्लेख किया।

विष्णु शंकर जैन : जी। हमारी याचिका में जिन ऐतिहासिक स्रोतों का उल्लेख किया गया है, उनमें कुछ मुगलकालीन दस्तावेज भी शामिल हैं। हमारा पक्ष है कि उन स्रोतों का समग्र अध्ययन होना चाहिए। हमने अदालत में यह कहा है कि यदि किसी दस्तावेज में किसी संपत्ति के आदान-प्रदान या पूर्व अस्तित्व का उल्लेख मिलता है, तो उसका परीक्षण होना चाहिए। अदालत का काम ही यही है कि वह दस्तावेजों की प्रमाणिकता और महत्व का मूल्यांकन करे।

प्रश्न : आपने बंद कमरों और कथित मूर्तियों का भी उल्लेख किया है।

विष्णु शंकर जैन : मैंने जो कहा है, वह हमारे शोध और हमें उपलब्ध सूचनाओं पर आधारित है। हमने यह दावा अदालत के समक्ष रखा है कि परिसर के कुछ हिस्सों की जांच आवश्यक है। मैं किसी निष्कर्ष की घोषणा नहीं कर रहा। मेरा कहना केवल इतना है कि यदि कोई प्रश्न उठाया गया है, तो उसका उत्तर वैज्ञानिक और न्यायिक प्रक्रिया से मिलना चाहिए। अदालत यदि जांच कराती है, तो वही निष्कर्ष सबके सामने आएगा। हमें उसी पर विश्वास है।

प्रश्न : अक्सर कहा जाता है कि राम मंदिर के बाद अब एक के बाद एक नए विवाद खड़े किए जा रहे हैं। आप इसे किस नजर से देखते हैं?

विष्णु शंकर जैन : मैं इस सोच से बिल्कुल सहमत नहीं हूं। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि राम जन्मभूमि का मुकदमा कोई दो-चार वर्षों की लड़ाई नहीं थी। यह लगभग सात दशकों तक चली न्यायिक प्रक्रिया थी। 1950 में पहला मुकदमा दायर हुआ। उसके बाद वर्षों तक विभिन्न अदालतों में सुनवाई होती रही। 1989 में मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा। वहां लगभग तीस वर्षों तक मुकदमा चला। सैकड़ों दस्तावेज प्रस्तुत हुए, हजारों पृष्ठों के साक्ष्य रिकॉर्ड हुए, गवाहियां हुईं और उसके बाद 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और वहां भी कई वर्षों तक गहन सुनवाई हुई। अंततः 9 नवंबर 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक निर्णय सुनाया। अब यदि कोई कहता है कि "हिंदू पक्ष को अदालत में जाने की अनुमति दे दी गई", तो मैं पूछना चाहता हूंअनुमति देने वाला कौन होता है? भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को न्यायालय जाने का अधिकार देता है। न्यायपालिका किसी समुदाय की इच्छा से नहीं चलती। न्यायालय केवल संविधान, साक्ष्यों और कानून के आधार पर चलता है।

प्रश्न : लेकिन यह भी कहा जाता है कि राम मंदिर का फैसला एक अपवाद था।

विष्णु शंकर जैन : बिल्कुल नहीं। राम मंदिर का निर्णय भारतीय न्यायशास्त्र में कई महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्पष्ट करता है। सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि यदि किसी मंदिर को तोड़ दिया जाए, तब भी वहां विराजमान देवता का विधिक अस्तित्व समाप्त नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि देवता का अधिकार बना रहता है। यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय विधि व्यवस्था में मान्यता प्राप्त सिद्धांत है। यही कारण है कि राम जन्मभूमि का फैसला केवल एक भूमि विवाद का निस्तारण नहीं था। इसने आगे आने वाले अनेक मामलों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी आधार भी तैयार किया।

प्रश्न : आपने कई बार देवकीनंदन अग्रवाल का उल्लेख किया है। उन्हें इतना महत्वपूर्ण क्यों मानते हैं?

विष्णु शंकर जैन : मैं हमेशा कहता हूं कि हमें न्यायमूर्ति देवकीनंदन अग्रवाल का आभार व्यक्त करना चाहिए। उन्होंने 1989 में भगवान श्रीरामलला विराजमान की ओर से 'नेक्स्ट फ्रेंड' बनकर मुकदमा दायर किया। यह भारतीय न्यायिक इतिहास की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। इसी मुकदमे ने यह सिद्ध किया कि यदि किसी देवस्थान के अधिकारों की रक्षा करनी हो तो भगवान के नाम से भी मुकदमा दायर किया जा सकता है। यही सिद्धांत आगे चलकर श्रीकृष्ण जन्मभूमि सहित अन्य मामलों में भी लागू हुआ।

प्रश्न : क्या यही कारण था कि आपने श्रीकृष्ण जन्मभूमि का मुकदमा दायर किया?

विष्णु शंकर जैन : बिल्कुल। राम मंदिर के निर्णय के बाद न्यायिक स्थिति अधिक स्पष्ट हो गई थी। उसके बाद हमने 25 सितंबर 2020 को भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की ओर से मुकदमा दायर किया। हमारा उद्देश्य किसी से संघर्ष करना नहीं था। हमारा उद्देश्य केवल इतना था कि न्यायालय उपलब्ध दस्तावेजों, ऐतिहासिक अभिलेखों और साक्ष्यों की जांच करे। हम मानते हैं कि यदि किसी पक्ष के पास साक्ष्य हैं तो उनका परीक्षण अदालत में होना चाहिए, कि टीवी बहसों या राजनीतिक मंचों पर।

प्रश्न : आपके विरोधी कहते हैं कि यह सब राजनीतिक एजेंडा है।

विष्णु शंकर जैन : यदि यह राजनीतिक एजेंडा होता तो हम अदालत क्यों जाते? राजनीति सड़क पर होती है। अदालत में केवल दस्तावेज चलते हैं। हमारे हर मुकदमे में हजारों पृष्ठों के दस्तावेज, ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक संदर्भ और कानूनी आधार प्रस्तुत किए गए हैं। यदि हमारे पास साक्ष्य नहीं होंगे तो अदालत एक दिन भी हमारी बात नहीं सुनेगी। इसलिए मैं बार-बार कहता हूं कि यह पूरी लड़ाई केवल तर्क, साक्ष्य और कानून की है।

प्रश्न : प्लेस आॅफ वर्शिप एक्ट Places of Worship Act को लेकर भी आपकी स्पष्ट राय रही है।

विष्णु शंकर जैन : यह कानून आज देश के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों में से एक है। हमने सर्वोच्च न्यायालय में इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। हमारा कहना है कि यदि किसी व्यक्ति का मौलिक अधिकार प्रभावित होता है, यदि किसी धार्मिक स्थल के संबंध में ऐतिहासिक अन्याय का प्रश्न उठता है, तो न्यायालय के दरवाजे बंद नहीं किए जा सकते। अंतिम निर्णय सर्वोच्च न्यायालय करेगा, लेकिन हमें अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है।

प्रश्न : आपको व्यक्तिगत रूप से सबसे बड़ी प्रेरणा कहां से मिली?

विष्णु शंकर जैन : मेरे पिता वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन ने जीवन भर ऐसे मुकदमे लड़े। उस समय उनका मजाक उड़ाया गया, उन्हें तरह-तरह के विशेषण दिए गए, लेकिन उन्होंने अपने विश्वास और कानूनी तैयारी से कभी समझौता नहीं किया। मैंने उनसे एक ही बात सीखी कि अदालत में भावनाएं नहीं, बल्कि साक्ष्य बोलते हैं। आज यदि देश में इन विषयों पर खुलकर चर्चा हो रही है तो उसके पीछे वर्षों की कानूनी तैयारी और न्यायपालिका पर विश्वास है।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि देश की नई पीढ़ी इन मामलों को अलग नजरिए से देख रही है?

विष्णु शंकर जैन : बिल्कुल। सबसे बड़ा परिवर्तन यही है। पहले इन विषयों पर बात करना भी कठिन माना जाता था। आज लोग दस्तावेज पढ़ना चाहते हैं, न्यायालय के आदेश समझना चाहते हैं और इतिहास को प्रमाणों के साथ जानना चाहते हैं। मेरे लिए यही सबसे बड़ी उपलब्धि है कि अब बहस भावनाओं से आगे बढ़कर अदालतों और साक्ष्यों तक पहुंच रही है। और मैं हमेशा यही कहता हूंयदि हमारे तर्क गलत हैं तो अदालत उन्हें खारिज कर देगी, लेकिन यदि सही हैं तो न्याय अवश्य मिलेगा। हमें भारतीय न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है। ज्ञानवापी हो, भोजशाला, संभल या कुतुब मीनारहम सड़क पर नहीं, अदालत में इतिहास के साक्ष्य रख रहे हैं. हमारा उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि न्यायालय के समक्ष प्रमाणों की जांच कराना है.

प्रश्न : आलोचक कहते हैं कि एक के बाद एक नए धार्मिक स्थल अदालत में ले जाकर विवाद पैदा किए जा रहे हैं।

विष्णु शंकर जैन : मैं इस आरोप को स्वीकार नहीं करता। यदि कोई व्यक्ति अदालत जाता है, याचिका दायर करता है और न्यायालय उसे सुनता है, तो इसका अर्थ है कि मामला विधिक परीक्षण योग्य है। न्यायालय किसी भी याचिका को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करता कि किसी की इच्छा है। अदालत पहले यह देखती है कि क्या कोई कानूनी प्रश्न बनता है, क्या प्रथम दृष्टया सुनवाई का आधार है और क्या प्रस्तुत दस्तावेज विचारणीय हैं। हम किसी के विरुद्ध आंदोलन नहीं चला रहे। हम न्यायालय से केवल इतना कह रहे हैं कि उपलब्ध अभिलेखों, साक्ष्यों और दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच की जाए।

प्रश्न : ज्ञानवापी प्रकरण में आपकी सबसे महत्वपूर्ण दलील क्या रही?

विष्णु शंकर जैन : ज्ञानवापी का मुकदमा हमारे लिए केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि विधिक अधिकारों का भी प्रश्न है। हमने अदालत के समक्ष यह आग्रह किया कि परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया जाए ताकि जो भी वास्तविक स्थिति है, वह न्यायालय के सामने आए। हमारा कहना है कि न्यायालय अनुमान के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर निर्णय देता है। यदि किसी पक्ष के पास ऐतिहासिक या पुरातात्विक साक्ष्य हैं, तो उन्हें जांच की प्रक्रिया से गुजरना चाहिए। इसी कारण हमने सर्वेक्षण की मांग की और न्यायालय ने विधिक प्रक्रिया के अनुसार आवश्यक आदेश दिए। आगे क्या निष्कर्ष निकलते हैं, यह न्यायालय तय करेगा।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि एएसआई जैसी संस्थाओं की भूमिका निर्णायक है?

विष्णु शंकर जैन : बिल्कुल। अदालत किसी भी विवादित ऐतिहासिक प्रश्न पर विशेषज्ञ संस्थाओं की रिपोर्ट को महत्व देती है। पुरातत्व, वास्तुशिल्प, अभिलेख और अन्य वैज्ञानिक प्रमाण न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते हैं। हमारा आग्रह हमेशा यही रहा है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उपलब्ध वैज्ञानिक सामग्री का परीक्षण होना चाहिए।

प्रश्न : संभल के मामलों को लेकर भी आपने कई बार कहा कि वहां भी न्यायिक परीक्षण आवश्यक है। क्यों?

विष्णु शंकर जैन : संभल को लेकर भी हमारा दृष्टिकोण वही है जो अन्य मामलों में है। यदि किसी पक्ष का दावा है कि किसी स्थल का धार्मिक या ऐतिहासिक स्वरूप अलग था, तो उसका निर्णय मीडिया करेगी, राजनीति करेगी। उसका निर्णय अदालत करेगी। मैं हमेशा कहता हूं कि न्यायालय के सामने दोनों पक्षों को समान अवसर मिलता है। हलफनामे दाखिल होते हैं, दस्तावेज रखे जाते हैं, जिरह होती है और फिर निर्णय आता है। इसलिए किसी मुकदमे को केवल इसलिए गलत नहीं कहा जा सकता कि वह किसी संवेदनशील विषय से जुड़ा है।

प्रश्न : भोजशाला को लेकर आपने कई ऐतिहासिक संदर्भों का उल्लेख किया है।

विष्णु शंकर जैन : भोजशाला का मामला हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। हमने न्यायालय के समक्ष अनेक ऐतिहासिक स्रोत, अभिलेख और दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। हमारा कहना है कि वहां उपलब्ध साक्ष्यों का विधिक परीक्षण होना चाहिए। मैंने न्यायालय में यह भी रखा कि अतीत में अनेक विद्वानों, अधिकारियों और यात्रियों ने उस परिसर का उल्लेख अलग-अलग रूपों में किया है। इन सभी दस्तावेजों का मूल्यांकन अदालत के समक्ष होना चाहिए।

प्रश्न : आपने अपने वक्तव्य में ब्रिटिश काल के अभिलेखों और संग्रहालयों का भी उल्लेख किया।

विष्णु शंकर जैन : जी हाँ। हमारे अनुसार अनेक ऐसे ऐतिहासिक दस्तावेज, यात्रा-वृत्तांत और औपनिवेशिक काल के रिकॉर्ड हैं जिनका अध्ययन आवश्यक है। हमने अदालत में यह भी कहा है कि उपलब्ध अभिलेखों और पुरावशेषों का महत्व केवल इतिहास के लिए नहीं, बल्कि न्यायिक निर्णय के लिए भी है। जहाँ-जहाँ हमें ऐसे दस्तावेज मिले हैं, हमने उन्हें रिकॉर्ड का हिस्सा बनाया है। हमारा प्रयास यही है कि न्यायालय किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले अधिकतम सामग्री देखे।

प्रश्न : कुतुब मीनार परिसर को लेकर आपकी याचिका का मूल आधार क्या है?

विष्णु शंकर जैन : कुतुब मीनार परिसर के संबंध में भी हमने ऐतिहासिक अभिलेखों, स्थापत्य संबंधी तथ्यों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। हमारा पक्ष है कि यदि किसी ऐतिहासिक दावे पर गंभीर प्रश्न उठते हैं, तो न्यायालय को उसकी सुनवाई करनी चाहिए। हमारा उद्देश्य किसी स्मारक को लेकर विवाद खड़ा करना नहीं, बल्कि न्यायिक परीक्षण कराना है। अदालत जो निर्णय देगी, वही सभी के लिए स्वीकार्य होना चाहिए।

प्रश्न : आपके विरोधियों का कहना है कि इन मुकदमों से सामाजिक तनाव बढ़ता है।

विष्णु शंकर जैन : मैं इसका उल्टा मानता हूँ। यदि कोई विवाद अदालत में है, तो उसका समाधान कानून के दायरे में होगा। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। सड़क पर टकराव की जगह न्यायालय में बहस होना कहीं अधिक स्वस्थ प्रक्रिया है। मैं हमेशा अपने मुवक्किलों से भी कहता हूँ कि अदालत के बाहर कोई संघर्ष नहीं होना चाहिए। न्यायपालिका पर विश्वास रखिए, जो निर्णय आएगा वही सर्वोपरि होगा।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि आने वाले वर्षों में ऐसे और मुकदमे सामने आएंगे?

विष्णु शंकर जैन : यह इस बात पर निर्भर करेगा कि लोग किन विषयों को लेकर अदालत जाते हैं और उनके पास क्या सामग्री है। मेरा सिद्धांत बहुत स्पष्ट हैदावा तभी कीजिए जब आपके पास दस्तावेज, अभिलेख और विधिक आधार हो। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूँ कि इतिहास का पुनर्पाठ भावनाओं से नहीं, बल्कि न्यायिक परीक्षण, शोध और प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। यदि कोई दावा टिकाऊ है, तो वह अदालत में टिकेगा; यदि नहीं है, तो न्यायालय उसे स्वीकार नहीं करेगा। यही भारतीय न्याय व्यवस्था की शक्ति है।

प्रश्न : आपके आलोचक कहते हैं कि आप इतिहास को अदालत में ले जा रहे हैं।

विष्णु शंकर जैन : इतिहास और कानून कई बार एक-दूसरे से जुड़ते हैं। जब किसी संपत्ति, धार्मिक अधिकार या ऐतिहासिक दावे पर न्यायिक विवाद उत्पन्न होता है, तब अदालत को इतिहास, अभिलेख, पुरातत्व और साक्ष्यसबका अध्ययन करना पड़ता है। हम इतिहास लिखने नहीं गए हैं। हम न्यायालय से यह कह रहे हैं कि उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करिए और जो सत्य हो, उसे स्वीकार कीजिए।

प्रश्न : आपने कहा कि आपके पिता ने भी ऐसे मामलों में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।

विष्णु शंकर जैन : मेरे पिता वरिष्ठ अधिवक्ता हरिशंकर जैन ने दशकों तक ऐसे विषयों पर काम किया। उस समय उन्हें आलोचना भी झेलनी पड़ी, लेकिन उन्होंने कभी अदालत के बाहर संघर्ष का रास्ता नहीं चुना। उन्होंने हमेशा कहा कि यदि आपके पास साक्ष्य हैं तो न्यायालय जाइए। यदि साक्ष्य नहीं हैं, तो दावा मत कीजिए। यही शिक्षा मुझे उनसे मिली।

प्रश्न : क्या आपको लगता है कि आने वाले वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ेगी?

विष्णु शंकर जैन : यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा मामला विधिक रूप से टिकाऊ है। केवल भावनाओं के आधार पर कोई मुकदमा सफल नहीं हो सकता। अदालत दस्तावेज मांगती है, अभिलेख मांगती है, गवाह मांगती है और कानूनी आधार मांगती है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि यदि किसी के पास प्रमाण हैं, तो वह अदालत जाए। यदि प्रमाण नहीं हैं, तो समाज को अनावश्यक विवाद में नहीं डालना चाहिए।

प्रश्न : अंत में, आप देशवासियों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

विष्णु शंकर जैन : मेरा संदेश बहुत स्पष्ट है। भारत का संविधान हर नागरिक को न्याय पाने का अधिकार देता है। यदि किसी विषय पर मतभेद है, तो उसका समाधान न्यायपालिका करेगी। मैं किसी से यह नहीं कहता कि मेरी बात मान लीजिए। मैं केवल इतना कहता हूँ कि अदालत में रखे गए दस्तावेजों, न्यायालय की कार्यवाही और अंतिम निर्णय को पढ़िए। यदि हमारे तर्क गलत होंगे तो न्यायालय उन्हें स्वीकार नहीं करेगा; यदि सही होंगे, तो न्याय मिलेगा। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि अंतिम निर्णय कानून और न्यायपालिका करती है, कि भीड़, नारे और पूर्वाग्रह।

No comments:

Post a Comment

राम मंदिर से ताजमहल तक : साक्ष्य बोलेंगे, इतिहास खुद गवाही देगा

राम मंदिर से ताजमहल तक : साक्ष्य बोलेंगे , इतिहास खुद गवाही देगा सुरेश गांधी राम जन्मभूमि के निर्णय के बाद देश में जि...