दस पुत्रों से बढ़कर एक वृक्ष, तभी बचेगी धरती…
पर्यावरण बचेगा तभी पृथ्वी पर जीवन बचेगा। इसलिए समय की सबसे बड़ी मांग केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि वृक्षरक्षण भी है। "दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः। दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः॥" मत्स्य पुराण का यह श्लोक केवल धार्मिक वाक्य नहीं, बल्कि भारतीय पर्यावरण दर्शन का कालजयी घोषणा-पत्र है। मतलब साफ है दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष। संसार की शायद ही कोई सभ्यता होगी जिसने एक वृक्ष का मूल्य मनुष्य की दस पीढ़ियों से भी अधिक बताया हो। यही भारत की ऋषि-परंपरा का वह विराट चिंतन है, जिसने हजारों वर्ष पहले समझ लिया था कि यदि जल और जंगल सुरक्षित हैं, तभी जीवन सुरक्षित है। वृक्ष पृथ्वी पर जीवन के सबसे मौन, किंतु सबसे प्रभावशाली संरक्षक हैं। वे बोलते नहीं, लेकिन सांसें देते हैं। वे मांगते कुछ नहीं, लेकिन छाया, फल, औषधि, वर्षा और जीवन सब कुछ लौटाते हैं। उनकी जड़ें धरती को थामती हैं, उनकी शाखाएं बादलों को बुलाती हैं और उनकी हरियाली आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करती है। इसलिए आज का सबसे बड़ा मंत्र यही है वृक्षारोपण के साथ वृक्षरक्षण. धरती ने हमें जीवन दिया है। अब उसे जीवन लौटाने की जिम्मेदारी हमारी है। आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह नहीं पूछेंगी कि हमने कितनी ऊँची इमारतें बनाईं, बल्कि यह जरूर पूछेंगी कि हमने उनके लिए कितने पेड़ छोड़े। इसलिए समय की पुकार है एक नागरिक, एक पौधा नहीं; एक नागरिक, अनेक पौधे और जीवनभर उनका संरक्षण. आज लगाया गया एक पौधा, आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे अनमोल विरासत बन सकता है। वृक्ष लगाइए, उन्हें बचाइए और धरती को फिर से हरा-भरा बनाइए
सुरेश गांधी
आज पूरी दुनिया
जलवायु परिवर्तन की विभीषिका से
जूझ रही है। कहीं
भीषण गर्मी लोगों का जीवन मुश्किल
बना रही है, तो
कहीं असमय वर्षा और
बाढ़ तबाही मचा रही है।
ग्लेशियर तेजी से पिघल
रहे हैं, भूजल का
स्तर लगातार नीचे जा रहा
है और वायु प्रदूषण
करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य के
लिए खतरा बन चुका
है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं
कि यदि पृथ्वी का
औसत तापमान इसी गति से
बढ़ता रहा, तो आने
वाले दशकों में जीवन और
अधिक कठिन हो जाएगा।
इन चुनौतियों का सबसे सरल,
सस्ता और प्रभावी समाधान
वृक्ष हैं। पेड़ केवल
ऑक्सीजन देने वाली प्राकृतिक
मशीन नहीं हैं। वे
धरती के मौन प्रहरी
हैं। उनकी जड़ें मिट्टी
को बांधती हैं, वर्षा के
जल को धरती में
समाहित करती हैं, नदियों
को जीवन देती हैं,
पक्षियों और वन्यजीवों को
आश्रय देती हैं तथा
वातावरण में मौजूद कार्बन
डाइऑक्साइड को अवशोषित कर
जलवायु परिवर्तन की गति को
धीमा करती हैं। एक
बड़ा वृक्ष प्रतिदिन अनेक लोगों के
लिए आवश्यक ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की क्षमता रखता
है। वह अपने आसपास
के तापमान को भी कम
करता है और वातावरण
को संतुलित बनाए रखता है।
लेकिन विकास की अंधी दौड़
में जब जंगल सिकुड़ते
गए, तालाब मिटते गए और भूजल
धरती की गहराइयों में
खोता गया, तब प्रकृति
ने भी अपने संकेत
देने शुरू कर दिए।
गर्मी नए रिकॉर्ड बनाने
लगी, वर्षा का चक्र असंतुलित
हो गया, बाढ़ और
सूखे की घटनाएं बढ़ने
लगीं। मौसम का मिजाज
बदल गया। किसानों की
फसलें अनिश्चितता के हवाले होने
लगीं। जो ऋतुचक्र कभी
प्रकृति का अनुशासित विधान
था, वह अब असंतुलन
का दर्पण बन चुका है।
ऐसे समय में वृक्षारोपण
केवल सरकारी अभियान नहीं, बल्कि हर नागरिक का
जीवनभर निभाया जाने वाला संकल्प
होना चाहिए। जब भी कोई
बच्चा जन्म लेता है,
तो उसके स्वागत में
मिठाइयाँ बांटी जाती हैं, खुशियाँ
मनाई जाती हैं। कल्पना
कीजिए, यदि उसी दिन
उसके नाम पर एक
पौधा भी लगाया जाए,
तो वह पौधा और
वह बच्चा साथ-साथ बड़े
होंगे। एक दिन वह
पौधा विशाल वृक्ष बनकर न केवल
उस बच्चे, बल्कि पूरे समाज को
शुद्ध हवा, छाया और
जीवन देगा। शायद यही वह
विचार है, जो आने
वाले भारत को सुरक्षित
और समृद्ध बना सकता है।
विडंबना यह है कि
जिस विकास पर हमें गर्व
है, उसी विकास ने
सबसे अधिक पेड़ों की
बलि ली है। नई
सड़कें बनीं, इमारतें खड़ी हुईं, कॉलोनियाँ
बस गईं, लेकिन हरियाली
लगातार सिमटती चली गई। शहरों
में अब कंक्रीट की
दीवारें तो हैं, मगर
छांव देने वाले पेड़
कम होते जा रहे
हैं। परिणामस्वरूप 'हीट आइलैंड' जैसी
समस्या तेजी से बढ़
रही है, जहां शहरों
का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों
से कई डिग्री अधिक
दर्ज किया जाता है।
उत्तर प्रदेश भी इस संकट
से अछूता नहीं था। एक
दशक पहले तक पर्यावरण
संरक्षण सरकारी प्राथमिकताओं के हाशिये पर
था। वनभूमि घट रही थी,
जलस्रोत पाटे जा रहे
थे और वृक्षारोपण अधिकतर
औपचारिकता बनकर रह गया
था। वर्ष 2017 में जब मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश की
बागडोर संभाली, तब वन विभाग
की नर्सरियों में मात्र पाँच
लाख पौधे उपलब्ध थे।
यह संख्या उस प्रदेश के
लिए चिंता का विषय थी,
जो कभी ऋषियों, आश्रमों
और घने वनों की
पहचान हुआ करता था।
यहीं से हरित परिवर्तन की
एक नई यात्रा शुरू
हुई।
वृक्षारोपण को सरकारी कार्यक्रम
नहीं, बल्कि जनभागीदारी का महाअभियान बनाया
गया। गांवों से लेकर शहरों
तक, विद्यालयों से लेकर स्वयंसेवी
संस्थाओं तक, पंचायतों से
लेकर सरकारी विभागों तक हर किसी
की भूमिका तय की गई।
परिणाम यह हुआ कि
वर्ष 2017 से अब तक
प्रदेश में 242 करोड़ से अधिक पौधे
रोपे जा चुके हैं।
पर्यावरण दिवस पर एक
ही दिन में पाँच
करोड़ पौधों का रोपण हुआ
और अब 12 जुलाई को 35 करोड़ पौधे लगाने का
ऐतिहासिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
इस अभियान की सबसे बड़ी
शक्ति यह है कि
प्रदेश की नर्सरियों में
आज 57 करोड़ से अधिक पौधे
तैयार हैं, जो हरित
भविष्य की मजबूत नींव
बन सकते हैं। लेकिन
केवल पौधे लगा देना
पर्याप्त नहीं है। भारत
ने अतीत में भी
वन महोत्सव देखे हैं, करोड़ों
पौधे लगते भी देखे
हैं, परंतु उनमें से अधिकांश इसलिए
वृक्ष नहीं बन सके
क्योंकि उनकी रक्षा करने
वाला कोई नहीं था।
पौधा लगाना आसान
है, उसे वृक्ष बनाना
कठिन। इसलिए आज की सबसे
बड़ी आवश्यकता है कि हर
पौधे का एक संरक्षक
हो। जिस दिन समाज
यह जिम्मेदारी स्वीकार कर लेगा, उसी
दिन वृक्षारोपण अभियान वास्तव में सफल माना
जाएगा। इसी सोच को
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "एक
पेड़ मां के नाम"
अभियान ने नई ऊंचाई
दी है। भारतीय समाज
में मां केवल संबंध
नहीं, बल्कि संवेदना का सबसे ऊंचा
प्रतीक है। जब एक
पौधा मां के नाम
लगाया जाता है, तब
वह सरकारी लक्ष्य नहीं रहता, परिवार
की धरोहर बन जाता है।
यही भावनात्मक जुड़ाव किसी भी पर्यावरण
अभियान की सबसे बड़ी
शक्ति है। पर्यावरण संकट का सबसे
बड़ा आघात किसान झेल
रहा है। मौसम का
चक्र लगभग डेढ़ महीने
तक खिसक चुका है।
मानसून की अनिश्चितता, असमय
ओलावृष्टि, बढ़ती गर्मी और घटती नमी
ने खेती को जोखिम
का व्यवसाय बना दिया है।
दो-तीन बीघे की
खेती करने वाले किसान
के लिए यह बदलाव
केवल मौसम नहीं, बल्कि
आजीविका का संकट है।
ऐसे समय में वृक्ष
केवल हरियाली नहीं, बल्कि खेत, जल और
किसान—तीनों के रक्षक बनकर
सामने आते हैं।
हमारे पूर्वजों ने पीपल, बरगद,
नीम और बेल को
पूजा का विषय यूं
ही नहीं बनाया था।
उन्होंने पर्यावरण विज्ञान को आस्था का
स्वरूप दिया ताकि समाज
उन्हें कभी न काटे।
कुओं, बावड़ियों और तालाबों को
पुण्य कार्य इसलिए कहा गया कि
जल संरक्षण समाज की संस्कृति
बन जाए। आज विज्ञान
उन्हीं बातों को नए शब्दों
में दोहरा रहा है, जिन्हें
हमारी ऋषि परंपरा हजारों
वर्ष पहले जीवन का
आधार बता चुकी थी।
आज उत्तर प्रदेश में जो हरित
अभियान दिखाई दे रहा है,
वह केवल पौधों की
संख्या का खेल नहीं,
बल्कि उस सनातन चेतना
का पुनर्जागरण है, जिसने प्रकृति
को माता और वृक्षों
को जीवनदाता माना। विकास और पर्यावरण को
विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे का
पूरक मानने की यही सोच
भविष्य का रास्ता तय
करेगी। 242 करोड़ पौधों का संकल्प और
35 करोड़ पौधों का महालक्ष्य केवल
आंकड़े नहीं हैं; वे
आने वाली पीढ़ियों के
लिए लिखी जा रही
हरित इबारत हैं।
आज आवश्यकता केवल
एक पौधा लगाने की
नहीं, बल्कि उसे वृक्ष बनने
तक बचाने की है। क्योंकि
इतिहास गवाह है—सभ्यताएं
तलवारों से नहीं, जंगलों
के उजड़ने से समाप्त हुई
हैं। यदि पृथ्वी को
बचाना है, तो वृक्ष
बचाने होंगे। और यदि भविष्य
को हराभरा बनाना है, तो हर
हाथ को पौधा और
हर हृदय को उसका
प्रहरी बनना होगा। भारत
की संस्कृति में वृक्षों को
देवतुल्य माना गया है।
पीपल, बरगद, नीम, बेल, आंवला,
अशोक और तुलसी जैसे
पौधों का धार्मिक, सामाजिक
और औषधीय महत्व हजारों वर्षों से स्वीकार किया
जाता रहा है। हमारे
पूर्वज जानते थे कि प्रकृति
की रक्षा ही मानव जीवन
की रक्षा है। इसलिए उन्होंने
वृक्षों को पूजा, पर्व
और परंपराओं से जोड़ दिया।
आधुनिक विज्ञान आज वही बात
वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ दोहरा
रहा है।
हर वर्ष करोड़ों
पौधे लगाए जाते हैं।
रिकॉर्ड बनते हैं, तस्वीरें
प्रकाशित होती हैं और
अभियान समाप्त हो जाता है।
लेकिन असली सवाल यह
है कि उन पौधों
में से कितने अगले
वर्ष तक जीवित रहते
हैं? वृक्षारोपण की सफलता पौधों
की संख्या से नहीं, बल्कि
उनके जीवित रहने से तय
होती है। इसलिए अब
समय आ गया है
कि अभियान का स्वरूप बदला
जाए। हर पौधे की
जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति,
परिवार, विद्यालय, संस्था या ग्राम पंचायत
को सौंपी जाए। जब तक
पौधा वृक्ष न बन जाए,
उसकी देखभाल की व्यवस्था सुनिश्चित
हो। विद्यालयों में बच्चों को
केवल पर्यावरण पढ़ाने से काम नहीं
चलेगा। प्रत्येक छात्र के नाम पर
एक पौधा लगाने और
उसकी नियमित देखभाल करने की परंपरा
विकसित करनी होगी। यदि
हर बच्चा अपने लगाए हुए
पौधे को बड़ा होते
देखेगा, तो उसके भीतर
प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता
स्वतः विकसित होगी। यही संवेदनशीलता भविष्य
के भारत को पर्यावरण
के प्रति अधिक जिम्मेदार बनाएगी।
ग्रामीण भारत में वृक्षारोपण
आजीविका का भी मजबूत
आधार बन सकता है।
फलदार, औषधीय और इमारती पौधे
किसानों की आय बढ़ा
सकते हैं। कृषि वानिकी
(एग्रोफॉरेस्ट्री) खेती को अधिक
टिकाऊ और लाभकारी बना
सकती है। शहरों में
पार्क, सड़क किनारे हरित
पट्टियाँ और सार्वजनिक स्थलों
पर वृक्षों का विस्तार लोगों
को प्रदूषण और गर्मी से
राहत दे सकता है।
आज आवश्यकता केवल सरकार की
नहीं, बल्कि समाज की भागीदारी
की है। स्वयंसेवी संगठन,
उद्योग, धार्मिक संस्थाएँ, सामाजिक मंच, युवा संगठन
और आम नागरिक यदि
इस अभियान को अपना व्यक्तिगत
दायित्व मान लें, तो
हर वर्ष लगाए जाने
वाले पौधों का परिणाम कई
गुना बेहतर हो सकता है।
एक अच्छी पहल यह भी
हो सकती है कि
जन्मदिन, विवाह, वर्षगाँठ, गृह प्रवेश, परीक्षा
में सफलता या किसी प्रियजन
की स्मृति में पौधे लगाए
जाएँ। इससे वृक्षारोपण भावनात्मक
रूप से लोगों के
जीवन का हिस्सा बन
जाएगा। जब किसी पौधे
से यादें जुड़ जाती हैं,
तो उसकी रक्षा अपने
आप होने लगती है।
क्यों जरूरी हैं पेड़?
🌳 पेड़ वातावरण से
कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन
की गति कम करते
हैं।
🌳 मिट्टी के कटाव को
रोकते हैं और भूजल
संरक्षण में सहायक होते
हैं।
🌳 वायु प्रदूषण कम
कर तापमान नियंत्रित करने में मदद
करते हैं।
🌳 पक्षियों, मधुमक्खियों और वन्यजीवों का
प्राकृतिक आवास हैं।
🌳 फल, औषधि, लकड़ी
और आजीविका का महत्वपूर्ण स्रोत
हैं।


No comments:
Post a Comment