बंगाल को बचाने का महासंघर्ष : जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बदल दी विभाजन की दिशा
कुछ व्यक्तित्व इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होते, बल्कि इतिहास की दिशा बदल देते हैं। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ऐसे ही राष्ट्रपुरुष थे, जिन्होंने सत्ता से अधिक सिद्धांतों को, पद से अधिक राष्ट्र को और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से अधिक भारत की एकता एवं स्वाभिमान को महत्व दिया। भारत का आधुनिक इतिहास जब-जब उन व्यक्तित्वों की चर्चा करता है जिन्होंने स्वतंत्र भारत की वैचारिक नींव को आकार दिया, तब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्हें केवल एक राजनेता के रूप में देखना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे शिक्षाविद्, प्रखर चिंतक, कुशल प्रशासक, संवैधानिक विमर्श के गंभीर अध्येता और सबसे बढ़कर राष्ट्र की एकता तथा अखंडता के लिए समर्पित एक ऐसे कर्मयोगी थे, जिन्होंने अपने विचारों की कीमत सत्ता से नहीं, बल्कि अपने जीवन से चुकाई
सुरेश गांधी
1947 का इतिहास केवल
भारत के विभाजन का
इतिहास नहीं है। यह
उस संघर्ष का भी इतिहास
है, जिसमें एक व्यक्ति ने
तर्क, संगठन और अदम्य इच्छाशक्ति
के बल पर बंगाल
के एक बड़े भूभाग
को पाकिस्तान में जाने से
बचाने का अभियान छेड़ा।
यदि वह संघर्ष न
हुआ होता, तो आज का
पश्चिम बंगाल शायद भारत के
मानचित्र में न होता।
1947 का वर्ष भारतीय इतिहास
का सबसे पीड़ादायक और
सबसे निर्णायक अध्याय था। एक ओर
सदियों पुरानी गुलामी की बेड़ियां टूट
रही थीं, दूसरी ओर
देश सांप्रदायिक हिंसा, विस्थापन और विभाजन की
त्रासदी से गुजर रहा
था।
इसी उथल-पुथल के बीच बंगाल का भविष्य भी अधर में था। मुस्लिम लीग की योजना केवल पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने की नहीं थी।
उसके भीतर एक ऐसा विचार भी आकार ले रहा था कि पूरा बंगाल एक स्वतंत्र राज्य बने या पाकिस्तान के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। यदि ऐसा होता, तो कोलकाता सहित विशाल भूभाग भारत से अलग हो सकता था। यही वह समय था जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी निर्णायक रूप से सामने आए।
उनका मानना था कि यदि धर्म के आधार पर देश का विभाजन स्वीकार किया जा रहा है, तो हिंदू बहुल क्षेत्रों को किसी भी स्थिति में पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। उन्होंने इस प्रश्न को केवल भावनात्मक नहीं रहने दिया, बल्कि इसे जनसंख्या, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के आधार पर राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया।'संयुक्त बंगाल' योजना का विरोध
1947 में 'यूनाइटेड बंगाल' या 'संयुक्त बंगाल' का विचार सामने आया। इसके समर्थकों का तर्क था कि बंगाल को न भारत में रखा जाए और न पाकिस्तान में, बल्कि उसे एक स्वतंत्र राज्य बनाया जाए। देखने में यह प्रस्ताव आकर्षक प्रतीत होता था, किंतु डॉ. मुखर्जी ने इसके दूरगामी परिणामों को तुरंत समझ लिया।
उन्होंने चेताया कि ऐसा राज्य
अंततः पाकिस्तान के प्रभाव में
चला जाएगा और वहां रहने
वाले हिंदुओं की सुरक्षा गंभीर
संकट में पड़ जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा
कि कोलकाता जैसे औद्योगिक और
सांस्कृतिक केंद्र का भारत से
अलग होना राष्ट्रीय हित
के प्रतिकूल होगा। उन्होंने बंगाल के विभिन्न सामाजिक
संगठनों, बुद्धिजीवियों, व्यापारिक वर्ग और आम
नागरिकों को इस विषय
पर जागरूक किया। यह केवल राजनीतिक
आंदोलन नहीं था, बल्कि
जनमत निर्माण का एक व्यापक
अभियान था।
जनमत को बनाया सबसे बड़ा हथियार
डॉ. मुखर्जी जानते
थे कि इतिहास केवल
बंद कमरों में लिए गए
राजनीतिक निर्णयों से नहीं बदलता,
बल्कि जनता की आवाज
भी उसकी दिशा तय
करती है। उन्होंने गांव-गांव, शहर-शहर संवाद
स्थापित किया। सभाएं हुईं, प्रस्ताव पारित हुए और यह
संदेश दिया गया कि
हिंदू बहुल क्षेत्रों को
भारत में रहना चाहिए।
उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन के समक्ष भी
तथ्य रखे कि पश्चिमी
बंगाल की सामाजिक संरचना,
आर्थिक व्यवस्था और जनसंख्या भारत
के साथ रहने की
पक्षधर है। इस अभियान
का प्रभाव धीरे-धीरे राष्ट्रीय
स्तर पर दिखाई देने
लगा।
कोलकाता का महत्व समझने वाले दूरदर्शी नेता
उस समय कोलकाता
केवल एक शहर नहीं
था। वह भारत की
औद्योगिक राजधानी, प्रमुख बंदरगाह, शिक्षा और संस्कृति का
केंद्र तथा पूर्वी भारत
की आर्थिक जीवनरेखा था। यदि कोलकाता
भारत से अलग हो
जाता, तो इसका प्रभाव
केवल बंगाल तक सीमित नहीं
रहता, बल्कि पूरे देश की
अर्थव्यवस्था और सामरिक स्थिति
पर पड़ता। डॉ. मुखर्जी ने
इस तथ्य को मजबूती
से रखा कि कोलकाता
का भारत में रहना
राष्ट्रीय आवश्यकता है। उन्होंने आर्थिक
तर्कों को राजनीतिक विमर्श
से जोड़ा और यह स्पष्ट
किया कि विभाजन की
रेखाएं केवल धार्मिक आधार
पर नहीं खींची जा
सकतीं।
विभाजन का दर्द, लेकिन यथार्थ का स्वीकार
इतिहासकारों की दृष्टि में उनकी भूमिका
यद्यपि विभाजन के अंतिम निर्णय
में अनेक राजनीतिक, प्रशासनिक
और अंतरराष्ट्रीय कारक भी शामिल
थे, फिर भी यह
निर्विवाद है कि डॉ.
मुखर्जी बंगाल के प्रश्न पर
सबसे मुखर और प्रभावशाली
नेताओं में थे। उन्होंने
इस विषय को राष्ट्रीय
एजेंडे पर बनाए रखा
और लगातार हस्तक्षेप किया।
विस्थापितों की पीड़ा को समझने वाले नेता
बंगाल का प्रश्न, राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न
बंगाल का संघर्ष बना राष्ट्रीय विचार
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के लिए बंगाल केवल उनका गृह प्रदेश नहीं था। वह भारत की सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र था। इसलिए बंगाल को बचाने का संघर्ष उनके लिए क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व था। उन्होंने यह सिद्ध किया कि किसी भी क्षेत्र की रक्षा केवल सैनिक शक्ति से नहीं होती; उसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, जनजागरण और दूरदर्शी नेतृत्व की भी आवश्यकता होती है। इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन बताता है कि यदि उस दौर में बंगाल के प्रश्न पर डॉ. मुखर्जी जैसा नेतृत्व सामने न आता, तो पूर्वी भारत का राजनीतिक और भौगोलिक स्वरूप आज बिल्कुल अलग हो सकता था। इसी कारण अनेक इतिहासकार उन्हें पश्चिम बंगाल के भारत में बने रहने की प्रक्रिया का प्रमुख शिल्पकार मानते हैं। बंगाल की यह लड़ाई केवल सीमाओं की नहीं थी; यह भारत की राष्ट्रीय अस्मिता, सांस्कृतिक निरंतरता और करोड़ों लोगों के भविष्य की लड़ाई थी। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस संघर्ष में जिस दृढ़ता, दूरदृष्टि और साहस का परिचय दिया, उसने उन्हें केवल बंगाल का नहीं, बल्कि पूरे भारत का राष्ट्रनायक बना दिया।









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