एक देश, एक विधान : डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का कश्मीर सत्याग्रह और राष्ट्र के नाम अंतिम संदेश
उन्होंने कहा था—'एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे।' यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि भारतीय गणराज्य की एकात्मकता का उद्घोष था। इसी संकल्प को लेकर वे जम्मू-कश्मीर की ओर बढ़े और वहीं उनका जीवन भारतीय राजनीति के सबसे रहस्यमय अध्यायों में दर्ज हो गया। स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी—रियासतों का एकीकरण। अधिकांश रियासतें भारत में विलय हो गईं, लेकिन जम्मू-कश्मीर का प्रश्न शुरू से ही अलग और जटिल बना रहा। 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमले, महाराजा हरि सिंह द्वारा भारत के साथ विलय-पत्र पर हस्ताक्षर और उसके बाद बनी राजनीतिक परिस्थितियों ने इस राज्य को विशेष संवैधानिक व्यवस्था की ओर अग्रसर किया। भारतीय संविधान में जोड़ा गया अनुच्छेद 370 इसी विशेष व्यवस्था का आधार बना। इसके तहत जम्मू-कश्मीर को अलग संविधान, अलग ध्वज और अनेक मामलों में विशेष अधिकार प्राप्त हुए। समर्थकों का मत था कि यह व्यवस्था तत्कालीन परिस्थितियों में आवश्यक थी, जबकि विरोधियों का तर्क था कि इससे राष्ट्रीय एकीकरण की प्रक्रिया प्रभावित होगी। इसी बहस के केंद्र में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम सबसे प्रमुखता से उभरता है। उनका मानना था कि भारत की संप्रभुता और संवैधानिक एकता के लिए अलग संवैधानिक व्यवस्था स्थायी समाधान नहीं हो सकती। वे कहते थे कि यदि भारत एक राष्ट्र है, तो उसके नागरिकों के अधिकार और संवैधानिक व्यवस्था भी मूलतः एक होनी चाहिए
सुरेश गांधी
1947 का इतिहास केवल भारत के विभाजन का इतिहास नहीं है। यह उस संघर्ष का भी इतिहास है, जिसमें एक व्यक्ति ने तर्क, संगठन और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर बंगाल के एक बड़े भूभाग को पाकिस्तान में जाने से बचाने का अभियान छेड़ा। यदि वह संघर्ष न हुआ होता, तो आज का पश्चिम बंगाल शायद भारत के मानचित्र में न होता। 1947 का वर्ष भारतीय इतिहास का सबसे पीड़ादायक और सबसे निर्णायक अध्याय था। एक ओर सदियों पुरानी गुलामी की बेड़ियां टूट रही थीं, दूसरी ओर देश सांप्रदायिक हिंसा, विस्थापन और विभाजन की त्रासदी से गुजर रहा था। पंजाब और बंगाल, दोनों ही इस विभाजन की सबसे बड़ी कीमत चुका रहे थे। लाखों लोग अपनी जन्मभूमि छोड़ने को विवश हुए और हजारों परिवार इतिहास की सबसे भीषण मानवीय त्रासदियों में बिखर गए। इसी उथल-पुथल के बीच बंगाल का भविष्य भी अधर में था।
मुस्लिम लीग की योजना केवल पूर्वी बंगाल को पाकिस्तान में शामिल करने की नहीं थी। उसके भीतर एक ऐसा विचार भी आकार ले रहा था कि पूरा बंगाल एक स्वतंत्र राज्य बने या पाकिस्तान के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। यदि ऐसा होता, तो कोलकाता सहित विशाल भूभाग भारत से अलग हो सकता था। यही वह समय था जब डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी निर्णायक रूप से सामने आए। उनका मानना था कि यदि धर्म के आधार पर देश का विभाजन स्वीकार किया जा रहा है, तो हिंदू बहुल क्षेत्रों को किसी भी स्थिति में पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनने दिया जा सकता। उन्होंने इस प्रश्न को केवल भावनात्मक नहीं रहने दिया, बल्कि इसे जनसंख्या, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और लोकतांत्रिक अधिकारों के आधार पर राष्ट्रीय विमर्श का विषय बनाया।नेहरू सरकार से मतभेद : सत्ता नहीं, सिद्धांत महत्वपूर्ण
भारतीय जनसंघ : वैचारिक राजनीति का नया अध्याय
कश्मीर का प्रश्न : केवल सीमा नहीं, संवैधानिक एकता का विषय
डॉ. मुखर्जी का
मानना था कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न
अंग है और वहां
किसी भारतीय नागरिक के प्रवेश पर
विशेष अनुमति (परमिट) की व्यवस्था राष्ट्रीय
भावना के अनुकूल नहीं
है। उस समय जम्मू-कश्मीर जाने के लिए
भारत के नागरिकों को
परमिट लेना पड़ता था।
यह व्यवस्था उनके लिए केवल
प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रतीक
के रूप में थी
जो भारत की एकात्मक
व्यवस्था से अलगाव का
संकेत देती थी। उन्होंने
स्पष्ट कहा— "एक देश में
दो विधान, दो प्रधान और
दो निशान नहीं चलेंगे।" यह
वाक्य भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित
नारों में शामिल हो
गया। इसके माध्यम से
वे यह संदेश देना
चाहते थे कि भारत
की संप्रभुता और संवैधानिक व्यवस्था
सभी राज्यों के लिए समान
आधार पर होनी चाहिए।
जम्मू सत्याग्रह: शब्दों से कर्म तक
1952 में जम्मू में
आयोजित एक विशाल जनसभा
में डॉ. मुखर्जी ने
ऐतिहासिक घोषणा की— "या तो मैं
आपको भारतीय संविधान दिलाऊँगा या फिर इस
उद्देश्य की पूर्ति के
लिए अपना जीवन बलिदान
कर दूँगा।" यह कोई भावनात्मक
भाषण नहीं था। अगले
ही वर्ष उन्होंने अपने
संकल्प को व्यवहार में
उतारने का निर्णय लिया।
11 मई 1953 को वे बिना
परमिट जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने
निकले। सीमा पार करते
ही उन्हें तत्कालीन जम्मू-कश्मीर सरकार ने गिरफ्तार कर
लिया। उस समय राज्य
में शेख अब्दुल्ला के
नेतृत्व वाली सरकार थी।
उनकी गिरफ्तारी पूरे देश में
चर्चा का विषय बन
गई। जनसंघ और अनेक सामाजिक
संगठनों ने इसे लोकतांत्रिक
अधिकारों का प्रश्न बताया।
देशभर में प्रदर्शन हुए
और सरकार से उन्हें रिहा
करने की मांग उठी।
रहस्यमय मृत्यु : आज भी अनुत्तरित प्रश्न
गिरफ्तारी के बाद डॉ.
मुखर्जी को हिरासत में
रखा गया। 23 जून 1953 को हिरासत के
दौरान उनका निधन हो
गया। आधिकारिक रूप से उनकी
मृत्यु का कारण चिकित्सकीय
परिस्थितियों को बताया गया,
किंतु उस समय से
ही उनके समर्थकों और
अनेक राजनीतिक नेताओं ने इस घटना
की स्वतंत्र जांच की मांग
उठाई। उनकी मृत्यु को
लेकर वर्षों तक प्रश्न उठते
रहे—क्या उन्हें समय
पर उचित चिकित्सा मिली?
क्या हिरासत की परिस्थितियां संतोषजनक
थीं? क्या पूरे घटनाक्रम
की निष्पक्ष जांच हुई? इन
प्रश्नों ने इस घटना
को भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित
और विवादास्पद प्रसंगों में शामिल कर
दिया। इतिहासकार इस विषय पर
अलग-अलग मत रखते
हैं, लेकिन इसमें कोई विवाद नहीं
कि उनकी मृत्यु ने
पूरे देश को झकझोर
दिया और उन्हें राष्ट्रीय
एकता के लिए बलिदान
देने वाले नेता के
रूप में स्थापित कर
दिया।
एक विचार, जो व्यक्ति से बड़ा हो गया
डॉ. श्यामा प्रसाद
मुखर्जी का कश्मीर आंदोलन
केवल तत्कालीन राजनीतिक विवाद नहीं था। उसने
भारत में संघीय ढांचे,
संवैधानिक व्यवस्था और राष्ट्रीय एकता
पर एक दीर्घकालिक बहस
को जन्म दिया। उनके
समर्थकों के लिए यह
संघर्ष भारत की पूर्ण
संवैधानिक एकता का आंदोलन
था, जबकि उस समय
कई अन्य राजनीतिक दलों
की अलग राय थी।
किंतु यह निर्विवाद है
कि उन्होंने कश्मीर के प्रश्न को
राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में
ला दिया।
2019: जब इतिहास ने नया मोड़ लिया
5 अगस्त 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के नेतृत्व वाली
केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर
से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों
और अनुच्छेद 35ए को समाप्त
करने का निर्णय लिया
तथा राज्य का पुनर्गठन किया।
सरकार ने इसे राष्ट्रीय
एकीकरण की दिशा में
ऐतिहासिक कदम बताया। इस
निर्णय के बाद व्यापक
स्तर पर यह चर्चा
हुई कि डॉ. श्यामा
प्रसाद मुखर्जी जिस संवैधानिक एकरूपता
की वकालत करते थे, वह
अब एक नए रूप
में लागू हुई है।
वहीं इस निर्णय पर
देश में अलग-अलग
राजनीतिक और संवैधानिक दृष्टिकोण
भी सामने आए। समर्थकों ने
इसे उनके लंबे समय
से व्यक्त विचारों की पूर्ति माना,
जबकि आलोचकों ने इसके अन्य
पहलुओं पर प्रश्न उठाए।
इतना स्पष्ट है कि इस
निर्णय के बाद डॉ.
मुखर्जी का नाम और
उनके विचार पुनः राष्ट्रीय विमर्श
के केंद्र में आ गए।
बलिदान से विरासत तक
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि किसी भी विचार की वास्तविक शक्ति उसके पीछे खड़े व्यक्ति के त्याग और प्रतिबद्धता में होती है। उन्होंने अपने विश्वासों के लिए संघर्ष किया, सत्ता छोड़ी, आंदोलन किया और अंततः हिरासत में रहते हुए अपना जीवन गंवाया। आज उनका कश्मीर सत्याग्रह केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संवैधानिक बहस और राष्ट्रीय एकता के विमर्श का स्थायी अध्याय बन चुका है। इतिहास में ऐसे व्यक्तित्व विरले ही मिलते हैं जिनकी मृत्यु के दशकों बाद भी उनके विचार राष्ट्रीय नीतियों और सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बने रहें। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उन्हीं विरल राष्ट्रपुरुषों में एक हैं।










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