Thursday, 23 July 2026

भक्ति विमर्श के दो उज्ज्वल नक्षत्रों को नई दृष्टि देने वाले सुभाष राय होंगे प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित

भक्ति विमर्श के दो उज्ज्वल नक्षत्रों को नई दृष्टि देने वाले सुभाष राय होंगे प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान से सम्मानित 

'दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' और 'आत्मसंभवा आंडाल' के लिए मिला चयन

काशीनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी और आशीष त्रिपाठी की निर्णायक समिति का सर्वसम्मत फैसला

• 24 जुलाई को वाराणसी में होगा सम्मान समारोह

सुरेश गांधी

वाराणसी। भारतीय संत साहित्य, भक्ति परंपरा और स्त्री विमर्श के गंभीर अध्येता तथा वरिष्ठ कवि-संपादक सुभाष राय को वर्ष 2026 का प्रतिष्ठित 'प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान' प्रदान किया जाएगा। कबीर विवेक परिवार की ओर से दिए जाने वाले इस सम्मान के लिए उनका चयन हिंदी जगत की तीन प्रतिष्ठित विभूतियोंकथाकार प्रो. काशीनाथ सिंह, कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी तथा कवि-आलोचक प्रो. आशीष त्रिपाठीकी निर्णायक समिति ने सर्वसम्मति से किया है। सम्मान की घोषणा कबीर विवेक परिवार की प्रमुख डॉ. भगवंती सिंह ने की।

यह सम्मान सुभाष राय को भारतीय भक्ति साहित्य की दो विलक्षण संत कवयित्रियोंअक्क महादेवी और आंडालके जीवन, काव्य और वैचारिक प्रतिरोध पर आधारित उनकी चर्चित कृतियों 'दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' तथा 'आत्मसंभवा आंडाल' के लिए प्रदान किया जा रहा है। रज़ा न्यास की अध्येतावृत्ति के अंतर्गत लिखी गई इन दोनों पुस्तकों का प्रकाशन सेतु प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा किया गया है और हिंदी जगत में इन्हें गंभीर अध्ययन तथा नई वैचारिक दृष्टि के लिए व्यापक सराहना मिली है।

निर्णायक मंडल ने अपनी संस्तुति में कहा है कि आंडाल और अक्क महादेवी भारतीय भक्ति आंदोलन में उस जनतांत्रिक चेतना की प्रतिनिधि हैं, जिसने धर्म, समाज और साहित्य को नए विचारों से समृद्ध किया। सुभाष राय ने अपनी इन पुस्तकों में केवल उनके आध्यात्मिक पक्ष का ही नहीं, बल्कि उनके भीतरी संघर्ष, स्त्री अस्मिता, सामाजिक प्रतिरोध और सांस्कृतिक चेतना का भी अत्यंत सूक्ष्म एवं प्रामाणिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यही विशेषता इन कृतियों को समकालीन हिंदी आलोचना में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

सम्मान के संयोजक एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर मनोज कुमार सिंह ने बताया कि संत साहित्य के अप्रतिम अध्येता प्रो. शुकदेव सिंह की स्मृति में स्थापित यह सम्मान प्रतिवर्ष उनकी जन्मतिथि 24 जुलाई को प्रदान किया जाता है। इस वर्ष भी वाराणसी में आयोजित गरिमामय समारोह में सुभाष राय को सम्मानित किया जाएगा।

गौरतलब है कि गाजीपुर में जन्मे प्रो. शुकदेव सिंह हिंदी जगत में संत साहित्य के सबसे प्रतिष्ठित विद्वानों में गिने जाते हैं। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के प्रोफेसर रहे शुकदेव सिंह ने संत साहित्य पर अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया। उनके शोध और आलोचनात्मक कार्य आज भी संत साहित्य के शोधार्थियों और अध्येताओं के लिए आधारग्रंथ का महत्व रखते हैं। भारतीय संत परंपरा के गहन अध्ययन को नई दिशा देने में उनका योगदान अविस्मरणीय माना जाता है।

सम्मान के लिए चयनित सुभाष राय का जन्म उत्तर प्रदेश के मऊ जनपद के बड़ागांव में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा गांव की पाठशाला में प्राप्त करने के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित साहित्य संस्थान के.एम.आई. से हिंदी भाषा एवं साहित्य में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर तथा विधि की शिक्षा पूरी की। इसके बाद उत्तर भारत के सुप्रसिद्ध संत कवि दादूदयाल के रचना संसार पर शोध कर उन्होंने अपनी अकादमिक पहचान स्थापित की। सुभाष राय का व्यक्तित्व साहित्य और पत्रकारितादोनों क्षेत्रों में समान रूप से सम्मानित है। उन्होंने दशकों तक हिंदी पत्रकारिता में अनेक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्रों में शीर्ष संपादकीय दायित्व निभाए और वर्तमान में जनसंदेश टाइम्स के प्रधान संपादक के रूप में कार्यरत हैं। उनकी लेखनी में साहित्यिक संवेदना, सामाजिक सरोकार और वैचारिक स्पष्टता का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

उनकी प्रकाशित कृतियों में कविता संग्रह 'सलीब पर सच' और 'मूर्तियों के जंगल में', निबंध संग्रह 'जाग मछन्दर जाग' तथा संस्मरण एवं आलोचनात्मक लेखों का संग्रह 'अंधेरे के पार' शामिल हैं। वहीं 'दिगम्बर विद्रोहिणी अक्क महादेवी' और 'आत्मसंभवा आंडाल' ने उन्हें भारतीय भक्ति साहित्य के गंभीर अध्येता के रूप में नई प्रतिष्ठा दिलाई है। सुभाष राय को इससे पूर्व नई धारा रचना सम्मान, माटी रतन सम्मान, देवेन्द्र कुमार बंगाली स्मृति कविता सम्मान तथा स्पंदन कृति आलोचना सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। अब प्रो. शुकदेव सिंह स्मृति सम्मान उनके साहित्यिक अवदान की एक और महत्वपूर्ण स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है।

यह सम्मान केवल एक लेखक का अभिनंदन नहीं, बल्कि भारतीय संत परंपरा, भक्ति साहित्य और स्त्री चेतना पर गंभीर अनुसंधान की उस सतत परंपरा का भी सम्मान है, जिसने हिंदी साहित्य को नई वैचारिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। वाराणसी की सांस्कृतिक धरती पर 24 जुलाई को आयोजित होने वाला यह समारोह साहित्य और शोध जगत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर माना जा रहा है।

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