Friday, 7 August 2026

ब्राह्मणों को रिझाने की सियासत, 2027 से पहले छिड़ी नई जंग

ब्राह्मणों को रिझाने की सियासत, 2027 से पहले छिड़ी नई जंग

लखनऊ के मंच से गांव की चौपाल तक गर्म बहस, 2027 से पहले सम्मान, स्मृति और सत्ता की नई लड़ाई

सुरेश गांधी

वाराणसी. 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण राजनीति एक बार फिर उत्तर प्रदेश के केंद्र में है। लखनऊ के प्रबुद्ध सम्मेलन में अखिलेश यादव केपीडीए में पंडितवाले संदेश के बाद सियासी तापमान अचानक बढ़ गया है। भाजपा इसे अपने परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश मान रही है, जबकि सपा इसे सामाजिक विस्तार की रणनीति बता रही है। लेकिन पूर्वांचल की गलियों, कचहरी के बरामदों, विश्वविद्यालयों और गांव की चौपालों में बहस किसी एक बयान पर नहीं टिकती; वहां सवाल कहीं ज्यादा गहरे हैंसम्मान, प्रतिनिधित्व और पुरानी राजनीतिक स्मृतियों के। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या ब्राह्मण मतदाता समाजवादी पार्टी के पिछले शासनकाल की घटनाओं को भूल पाएगा?

                मतलब साफ है ब्राह्मणों को लेकर छिड़ी सियासी जंग अब केवल वोटों की लड़ाई नहीं रही। यह स्मृति, सम्मान और राजनीतिक भरोसे की लड़ाई बन चुकी है। अखिलेश यादव का नया ब्राह्मण outreach और भाजपा द्वारा पुराने दौर की याद दिलाने की रणनीतिदोनों मिलकर 2027 की राजनीति का नया नैरेटिव गढ़ रहे हैं। अंतिम फैसला वही मतदाता करेगा जो चौपाल पर पुराने जख्म भी याद रखता है और वर्तमान का हिसाब भी मांगता है। लखनऊ के प्रबुद्ध सम्मेलन से निकला संदेश अब गांव की चौपालों, कस्बों की चाय दुकानों और शहरों के ब्राह्मण मोहल्लों तक पहुंच चुका है। समाजवादी पार्टी जहांसम्मान और प्रतिनिधित्वकी बात कर रही है, वहीं भाजपापुराने अनुभव और भरोसेका सवाल उठा रही है।

सम्मान चाहिए, केवल नारे नहीं

प्रयागराज के सिविल लाइंस क्षेत्र में मिले अधिवक्ता अशोक तिवारी कहते हैं, “हर चुनाव से पहले ब्राह्मणों को याद किया जाता है। लेकिन मतदाता पुराने दौर को भी याद रखता है। असली सवाल टिकट, भागीदारी और प्रशासनिक व्यवहार का है।वाराणसी के भेलूपुर में एक शिक्षक ने कहा, “हम किसी दल के स्थायी वोटर नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक स्मृतियां जल्दी मिटती भी नहीं हैं।

सपा का नया ब्राह्मण संदेश

लखनऊ सम्मेलन में वैदिक मंत्रोच्चार, संतों का सम्मान और प्रबुद्ध प्रतिनिधियों की मौजूदगी ने साफ संकेत दिया कि समाजवादी पार्टी अब केवल पीडीए  (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) की राजनीति तक सीमित नहीं रहना चाहती। पार्टी नेतृत्व का दावा है कि वहसम्मान और भागीदारीकी राजनीति कर रहा है और ब्राह्मण समाज को नए सामाजिक समीकरण में जोड़ना चाहता है। 2024 लोकसभा चुनाव के बाद सपा को महसूस हुआ कि विधानसभा चुनाव में व्यापक सामाजिक गठबंधन के बिना सत्ता तक पहुंच मुश्किल है।

भाजपा का पलटवार: “पुरानी यादें जिंदा हैं

भाजपा नेताओं ने तुरंत जवाबी हमला बोला। उनका कहना है कि सपा चुनाव के समय ब्राह्मणों को याद करती है और पुराने शासनकाल की घटनाओं को भुलाया नहीं जा सकता। भाजपा अपने ब्राह्मण नेतृत्व, धार्मिक आयोजनों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश देने में जुटी है कि ब्राह्मण समाज का सम्मान उसके लिए प्राथमिकता है। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि भावनात्मक जुड़ाव और राजनीतिक भरोसा केवल चुनावी सम्मेलनों से नहीं बनता।

पुराने आंदोलनों की याद

ब्राह्मण संगठनों ने उस दौर में कानून-व्यवस्था, पुलिस कार्रवाई और कुछ चर्चित हत्याकांडों को लेकर राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन किए थे। प्रतापगढ़ सहित कई मामलों में सरकार की भूमिका और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। राजनीतिक मंचों पर इन घटनाओं का उल्लेख आज भी किया जाता है और भाजपा इन्हेंब्राह्मण असंतोषके उदाहरण के रूप में पेश करती है।

आंकड़ों से ज्यादा स्मृति की राजनीति

राजनीतिक मंचों पर 2017 से पहले और बाद की तुलना जोर-शोर से की जा रही है, लेकिन एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य स्तर पर ब्राह्मणों की हत्या, उत्पीड़न या फर्जी मुकदमों के समेकित आधिकारिक जातिवार आंकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए राजनीतिक दावे और प्रमाणित आंकड़े अलग-अलग चीजें हैं। ग्राउंड रिपोर्टिंग में यही अंतर सबसे ज्यादा दिखाई देता है। गांवों में लोग संख्या नहीं गिनाते, वे घटनाएं याद करते हैं।

पूर्वांचल की आवाज

भदोही जिले के एक गांव में किसान राममोहन मिश्र कहते हैं, “पहले जाति देखकर वोट पड़ता था, अब काम भी देखा जाता है।पास बैठे एक युवा मतदाता ने तुरंत जोड़ा, “रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था हमारे लिए ज्यादा बड़े मुद्दे हैं।यह संवाद बताता है कि ब्राह्मण समाज एकरूप नहीं है। एक वर्ग सम्मान और प्रतिनिधित्व की बात करता है, दूसरा विकास और रोजगार की, जबकि तीसरा पुराने राजनीतिक अनुभवों को निर्णायक मानता है।

विश्वविद्यालयों तक पहुंची बहस

पूर्वांचल के शिक्षित युवाओं के बीच यूजीसी, 2026 की चर्चा भी सुनाई देती है। कुछ सवर्ण और ब्राह्मण संगठनों ने इन नियमों का विरोध किया था और सुप्रीम कोर्ट द्वारा इनके क्रियान्वयन पर रोक लगाए जाने को अपनी चिंता की पुष्टि के रूप में देखा। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह मुद्दा ब्राह्मण राजनीति का एकमात्र कारण नहीं, बल्कि व्यापक पहचान और प्रतिनिधित्व की बहस का हिस्सा है।

ब्राह्मण कितने अहम?

चुनावी अध्ययनों के अनुसार उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण आबादी लगभग 10–12 प्रतिशत मानी जाती है। पूर्वांचल के वाराणसी, प्रयागराज, भदोही, जौनपुर, चंदौली और मिर्जापुर जैसे जिलों में उनका प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक माना जाता है। यही वजह है कि दोनों बड़े दल इस वर्ग को लेकर असाधारण सक्रियता दिखा रहे हैं।

असली सवाल: क्या बदलेगा वोट?

यदि सपा ब्राह्मण मतदाताओं में सीमित समर्थन भी बढ़ा लेती है तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर असर पड़ सकता है। भाजपा को भरोसा है कि उसका पारंपरिक आधार कायम रहेगा। इसलिए लड़ाई केवल वोट प्रतिशत की नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश की भी है। सपापीडीए प्लस प्रबुद्धका नया फार्मूला गढ़ना चाहती है, जबकि भाजपाविश्वास बनाम अवसरवादका नैरेटिव बना रही है।

2027 की लड़ाई अब स्मृति बनाम संदेश

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों को लेकर छिड़ी जंग केवल चुनावी अंकगणित नहीं रही। यह सम्मान, प्रतिनिधित्व, राजनीतिक स्मृति और सामाजिक भरोसे की लड़ाई बन चुकी है। लखनऊ के मंचों पर दिए गए बयान अब गांव की चौपालों में परखे जा रहे हैं। मतदाता के सामने एक तरफ नई राजनीतिक पेशकश है, दूसरी तरफ पुरानी स्मृतियां। 2027 में फैसला भाषणों से नहीं, बूथों पर होगा। वहीं तय होगा कि ब्राह्मण समाज नई सियासी दस्तक स्वीकार करता है या पुराने अनुभवों को ही अपना राजनीतिक मार्गदर्शक बनाए रखता है।

No comments:

Post a Comment

काकोरी के अमर शहीदों को काशी का नमन

काकोरी के अमर शहीदों को काशी का नमन हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत सर्किट हाउस में सजी ऐतिहासिक प्रदर्शनी , पुष्पांजलि ...