पुष्पवर्षा के बीच बाबा के दरबार उमड़ा आस्था का महाज्वार
रात से लगी कतारें, हर-हर महादेव से गूंजी काशी; कपाट बंद होने से पहले तक सवा छह लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने किया दर्शन-पूजनसुरेश गांधी
वाराणसी. सावन माह का
पहला सोमवार जैसे ही आया,
काशी ने स्वयं को
फिर एक बार शिवमय
होते देखा। आधी रात ढलने
के साथ ही श्री
काशी विश्वनाथ धाम की ओर
बढ़ते कदमों की आहट तेज
होने लगी थी। कोई
गंगाजल की छोटी कलशी
थामे था, कोई बेलपत्र
और धतूरा लिए हुए, तो
कोई परिवार सहित बाबा के
दरबार में हाजिरी लगाने
निकला था। रात के
लगभग डेढ़ बजे गोदौलिया
की गलियां जाग चुकी थीं।
दुकानों के आधे उठे
शटर, हाथों में जल कलश
लिए श्रद्धालु, कांवरियों की थकी मगर
दमकती आंखें और दूर से
आती घंटियों की ध्वनि—काशी
उस समय सो नहीं
रही थी, वह बाबा
विश्वनाथ के स्वागत में
स्वयं को तैयार कर
रही थी। सावन के
पहले सोमवार की यह रात
धीरे-धीरे भोर में
बदल रही थी और
भोर की पहली किरण
फूटने से पहले ही
धाम के प्रवेश मार्ग
श्रद्धालुओं से भर चुके
थे.
हर-हर महादेव
के उद्घोष से संपूर्ण काशी
का वातावरण अलौकिक हो उठा। विश्वनाथ
धाम की ओर बढ़ते
कदमों का सिलसिला ऐसा
था मानो पूरी काशी
एक ही दिशा में
चल पड़ी हो। धाम
परिसर में ऐसा प्रतीत
हो रहा था मानो
श्रद्धा स्वयं चलकर बाबा के
द्वार पर पहुंच गई
हो। महिलाओं के मंगलगीत, कांवड़ियों
की टोलियां, शिवभक्त युवाओं का उत्साह और
बुजुर्गों की शांत आस्था—इन सबने मिलकर
उस दृश्य को एक जीवंत
आध्यात्मिक उत्सव में बदल दिया,
जिसे शब्दों में पूरी तरह
बांध पाना कठिन है।
कोई बिहार से आया था,
कोई बुंदेलखंड से, कोई राजस्थान
से तो कोई दक्षिण
भारत से। भाषा अलग-अलग थी, लेकिन
हर कंठ पर एक
ही पुकार थी—हर-हर
महादेव।
भोर से पहले ही भर गया बाबा का दरबार
सुबह के चार बजते-बजते धाम के प्रवेश मार्ग श्रद्धालुओं से पूरी तरह भर चुके थे। पुलिस बैरिकेडिंग के भीतर कतारें अनुशासित ढंग से आगे बढ़ रही थीं, पर भीड़ का उत्साह हर पल बढ़ता
जा रहा था। एक वृद्ध दंपती ने मुस्कुराते हुए कहा, “साल भर इंतजार रहता है इस सोमवार का। बाबा बुलाते हैं तभी दर्शन होता है।” गंगा स्नान कर लौटते श्रद्धालुओं के गीले वस्त्रों से उठती गंगाजल की गंध, बेलपत्र की हरियाली और धूप-अगरबत्ती की सुगंध मिलकर पूरे वातावरण को अलौकिक बना रही थी। ऐसा लग रहा था मानो काशी की हवा में भी शिवनाम घुल गया हो।फूल बरसे तो भावुक हो उठे भक्त
सावन माह के
प्रथम सोमवार पर मंडलायुक्त एस.
राजलिंगम ने श्री काशी
विश्वनाथ धाम पहुंचकर बाबा
का विधि-विधान से
दर्शन-पूजन किया। इसके
बाद जब श्रद्धालुओं पर
पुष्पवर्षा हुई तो कुछ
क्षणों के लिए पूरा
धाम जयघोष से गूंज उठा।
फूलों की पंखुड़ियां श्रद्धालुओं
के सिर और कंधों
पर गिरती रहीं और अनेक
भक्त हाथ जोड़कर आकाश
की ओर निहारते रहे।
उस क्षण भीड़ नहीं,
भक्ति दिखाई दे रही थी।
मंडलायुक्त ने प्रदेश और
देशवासियों के सुख, समृद्धि
और मंगल की कामना
की तथा धाम में
की गई व्यवस्थाओं का
निरीक्षण कर अधिकारियों को
निर्देश दिए कि प्रत्येक
श्रद्धालु को सुरक्षित और
सुगम दर्शन की सुविधा मिले।
इस दौरान मुख्य कार्यपालक अधिकारी विश्व भूषण मिश्र, एसडीएम
शंभू कुमार और मंदिर प्रशासन
के अन्य अधिकारी उपस्थित
रहे।
आंकड़ों से परे आस्था का विस्तार
मंदिर प्रशासन के अनुसार कपाट
बंद होने से पहले
तक सवा छह लाख
से अधिक श्रद्धालु बाबा
श्री काशी विश्वनाथ का
दर्शन-पूजन और जलाभिषेक
कर चुके थे। यह
संख्या केवल एक प्रशासनिक
आंकड़ा नहीं, बल्कि उस अटूट विश्वास
का प्रमाण है जो सदियों
से काशी को भारत
की आध्यात्मिक राजधानी बनाए हुए है।
धाम परिसर में तैनात एक
अधिकारी ने बताया कि
भीड़ लगातार बढ़ती रही और देर
शाम तक दर्शन का
क्रम बिना रुके चलता
रहा। चिकित्सा शिविर, पेयजल केंद्र, मोबाइल शौचालय और स्वयंसेवकों की
टीमें लगातार सक्रिय रहीं।
गंगा से धाम तक एक ही धड़कन
अस्सी घाट से दशाश्वमेध
और राजघाट तक सुबह से
ही श्रद्धालुओं का रेला दिखाई
देता रहा। स्नान के
बाद हजारों भक्त गंगाजल लेकर
धाम पहुंचे। घाटों पर बजती घंटियां
और धाम में गूंजते
वैदिक मंत्र एक-दूसरे में
घुलते रहे। ऐसा प्रतीत
हो रहा था मानो
गंगा स्वयं जल लेकर विश्वनाथ
के चरणों में उपस्थित हो
रही हो।
प्रशासन की परीक्षा और श्रद्धालुओं का धैर्य
भीड़ असाधारण थी,
फिर भी कतारों में
धैर्य दिखाई दिया। कहीं स्वयंसेवक वृद्धों
को सहारा दे रहे थे,
कहीं पुलिसकर्मी बच्चों को सुरक्षित आगे
बढ़ा रहे थे। कई
श्रद्धालुओं ने बताया कि
प्रतीक्षा लंबी अवश्य रही,
लेकिन व्यवस्था संतोषजनक थी। काशी की
भीड़ में भी एक
अदृश्य अनुशासन दिखाई देता है—शायद
इसे ही तीर्थ की
संस्कृति कहते हैं।
गंगा से धाम तक शिवमय हुई काशी
अस्सी घाट से लेकर
दशाश्वमेध और राजघाट तक
गंगा तटों पर भोर
से ही स्नान और
जलाभिषेक की तैयारियां शुरू
हो गई थीं। अनेक
श्रद्धालु पहले गंगा स्नान
कर पवित्र जल लेकर विश्वनाथ
धाम पहुंचे। घाटों पर घंटों की
ध्वनि और धाम में
गूंजते वैदिक मंत्रों ने काशी को
एक विराट शिव आराधना में
रूपांतरित कर दिया।
काशी का शाश्वत संदेश
सावन का पहला
सोमवार केवल धार्मिक अनुष्ठान
नहीं, बल्कि भारतीय लोकजीवन की उस जीवित
परंपरा का उत्सव है
जिसमें आस्था, अनुशासन और सामूहिकता साथ-साथ चलती हैं।
विश्वनाथ धाम में उमड़ी
यह भीड़ किसी आयोजन
की भीड़ नहीं थी;
यह उस विश्वास का
प्रवाह था जो पीढ़ियों
से बिना रुके बहता
आ रहा है। जब
लाखों कंठ एक साथ
हर-हर महादेव का
उद्घोष करते हैं, जब
फूलों की वर्षा के
बीच भक्त बाबा के
दर्शन करते हैं और
जब गंगा से उठी
आस्था विश्वनाथ के द्वार पर
आकर ठहरती है, तब काशी
केवल एक शहर नहीं
रहती—वह भारतीय आत्मा
का स्पंदन बन जाती है।
सावन के प्रथम सोमवार
की यह सुबह उसी
स्पंदन का विराट, जीवंत
और अविस्मरणीय रूप थी।
सप्तऋषि आरती दर्शन
श्रावण मास के प्रथम सोमवार पर श्री काशी
विश्वनाथ धाम में कपाट बंद होने से पूर्व भगवान श्री विश्वेश्वर की दिव्य सप्तऋषि आरती
संपन्न हुई। वैदिक मंत्रोच्चार, घंटा-घड़ियाल और शंखध्वनि के बीच बाबा का विशेष श्रृंगार
कर आरती उतारी गई। धाम परिसर हर-हर महादेव के जयघोष से गुंजायमान रहा और श्रद्धालुओं
ने भावविभोर होकर दर्शन किए। मंदिर प्रशासन के अनुसार सप्तऋषि आरती के उपरांत निर्धारित
समय पर बाबा की शयन आरती संपन्न होगी।
श्री शंकर स्वरूप श्रृंगार आरती
श्रावण मास-2026 के प्रथम सोमवार पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में भगवान श्री विश्वेश्वर का दिव्य श्री शंकर स्वरूप श्रृंगार आरती दर्शन भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। बाबा का भस्म, चंदन, पुष्पमालाओं और रजत आभूषणों से अलौकिक श्रृंगार किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार, शंखध्वनि और घंटा-घड़ियाल के मध्य संपन्न आरती से धाम परिसर भक्तिमय हो उठा। श्रद्धालुओं ने भावविभोर होकर दर्शन-पूजन किया और हर-हर महादेव के जयघोष से वातावरण गुंजायमान रहा।




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