आजादी के अमृतकाल में पत्रकारों की नई आस
मुख्यमंत्री से
मुलाकात
के
बाद
स्वास्थ्य,
पेंशन,
आवास
और
सुरक्षा
जैसे
मुद्दों
पर
फिर
तेज
हुई
बहस
सुरेश गांधी
वाराणसी. स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय
उत्सव नहीं होता, वह
समाज के उन वर्गों
की आकांक्षाओं का भी दर्पण
होता है जो लोकतंत्र
की निरंतरता के लिए मौन
किंतु महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस वर्ष
आजादी के जश्न के
बीच उत्तर प्रदेश के पत्रकार समुदाय
में एक नई उम्मीद
जागी है। मुख्यमंत्री से
हुई मुलाकात और उसके बाद
सूचना विभाग स्तर पर हुई
चर्चा ने वर्षों से
लंबित पत्रकार कल्याण के प्रश्न को
फिर सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में
ला दिया है।
लखनऊ में हुई
इस मुलाकात में स्टाम्प एवं
न्यायालय शुल्क मंत्री रविन्द्र जायसवाल के साथ वरिष्ठ
पत्रकार सुरेश गांधी ने मुख्यमंत्री को
पत्रकारों की समस्याओं से
संबंधित विस्तृत ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन का स्वर किसी
विशेष क्षेत्र का नहीं, बल्कि
पूरे उत्तर प्रदेश के पत्रकार समाज
की सामूहिक पीड़ा का था। मुख्यमंत्री
ने विषय को गंभीरता
से सुनते हुए सकारात्मक पहल
का आश्वासन दिया। इसके बाद मान्यता
प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष हेमंत
तिवारी और सचिव भारत
सिंह के नेतृत्व में
प्रतिनिधिमंडल ने सूचना निदेशक
विशाल सिंह से मिलकर
मांगों को विस्तार से
रखा।
ज्ञापन में सबसे प्रमुख
प्रश्न पत्रकारों की स्वास्थ्य सुरक्षा
का था। कभी मान्यता
प्राप्त पत्रकारों को सरकारी अस्पतालों
में निःशुल्क उपचार, दवाएं और चिकित्सकीय सुविधाएं
प्राप्त थीं। रेल यात्रा
में भी रियायतें और
विशेष सुविधाएं उपलब्ध थीं। समय के
साथ ये व्यवस्थाएं समाप्त
होती चली गईं। आज
जिले और तहसील स्तर
पर कार्यरत अनेक पत्रकार सीमित
आय में जीवनयापन करते
हैं। बीमारी, दुर्घटना या आकस्मिक संकट
उनके लिए आर्थिक आपदा
बन जाता है। सहायता
मिल भी जाए तो
वह दया का विषय
बनती है, जबकि पूर्व
की व्यवस्था अधिकार आधारित थी।
पत्रकार प्रतिनिधियों ने स्वास्थ्य सुविधा
की पुनर्बहाली के साथ आयुष्मान
जैसी व्यापक चिकित्सा सुरक्षा, पत्रकार पेंशन योजना, आवास योजना, दुर्घटना
एवं जीवन बीमा, पत्रकार
सुरक्षा आयोग, जिला स्तर पर
हेल्प डेस्क और आर्थिक रूप
से कमजोर पत्रकारों के लिए विशेष
सहायता कोष की मांग
की है। यह केवल
सुविधाओं की सूची नहीं,
बल्कि पत्रकारिता को गरिमामय कार्य-परिस्थिति देने का आग्रह
है।
इसी संदर्भ में
“एक देश, एक पत्रकार”
की अवधारणा भी उल्लेखनीय है।
यदि पत्रकारों के लिए न्यूनतम
सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधा और पहचान संबंधी
मानक पूरे देश में
एक समान हों, तो
विभिन्न राज्यों में कार्यरत पत्रकारों
को अधिकार प्राप्त करने में अनावश्यक
बाधाओं का सामना नहीं
करना पड़ेगा। आज पत्रकारिता का
कार्यक्षेत्र जिला या राज्य
की सीमाओं तक सीमित नहीं
रहा। डिजिटल युग में पत्रकार
राष्ट्रीय परिदृश्य का हिस्सा है;
इसलिए उसकी मूलभूत सुरक्षा
भी व्यापक दृष्टि से देखी जानी
चाहिए।
लोकतंत्र में पत्रकार केवल
समाचार लिखने वाला व्यक्ति नहीं
होता। वह समाज की
आवाज़ को शासन तक
पहुंचाने वाला सेतु है।
प्राकृतिक आपदा हो, महामारी
हो, अपराध हो या जनसमस्या—सबसे पहले वही
घटनास्थल पर उपस्थित दिखाई
देता है। विडंबना यह
है कि जनहित के
प्रश्न उठाने वाला यह वर्ग
स्वयं स्वास्थ्य, सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण
के प्रश्नों से जूझता रहता
है।
आज जब उत्तर
प्रदेश विकास, निवेश और सामाजिक कल्याण
के नए अध्याय लिखने
का दावा कर रहा
है, तब पत्रकार कल्याण
पर पुनर्विचार समय की मांग
है। यदि सरकार स्वास्थ्य
सुरक्षा, पेंशन, आवास और सुरक्षा
आयोग जैसी मांगों पर
ठोस निर्णय लेती है, तो
यह केवल पत्रकारों को
राहत देने वाला कदम
नहीं होगा, बल्कि लोकतंत्र की संस्थागत मजबूती
का संकेत भी होगा।
आजादी के अमृतकाल में सबसे बड़ी आशा यही है कि संवाद की यह पहल घोषणा तक सीमित न रहे। पत्रकारों की अपेक्षा किसी विशेषाधिकार की नहीं, बल्कि सम्मानजनक सामाजिक सुरक्षा की है। मुख्यमंत्री से हुई मुलाकात ने उम्मीद का दीप जलाया है; अब प्रदेश की पत्रकारिता उस दीप को नीति और निर्णय की स्थायी रोशनी में बदलते देखने की प्रतीक्षा कर रही है।

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