‘विकसित भारत’ अब सपना नहीं, संकल्प की अग्निपरीक्षा
आत्मनिर्भरता
से
विश्व
नेतृत्व
तक—मोदी
के
स्वतंत्रता
दिवस
भाषण
में
‘भारत’
को
बाजार
से
निर्माता,
उपभोक्ता
से
सृजक
और
शक्ति
से
वैश्विक
नेतृत्व
की
ओर
ले
जाने
का
रोडमैप.
जी
हां,
लाल
किले
की
प्राचीर
पर
लहराता
तिरंगा
हर
वर्ष
देश
को
उसके
अतीत
की
याद
दिलाता
है,
लेकिन
इस
बार
प्रधानमंत्री
नरेंद्र
मोदी
का
संबोधन
इतिहास
से
अधिक
भविष्य
की
ओर
मुखातिब
दिखाई
दिया।
आजादी
की
आठ
दशक
लंबी
यात्रा
के
पड़ाव
से
खड़े
होकर
उन्होंने
उस
भारत
की
तस्वीर
उकेरने
की
कोशिश
की,
जिसकी
पहचान
केवल
दुनिया
के
बड़े
बाजार
के
रूप
में
नहीं,
बल्कि
उत्पादन,
प्रतिभा,
तकनीक,
रक्षा,
कृषि,
नवाचार
और
संस्कृति
की
वैश्विक
ताकत
के
रूप
में
हो।
भाषण
में
उपलब्धियों
का
आत्मविश्वास
था
तो
अधूरे
लक्ष्यों
की
बेचैनी
भी;
आत्मनिर्भरता
का
आग्रह
था
तो
विश्व
से
कदम
मिलाकर
चलने
की
आकांक्षा
भी।
सबसे
महत्वपूर्ण
यह
कि
‘विकसित
भारत’
को
सरकारी
योजना
से
निकालकर
नागरिक
संकल्प
का
रूप
देने
की
कोशिश
दिखी।
संदेश
साफ
था—2047
दूर
का
कोई
स्वप्न
नहीं,
आज
के
फैसलों
और
आज
की
मेहनत
से
गढ़ी
जाने
वाली
आने
वाली
पीढ़ियों
की
विरासत
है
लाल किले की
प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस
पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संबोधन
महज सरकार की उपलब्धियों का
लेखा-जोखा नहीं था।
यह उस भारत की
रूपरेखा खींचने का प्रयास था,
जो आजादी की आठवीं दशक
यात्रा पूरी करते हुए
अगले 21 वर्षों में 2047 के विकसित भारत
की मंजिल तक पहुंचना चाहता
है। प्रधानमंत्री ने इस बार
भाषण में अतीत की
स्मृतियों के साथ भविष्य
की बेचैनी को जोड़ा—और
संदेश दिया कि अब
भारत को छोटे लक्ष्य
रखने की आदत छोड़कर
वैश्विक स्तर पर बड़े
लक्ष्य साधने होंगे। इस संबोधन का
सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यही रहा
कि ‘विकसित भारत’ को केवल आर्थिक
विकास का पर्याय नहीं
बनाया गया। इसके केंद्र
में उत्पादन, कृषि, तकनीक, आधारभूत ढांचा, रक्षा, हरित अर्थव्यवस्था, समुद्री
शक्ति और भारतीय संस्कृति
की वैश्विक प्रतिष्ठा—अर्थात विकास के सात व्यापक
आयाम रखे गए। प्रधानमंत्री
ने इन्हें ‘सप्तधारा’ के रूप में
सामने रखा।
आजादी की स्मृति से 2047 के संकल्प तक
लाल किले की
प्राचीर पर तिरंगा केवल
इतिहास का प्रतीक नहीं,
भविष्य का ध्वज भी
है। इस बार प्रधानमंत्री
के भाषण में यही
भाव बार-बार उभरता
दिखाई दिया। स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों के
त्याग को नमन करते
हुए उन्होंने देश को याद
दिलाया कि आजादी केवल
सत्ता परिवर्तन नहीं थी; यह
आत्मनिर्णय का अधिकार था।
अब उसी आत्मनिर्णय को
आर्थिक, तकनीकी और सामरिक आत्मनिर्भरता
में बदलना अगली पीढ़ी की
जिम्मेदारी है। मोदी ने
बड़े सपने देखने और
दृढ़ संकल्प के साथ उन्हें
पूरा करने पर जोर
दिया। उनके भाषण का
अंत भी इसी विचार
पर हुआ—राष्ट्रहित को
निजी हित से ऊपर
रखने, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने
और सामूहिक प्रयास से विकसित भारत
बनाने का आह्वान।
‘सप्तधारा’ में दिखाई दिया नए भारत का नक्शा
इस भाषण की
सबसे बड़ी संपादकीय विशेषता
‘सप्तधारा’ की अवधारणा रही।
यह महज सात घोषणाओं
की सूची नहीं, बल्कि
भारत की अगली विकास-यात्रा का व्यापक ढांचा
है।
पहली
धारा—निर्माण
शक्ति
: भारत को केवल दुनिया
का बड़ा बाजार बने
रहना स्वीकार्य नहीं। प्रधानमंत्री ने घटक निर्माण
से लेकर डिजाइन और
अंतिम उत्पाद तक पूरी वैल्यू
चेन भारत में विकसित
करने की बात कही।
लागत, गुणवत्ता और पैमाने को
प्रतिस्पर्धा का आधार बनाते
हुए उन्होंने भारतीय उत्पादों को विश्वसनीय वैश्विक
पहचान दिलाने पर बल दिया।
उनका ‘क्वालिटी’ पर विशेष जोर
बताता है कि आत्मनिर्भरता
का अर्थ केवल देश
में उत्पादन करना नहीं, बल्कि
ऐसा उत्पादन करना है जिसे
दुनिया खरीदना चाहे।
दूसरी
धारा—कृषि
और
खाद्य
उत्पादन
: खेती को खेत की
मेड़ से वैश्विक बाजार
तक ले जाने का
विचार भाषण में स्पष्ट
दिखाई दिया। मोटा अनाज, मसाले,
फल, फूल और पारंपरिक
भारतीय खाद्य उत्पादों को वैश्विक ब्रांड
बनाने की बात कृषि
को केवल खाद्यान्न उत्पादन
से आगे बढ़ाकर निर्यात
और ब्रांड अर्थव्यवस्था से जोड़ती है।
रसायन-मुक्त खेती और वैश्विक
मानकों पर जोर भी
इसी बदलाव का संकेत है।
तीसरी
धारा—तकनीक
और
नवाचार : एआई, क्वांटम, अंतरिक्ष, रोबोटिक्स, डेटा सेंटर और
6जी जैसे क्षेत्र बताते
हैं कि अगले भारत
की लड़ाई केवल कारखानों में
नहीं, प्रयोगशालाओं और डिजिटल दुनिया
में भी होगी। प्रधानमंत्री
का संदेश साफ था—भारत
दुनिया का केवल उपभोक्ता
न बने, बल्कि नवाचार
का केंद्र बने।
चौथी
धारा—गति
शक्ति
: तेज रेल, आधुनिक राजमार्ग,
जलमार्ग, हवाई अड्डे और
मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स को विकास की
धमनियों के रूप में
देखा गया। बंदरगाहों को
केवल माल चढ़ाने-उतारने
के केंद्र के बजाय आर्थिक
विकास के इंजन के
रूप में विकसित करने
का विचार इस दृष्टि को
और व्यापक बनाता है।
पांचवीं
धारा—रक्षा
शक्ति : आत्मनिर्भर रक्षा अब केवल आयात
घटाने की नीति नहीं,
बल्कि भारत को वैश्विक
रक्षा आपूर्तिकर्ता बनाने की महत्वाकांक्षा है।
ड्रोन, काउंटर-ड्रोन, हाइपरसोनिक तकनीक और साइबर सुरक्षा
जैसे क्षेत्रों का उल्लेख बताता
है कि सुरक्षा की
परिभाषा भी बदल रही
है।
छठी
धारा—हरित
और
नीली
अर्थव्यवस्था : ग्रीन हाइड्रोजन, अक्षय ऊर्जा, ऊर्जा भंडारण, हरित गतिशीलता के
साथ समुद्र आधारित अर्थव्यवस्था पर जोर बताता
है कि विकास और
पर्यावरण को एक-दूसरे
का विरोधी मानने की पुरानी धारणा
से आगे बढ़ने का
प्रयास है।
सातवीं
धारा—भारत
की
सॉफ्ट
पावर : योग, आयुर्वेद, समग्र स्वास्थ्य, हस्तशिल्प, सिनेमा, वीएफएक्स, एनीमेशन, गेमिंग और डिजिटल कंटेंट
को दुनिया तक पहुंचाने की
बात भारत की सांस्कृतिक
शक्ति को आर्थिक शक्ति
में बदलने की कोशिश है।
यह वह क्षेत्र है
जहां भारत बिना किसी
सैन्य शक्ति के भी दुनिया
में अपना प्रभाव बढ़ा
सकता है।
सबसे बड़ा बदलाव—‘छोटा सोचने’ से इनकार
भाषण का एक
उल्लेखनीय पक्ष प्रधानमंत्री का
बड़े लक्ष्यों पर जोर रहा।
उन्होंने सवाल उठाया कि
भारत में दुनिया की
शीर्ष 500 कंपनियों में 50 कंपनियां क्यों नहीं हो सकतीं?
कोई भारतीय बैंक दुनिया के
शीर्ष पांच बैंकों में
क्यों नहीं आ सकता?
भारतीय फार्मा कंपनियां, कानून फर्म, रेटिंग एजेंसियां, कंसल्टिंग कंपनियां और टेक्नोलॉजी कंपनियां
विश्व की अग्रणी संस्थाओं
में क्यों नहीं गिनी जानी
चाहिए? यही वह बिंदु
है जहां भाषण सरकारी
योजनाओं की सीमा से
बाहर निकलकर राष्ट्रीय मनोविज्ञान को संबोधित करता
है। भारत की सबसे
बड़ी चुनौती केवल संसाधनों की
नहीं, आकांक्षाओं के पैमाने की
भी है। प्रधानमंत्री का
संदेश था कि जब
देश के पास प्रतिभा,
बाजार, जनशक्ति और तकनीकी क्षमता
है तो लक्ष्य भी
उसी अनुपात में बड़े होने
चाहिए।
आत्मनिर्भरता का अर्थ ‘दुनिया से दूरी’ नहीं
मोदी के भाषण
में आत्मनिर्भरता को संरक्षणवाद की
दीवार की तरह नहीं,
वैश्विक प्रतिस्पर्धा की तैयारी की
तरह प्रस्तुत किया गया। ‘मेक
इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर
लोकल’ के साथ वैश्विक
आपूर्ति श्रृंखला में भरोसेमंद केंद्र
बनने की बात इसी
विरोधाभास को दूर करती
है। अर्थात संदेश यह नहीं कि
भारत दुनिया से कट जाए;
संदेश यह है कि
भारत दुनिया से जुड़े, लेकिन
अपनी क्षमता के बल पर।
यही अंतर आत्मनिर्भरता की
अवधारणा को अधिक महत्वाकांक्षी
बनाता है।
भाषण में उपलब्धियों का आईना भी
प्रधानमंत्री ने पिछले 12 वर्षों
में विनिर्माण, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बुनियादी सुविधाओं, ऊर्जा, रक्षा, रेलवे, शिक्षा, स्टार्टअप और सामाजिक सुरक्षा
में हुए बदलावों को
भी सामने रखा। सरकारी आंकड़ों
के अनुसार रक्षा उत्पादन लगभग चार गुना,
इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन करीब सात गुना,
मोबाइल फोन उत्पादन करीब
35 गुना और आधुनिक रेल
कोच उत्पादन करीब 21 गुना बढ़ा है।
डिजिटल लेनदेन में लगभग 100 गुना
वृद्धि का भी उल्लेख
किया गया। सेमीकंडक्टर, सौर
ऊर्जा, गैस वितरण, रेलवे
विद्युतीकरण और रक्षा निर्यात
जैसे क्षेत्रों को भी उन्होंने
बदलते भारत की तस्वीर
के प्रमाण के रूप में
प्रस्तुत किया। इन आंकड़ों का राजनीतिक महत्व
अपनी जगह है, लेकिन
संपादकीय दृष्टि से इनका बड़ा
अर्थ यह है कि
भाषण का केंद्र ‘क्या
किया गया’ से आगे
बढ़कर ‘अब क्या हासिल
करना है’ पर था।
युवा—भाषण के केंद्र में भारत का भविष्य
इस बार युवा
केवल भाषण के श्रोता
नहीं, भविष्य के निर्माता के
रूप में सामने आए।
एआई प्रशिक्षण, ऑनलाइन परीक्षा कोचिंग, स्टार्टअप, शोध, अंतरिक्ष, ड्रोन,
खेल और नई तकनीकों
को लेकर प्रधानमंत्री ने
युवाओं के लिए अवसरों
का विस्तृत खाका रखा। विशेष
रूप से एक वर्ष
में एक करोड़ युवाओं
को एआई प्रशिक्षण देने
की घोषणा भविष्य की अर्थव्यवस्था में
कौशल की बदलती प्रकृति
का संकेत है। यहां भाषण
का एक गहरा संदेश
छिपा है—2047 का भारत आज
के युवाओं के हाथों बनेगा।
इसलिए विकसित भारत का सबसे
बड़ा निवेश इमारतों में नहीं, मानव
क्षमता में होना चाहिए।
नशामुक्त भारत और सामाजिक जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री ने नशे को
युवाशक्ति के सामने बड़ी
चुनौती बताते हुए नशामुक्त भारत
को केवल सरकारी अभियान
न मानकर हर परिवार की
जिम्मेदारी बनाने का आह्वान किया।
100 सप्ताह के अभियान में
स्वयंसेवी संगठनों, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं और आध्यात्मिक संगठनों
की भागीदारी का उल्लेख इसी
सामाजिक भागीदारी की ओर संकेत
करता है। यह भाषण
के आर्थिक और तकनीकी विमर्श
के बीच एक सामाजिक
विराम जैसा था—मानो
संदेश हो कि विकसित
राष्ट्र केवल ऊंची जीडीपी
से नहीं बनता; उसके
लिए स्वस्थ, जिम्मेदार और जागरूक समाज
भी चाहिए।
महिलाओं की भागीदारी पर राजनीतिक दलों को संदेश
महिला आरक्षण को लागू करने
के लिए सभी राजनीतिक
दलों से मिलकर आगे
बढ़ने का आह्वान भी
भाषण का महत्वपूर्ण राजनीतिक
संदेश रहा। प्रधानमंत्री ने
संसद और विधानसभाओं में
महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी को जल्द सुनिश्चित
करने की बात कही।
यह विषय केवल प्रतिनिधित्व
का नहीं, नीति निर्माण में
आधी आबादी की निर्णायक भागीदारी
का है।
राष्ट्रहित बनाम स्वार्थ—भाषण का नैतिक पक्ष
भाषण के अंतिम
हिस्से में प्रधानमंत्री ने
पंच प्रण की याद
दिलाते हुए राष्ट्रहित को
निजी हित से ऊपर
रखने और कर्तव्य को
जीवन की पहचान बनाने
की बात कही। यही
वह बिंदु है जहां आर्थिक
नीति का भाषण नागरिक
आचरण के भाषण में
बदल जाता है। क्योंकि
कोई भी सरकार अकेले
विकसित भारत नहीं बना
सकती। सड़क सरकार बना
सकती है, लेकिन उस
सड़क पर अनुशासन नागरिक
को रखना होगा। कारखाना
सरकार की नीति से
लग सकता है, लेकिन
गुणवत्ता उद्योग को सुनिश्चित करनी
होगी। स्टार्टअप को नीति का
सहारा मिल सकता है,
लेकिन नवाचार युवा को करना
होगा। कृषि को बाजार
मिल सकता है, लेकिन
वैश्विक गुणवत्ता किसान को अपनानी होगी।
अर्थात ‘विकसित भारत’ अंततः सरकार की योजना से
अधिक समाज की सामूहिक
परियोजना है।
जहां भाषण को कसौटी पर भी कसना होगा
किसी लोकतांत्रिक प्रधानमंत्री
के भाषण की वास्तविक
परीक्षा तालियों से नहीं, उसके
बाद के क्रियान्वयन से
होती है। बड़े लक्ष्य
आकर्षक होते हैं, लेकिन
बड़े लक्ष्य प्रशासनिक दक्षता, संघीय सहयोग, पूंजी, कौशल, रोजगार, शिक्षा की गुणवत्ता और
संस्थागत क्षमता की कठिन परीक्षा
भी लेते हैं। ‘सप्तधारा’
का विचार व्यापक है, लेकिन इसकी
सफलता इस बात पर
निर्भर करेगी कि घोषित प्राथमिकताएं
कितनी तेजी से जमीन
पर उतरती हैं और उनका
लाभ देश के अंतिम
व्यक्ति तक किस रूप
में पहुंचता है। यही वह
जगह है जहां लाल
किले का भाषण आने
वाले वर्षों के लिए सरकार
और समाज—दोनों के
सामने जवाबदेही का दस्तावेज भी
बन जाता है।
‘डिमाजी नक्सल’ की चेतावनी—भाषण का सबसे विवादास्पद अध्याय
भाषण में नक्सल-माओवादी हिंसा के कमजोर पड़ने
और प्रभावित क्षेत्रों में शांति तथा
विकास की बात के
साथ प्रधानमंत्री ने वैचारिक स्तर
पर मौजूद खतरे की भी
चेतावनी दी। ‘डिमाजी नक्सल’
जैसे शब्दों ने भाषण के
इस हिस्से को सबसे अधिक
राजनीतिक बहस वाला बना
दिया।समर्थकों की दृष्टि में
यह हिंसक विचारधारा के वैचारिक आधार
पर प्रहार है, जबकि आलोचक
इसे असहमति और वैचारिक विरोध
को संदेह की दृष्टि से
देखने की प्रवृत्ति मान
सकते हैं। यही लोकतंत्र
की जटिलता है—राष्ट्र की
सुरक्षा और लोकतांत्रिक असहमति
के बीच संतुलन हमेशा
जरूरी रहेगा।
लाल किले से निकला असली संदेश
इस बार के भाषण को यदि एक वाक्य में समेटना हो तो उसका सार शायद यह है— भारत अब विकास की गति बढ़ाने भर की बात नहीं कर रहा; वह विकास की परिभाषा का पैमाना बदलने की तैयारी कर रहा है। 2014 के बाद की यात्रा को उपलब्धियों के आईने में देखने के साथ प्रधानमंत्री ने 2047 के भारत की कल्पना को अगले चरण में पहुंचाने की कोशिश की है। विनिर्माण से एआई तक, खेत से वैश्विक बाजार तक, समुद्र से अंतरिक्ष तक, रक्षा से सॉफ्ट पावर तक—भाषण ने भारत की शक्ति को अनेक धाराओं में देखने का प्रयास किया।लेकिन इतिहास में भाषणों की चमक कुछ समय बाद धुंधली पड़ जाती है। टिकता वही है जिसे राष्ट्र अपने श्रम से साकार करता है। इसलिए लाल किले की प्राचीर से आज की सबसे बड़ी पुकार केवल ‘विकसित भारत’ की नहीं थी। यह पुकार थी—बड़े सपने देखो, उन्हें संकल्प में बदलो और संकल्प को परिणाम में बदलने का साहस करो। आजादी की पहली पीढ़ी ने भारत को स्वतंत्र कराया था। अब अगली पीढ़ी के सामने भारत को सक्षम, समृद्ध, आत्मनिर्भर और विश्व-नेतृत्वकारी राष्ट्र बनाने की चुनौती है। तिरंगे की छाया में दिया गया यह भाषण इसलिए एक सरकारी संबोधन भर नहीं, बल्कि 2047 की ओर बढ़ते भारत के लिए एक राजनीतिक-सामाजिक संकल्प-पत्र की तरह पढ़ा जाएगा। लाल किले से इस बार इतिहास ने पीछे मुड़कर कम देखा—आगे देखने की बेचैनी अधिक दिखाई दी।


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