नाग के फन में भय नहीं, सृष्टि की रक्षा का दर्शन
शिव
के
कंठ
से
धरती
की
मेड़
तक
नाग
पंचमी—जहां
आस्था
प्रकृति
के
साथ
सह-अस्तित्व
का
मंत्र
बन
जाती
है.
नाग
पंचमी
इसलिए
महत्वपूर्ण
नहीं
कि
इस
दिन
नागों
की
पूजा
होती
है।
वह
इसलिए
महत्वपूर्ण
है
कि
भारतीय
सभ्यता
ने
हजारों
वर्ष
पहले
यह
समझ
लिया
था
कि
मनुष्य
अकेला
जीव
नहीं
है।
उसके
साथ
असंख्य
जीव-जगत
हैं,
जिनके
बिना
जीवन
का
संतुलन
संभव
नहीं।
शिव
के
कंठ
का
नाग
इसी
सह-अस्तित्व
का
प्रतीक
है।
सावन
की
बूंदों
से
भीगी
धरती,
खेतों
की
मेड़,
जल
से
भरे
तालाब,
गंगा
की
धार,
मंदिरों
की
घंटियां
और
शिव
के
कंठ
में
विराजमान
नाग—इन
सबको
एक
साथ
रखकर
देखें
तो
नाग
पंचमी
एक
विराट
संदेश
बन
जाती
है।
प्रकृति
को
जीतना
नहीं
है,
उसके
साथ
जीना
है।
जीवों
से
डरना
नहीं
है,
उनके
अस्तित्व
को
समझना
है।
आस्था
को
केवल
कर्मकांड
नहीं
बनाना
है,
उसे
जीवन
का
संस्कार
बनाना
है।
यही
नाग
पंचमी
का
सबसे
सुंदर
अर्थ
है।
और
शायद
इसीलिए
सावन
की
हरियाली
में
जब
नागदेवता
के
सामने
दीप
जलता
है
तो
वह
केवल
एक
सर्प
की
पूजा
नहीं
होती—वह
उस
पूरी
सृष्टि
के
प्रति
मनुष्य
का
प्रणाम
होता
है,
जिसका
वह
स्वयं
एक
छोटा-सा
हिस्सा
है
सुरेश गांधी
कर देता है। पंचांग
परंपरा के अनुसार इस
दिन पंचमी तिथि, नक्षत्र और योग का
विशिष्ट संयोग बन रहा है।
उपलब्ध पंचांग गणनाओं में पंचमी तिथि
शाम तक रहने तथा
चंद्रमा के कन्या राशि
में संचरण का उल्लेख है। एक पर्व, जिसके भीतर पूरा ब्रह्मांड है
भारतीय संस्कृति की विशेषता रही
है कि उसने प्रकृति
को केवल उपयोग की
वस्तु नहीं माना। नदी
मां बनी, पर्वत देवता
बने, वृक्षों में देवत्व देखा
गया और पशु-पक्षियों
को भी धार्मिक प्रतीकों
में स्थान मिला। नाग इसी विराट
दृष्टि का एक अद्भुत
उदाहरण हैं। जिस जीव
से मनुष्य स्वाभाविक रूप से भय
खाता है, उसी को
सनातन परंपरा ने भगवान शिव
के कंठ का अलंकार
बना दिया। जिस नाग से
खेतों में किसान डर
सकता था, उसी को
खेतों की रक्षा करने
वाली प्रकृति की शक्ति का
प्रतीक माना गया। यही
नाग पंचमी का सबसे गहरा
संदेश है—भय को
सम्मान में बदल देना।
हिंदू परंपरा में श्रावण शुक्ल पंचमी नाग आराधना के लिए विशेष मानी गई है। पंचमी तिथि स्वयं नागों को प्रिय मानी गई है और इसी कारण इस दिन नागदेवता की पूजा की परंपरा विकसित हुई। पुराणों में नागों की अनेक कथाएं हैं। अनंत और शेष सृष्टि के आधार और भगवान विष्णु की शय्या से जुड़े हैं। वासुकि समुद्र मंथन में देवों और दैत्यों के बीच प्रयुक्त मंथनी की रस्सी बने। तक्षक महाभारत की कथा में आता है।
कालिय की
कथा भगवान कृष्ण से जुड़ती है।
अर्थात नाग भारतीय पुराकथाओं
में कहीं विनाशकारी शक्ति
हैं तो कहीं रक्षक;
कहीं धरती के भीतर
की ऊर्जा के प्रतीक हैं
तो कहीं जल और
उर्वरता से जुड़े देवस्वरूप।
नाग पंचमी इसी बहुआयामी नाग-परंपरा का उत्सव है।
बारह नागों का स्मरण—एक विराट प्रतीक संसार
नाग पंचमी की पूजा परंपरा में बारह प्रमुख नागों का स्मरण मिलता है— अनंत, वासुकि, शेष, पद्म, कंबल, कर्कोटक, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालिय, तक्षक और पिंगल।
इन नामों के पीछे केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की वह स्मृति भी है जिसमें धरती के भीतर, जलाशयों में, नदियों के किनारे और जंगलों में रहने वाले सर्पों को जीवन-चक्र का हिस्सा माना गया। नाग पूजा का मूल भाव इसलिए केवल यह नहीं कि नाग हमें न डसे; उससे बड़ा भाव यह है कि मनुष्य प्रकृति के उस संसार को स्वीकार करे, जो उसके नियंत्रण से बाहर है।इस बार सोमवार का संयोग क्यों महत्वपूर्ण?
नाग पंचमी और सोमवार का साथ आना पर्व को शिवमय बना देता है। भगवान शिव की पहचान ही ऐसी है जिसमें विरोधाभास एकाकार हो जाते हैं—जटाओं में गंगा, मस्तक पर चंद्रमा, शरीर पर भस्म और गले में नाग।
शिव के कंठ में विष है और उसी कंठ पर नाग भी विराजते हैं। इसलिए नाग पंचमी को शिव आराधना से अलग करके देखना कठिन है।सावन + सोमवार + नाग पंचमी का यह त्रिवेणी भाव काशी जैसे शिवनगर में और अधिक गहराता है।
बाबा विश्वनाथ
की नगरी में सावन
का प्रत्येक दिन शिव को
समर्पित है और नाग
पंचमी उस आराधना में
प्रकृति के एक और
रूप को जोड़ देती
है।
तिथि, नक्षत्र और योग का ज्योतिषीय विधान
पंचांग केवल तारीख बताने वाला कैलेंडर नहीं है। भारतीय परंपरा में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण मिलकर समय की प्रकृति को समझने का माध्यम रहे हैं। इस वर्ष नाग पंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी को पड़ रही है। पंचांग गणना में चंद्रमा के कन्या राशि में संचरण का उल्लेख मिलता है।
सप्ताह की शुरुआत में सूर्य के सिंह राशि की ओर संक्रमण का भी ज्योतिषीय महत्व बताया गया है। 17 अगस्त से शुरू होने वाले सप्ताह को पंचांग परंपरा नाग पंचमी और श्रावण सोमवार के धार्मिक संयोग के कारण विशेष मानती है।
चित्रा नक्षत्र
और शुभ योग से
जुड़े पंचांग विवरण भी इस पर्व
को ज्योतिषीय दृष्टि से विशिष्ट बनाते
हैं। चित्रा का संबंध सृजन
और रूप-सौंदर्य से
जोड़ा जाता है, जबकि
शुभ योग को परंपरागत
रूप से मंगलकारी माना
जाता है। हालांकि ज्योतिषीय
फलादेश व्यक्ति-विशेष की जन्मकुंडली पर
निर्भर करता है; इसलिए
केवल राशि देखकर निश्चित
भविष्यवाणी करना उचित नहीं।
नाग और शिव—दो प्रतीक, एक दर्शन
शिव के गले में लिपटा नाग भारतीय दर्शन का शायद सबसे विलक्षण प्रतीक है। सर्प अपनी केंचुली छोड़ता है। इसलिए वह पुनर्जन्म और परिवर्तन का प्रतीक भी बना। वह धरती के भीतर रहता है, इसलिए उसे पाताल और अधोलोक से जोड़ा गया।
उसका विष विनाशकारी है, लेकिन वही विष शिव के कंठ में जाकर नीलकंठ का रूप लेता है। यहां एक गहरी सांस्कृतिक व्याख्या सामने आती है—विनाशकारी शक्ति को नियंत्रण में रखकर लोककल्याण में बदल देना ही शिवत्व है। शिव के कंठ का नाग मानो यही कहता है कि शक्ति से डरना नहीं, उसे मर्यादा में रखना सीखना चाहिए।कृष्ण और कालिय—अहंकार के फन पर धर्म का स्पर्श
नाग पंचमी की
स्मृति कृष्ण की कालिय नाग
कथा के बिना भी
अधूरी है। यमुना के
जल को विषैला बना
देने वाले कालिय नाग
के फन पर बालक
कृष्ण का नृत्य भारतीय
लोकमानस में केवल एक
अद्भुत लीला नहीं है।
इसे अहंकार और विषाक्तता पर
धर्म की विजय के
प्रतीक के रूप में
भी देखा गया। कृष्ण
ने कालिय का संहार नहीं
किया; उसे वहां से
जाने का आदेश दिया।
कथा का यह पक्ष
आज के समय में
विशेष अर्थ रखता है—प्रकृति का विनाश नहीं,
संतुलन की स्थापना।
खेती की मेड़ से जुड़ी है नाग पंचमी
किसान का सामना सांपों से होता है। ऐसे समय में नाग पूजा की परंपरा ने भय को धार्मिक सम्मान में बदलने का काम किया। सर्प खेतों में चूहों और अन्य छोटे जीवों की संख्या नियंत्रित करने में भी प्राकृतिक भूमिका निभाते हैं।
यानी जिस
जीव को केवल भय
की दृष्टि से देखा गया,
वह कृषि-व्यवस्था के
संतुलन का भी एक
महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए नाग
पंचमी को यदि आधुनिक
भाषा में समझें तो
यह जैव-विविधता के
सम्मान का हजारों वर्ष
पुराना लोक-संदेश भी
है।
लोकगीतों में नाग, स्मृति में नाग
कहीं नाग मंदिरों
में मेले लगते हैं
तो कहीं खेतों की
मेड़ पर पूजा की
जाती है।bभारत की
यही विविधता नाग पंचमी को
केवल धार्मिक पर्व नहीं रहने
देती; वह लोक-संस्कृति
का जीवंत दस्तावेज बन जाती है।
नाग पूजा और 'नागदोष' की मान्यता
इसी कारण नाग पंचमी
पर अनेक लोग नागदेवता
की पूजा, शिव आराधना, मंत्र-जप और दान
आदि करते हैं। धार्मिक
आस्था में इसे नागभय
और पारिवारिक बाधाओं से मुक्ति की
कामना से जोड़ा जाता
है। लेकिन यहां भी जरूरी
है कि धार्मिक विश्वास
और ज्योतिषीय मान्यता को निश्चित वैज्ञानिक
परिणाम के रूप में
प्रस्तुत न किया जाए।
आस्था अपना स्थान रखती
है और विज्ञान अपना।
दूध चढ़ाने की परंपरा और बदलता समय
इसलिए
आस्था को बनाए रखते
हुए पूजा नागदेवता की
प्रतिमा, चित्र या प्रतीक के
सामने की जा सकती
है। यह परिवर्तन परंपरा
का विरोध नहीं, बल्कि परंपरा को जीवन और
प्रकृति के अनुकूल बनाने
की समझ है। सच्ची
श्रद्धा वह नहीं जो
किसी जीव को कष्ट
दे; सच्ची श्रद्धा वह है जो
उसके जीवन की रक्षा
करे।
नाग पंचमी की कथा में छिपा भय से मुक्ति का भाव
काशी में नाग पंचमी का अपना आध्यात्मिक अर्थ
काशी में नाग पंचमी को केवल पंचांग की एक तिथि मान लेना उसके अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह वह नगरी है जहां शिव स्वयं विश्वनाथ हैं। गंगा उनकी जटाओं से जुड़ी हैं और नाग उनके कंठ के आभूषण हैं।
सावन में जब काशी की गलियों से लेकर घाटों तक शिवभक्ति की धारा बहती है, तब नाग पंचमी उस धारा में प्रकृति का रंग भर देती है। यहां नाग की पूजा मानो
शिव के उस रूप को प्रणाम है जो मनुष्य को सिखाता है कि ईश्वर केवल मंदिर में नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रत्येक जीव में भी दिखाई दे सकता है।आज के समय में नाग पंचमी का अर्थ और बड़ा हो गया है. आज जंगल घट रहे हैं, जलस्रोत सिकुड़ रहे हैं और मनुष्य तथा वन्यजीवों के बीच टकराव बढ़ रहा है। ऐसे समय में नाग पंचमी की प्राचीन परंपरा को नए अर्थ में पढ़ना जरूरी है। सर्प दिखाई दे तो उसे मारना नहीं। भीड़ लगाकर उसे पकड़ना नहीं। उसे दूध पिलाने के नाम पर परेशान नहीं करना। प्रशिक्षित सर्प-रक्षक या वन विभाग की सहायता लेना—यही प्रकृति के प्रति आधुनिक श्रद्धा हो सकती है। क्योंकि जिस नाग को हम मंदिर में देवता कहते हैं, उसे खेत या घर के आसपास देखकर मार देना हमारी आस्था के भीतर के विरोधाभास को सामने ला देता है। पूजा और संरक्षण के बीच दूरी नहीं होनी चाहिए।













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