सारंगनाथ महादेव : जहां सावन में साले के घर मेहमान बनकर आते हैं भोलेनाथ
जीजा-साले के इस अनूठे शिवालय में एक ही अरघे में विराजते हैं दो शिवलिंग, सारंग ऋषि की तपस्या से जुड़ी है हजारों वर्ष पुरानी मान्यता. जी हां, काशी में शिव केवल मंदिरों में नहीं, रिश्तों में भी बसते हैं। यहां देवाधिदेव महादेव की आराधना जितनी विराट है, उनकी कथाएं उतनी ही आत्मीय। सारनाथ की धरती पर एक ऐसा शिवधाम है, जहां आस्था भगवान और भक्त के रिश्ते से आगे बढ़कर जीजा-साले के पवित्र संबंध का रूप ले लेती है। सावन आते ही इस प्राचीन धाम की धड़कन तेज हो जाती है। गंगाजल लिए कांवड़ियों के कदम बढ़ते हैं, घंटियां गूंजती हैं और हर-हर महादेव के जयघोष के बीच भक्त उस अद्भुत शिवालय की ओर खिंचे चले आते हैं, जहां एक ही अरघे में दो शिवस्वरूपों के दर्शन होते हैं। कहते है सावन में काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ अपनी नगरी से निकलकर यहां अपने साले सारंगनाथ के घर मेहमान बनते हैं। यही विश्वास इस धाम को काशी के अन्य शिवालयों से अलग पहचान देता है। यहां दर्शन केवल पुण्य की कामना नहीं, बल्कि उस सनातन भावभूमि से साक्षात्कार है जहां तपस्या में रिश्ते हैं, रिश्तों में भक्ति है और भक्ति में स्वयं महादेव। सारनाथ की बौद्ध धरोहर के बीच खड़ा सारंगनाथ महादेव मानो सदियों से यही संदेश दे रहा है—काशी में शिव हर रूप में हैं, बस देखने वाली आंख और महसूस करने वाला मन चाहिए
सुरेश गांधी
भारत की सनातन
परंपरा केवल पूजा-पद्धतियों
का विस्तार नहीं, बल्कि आस्था, लोकविश्वास और पुराण कथाओं
से बुना वह विराट
संसार है, जहां हर
तीर्थ अपने भीतर एक
कथा, हर शिवालय अपनी
अलग महिमा और हर शिवलिंग
किसी न किसी आध्यात्मिक
स्मृति को संजोए हुए
है। काशी तो स्वयं
शिव की नगरी है।
यहां बाबा विश्वनाथ के
साथ ऐसे अनेक प्राचीन
शिवालय हैं, जिनकी मान्यताएं
देश-दुनिया के श्रद्धालुओं को
अपनी ओर खींचती हैं।
इन्हीं में एक है
सारंगनाथ महादेव मंदिर, जहां शिव की
पूजा का स्वरूप ही
अपने आप में अद्भुत
है। सारनाथ को दुनिया भगवान
बुद्ध की प्रथम धर्मदेशना
की भूमि के रूप
में जानती है, लेकिन इसी
सारनाथ की धरती पर
सनातन आस्था का एक ऐसा
अध्याय भी जीवित है,
जहां मान्यता है कि भगवान
शिव अपने साले सारंग
ऋषि के यहां मेहमान
बनकर आते हैं। यही
वजह है कि यह
मंदिर लोकमानस में ‘जीजा-साले
का मंदिर’ के नाम से
भी प्रसिद्ध है। मंदिर के
गर्भगृह में एक ही
अरघे में दो शिवलिंगों
का दर्शन श्रद्धालुओं के लिए विशेष
आकर्षण है। एक शिवलिंग
अपेक्षाकृत लंबा और दूसरा
गोलाकार व कुछ ऊंचा
दिखाई देता है। धार्मिक
मान्यता इन्हें सारंगनाथ और बाबा विश्वनाथ
के स्वरूप से जोड़ती है।
सावन में यहां पहुंचने
वाला भक्त इस अनूठे
दृश्य को केवल आंखों
से नहीं, बल्कि आस्था से देखता है—एक ही स्थान
पर शिव के दो
स्वरूप, एक ही अरघे
में साथ-साथ।
सारंग ऋषि की तपस्या और शिव के साक्षात दर्शन की कथा
सारंगनाथ महादेव की कथा दक्ष
प्रजापति, माता सती और
भगवान शिव के विवाह
से जुड़ती है। लोकमान्यता के
अनुसार सारंग ऋषि दक्ष प्रजापति
के पुत्र और माता सती
के भाई थे। जब
सती का विवाह कैलाशवासी
शिव से हुआ, उस
समय सारंग ऋषि तपस्या में
लीन थे। विवाह के
बाद जब उन्हें अपनी
बहन के विवाह का
समाचार मिला तो मन
में अनेक प्रश्न उठे।
शिव के औघड़ स्वरूप
को लेकर उनके मन
में संशय भी पैदा
हुआ। कथा के अनुसार
बहन से मिलने के
लिए निकले सारंग ऋषि सारनाथ के
प्राचीन मृगदाव क्षेत्र में पहुंचे। यात्रा
की थकान से वहीं
विश्राम करते हुए उन्हें
स्वप्न में काशी के
दिव्य स्वरूप का दर्शन हुआ।
जागने पर उन्हें अपने
बहनोई शिव के प्रति
किए गए विचारों पर
पश्चाताप हुआ। उन्होंने उसी
धरती पर बाबा विश्वनाथ
की तपस्या करने का संकल्प
लिया। मान्यता है कि उनकी
तपस्या इतनी कठोर थी
कि उनके शरीर से
गोंद जैसा पदार्थ निकलने
लगा, फिर भी तपस्या
नहीं टूटी। अंततः उनकी साधना से
प्रसन्न होकर भगवान शिव
माता पार्वती के साथ उन्हें
दर्शन देने पहुंचे। कहते है शिव
ने सारंग ऋषि से वर
मांगने को कहा। तब
सारंग ऋषि ने कोई
सांसारिक वरदान नहीं मांगा, बल्कि
इच्छा जताई कि भगवान
शिव सदैव उनके साथ
इसी स्थान पर विराजमान रहें।
शिव ने उनकी भक्ति
से प्रसन्न होकर यह वरदान
स्वीकार किया और उन्हें
‘सारंगनाथ’ नाम से प्रतिष्ठित
होने का आशीर्वाद दिया।
यहीं से इस तीर्थ
की सबसे अनूठी मान्यता
जन्म लेती है—सारंगनाथ
महादेव के साथ स्वयं
बाबा विश्वनाथ का भी वास।
सावन में ससुराल छोड़ साले के घर आते हैं भोलेनाथ!
काशी की लोकआस्था
में सावन भगवान शिव
का महीना है। लेकिन सारंगनाथ
में यह आस्था एक
अलग रंग लेती है।
श्रद्धालुओं के बीच मान्यता
है कि सावन में
काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ काशी
से यहां आते हैं
और अपने साले सारंगनाथ
के यहां पूरे सावन
मास में निवास करते
हैं। इसीलिए सावन में सारंगनाथ
महादेव के दर्शन का
विशेष महत्व माना जाता है।
भक्तों का विश्वास है
कि सावन में यहां
जलाभिषेक और दर्शन करने
से बाबा विश्वनाथ की
आराधना के समान पुण्य
प्राप्त होता है। खासकर
सोमवार को मंदिर परिसर
में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती
है। कांवड़िये गंगाजल लेकर पहुंचते हैं
और हर-हर महादेव
के जयघोष के बीच शिवलिंग
का जलाभिषेक करते हैं। यहां आस्था
का सबसे सुंदर पक्ष
यही है कि भक्तों
के लिए सारंगनाथ केवल
एक मंदिर नहीं, बल्कि भोलेनाथ के ससुराल-संबंधों
से जुड़ा वह पवित्र पड़ाव
है, जहां देवाधिदेव शिव
अपने ही भक्त-भाई
के प्रेम से बंधे दिखाई
देते हैं।
गोंद चढ़ाने की अनूठी परंपरा
सारंगनाथ मंदिर की सबसे अलग
पहचान यहां की गोंद
चढ़ाने की परंपरा है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार सारंग
ऋषि की कठोर तपस्या
के दौरान उनके शरीर से
गोंद निकली थी। इसी कथा
के आधार पर आज
भी श्रद्धालु यहां गोंद चढ़ाते
हैं। लोकविश्वास है कि चर्म
रोग से पीड़ित व्यक्ति
यदि सच्ची श्रद्धा से सारंगनाथ महादेव
को गोंद अर्पित करे
तो उसे रोग से
मुक्ति मिलती है। हालांकि इसे
धार्मिक लोकमान्यता के रूप में
ही देखा जाना चाहिए;
किसी बीमारी के उपचार के
लिए चिकित्सकीय सलाह का विकल्प
नहीं माना जा सकता।
इसी तरह बेरोजगारी, संतान सुख, पारिवारिक सुख-शांति और मनोकामना पूर्ति
को लेकर भी श्रद्धालुओं
की गहरी आस्था है।
विवाह के बाद नवदंपती
यहां दर्शन कर दांपत्य और
दोनों परिवारों के बीच मधुर
संबंध की कामना करते
हैं।
आदि शंकराचार्य से जुड़ी मान्यता
मंदिर के दो शिवलिंगों
को लेकर एक और
महत्वपूर्ण धार्मिक मान्यता प्रचलित है। कहा जाता
है कि आदि गुरु
शंकराचार्य ने भारत भ्रमण
के दौरान अनेक स्थानों पर
सनातन परंपरा को पुनर्स्थापित करने
का कार्य किया और सारनाथ
में भी शिव उपासना
को प्रतिष्ठा मिली। स्थानीय धार्मिक परंपरा एक शिवलिंग को
सारंग ऋषि और दूसरे
को बाबा विश्वनाथ के
स्वरूप से जोड़ती है।
इतिहास और पुरातत्व की
दृष्टि से मंदिर की
स्थापना की सटीक तिथि
को लेकर अलग-अलग
मत हो सकते हैं,
लेकिन स्थानीय आस्था में इसकी प्राचीनता
हजारों वर्षों तक जाती है।
यही प्राचीनता मंदिर को काशी के
धार्मिक भूगोल में विशिष्ट स्थान
देती है।
बौद्ध, जैन और सनातन परंपराओं का संगम
सारनाथ की धरती स्वयं
भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं के सहअस्तित्व का
जीवंत उदाहरण है। यही वह
भूमि है जहां भगवान
बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति
के बाद प्रथम धर्मचक्र
प्रवर्तन किया। आसपास जैन परंपरा से
जुड़े धार्मिक स्थल भी हैं
और इसी भूभाग में
सारंगनाथ महादेव का प्राचीन शिवालय
सनातन आस्था की ध्वजा थामे
खड़ा है। इस दृष्टि
से सारंगनाथ केवल एक मंदिर
नहीं, बल्कि सारनाथ की बहुधर्मी आध्यात्मिक
विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा
है—जहां घंटियों की
ध्वनि, बौद्ध स्तूपों की शांति और
प्राचीन तीर्थ परंपरा एक ही सांस्कृतिक
भूगोल में दिखाई देती
है।
तीस फुट ऊंचे टीले पर आस्था का शिखर
मंदिर की प्राकृतिक स्थिति
भी इसे आकर्षक बनाती
है। करीब 30 फुट ऊंचे टीले
पर स्थित मंदिर का शिखर दूर
से ही दिखाई देता
है। शिखर पर लहराती
धर्मपताका मानो श्रद्धालुओं को
दूर से ही बुलाती
है। सावन आते ही
मंदिर और आसपास का
पूरा क्षेत्र भक्ति के रंग में
रंग जाता है। कांवड़ियों
के जत्थे, हर-हर महादेव
के जयकारे, बेलपत्र और पुष्प लिए
श्रद्धालु, जलाभिषेक की कतारें और
मंदिर परिसर में गूंजते मंत्र
वातावरण को शिवमय कर
देते हैं। सारनाथ स्टेशन
के निकट स्थित होने
के कारण यहां पहुंचना
भी अपेक्षाकृत आसान है। वाराणसी
कैंट क्षेत्र से भी सड़क
मार्ग द्वारा श्रद्धालु मंदिर तक पहुंचते हैं।
सावन का मेला और लोकजीवन की रौनक
सारंगनाथ की धार्मिक यात्रा
केवल दर्शन तक सीमित नहीं
रहती। सावन के साथ
यहां मेला भी सजता
है। झूले, खिलौनों की दुकानें, गुब्बारे,
खान-पान और ग्रामीण
बाजार की रौनक पूरे
क्षेत्र को उत्सव में
बदल देती है। रविवार
और सोमवार को विशेष भीड़
रहती है। आसपास के
जिलों से लोग परिवार
के साथ पहुंचते हैं।
बच्चों के लिए झूले
और मनोरंजन के साधन मेले
को धार्मिक आयोजन के साथ लोकउत्सव
का रूप देते हैं।
यही काशी की परंपरा है—जहां धर्म केवल
मंदिर के गर्भगृह में
नहीं रहता, बल्कि बाजार, मेले, गीत, प्रसाद और
लोकजीवन में उतरकर उत्सव
बन जाता है।
भंडारे में छलका श्रद्धा का प्रसाद
सावन के दौरान
मंदिर परिसर में धार्मिक आयोजनों
और भंडारों का भी आयोजन
होता है। श्रद्धालु और
संत सामूहिक रूप से प्रसाद
ग्रहण करते हैं। मंदिर
परिसर में भगवान शिव
के साथ गणेश, लक्ष्मी-नारायण, मां भगवती, पंचमुखी
हनुमान, रामदरबार, श्याम बाबा, बालाजी महाराज और लड्डू गोपाल
सहित अन्य देवी-देवताओं
के विग्रह भी श्रद्धालुओं को
आकर्षित करते हैं। भंडारा
यहां केवल भोजन नहीं,
बल्कि काशी की उस
परंपरा का प्रतीक है
जहां ‘अतिथि में भगवान’ और
‘अन्न में अन्नपूर्णा’ का
भाव दिखाई देता है।
काशी के धार्मिक मानचित्र में विशेष स्थान
सारंगनाथ महादेव को काशी के
प्रमुख शिवालयों की परंपरा में
महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। काशी में
शिव के असंख्य मंदिर
हैं और प्रत्येक मंदिर
की अपनी लोकमान्यता है।
सारंगनाथ की विशेषता उन
मान्यताओं में है जो
इसे सीधे बाबा विश्वनाथ,
माता सती और सारंग
ऋषि की कथा से
जोड़ती हैं। इसलिए सावन
में यहां आने वाला
श्रद्धालु केवल शिवलिंग पर
जल नहीं चढ़ाता, बल्कि
एक ऐसी कथा के
सामने खड़ा होता है
जिसमें भाई का बहन
के प्रति प्रेम, बहनोई के प्रति सम्मान,
तपस्या, पश्चाताप और ईश्वर के
प्रति अटूट भक्ति एक
साथ दिखाई देती है।
एक अरघा, दो शिवलिंग और आस्था का एक संसार
सारंगनाथ महादेव की सबसे बड़ी पहचान यही है कि यहां एक ही अरघे में दो शिवलिंग विराजमान हैं। एक ओर सारंग ऋषि की तपस्या की स्मृति, दूसरी ओर स्वयं भगवान शिव की उपस्थिति की मान्यता। इसीलिए यह मंदिर धार्मिक दृष्टि से जितना अनूठा है, उतना ही भावनात्मक भी। काशी की धरती पर जहां हर कदम पर शिव की उपस्थिति का अहसास होता है, वहीं सारंगनाथ में शिव की कथा कुछ और ही आत्मीय हो जाती है। यहां भोलेनाथ केवल देव नहीं, जीजा भी हैं; सारंगनाथ केवल शिवलिंग नहीं, भक्त-साले का प्रतीक भी हैं। सावन में जब कांवड़ियों के कंठ से ‘बोल बम’ और मंदिर परिसर से ‘हर-हर महादेव’ की गूंज एक साथ उठती है, तब लगता है जैसे प्राचीन कथा आज भी वर्तमान में सांस ले रही हो। सारंगनाथ महादेव इसलिए केवल एक शिवालय नहीं—यह काशी की उस सनातन कल्पना का जीवंत प्रतीक है, जहां देवता भी रिश्तों की डोर से बंधते हैं, भक्त की तपस्या से प्रसन्न होते हैं और आस्था सदियों की दूरी पार कर आज भी मनुष्य के मन में उतनी ही जीवित रहती है।


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