बिहार की तर्ज पर यूपी में तावड़े बनेंगे भाजपा के खेवनहार
बिहार की
चुनावी
बाजी
के
बाद
अब
सबसे
बड़े
सियासी
रण
की
कमान,
2027 में
संगठन
और
सामाजिक
समीकरण
साधने
की
चुनौती
सुरेश गांधी
वाराणसी। बिहार में चुनावी रणनीति
को धार देकर भाजपा-एनडीए को सफलता की
राह दिखाने वाले विनोद तावड़े
अब उत्तर प्रदेश की सियासी पतवार
संभालेंगे। भाजपा ने उन्हें 2027 के
विधानसभा चुनाव के लिए प्रदेश
का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया है। तावड़े
के साथ जगदीश पटेल
को सह-प्रभारी की
जिम्मेदारी दी गई है।
यूपी की 403 विधानसभा
सीटों का चुनाव बिहार
से कहीं बड़ा और
राजनीतिक रूप से अधिक
निर्णायक है। यही वजह
है कि भाजपा नेतृत्व
ने संगठन के शांत लेकिन
चुनावी रणनीति के माहिर माने
जाने वाले तावड़े पर
दांव लगाया है। उनकी चुनौती
केवल सीटों का गणित साधना
नहीं, बल्कि बूथ से लेकर
प्रदेश संगठन तक चुनावी मशीनरी
को एक सूत्र में
पिरोने की होगी।
तावड़े की नियुक्ति को
भाजपा के नए राष्ट्रीय
अध्यक्ष नितिन नवीन की संगठनात्मक
रणनीति के अगले चरण
के रूप में भी
देखा जा रहा है।
एक दिन पहले ही
नवीन की नई राष्ट्रीय
टीम में तावड़े को
महत्वपूर्ण स्थान मिला और अगले
ही दिन उन्हें देश
के सबसे बड़े राजनीतिक
राज्य की चुनावी कमान
सौंप दी गई।
बिहार की सफलता, यूपी की अग्निपरीक्षा
बिहार में मिली कामयाबी
ने तावड़े की रणनीतिक क्षमता
पर पार्टी का भरोसा बढ़ाया
है। अब वही अनुभव
यूपी में आजमाया जाएगा।
हालांकि उत्तर प्रदेश का चुनावी भूगोल,
जातीय समीकरण और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
बिहार से अलग है।
यहां भाजपा के सामने सत्ता
की निरंतरता बनाए रखने के
साथ 2024 लोकसभा चुनाव के बाद बदले
राजनीतिक समीकरणों को साधने की
भी चुनौती होगी। ऐसे में तावड़े
के सामने सबसे बड़ा सवाल
यही होगा—क्या बिहार
में चली चुनावी रणनीति
यूपी में भी जीत
की पटकथा लिख पाएगी? भाजपा
ने उन्हें सिर्फ प्रभारी नहीं बनाया है,
बल्कि 2027 के सबसे बड़े
सियासी इम्तिहान का रणनीतिकार बनाकर
मैदान में उतारा है।
संघ की पाठशाला से सियासत के शिखर तक
विनोद तावड़े की राजनीतिक यात्रा
छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी
परिषद से शुरू हुई।
1984 में एबीवीपी से जुड़े, 1989 में
महाराष्ट्र के प्रदेश सचिव
और 1993-94 में राष्ट्रीय महासचिव
(संगठन) बने। 1994 में सक्रिय भाजपा
राजनीति में आए। 1995 में
पहली बार भाजपा महाराष्ट्र
के महासचिव बने। यानी चुनावी
राजनीति में उतरने से
पहले ही संगठन खड़ा
करने का लंबा अनुभव
हासिल कर चुके थे।
पद नहीं, संगठन साधने की कार्यशैली
तावड़े की पहचान ऐसे
संगठनकर्ता की रही है
जो चुनाव को केवल प्रत्याशी
और प्रचार तक सीमित नहीं
रखते। बूथ, विधानसभा, लोकसभा
और सामाजिक समूहों के स्तर पर
अलग-अलग रणनीति बनाना
उनकी कार्यशैली का हिस्सा माना
जाता है। 2023 में वाराणसी में
उन्होंने स्पष्ट तौर पर लोकसभा
और विधानसभा कोर कमेटियों की
नियमित बैठक, सामाजिक-राजनीतिक विश्लेषण और भाजपा से
दूर रहे सामाजिक वर्गों
तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया
था।
मंत्री से संगठन के राष्ट्रीय रणनीतिकार तक
2014 में महाराष्ट्र विधानसभा
पहुंचने के बाद तावड़े
को देवेंद्र फडणवीस सरकार में स्कूली शिक्षा,
उच्च एवं तकनीकी शिक्षा,
चिकित्सा शिक्षा, खेल एवं युवा
कल्याण, संस्कृति और मराठी भाषा
समेत कई महत्वपूर्ण विभाग
मिले। इससे पहले वे
महाराष्ट्र विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष
भी रह चुके थे।
2019 के बाद प्रदेश की
सक्रिय राजनीति से बाहर होने
के बावजूद संगठन में उनकी भूमिका
खत्म नहीं हुई; 2020 में
राष्ट्रीय सचिव और नवंबर
2021 में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए। 2026 में
वे राज्यसभा पहुंचे।
बिहार में बना ‘गेम चेंजर’ का प्रोफाइल
तावड़े के राजनीतिक पुनरुत्थान
में बिहार अहम पड़ाव बना।
2022 से बिहार में संगठन और
चुनावी रणनीति पर उनकी सक्रियता
बढ़ी। 2025 के विधानसभा चुनाव
में भाजपा-एनडीए की रणनीति, जमीनी
संगठन और सामाजिक समीकरण
साधने में उनकी भूमिका
को पार्टी की बड़ी सफलता
से जोड़कर देखा गया। यही
बिहार का अनुभव अब
उन्हें यूपी के मिशन-2027
में सबसे बड़ी जिम्मेदारी
तक ले आया है।
रणनीति की खासियत—सामाजिक गणित + संगठन
तावड़े की चुनावी कार्यप्रणाली
का एक प्रमुख पक्ष
सामाजिक समीकरणों को संगठनात्मक गतिविधियों
से जोड़ना है। वाराणसी में
2023 की बैठक में उन्होंने
कमजोर प्रभाव वाले सामाजिक समूहों
में पहुंच बढ़ाने, युवा मतदाताओं से
संवाद और महिला-किसान
मोर्चों को सक्रिय करने
की रणनीति पर जोर दिया
था। यूपी जैसे जातीय
और क्षेत्रीय विविधता वाले राज्य में
यही क्षमता उनकी सबसे बड़ी
परीक्षा होगी।
काशी से भी रहा है चुनावी नाता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय
क्षेत्र वाराणसी से तावड़े का
चुनावी जुड़ाव नया नहीं है।
अगस्त 2023 में वे भाजपा
की लोकसभा प्रवास योजना के तहत वाराणसी
पहुंचे और जौनपुर, गाजीपुर
व घोसी लोकसभा क्षेत्रों
की क्लस्टर बैठक को संबोधित
किया। 2024 में भी भाजपा
की पहली लोकसभा सूची
जारी करते समय तावड़े
ने ही नरेंद्र मोदी
के वाराणसी से चुनाव लड़ने
की घोषणा की थी। हालांकि
उपलब्ध रिकॉर्ड उन्हें वाराणसी का औपचारिक चुनाव
प्रभारी नहीं बताता।
यूपी : अब सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा
बिहार की सफलता के
बाद अब तावड़े के
सामने 403 विधानसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश
है। भाजपा ने 18 अगस्त 2026 को उन्हें 2027 विधानसभा
चुनाव के लिए प्रदेश
का चुनाव प्रभारी बनाया है, जबकि गुजरात
के जगदीश पटेल सह-प्रभारी
होंगे। यूपी में उन्हें
संगठन, सामाजिक समीकरण, टिकट वितरण और
सत्ता-विरोधी संभावनाओं के बीच तालमेल
बैठाने की चुनौती होगी।
‘गेम चेंजर’ क्यों?
तावड़े की सबसे बड़ी ताकत किसी एक चुनावी नारे में नहीं, बल्कि लंबे संगठनात्मक अनुभव, दबाव में शांत रहने, विभिन्न सामाजिक वर्गों से संवाद और चुनावी मशीनरी को बूथ स्तर तक सक्रिय करने की क्षमता में बताई जाती है। बिहार के बाद यूपी की जिम्मेदारी मिलना इस बात का संकेत है कि भाजपा नेतृत्व उन्हें अब केवल महाराष्ट्र के नेता के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर के चुनावी रणनीतिकार के रूप में देख रहा है।

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